आजादी से पहले का हरियाणा

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रघुवीर सिंह

हरियाणा हिन्दुस्तान के उन प्रदेशों में से है,जो राजनीतिक तथा सामाजिक तौर पर काफी पिछड़े हुए इलाके हैं और जिनमें राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन तथा दूसरे समाज-सुधार आंदोलनों का प्रभाव भी ज्यादा नहीं रहा। शिक्षा का प्रसार भी बहुत कम रहा और कारखाने न के बराबर ही लगे।

         सारे ही प्रांत में खेती काफी पिछड़ी हुई थी। जमीन के नीचे लायक पानी बहुत कम है और कम इलाके में है, नहरी सिंचाई का कोई प्रबंध नहीं था, दिल्ली में अच्छी या बुरी सरकार, मजबूत या कमजोर सरकार के अनुसार यमुना नदी से नहर निकाल कर खेती के लिए सिंचाई का प्रबंध बनता-बिगड़ता रहा, परन्तु मुख्यत: पशुपालन लोगों का मुख्य-धंधा था और इसलिए अधिकतर भूमि या तो शामलात बंजर चरागाहें थी या व्यक्तिगत बंजर चरागाहें थी। काश्त के लिए काफी कम जमीन थी और उसमें भी अधिकतर चारे वाली फसलें ही बोई जाती थीं। परिणामस्वरूप इस इलाके में बहुत कम अतिरिक्त उपज होती थी और उसी को दिल्ली दखल कर लेती थी, क्योंकि सारे देश का शक्ति-केंद्र थी। यही कारण था कि हरियाणा में व्यवसायिक पूंजी का संचय बहुत निम्नस्तर का रहा और उसका भी मुख्य तौर-तरीका सूदखोरी ही रहा, माल का व्यापार नहीं। यही कारण है कि हरियाणा में मध्ययुग में तथा अंगे्रजी राज में भी कोई बड़ा व्यवसायिक केंद्र विकसित नहीं हुआ और न कोई साधन-सम्पन्न व्यापारी वर्ग पैदा हुआ जो पूंजीवाद के पदार्पण के  समय व्यापार में इक_े हुए रुपए को उद्योग  में लगाकर पूंजीपति वर्ग में विकसित हो जाता और न ही कोई ऐसा सामन्त वर्ग यहां था, जिसके पास पीढिय़ों की लूट-खसोट से इक_ी की हुई फालतू दौलत हो और वह उसको लगा दे।

        हरियाणा में सामन्तशाही कायम न होने के दो कारण रहे दिखते हैं। पहला दिल्ली। दिल्ली मध्ययुग में मुख्य शक्ति केंद्र थी। इसलिए अपने नजदीक किसी भी दूसरे सामंत को पैदा होने देने अपने लिए खतरनाक समझती थी। दूसरा कारण बहुत कम अतिरिक्त उपज होना था और जो इस बात से और भी साफ जाहिर होता है कि जो भी छोटी-बड़ी सामंतशाहियां, राजे-रजवाड़े तथा जागीरदारियां कायम हुईं, अंग्रेजी राज से पहले,चाहे बाद में उनकी हालत बहुत नाजुक रही। उनमें से अधिकतर की हालत जैसे पटौदी, दुजाना, लुहारू तो ऐसी थी कि उन्हें अपने बच्चों की शादियों के लिए भी कर्जे उठाने पड़ते थे। इसका एक परिणाम यह भी रहा कि सामंतशाही जो भाषा, साहित्य और कला का विकास करती है, हरियाणा उससे भी वंचित रह गया और आज हमारी कोई भाषा नहीं है तथा साहित्य नहीं है, कला की तो बात ही जाने दें। दिल्ली की उपस्थिति के कारण वह सामन्ती शोषण की सीढ़ी कायम नहीं हुई जो किसान को जमीन पर कमरतोड़ मेहनत करने पर मजबूर करती है तथा उसे अपनी सारी ताकत लगाकर अधिक उपजाने पर विवश करती है और इस प्रक्रिया में पैदावार के औजारों को भूमि को, सिंचाई को, सिंचाई साधनों को तथा बीज-खाद को विकसित करने पर मजबूर करती है। दूसरे शब्दों में पैदावार की ताकतों का विकास मध्ययुग में पिछड़ा हुआ रहा, जिससे व्यवसायिक पूंजी का संचय भी निम्न स्तर का रहा। कुछ साथियों ने यह कहने की कोशिश की है कि हरियाणा में खेती बहुत पहले से विकसित थी और यहां काफी बड़ी मात्रा में अतिरिक्त उत्पादन होता था। इस तर्क की हिमायत में वे अकबर के समय के कुछ सरकारी डाक्यूमैंट आंकड़ों सहित  उद्धृत करते हैं। इन आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि ये कितने इलाके की पैदावार है और वहां की जनसंख्या कितनी है। बिना इसके अतिरिक्त उपज का निर्धारण कर लेना जल्दबाजी ही कही जाएगी। जब हम हरियाणा में अतिरिक्त उत्पादन कम होने की बात करते हैं तो यह बात एबसोल्यूट अर्थ में नहीं सापेक्षिक अर्थ में करते हैं। (क्योंकि बिना कतई अतिरिक्त उपज के तो कोई भी वर्ग समाज और राज्य टिक नहीं सकता)।

                मुगलकाल में बादशाह सारी भूमि का मालिक था। जो काश्त भूमि से लगान वसूल करता था, जिसकी मात्रा अलाउद्दीन खिलजी के समय में आधा भाग और अकबर के समय में कुल पैदावार का 1/3 भाग था। देखना यह है कि बादशाह को लगान देने के बाद कोई भाग बचता है या नहीं और यदि बचता है तो क्या वह उस प्रांत या इलाके में व्यवसायिक संचय के लिए पर्याप्त है? कुछ लोगों ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि तुर्कों और मुगलों के जमाने में हरियाणा के बहुत बड़े भू-भाग में नहरों से सिंचाई होती थी और खेती बहुत अधिक विकसित थी। इन लोगों ने कहीं भी यह व्याख्या नहीं की कि हरियाणा में उनके मुताबिक खेती का इतने पुराने जमाने में विकास होकर अंग्रेजों के आने तक क्यों और कैसे पिछड़ गया? यह सर्वविदित है कि वर्तमान भाखड़ा नहर के आने से पहले टोहाना, सिरसा तथा हिसार के बड़े भू-भाग में धूल उड़ती थी और खेती पूरी तरह मानसून पर आधारित थी। यह कहना भी संदर्भ से बाहर न होगा कि हरियाणा का यह भू-भाग बहुत ही कम वर्षा वाला भू-भाग है और इसका ‘वाटर टेबल’ उत्तर पूर्वी हरियाणा के मुकाबले में बहुत नीचे है। मूल बात तो यही है कि अंग्रेजों के आने से पहले अतिरिक्त उत्पादन (लगान की लूट के बाद) क्या इस स्तर का था कि किसी बड़े व्यवसायिक केंद्र को जन्म दे सकता और सामंती स्तरीकरण की सीढ़ी तैयार कर पाता? क्या कारण था कि यहां की ‘आर्गेनिक’ सामन्तशाही विकसित नहीं हो पाई?

                हिन्दुस्तान में अंग्रेजी शासन की कामयाबी के बाद हरियाणा को कई टुकड़ों में बांट दिया गया और संसार के प्रथम महायुद्ध तक यह सारे टुकड़े उपेक्षित ही रहे। पंजाब दिल्ली में प्रथम बार 1879 में जमीन की सैटिलमैंट हुई और प्रथम बार भूमि में व्यक्तिगत-सम्पति कायम हुई। पश्चिमी यमुना नहर निकलने से सिंचाई के साधन कायम हुए, जिससे गेहूं-गन्ने की बिजाई बढ़ी तथा कपास की खेती भी बढ़ी। प्रथम महायुद्ध में हरियाणा के कुछ विशेष इलाकों से काफी बड़ी संख्या में लोग सेना में भर्ती हुए। इससे पहले हरियाणा से लोग किसी भी सरकारी इदारे में स्थान नहीं पाते थे।

                हरियाणा में गंगा यमुना पर दोआब था। वही ऐसा इलाका था जो पर्याप्त अतिरिक्त उपज करता था। और इसी कारण मुजफ्फरनगर वगैरा के इलाके में कुछ जमींदारियां कायम हुईं और जब भी दिल्ली ने लगान बढ़ाया तो इन जमींदारियों ने लगान बढ़ौतरी के खिलाफ बड़े जन-विरोध गठित किए। इन जन-विरोधों का संगठनात्मक प्रारूप सर्वखाप पंचायतें थी। यह यों ही नहीं था कि जनविरोध संगठित करने वाली सर्वखाप पंचायतों की बैठकें अधिकतर मेरठ, मुजफ्फरनगर जनपदों में हुई और बाल्यान खाप के गांव (सोरों) में सर्वखाप पंचायत का स्थायी दफ्तर लंबे अरसे तक रहा।

                सन् 1857 के स्वतंत्रता युद्ध में हरियाणा के लोगों ने बहुत बड़ी संख्या में  हिस्सा लिया था और दिल्ली को स्वतंत्र कराने में तथा उसकी स्वतंत्रता को कायम रखने में हरियाणा के लोग मुगल बादशाह के साथ थे। जो भी छोटे-बड़े राजे-रजवाड़े हरियाणा में कायम हुए थे जैसे वल्लभगढ़, फरुखनगर, झज्जर,  रिवाड़ी, बहादुरगढ़,  फतेहाबाद और टोहाना इन सभी ठिकानों ने मुगल बादशाह का साथ दिया और अंग्रेजों को मार भगाने में अपना हिस्सा डाला। इसके अलावा दिल्ली-मेरठ जनपद, दिल्ली-हांसी, दिल्ली-करनाल, दिल्ली-गोहाना आदि जनपदों के लोगों ने पूरे उत्साह और बहादुरी से मुगल बादशाह का साथ दिया और गोरों को मार भगाने के लिए संघर्ष में शामिल हुए। इसलिए ‘पांच फिरंगी दस गोरे, लड़ै जाट के दो छोरे’, ‘फिरंगी लुट गयो रे हाथरस के बाजार’ आदि लोकगीत बने।

             प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन की शिकस्त के बाद अंग्रेजों ने हरियाणा प्र्रांत में बहुत पाशविक अत्याचार किए। सभ्य  संसार के नेताओं की सभ्यता का काफी भोंडा और निम्नस्तर का प्रदर्शन था। इन्सानी शोषण पर आधारित कोई भी सभ्यता मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत नहीं हो सकती। शोषण पर चोटें पड़ते  ही उसके मानवीय रूप का पर्दा फौरन उठ जाता है और शोषक का पाश्विक रूप खुल कर सामने आ जाता है।

                यूरोप में नई पैदा हुई पूंजीवादी सभ्यता के नेता अंग्रेज स्वतंत्रता प्राप्ति की इच्छा रखने वाले साधारण से साधारण हिन्दुस्तानी पर किस प्रकार भेडिय़ों की तरह टूट पड़े। यह इस बात से साफ जाहिर हो जाती है कि लिबासपुर के चौधरी उदमी राम को 37 दिन तक लटका-लटका कर मारा गया। उसके हाथ-पैरों को पेड़ के साथ बांध कर कीलें ठोक दी गई और 37 दिन तक उसी हालत में हिन्दुस्तान की आजादी का वह वीर सिपाही तड़प-तड़प कर अंग्रेजी पूंजीवादी सभ्यता की स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे के ऊंचे सिद्धांतों की कहानी कहता रहा। ब्रिटेन में प्रजातंत्र तथा जनवादी अधिकारों के विकास के इहिास का प्रतिनिधि हिन्दुस्तान में कर्नल हडसन बना, जिसने हजारों निहत्थे लोगों को मामूली मामूली कसूरों पर बिना कोई मुकद्दमा चलाए मौत के घाट उतार दिया। इस काम में उसने बच्चे, बूढ़े या औरत का भी कोई ख्याल नहीं किया। बड़े-बड़े गांवों में मुख्य चौराहों पर उसने लोगों को पेड़ों पर फांसी लटका दिया और लाशें नहीं उतारने दी। गोहाना जनपद में शामड़ी गांव में तेरह मुखिया किसानों को एक कतार में खड़े करके गर्दनें काट दी गई। महम, हांसी, फतेहाबाद, टोहाना, बल्ला आदि कितने ही स्थानों पर लोगों के साथ अमानवीय ढंग से अत्याचार किए गए। इसके अलावा बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह को, नवाब झज्झर को, बहादुरगढ़ के नवाब को, दिल्ली की कोतवाली के सामने 1858 को फांसी दी गई।

                मध्य युग में लंबे अरसे तक दिल्ली, हिन्दुस्तान की राजधानी रही और विशेषकर मुगल-काल में तो दिल्ली ही हिन्दुस्तान का शक्ति-बिन्दु रही। लेकिन हरियाणा के लोगों ने अपने सामाजिक, धार्मिक कार्यकलापों में दिल्ली के बादशाहों की दखलांदाजी बरदास्त नहीं की और जिस राजा ने भी इस दखलांदाजी का प्रयत्न किया, उसके खिलाफ लोगों ने सामूहिक रूप से विरोध-प्रदर्शन किया। दिल्ली की कमजोरी का लाभ उठाकर जब जब भी बाहर से हमलावर आए, हरियाणा के लोगों ने उसका विरोध किया। तैमूर लंग तथा अहमदशाह अब्दाली जैसों को दिल्ली में टिकने नहीं दिया। नसीरूद्दीन, अलाउद्दीन खिलजी, तुगलक तथा औरंगजेब आदि कितने ही दिल्ली के बादशाहों की सामाजिक व धार्मिक मामलों में दखलदांजी तथा मालगुजारी की वसूली तथा बढ़ौतरी का सफल विरोध किया। दिल्ली के बादशाहों की इन नीतियों के विरोधी संघर्ष में लोग गांव छोड़ कर अपने पशुओं को जंगलों में ले जाते थे। जमीनें बंजर पड़ी रहती, बादशाह को मालगुजारी नहीं मिलती। लोग छापामार संघर्ष चलाते और इसप्रकार तंग आकर बादशाह की लोगों से पंचायतों के जरिए समझौता ही करना पड़ता। अधिकतर राजाओं के रिकार्डों में यह दर्ज है कि हरियाणा के लोगों से मालगुजारी वसूली करना कठिन है। इसका कारण यह नहीं था कि हरियाणा के लोग मुगलों के खिलाफ बागी थे तथा जमीन का माल देने को तैयार नहीं थे। बल्कि सच्चाई यह है कि पैदावार इतनी कम थी कि देने को कुछ होता ही नहीं था। खेती मानसून पर ही आधारित थी तथा माल अदा करने लायक कई बार पैदावार नहीं होती थी। इसीलिए लोग लगान की अदायगी से बचने को गांव छोड़कर भाग जाते थे।

                परन्तु अंग्रेज बहुत विकसित समाज के प्रतिनिधि थे। प्रशासन के तरीके अधिक विकसित थे। सेना, संगठन तथा हथियार अधिक उन्नत थे, भूगोल तथा इंजीनियरिंग का ज्ञान हिन्दुस्तानियों के मुकाबले बहुत ज्यादा विकसित था। इसलिए दिल्ली पर अधिकार जमाने के बाद गोरे शासकों ने मालगुजारी की बढ़ौतरी, उसकी वसूली तथा सरकारी तंत्र को गांव तक ले जाने और पूरे समाज की हर कार्यवाही पर नजर रखना तथा अंग्रेजी राज के हितों के अनुसार ही उसको चलने देना या रोकना शुरू किया। हरियाणा के लोगों ने ऐसा महसूस किया कि उनकी पहले वाली आजादी छिन गई है तथा सारा प्रांत ही कैदखाना बना दिया गया है तथा उन्हें अपने घरों में कैद कर लिया गया है। इस घुटन को तोड़ने का मौका लोगों को नहीं मिल रहा था। मुगल-युग में जो लोगों का तरीका था, पंचायत करके सामूहिक फैसलों के अनुसार केंद्रीय सत्ता का विरोध करना, विरोधों के वे तरीके नया शासक लागू नहीं होने दे रहा था। पंचायत व्यवस्था के बजाए अपना प्रशासन ले आया था। अपने छुटभैये अफसर गांव में नियुक्त कर रहा था और उनको सरकारी खजाने से वेतन या मजदूरी देता था। आने-जाने के साधन विकसित कर लिए थे, रेल ले आया था। विरोध करने वाली जनता और शासक वर्ग के हथियार के स्तर में बहुत अन्तर था। इसलिए जहां कहीं प्रशासन का विरोध करने के प्रयत्न भी हुए, फौरन दबा दिए गए और गोरे प्रशासन का शिकंजा कसता गया।

                सन् 1857 में अंग्रेजी सेना के हिन्दुस्तानी सिपाहियों द्वारा मेरठ में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ विद्रोह हरियाणा की जनता की मनभाई खबर थी। फौरन बगावत  सारे हरियाणा में फैल गई। अंगे्रजी प्रशासन के सभी ठिकानों पर हमले किए गए तथा उन ठिकानों को नष्ट कर दिया गया। मालगुजारी व वसूली के मुख्यालय लोगों के गुस्से का लक्ष्य थे। इसलिए संघर्ष के  स्थान पर तहसील का दफ्तर तथा इसके कागजात जरूर जलाए गए। लेकिन कोई संगठन न होने के कारण लोगों का व्यवहार  अराजक था। दिल्ली से या हिन्दुस्तान से अंग्रेजों को उखाड़ना है, इस बात से लोगों का ज्यादा वास्ता नजर नहीं आता। स्थानीय तौर पर प्रशासन समाप्त हो गया और उनके लिए स्वतंत्रता प्राप्त हो गई थी, लेकिन प्रशासन की इस पूर्ण गैरहाजिरी का नाजायज लाभ उठाकर आपस में लड़ना-झगड़ना तथा लूट-खसोट शुरू कर दी गई थी, जिसके कारण अंग्रेज खिलाफ संघर्ष के लिए लोगों में इतनी नफरत और गुस्सा होने के बावजूद, जनसमर्थन की वह शक्ति नहीं मिली जो उनकी जीत के लिए आवश्यक थी। केवल हरियाणा के राजे-रजवाड़े तथा अंग्रेज सेना के हिन्दुस्तानी सिपाही ही अंग्रेज के हमले से दिल्ली की रक्षा करने में लगे हुए थे। हिसार के इलाकों पर अंग्रेज की मदद के लिए बीकानेर के राजा का हमला तथा करनाल-कुरुक्षेत्र व पानीपत पर पटियाला और जींद के राजाओं का हमला, अंग्रेज की हिमायत में हुआ। हरियाणा की जनता द्वारा विरोध संगठित नहीं किया गया, जिसके कारण अंग्रेज को दोबारा दिल्ली जीतने में  बहुत मदद मिली और हिन्दुस्तान का पहला आजादी युद्ध पराजित हो गया।

                इस पराजय के हरियाणा के संदर्भ में दूरगामी परिणाम निकले। पराजय के बाद जो दमन चक्र चला उससे लोग प्रथम बार दिल्ली की सरकार से भयभीत हो गए। प्रशासन इतिहास में पहली बार गांव में पहुंच गया। मालगुजारी की वसूली बाकायदा और सख्ती से शुरू हुई। हर गांव में प्रशासन के अपने भाड़े और बिना भाड़े के एजेंट कामय हो गए थे। खेती बहुत पिछड़ी हुई थी। लोगों से एक-एक पैसा लूट लिया गया था। भयंकर अकाल पड़ रहे थे, जिनमें बहुत लोग भूखे-प्यासे मर गए। हरियाणा के लोगों ने इससे पहले कभी इसप्रकार की मुसीबत नहीं देखी थी। छोटी-छोटी बातों के लिए पूरे गांव के गांव को सजाएं मिलती। गांव छोड़कर लोग कहीं जाने की स्थिति में नहीं रहे थे। लोगों की पीड़ाएं असहनीय थी, लेकिन बरदाश्त करने के अलावा जनता के पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था। इसलिए 1858-59 से लेकर 20वीं सदी के प्रारंभ तक हरियाणा का इतिहास का समय घोर अंधेरे का समय है। यही समय था जब चार गोरे घुड़सवारों के सामने गांव के गांव भाग लेते थे। गोरे लोगों के पास दिव्य शक्ति मान ली गई थी। ‘साहबा’ -एक पुलिस का कांस्टेबल सारे गांव को अकेला हांक कर ले जा सकता था, बगैर कोई कारण बताए। किसी की कारण पूछने की हिम्मत नहीं हो सकती थी। यहां तक  कि अंग्रेज द्वारा गोली से मारे गए या फांसी लगाए गए लोगों का कनागत (श्राद्ध) भी नहीं मनाया जाता था।

                अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने लोगों को इस हद तक भयभीत कर दिया कि उन्होंने अपने शहीदों को भी जानबूझ कर भुला दिया। जो भी अंग्रेज-विरोधी था वह अहितकर मान लिया गया और साम्राज्य के छोटे से छोटे एजेंट को भी समाज में दबदबा मिल गया। उनसे किसी भी रूप में संबंध कायम रखना आम आदमी अपना अहोभाग्य समझने लगा। यही कारण है कि अंग्रेजी सरकार द्वारा नियुक्त गांव के नए अफसर, नंबरदार, सफेदपोश और जैलदार फौरन हरियाणा के समाज में सम्माननीय मान लिए गए। इसी दौरान इन कहावतों का प्रचलन शुरू हुआ-‘राज की अगाड़ी-घोड़े की पछाड़ी नहीं आना चाहिए।’ ‘थळस के पड़े का अर पुलिस के पीटे का कोई डर नहीं होता’ आदि।

                इन सब मुसीबतों के बावजूद समाज में कुछ ऐसे आधार तैयार होने लगे थे, जिनके ऊपर समाज में ऐसी ताकतों को जन्म लेना था जो इस सर्वशक्तिमान दिखाई देने वाले अंग्रेजी साम्राज्य को उखाड़ फैंक सकती थीं। हरियाणा में पशुपालन के साथ-साथ लोग खेती को भी गंभीरता से लेने पर मजबूर हुए। लोग सामूहिक तथा व्यक्तिगत प्रयत्नों से खेती में पैदावार के साधनों का विकास करने पर मजबूर हो गए, लेकिन धन के अभाव में विकास प्रक्रिया धीमी ही रही। लेकिन यूरोप के औद्योगिक विकास ने तथा संसार के बड़े भाग पर अंग्रेज के अधिकार ने इस सारे क्षेत्र को ही एक मंडी बना दिया, जिससे कपास, गन्ना आदि व्यापारिक फसलें बनीं और इनकी बाजार में मांग बढ़ी तो इनकी खेती बढ़ी। परिणामस्वरूप खेती केवल खुद के उपभोग तथा मालगुजारी देने के लिए नहीं, बल्कि कुछ कमाने के लिए भी की जाने लगी। लेकिन पूंजी का अभाव, खेती के विकास में मुख्य रुकावट थी। महाजनी पूंजी ही एकमात्र सहारा थी, लेकिन इसका बोझ इसप्रकार का था कि विकास की बजाए अवरोध पैदा करती थी। इसीलिए 20वीं सदी के प्रारंभ तक हरियाणा में नवजागरण के लिए कोई भौतिक आधार कायम नहीं हुआ।

                बीसवीं सदी के शुरू में ही यूरोप में बड़े युद्ध की तैयारियां शुरू हो गई थीं। ब्रिटेन और फ्रांस के मुकाबले यूरोप के दूसरे देशों का पूूंजीपति भी आ गया था और विशेषकर जर्मनी का। यूरोप में कारखाने का फैलाव बहुत तेजी से हुआ तथा औद्योगिक कच्चे माल की मांग संसार में तेजी से बढ़ी थी। अमेरिका और हिन्दुस्तान अंग्रेजी कारखाने के लिए कच्चे माल के मुख्य स्रोत थे। अमेरिका में भी दासप्रथा समाप्त होने के बाद खेती में खर्चा बढ़ गया था। इसलिए हिन्दुस्तान में भी अंग्रेज पूंजीपति के एकाधिकार के बावजूद खेती की पैदावार के दाम कुछ बढ़ गए थे। इसीलिए हरियाणा में भी गन्ने और कपास की खेती की काश्त बढऩी शुरू हुई। प्रथम महायुद्ध के समय हरियाणा से बहुत बड़ी संख्या में लोग फौज में भर्ती हुए। भयंकर गरीबी और मंदी के दौर में महीने में सात या आठ रुपए का वेतन भी खेती में पूंजी बन गया। ये लोग सेना में भर्ती होकर दूसरे देशों में, यूरोप भी गए। विचारों की जड़ता टूटी। विकसित दुनिया को देखा। युद्ध समाप्ति के बाद जब ये लोग गांव वापिस आए तो इन लोगों ने खेती में पैसा लगाकर  खेती शुरू की। यह इसलिए क्योंकि इन लोगों के पास पैसा था। दूसरे इन लोगों ने शिक्षा पर बढ़ा जोर दिया। जगह-जगह इन लोगों ने जन सहयोग से स्कूल खोले। हरियाणा में प्रथम बार एक छोटे से मध्यम वर्ग का जन्म हुआ। आर्य समाज के समाज-सुधार आंदोलन का प्रसार भी इसी दौरान हरियाणा में हुआ और सारे देश में चल रहे राष्ट्रीय-मुक्ति-आंदोलन का प्रभाव भी हरियाणा पर पड़ा। खेती में पूंजीवाद के दखल ने देहात में एक नए वर्ग को जन्म दिया, जिसने शिक्षा-प्रसारण और समाज-सुधार आंदोलन तथा राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के प्रभाव को देहात में फैलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

                इसप्रकार हरियाणा में एक शिक्षित मध्यम वर्ग का जन्म हुआ। इस वर्ग ने हरियाणा में नवजागरण का डंका बजाया। राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में भी इस वर्ग ने अपनी हिस्सेदारी डाली। पंडित श्रीराम शर्मा, लाला शाम लाल, चौ. मातू राम, डाक्टर रामजी लाल, पंडित नेकी राम, चौ. लाजपत, चौ. सुमेर सिंह आदि लोगों ने जो इस वर्ग से उपजे थे, हरियाणा में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व प्रदान किया। झज्जर व अम्बाला से पहली अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में एक-एक सदस्य रहा।

                परन्तु इस नवोदित मध्य वर्ग की दो मुख्य कमजोरियां थीं, जिनके कारण उसका अपना विकास अधिक न हो सका और न ही उसका प्रभाव हरियाणवी समाज में गहराई तक जा सका। सर्वप्रथम यह वर्ग संख्या में बहुत छोटा था और इसका बौद्धिक और आर्थिक विकास इतना बौना था कि हरियाणवी समाज की अंधविश्वास और जाति-पाति पर आधारित मान्यताओं को अधिक चोट नहीं पहुंचा सका। असल में स्वयं भी यह वर्ग इन अंधविश्वासों और मान्यताओं से बाहर नहीं निकल पाया बल्कि इनका भाग रहकर इन अंधविश्वासों और मान्यताओं का औचित्य सिद्ध करने लगा। नई शिक्षा से तथा पैदावार से जो विवेकपूर्ण दृष्टिकोण इस वर्ग में पैदा होना चाहिए था तथा जिसका प्रभाव पूरे समाज की सोच पर पड़ना चाहिए था वह नहीं हुआ। इसलिए मध्यम वर्ग ने बंगाल, महाराष्ट्र, मद्रास, पंजाब तथा केरल आदि प्रांतों में जो भूमिका निभाई। जिसके परिणामस्वरूप नतीजा यह हुआ कि हरियाणा में जाति-बंधन की जकड़ विचार और सामाजिक  संस्थाओं-संरचनाओं पर से नहीं टूटी। इसीलिए आर्यसमाज तथा राष्ट्रीय-मुक्ति-आंदोलन का असर सतही रहा। समाज को इसी प्रकार से झकझोरने वाली बात न आर्य समाज कर पाया और न ही राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, बल्कि अंतत: समाज पर रिटायर्ड फौजियों के असर ने सरकार-भक्ति को जन्म दिया तथा मजबूत किया। इसके साथ ही पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी की सफलता ने भी इस इलाके के लोगों में राजभक्ति को बढ़ावा दिया और राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के प्रभाव को फैलने से रोका।

                सारे देश में पूरे देश के स्तर पर राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के बढ़ते हुए असर से सतर्क होकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने पंजाब में एक विशेष नीति अख्तियार की जिसकी इमदाद से उसने पंजाब के किसान को राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन में शामिल होने से रोकने का प्रयास किया। साम्राज्यवाद की इस नीति के मुख्य हथियार जाति के आधार पर  ‘कृषक’ और ‘अकृषक’ जातियां घोषित करना और अकृषक जातियों को कृषक जातियों के लोगों की जमीन न खरीदने देने का बिल पास करना, ‘मार्शल’ और ‘नोन मार्शल’ नस्लेें घोषित करना और मार्शल घोषित की गई जातियों को सेना की भर्ती में विशेष रियायतें प्रदान करना था। इसी नीति का राजनीतिक पहलू अंग्रेजी साम्राज्यवाद की इमदाद से यूनियनिस्ट पार्टी की कामयाबी थी। यूनियनिस्ट पार्टी की राजनीति का मुख्य स्तम्भ जातिवाद रहा और कांग्रेस पार्टी, जो राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन की मुखिया पार्टी थी, पर हमला यूनियनिस्ट पार्टी के लोग जाति-पाति के आधार पर ही करते रहे। ऐसा करने का मौका उन्हें इसलिए भी मिला कि इस क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व प्राय: शहरी लोगों के पास था। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के पास ऐसा कोई कृषि कार्यक्रम नही था जो व्यापक किसान जनता को अपनी और आकर्षित कर सकता। पंजाब विधान परिषद में यूनियनिस्ट पार्टी द्वारा पेश कुछ किसान हिमायती और सूदखोरी विरोधी बिलों को कांग्रेस द्वारा समर्थन न दिए जाने से यूनियनिस्ट पार्टी की किसानों में साख कांग्रेस के मुकाबले बढ़ गयी।

                पंजाब तथा हरियाणा के देहात में किसान तथा सूदखोर-जमाखोर वर्ग में मुख्य अन्तर्विरोध था। सूदखोरी के बोझ में न केवल उसकी सारी पैदावार चली जाती थी बल्कि उसकी जमीनेंं भी उसके हाथ से खिसक कर सूदखोरों के कब्जे में जा रही थीं। 1920 के दशक के सस्तेवाडे ने किसान की हालत ज्यादा खराब कर दी थी। इन गहराते अन्तर्विरोधों का लाभ उठाकर यूनियनिस्ट पार्टी के नेता चौधरी छोटूराम ने किसान बनाम महाजन की राजनीति को किसानों में फैलाने की कोशिश की और इस प्रयत्न में वह काफी सफल रहे भी। जाति पर आधारित पिछड़ी सामाजिक संरचनाएं चौ. छोटूराम के इस किसान बनाम महाजन की राजनीति को फैलाने में काम आई और विशेषकर उन इलाकों में जहां महलवारी व्यवस्था के कारण किसानों पर सामन्ती जकड़ अपेक्षाकृत कम थी और किसानों की आजादी की लड़ाई में व्यापक शिरकत का खतरा था वहां इस प्रकार की साम्राज्यवादी चाल को इस पार्टी ने सफल करने में पूरी मदद की।

                संसार के दूसरे महायुद्ध की समाप्ति पर जो दुनियां युद्ध की ज्वालाओं से निकल कर आई उसका रूप पहले की दुनियां से कई बातों में बहुत भिन्न था। युद्ध की समाप्ति के साथ-साथ ही सारा पूर्वी यूरोप समाजवादी हो गया और इस प्रकार प्रथम  बार संसार में एक समाजवादी शिविर कायम हो गया, जिसको साम्राज्यवाद द्वारा डराना-धमकाना संभव नहीं था। दूसरे साम्राज्यवादी देशों को युद्ध ने इतना तोड़ दिया कि उनके लिए राष्ट्रीय आजादी के लिए लड़ रहे गुलाम देशों के आंदोलनों को ज्यादा देर तक कुचल पाना मुमकिन नहीं रहा। युद्ध की जरूरतों ने हिन्दुस्तान की देशी-अंग्रेजी सेनाओं की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ा दी थी और उनका काफी बड़ा भाग आधुनिक हथियारों से लैस तथा प्रशिक्षित था। इस सेवा में शामिल हिन्दुस्तानी सैनिकों ने विदेशों में लड़ाई के मोर्चे पर जाकर संसार के बारे में अपने ज्ञान में वृद्धि की तथा यूरोप के मुक्त जीवन का अहसास भी किया। हिन्दुस्तानी सेना के बढ़े भाग को पुल तोड़ कर सिंगापुर में जापान के हवाले करना, उन लोगों का सैनिक बंदी होते-होते नेता जी के कहने पर आईएनए में शामिल हो जाना तथा देश की आजादी के लिए अंग्रेज के खिलाफ हथियार उठाना और हार के बाद आईएनए के लोगों की गिरफ्तारी, उन पर मुकद्दमा और आईएनए के लोगों को अंगे्रज द्वारा मजबूरन रिहा किया जाना, ऐसी घटनाएं थी जिनका असर हरियाणा पर बहुत गहरा पड़ा। हरियाणा में पहली बार आईएनए के फौजियों के रूप में राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को सक्रिय, मुखर तथा निडर कार्यकत्र्ता मिले। कांग्रेसी कार्यकत्र्ताओं को इन लोगों से बहुत लाभदायक तथा हौसले वाला सहयोग मिला। समाज पर रिटायर्ड फौजियों के सरकारपरस्त प्रभाव को इन लोगों ने प्राय: समाप्त सा ही कर दिया। इसलिए 1946 का आम चुनाव पहुंचते-पहुंचते हरियाणा में कांग्रेस पार्टी का प्रभाव बहुत ज्यादा बढ़ चुका था और इस चुनाव में सारे हरियाणा में ही यूनियनिस्टों का सफाया हो गया, जबकि अभी तक बालिग मताधिकार लागू नहीं हुआ था।           (साभार-प्रयास सितम्बर-दिसम्बर 83)

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा ( अंक 8-9, नवम्बर 2016 से फरवरी 2017), पृ.- 29 से 32

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