दया धर्म का मूल है उर्फ कुत्ता कथा – हरभगवान चावला

कहानी

(यह कहानी उन दयालु महानुभावों के श्री चरणों में समर्पित है जिनके लिए स्वार्थी इन्सान को छोड़कर सारे वफादार जीव दया और ममता के अधिकारी हैं।)

                यह उस समय की कथा है जब लाख या करोड़ का घोटाला, घोटाले का अपमान समझा जाता था, तब लाखों-करोड़ रुपयों के घोटालों का चलन था और इसे करोडों-करोड़ में बदलने के उपाय किए जा रहे थे। यह उस समय की कथा है जब राह चलते लोग सरेआम मार दिए जाते थे, मासूम बच्चियां हर रोज़ बलात्कार का शिकार होती थीं, जब जन नेता क़त्लेआम करवाते और बदले में सत्ता का सुख भोगते, जब अपने भाषणों में नफरत का वमन करने वाले आदमी की शवयात्रा निकलती तो आतंक के मारे शहर के शहर सन्नाटे में डूब जाते, जब महानगर के फुटपाथ पर सोये लोग बिला वजह लाठियों और सरियों से पीटे जाते और पीटने वाला नायकत्व के रथ पर सवार होकर गर्व से अपने गुंडा होने की घोषणा करता। इन हालात में निज़ाम चुप रहता। लोगों पर मुकद्दमे दर्ज होते और क्योंकि मुकद्दमा भुगतने वाले ख़ास आदमी होते, इसलिए बाइज़्ज़त बरी होते। ऐसे में देश के धर्म-प्रेमी दयालु लोग तीर्थयात्रा पर निकल जाते या चुपचाप भजन-कीर्तन करते, कविगण मदहोश कर देने वाली प्रेम कविताएं लिखते, युवा आई.पी.एल का भव्य आयोजन देखते और ट्वीट करते। इसी स्वर्ण युग में एक युवा राजकुमार अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ने निकला। वह वाकई ‘मर्द बच्चा’ था। उसने जनसभाओं में विधर्मियों के सिर काट देने का ओजस्वी बयान दिया, चुनाव जीता, मुकद्दमा भोगा और बाईज्जत बरी हुआ। इस राजकुमार की पूज्य अम्मा जी बड़ी जीव प्रेमी महिला थीं (याद रहे, जीवों में इन्सान शामिल नहीं होता)। दयालु अम्मा जी ने जीवों के प्रति करुणा की नदी बहा दी थी। वैसे भी यह उस युग का चलन था कि चर्चा में रहना है तो इन्सानों की नहीं, जीवों की बात करो। लोग अक्सर उनकी दयालुता की चर्चा करते। असल में जीवों के प्रति दया की अवधारणा पश्चिम से आई थी। आप जानते ही हैं कि हर अच्छी चीज पश्चिम से ही आती है। इस अवधारणा में तो एक और अच्छी बात थी, इसके साथ पैसा भी आया था, स्वयंसेवी संस्था बनाओ और पैसा लो। सो, राष्ट्रीय स्तर पर, राज्यों के स्तर पर, शहरों के स्तर पर ‘जीव प्रेमी संघ’ बन गए थे (असल में यह नाम अंग्रेजी में था-एनीमल लवर्स एसोसिएशन, यहां हमने उसका हिन्दी अनुवाद दिया है, बाद में तो इसकी शाखाएं, प्रशाखाएं भी बनी, जैसे स्नेक लवर्स एसोसिएशन, डॉग लवर्स एसोसिएशन, मंकी लवर्स एसोसिएशन आदि)। सरकार भी अम्मा जी के सामने नतमस्तक हुई, उनकी बात मानी और जीवों को संरक्षण देने की ठानी। अब सवाल यह था कि किन जीवों को संरक्षण दिया जाए ? जब ऐसे सवाल निजाम के सामने आते हैं तो परम्परा का महत्व बढ़ जाता है, संस्कृति मूल्यवान हो जाती है। परम्परा और संस्कृति को खंगाला गया। निष्कर्ष निकला कि जो शक्तिशाली हो, उसे संरक्षण दिया जाना चाहिए। निज़ाम खुश हुआ कि उसने अब तक जो किया है, सही किया है। तमाम धर्मगुरुओं, राजनेताओं तथा गुंडों को संरक्षण दिया जा चुका है। अब इस आचार-संहिता के आलोक में जीवों का मूल्यांकन किया गया। ‘महाजनो येन गत:’ सिद्धांत के अनुसार गाय, साँड, शेर, बाघ आदि को बहुत पहले ही संरक्षण दिया जा चुका था। इस पर पुनर्विचार का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। जिन जीवों को संरक्षण के योग्य पाया गया, उनमें मुख्य रूप से सांप, बंदर और कुत्ता शामिल थे। सांप के पास जहर था, बंदर के पास पंजा, कुत्ते के पास दांत। विचार कुछ और जीवों पर भी किया गया पर भैंस के पास अक्ल नहीं थी, बकरी के पास सींग तो थे पर उसने कभी न तो सींगों की ताकत को समझा था, न कभी इनका इस्तेमाल ही किया था, सुअर के पास सिर्फ कीचड़ था, कीचड़ उछालना अब यहाँ की संस्कृति थी और कीचड़ से अब कोई नहीं डरता था, भेड़ तो भेड़ थी, मुर्गे के पास तो निरीहता के अलावा कुछ था ही नहीं। इसलिए इन जीवों को जीने के अधिकार के काबिल नहीं माना गया। बेचारे मक्खी-मच्छर की तो बिसात ही क्या? उनको मारने के लिए तो हर रोज नए तरीके इजाद किए जा रहे थे।
चुनिंदा जीवों को संरक्षण देने के कुछ सार्थक नतीजे सामने आए। सपेरे और मदारी बेरोजगार हो गए। इससे निजाम पर तो कोई फर्क नहीं ही पड़ा, क्योंकि ये कमजोर लोग थे और निजाम का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, सभ्य लोग तो बहुत खुश हुए, क्योंकि सांप और बंदर का तमाशा दिखाते ये मैले-कुचैले, घृणित लोग उन्हें कभी भी पसंद नहीं थे, कहीं भी मज़मा लगाकर ये लोग सभ्य नागरिकों के जीवन में खलल ही डालते थे। उधर, अमीर लोगों के लिए व्यवसाय के नए क्षितिज खुल गए। जगह-जगह अच्छी नस्ल के कुत्तों (जाहिर है, पश्चिम के कुत्ते ही श्रेष्ठ थे-हर चीज की तरह) के क्रय-विक्रय और उनके आहार-विहार, इलाज आदि की दुकानें खुल गईं। इससे लोगों का जीवन स्तर तो सुधरा ही, राष्ट्रीय आय में भी वृद्धि हुई। बड़े लोग अब कुत्तों के साथ सैर करने निकलते, किसी के घर के सामने, सड़क के किनारे या पार्क में शान से उनको ‘पॉटी’ करवाते और इतराते हुए अपने कुत्तों के सयानेपन के किस्से सुनाते। कभी कुत्ते कार में अपनी मालकिन की गोद में अठखेलियां करते होते या किसी खास और आकर्षक पोज में कार के पिछले शीशे के पास बिठा दिए जाते ताकि लोग देखें और कहें- ‘ओ! हाऊ स्वीट।’
अब शहरों के आवारा, देसी कुत्ते भी सड़कों पर मटरगश्ती करते फिरते थे क्योंकि म्यूनिसिपल कमेटी के लोग न तो उन्हें ज़हर देकर मार सकते थे, न गाड़ी में भरकर ले जा सकते थे। नतीजतन, अब वे सड़कों पर दनदनाने लगे थे। सांडों और गायों से तो पहले ही शहरों की सड़कें भरी रहती थीं, ऊपर से कुत्ते! अब सड़कों पर लोग कम होते थे, जानवर ज्यादा। इन जानवरों से टकरा कर या इनकी लड़ाई और हमले की चपेट में आकर रोज वाहन सवार मरते या घायल होते पर इनमें निन्यानवे प्रतिशत सामान्य लोग होते थे और इनकी मौत या चोट से निज़ाम को कोई फर्क नही पड़ता था। कभी-कभी कोई बड़ा आदमी जब इनकी चपेट में आता तो अखबारों में ख़बरें छपतीं, हंगामा होता, फिर सब वैसा ही हो जाता।
देश के बहुत सारे शहरों की तरह इस छोटे से शहर में भी ‘डॉग लवर्स एसोसिएशन’ (कुत्ता प्रेमी संघ) की विधिवत् स्थापना हुई। एक मिल मालिक को इस संघ का अध्यक्ष बनाया गया। इस आदमी का शहर के बीच में एक गत्ता बनाने का कारख़ाना था। यह कारखानेदार मजदूरों के शोषण के लिए बदनाम था। इस कारख़ाने से बदबू उठती थी, जिससे आसपास के लोगों का जीना हराम हो गया था। वे बार-बार कारख़ाने को यहां से हटाने की मांग करते थे पर वे आम लोग थे। उनकी सुना जाना तो किसी भी तरह से जायज़ नहीं था। हाँ, अगर शिकायत कुत्तों की ओर से आई होती तो कुछ सोचा भी जाता। इस संस्था के सचिव बने शहर के एक मशहूर चिकित्सक। ये चिकित्सक महोदय अपने मरीज़ों की चमड़ी तक उतार लेने के लिए अच्छा-ख़ासा नाम कमा चुके थे। उनके घर में एक-से-एक उम्दा नस्ल के चार-पाँच कुत्ते थे और इस वजह से उन्हें संभ्रांत वर्ग में गर्व और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अब उनसे बेहतर सचिव भला कौन होता ?
उस शहर में कई पार्क थे, पर उनमें से एक पार्क बड़ा और हरा-भरा था। इस पार्क में सुबह-शाम बच्चे, बूढ़े, जवान घूमने या बैठने आते। इसी पार्क में रहते हुए एक कुतिया ने चार पिल्लों को जन्म दिया। पिल्ले बड़े हो रहे थे और तेजी से कुत्ते होते जा रहे थे। जिन बच्चों के हाथ में कोई खाने का सामान होता, ये पिल्ले उनके पीछे पड़ जाते। पिछले एक महीने में इन पिल्लों द्वारा बच्चों को काट खाने की चार वारदातें हो चुकी थीं। कुछ बच्चों ने तो यहाँ आना छोड़ ही दिया था। पार्क में घूमने के लिए बनी पगडंड�� अक्सर इन पिल्लों के मल से भरी रहती। इन पिल्लों की माँ वैसे तो इन्हें आत्मनिर्भर जान कर इन्हें छोड़ बाहर घूमती रहती थी, पर उसने अभी इस पार्क की मिल्कियत को छोड़ा नहीं था। वह कभी-कभी अपने किसी साथी कुत्ते के साथ आती और अपने बच्चों को संभाल जाती। एक बार तो उस कुतिया और उसके दोस्त कुत्ते ने पार्क में अंतरंग  प्रेम का ऐसा प्रदर्शन किया कि घूमने आए लोग शर्म से पानी-पानी हो गए। इसी पार्क के ठीक सामने के मकान में एक औरत रहती थी-माया अग्रवाल। माया ‘कुत्ता प्रेमी संघ’ की माननीय सदस्या थी। वह हर रात पार्क में उन पिल्लों को संभालने आती-जिन्हें वह ‘पॅपीज’़ कहती थी। यूँ तो ये पॅपीज़ देसी थे पर उसे उनमें ‘लैब्रा’ की झलक दिखाई पड़ती थी। उसे लगता ज़रूर इनमें लैब्रा का डीएनए है। उसके हाथ में कभी रोटी होती तो कभी बिस्कुट। वह पहले उन्हें अपने सीने से चिपकाती, साथ लाई हुई चीज़ खिलाती, थोड़ी देर उनके साथ खेलती रहती, फिर पार्क में मौजूद लोगों को इस नजऱ से देखती कि पॅपीज़ को किसी ने तंग किया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा। यह औरत हमेशा अकेली होती, उसके साथ कभी किसी मर्द को नहीं देखा गया था, न किसी औरत को। वह पार्क में भी किसी से कोई बात नहीं करती थी।

                पार्क में नियमित रूप से आने वाले सब लोग उसे    पहचानते थे। उनके हावभाव देखकर ऐसा लगता था कि वे उससे डरते भी थे। शायद यही कारण था कि बच्चों को काट खाने की वारदातों के बाद भी पिल्लों के खि़लाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।
एक गांव के सरकारी स्कूल से सेवानिवृत्त शिक्षक बृजलाल पार्क के पास की कॉलानी में ही रहते थे और रोज़ अपने पांच वर्षीय पोते के साथ उसी पार्क में घूमने आते थे, पर उन्होंने कभी माया अग्रवाल को नहीं देखा था और न ही उसके बारे में कभी सुना था। कारण कि वे शाम को जल्दी आते और जल्दी ही वापस चले जाते। उनका बेटा शहर से दूर किसी और शहर में नौकरी करता था। इस समय वे घर में अकेले मर्द थे। पिछले कुछ महीनों से शहर में अपराध बहुत बढ़ गए थे, सो वे अँधेरा होने के बाद घर में ही रहना पसंद करते थे। एक दिन इत्तिफाक कुछ ऐसा हुआ कि वे पार्क में बेंच पर बैठे थे कि उन्हें अपने पोते की चीख सुनाई पड़ी। दरअसल पार्क के एक कोने में खेल रहे बच्चों पर पिल्ले झपट पड़े थे और दो बच्चों को काट खाया था। उनमें एक उनका पोता था। पोते के पैर से बहता ख़ून देखकर उनका भी खून खौल उठा। उन्होंने तुरंत अपने बेटे के एक दोस्त को फोन मिलाकर उसे फौरन कार सहित पार्क में पहुंचने का आदेश दिया। वह पहुंचा तो उसकी मदद से उन्होंने चारों पिल्लों को कार की डिक्की में डाला और एक किलोमीटर दूर एक ऐसे पार्क में छोड़ दिया जो अभी विकसित होने की प्रक्रिया में था और जहाँ लागों की आमदरफ़्त कम थी।
रात के कऱीब आठ बजे…मास्टर जी अपने पोते को गोद में लिए घर के आँगन में बैठे थे। पोते के पैर पर पट्टी बँधी थी। वे पट्टी को देखते जाते और पोते के सर पर हाथ फिराते हुए उसे जल्दी ठीक होने का आश्वासन देते जाते…कि तभी…माया अग्रवाल ने उनके घर में प्रवेश किया। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। वह उनके ठीक सामने आकर खड़ी हुई और प्रश्न किया,”पार्क से पॅपीज़ आपने उठाए है ?’’
”हाँ, मैंने ही उठाए हैं, पर आप कौन हैं और यह सवाल मुझसे क्यों कर रही हैं ?
”अभी पता चल जाएगा कि मैं कौन हूँ, पहले आप यह बताइए आपने पॅपीज़ को पार्क से उठाया क्यों ?’’
”क्योंकि उन्होंने मेरे पोते को काट लिया था।’’
”तो क्या इस कारण से आप उनकी जान ले लेंगे ? इन्सान से ज़्यादा वफादार होते हैं कुत्ते, जानते हैं आप ?’’ अब माया अग्रवाल चिल्ला रही थी। इस उत्तेजनापूर्ण संवाद को सुन मास्टर जी की पत्नी और पुत्रवधू भी आँगन में आ गई थीं। माया अग्रवाल बोले जा रही थी,”एक माँ से उसके बेटों को जुदा किया है आपने, जानते हैं, कितना पाप लगेगा ?’’
”ओ बहन जी, पुन्न आप कमाओ, हमें तो पापी ही रहने दो।’’ अब मोर्चा मास्टर जी की बीवी ने संभाल लिया था, ”इतना ही प्यार है इन कुत्तों से तो इनको अपणे घर में क्यों नहीं रखती, सरकार ने पार्क लोगों के लिए बनाया है या कुत्तों के लिए ?’’
यह सुनते ही माया अग्रवाल के तन-बदन में आग लग गई। वह चीखी,”हाऊ डेयर यू, बदतमीज़ औरत ! मैं प्यार से बोल रही हूँ और तू सर पर ही सवार हो गई है। वाह रे वाह ! चोरी और सीनाज़ोरी ! एक तो पॅपीज़ चुरा लिए, ऊपर से उपदेश दे रही है। मैं बताती हूँ तुम लोगों को तुम्हारी औक़ात, न दिन में तारे दिखाए तो मेरा भी नाम माया अग्रवाल नहीं !’’ मोबाइल पर किसी का नम्बर मिलाती वह घर से निकल गई।
अगले दिन अभी नौ भी नहीं बजे थे कि मास्टर जी के दरवाज़े पर पुलिस की जीप आ खड़ी हुई। तुरत-फुरत मास्टर जी को जीप में लादा गया और थाने में ले जाकर एक बेंच पर बिठा दिया गया। एकाध मिनट के भीतर ही उनके बेटे का वह दोस्त जिन्हें उन्होंने कल पार्क में बुलाया था, भी थाने पहुंच गया। आते ही उसने सामने कुर्सी पर विराजमान थानेदार को परिचय दिया,”मैं दिनेश कुमार, यहाँ सरकारी स्कूल में मैथ मास्टर हूँ और ये मेरे अंकल हैं, मेरे दोस्त के पिता, अभी साल भर पहले सरकारी स्कूल से रिटायर हुए हैं। बड़े शरीफ आदमी हैं, बड़ा नाम कमाया है इन्होंने डिपार्टमेंट में।’’
”इतना नाम कमाया है तो कुत्ते चुराने का पंगा क्यों ले लिया मास्टर जी ? थानेदार सीधे मास्टर जी से मुख़ातिब था।
”मैंने कोई कुत्ता नहीं चुराया, मैंने तो उन्हें एक पार्क से उठाकर दूसरे पार्क में छोड़ा है बस, उन कुत्तों में से एक ने मेरे पोते को काट लिया था, इसीलिए…’’
”पर थाने में की गई शिकायत तो यही कहती है कि आपने कुत्ते चुराए हैं। अख़बार की रिपोर्ट भी इस बात को कन्फर्म करती है, थानेदार ने एक अंग्रेज़ी अख़बार उनके सामने रख दिया,”अंग्रेज़ी तो आपको आती ही होगी, पढि़ए क्या लिखा है ?’’
मास्टर जी ने पढ़ा। ख़बर का शीर्षक था-‘रिटायर्ड टीचर स्टील्ज़ सिक्स पॅपीज़।’ उन्होंने ख़बर पढ़ी, जिसका हिंदी अनुवाद यहाँ दिया जा रहा है-‘एक महिला ने कहा है कि एक सेवानिवृत्त शिक्षक ने उससे बदला लेने के लिए छ: पिल्लों को चुरा लिया है। आदर्श कॉलोनी में रहने वाली माया अग्रवाल नामक इस महिला ने इस सम्बंध में स्थानीय पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है। महिला का कहना है कि कुछ दिन पहले उनका किसी बात को लेकर शिक्षक के परिवार से झगड़ा हुआ था, इसीलिए इस परिवार के मुखिया ने उन पिल्लों को चुरा लिया जिन पर वह माँ की तरह ममता लुटाती थी। जब वह इन कुत्तों के बारे में पूछने के लिए उनके घर गई तो इस परिवार के सदस्यों ने उसके साथ बदतमीज़ी की।’
पूरी ख़बर को दो बार पढऩे के बाद उनके मुंह से बोल फूटा,”थानेदार साहब, इस औरत को तो मैंने कल से पहले कभी देखा ही नहीं, फिर हमारा झगड़ा कब हुआ ? और फिर इसमें तो छ: पिल्लों का जि़क्र है जबकि पिल्ले चार थे, आप मुझसे मेरे पोते की कसम ले सकते हैं…’’ बोलते-बोलते उन्हें लगा कि जैसे उनकी ज़बान तुतलाने लगी है। उनसे आगे बोला नहीं गया।
”चलो थोड़ी देर में वो लेडी और ‘कुत्ता प्रेमी संघ’ के सैक्रेटरी डॉ.नरवाल यहाँ आने वाले हैं, आप उनको बता देना यह बात।’’ थानेदार ने कहा।
मास्टर जी बेंच पर घुटने मोड़े और उनमें सर दिए बैठे थे। उनके भीतर विचारों का बवंडर था। बरसात के दिन की हवाओं की तरह बार-बार उनके सोचने की दिशा बदल जाती थी। पहले तो उन्होंने इस बात पर ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ख़बर सिर्फ  अंग्रेज़ी अख़बार में छपी थी जिसे शहर में मुश्किल से दस-बीस लोग पढ़ते होंगे। किसी हिंदी अख़बार में यह ख़बर छपी होती तो कितनी बदनामी होती (लेखक का हस्तक्षेप-सीधे-सादे मास्टर जी यह नहीं जानते थे कि अंग्रेज़ी अख़बार हिंदी अख़बारों के मुक़ाबले श्रेष्ठ होते हैं-ठीक वैसे ही जैसे काले हिंदुस्तानियों के मुक़ाबले गोरे अंग्रेज़-इसीलिए वे इन्सानों की बजाय कुत्तों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। अंग्रेज़ी अख़बार में छपने से ख़बर की गरिमा बढ़ी थी। दूसरी वजह यह थी कि अंग्रेज़ी अख़बार में छपी ख़बर को शासन-प्रशासन अधिक गंभीरता से लेता है। तीसरी सबसे बड़ी वजह यह कि अंग्रेज़ी में छपी ख़बर से ‘कुत्ता प्रेमी संघ’ के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नजऱ में  माया अग्रवाल का क़द बढ़ जाने की असीम संभावनाएँ थीं)। कभी उनका दिमाग़ अपने पढ़ाए बच्चों को याद कर रहा था। उन्होंने अपने 35 साल के शैक्षणिक जीवन में बच्चों को हमेशा नेक इन्सान बनने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने तेज़ी से अपने उन शिष्यों को याद किया जो कोई मुकाम हासिल कर चुके थे। उन्हें आश्चर्य हुआ कि उनमे से कोई न राजनेता था, न पुलिस अफसर। इस वक़्त उन्हें इनकी ही ज़रूरत थी। फिर उनका ध्यान प्रदेश में रोज़ हो रहे जघन्य अपराधों की तरफ मुड़ गया। क्या किसी इन्सान का क़त्ल हो जाने या किसी बच्चे का अपहरण होने पर भी पुलिस इतनी सक्रियता दिखाती है ?
”मामला किसी बच्चे के किडनैप का होता तो बहुत बड़ी बात नहीं थी पर यह तो कुत्तों के किडनैप का मामला है”, मास्टर जी बुरी तरह चौंके, क्या यह थानेदार मन की बात पढ़ लेता है यार बेध्यानी में मन में सोची बात ज़बान पर आ गई, थानेदार दिनेश से कह रहा था,”मैं समझ सकता हूँ कि इन्होंने ऐसा कोई कसूर नहीं किया पर हम क्या कर सकते हैं ? इस केस को निपटाने के लिए पुलिस पर ऊपर से बड़ा भारी दबाव है। इस केस की रिपोर्ट ‘पशु प्रेमी संघ’ की राष्ट्रीय अध्यक्ष अम्माजी, प्रांतीय अध्यक्ष जय सिंह चौहान तथा मुख्यमंत्री तक की जा चुकी है। एस.पी साहब के पास ऊपर से कितनी बार फोन आ चुके हैं।
डॉ. नरवाल की पहचान तो ऊपर तक है ही, फिर मुख्यमंत्री माने हुए पशु प्रेमी हैं। आपने कल का अख़बार नहीं पढ़ा ? अन्तर्राष्ट्रीय पशु प्रेमी संघ ने मुख्यमंत्री को पशु प्रेम के लिए अवॉर्ड दिया है।’’
दिनेश ने वाक़ई यह ख़बर पढ़ी थी। अब मास्टर जी और दिनेश को मामले की गंभीरता समझ में आ रही थी। मास्टर जी के चेहरे का रंग उड़ गया था, फिर भी उन्होंने सोचा-काश जितनी दया मुख्यमंत्री के दिल में पशुओं के लिए है, उसका दस प्रतिशत इन्सानों के लिए भी होती। वे कुछ कहने को हुए पर एकदम सचेत हो गए कि कहीं थानेदार उनके मन की इस बात को भी न पढ़ ले कि तभी उनके भाग्य विधाताओं यानी माया अग्रवाल और डा. नरवाल ने थानेदार के कक्ष में प्रवेश किया। थानेदार ने उन्हें सामने की कुर्सियों पर बैठने का इशारा किया, डाक्टर से हाथ मिलाकर दोनों का हालचाल पूछा और फिर मास्टर जी की तरफ इशारा कर कहा,” ये हैं आपके मुजरिम डॉक्टर साहब !’’ तब तक एक सिपाही दौड़कर उनके लिए पानी ले आया था। पानी पीते-पीते डॉ. नरवाल ने भरपूर नजऱ से उन्हें देखा, फिर कहा,”शक्ल से तो बहुत मासूम लगते हैं।’’
”ये वास्तव में एक बहुत शरीफ आदमी हैं, आज से पहले कभी थाना-कचहरी का मुंह तक नहीं देखा।’’ अचानक दिनेश बोल उठा।
”आपकी तारीफ ?’’ डॉक्टर ने पूछा
”ये यहाँ के सरकारी स्कूल में मैथ मास्टर हैं, इनके बेटे के दोस्त हैं।’’ थानेदार ने उसका परिचय दिया।
”देखिये मिस्टर दिनेश, अगर आप सचमुच में इनका भला चाहते हैं तो चुप रहिये।’’ डॉक्टर के इतना कहते ही दिनेश की तो जैसे साँस सूख गई। वह अपने होंठ काटता चुपचाप बैठा रहा। अब डॉक्टर माया अग्रवाल की तरफ मुख़ातिब हुआ,”हाँ तो मैडम, आपका मुजरिम आपके सामने बैठा है, बोलिए, मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए।’’ आखिऱी पंक्ति उन्होंने मुस्कुराते और किंचित गुनगुनाते हुए कही। मैडम डॉक्टर साहब के अंदाज़ पर खुलकर मुस्कुराई और फिर अचानक गंभीर हो गई,”गुनाह तो इनका इतना बड़ा है कि माफ करने को जी नहीं चाहता पर मेरा दिल इन जैसा कठोर नहीं है। गोसाईं जी ने कहा है-दया धर्म का मूल है- (मास्टर जी गुस्से से लाल हो गए थे-वे इस दया-धर्म वाली बाई से दो प्रश्न पूछना चाहते थे-एक, जब पिल्ले चार थे तो तुमने छ: क्यों लिखवाए, दो, कल से पहले हमारी मुलाक़ात कब हुई थी और कब लड़ाई हुई थी। वे चीखना चाहते थे-ए दया की ठेकेदारनी, तू अपनी दया अपने पास रख, पर डॉक्टर की पहुंच के ख़ौफ ने उनके होंठ सिल दिए), माया अग्रवाल कह रही थी,” अगर ये लिख कर माफी माँगें और पिल्ले जहाँ से चुराए थे, वहीं वापस लाकर रख दें तो माफी पर सोचा जा सकता है।’’
”तो मास्टर जी, इधर कुर्सी पर आ जाइए और माफीनामा लिखिए।’’ थानेदार ने कहा। मास्टर जी बेंच पर ही ऐसे बैठे रहे कि जैसे कुछ सुना ही न हो। दिनेश उठा और उनकी बाज़ू पकड़कर कुर्सी तक ले आया। थानेदार ने उनके सामने कागज़़ और पेन रख दिया। उन्होंने पेन का ढक्कन खोला, कागज़़ को अपने निकट सरकाया और थानेदार का मुंह देखने लगे। डॉक्टर ने बोलना शुरू किया,”लिखिए, मैं बृजलाल, रिटायर्ड मास्टर, निवासी आदर्श कॉलोनी स्वीकार करता हूँ कि मैंने कॉलोनी के पार्क से पिल्ले चुराए… ”
”पर मैंने पिल्ले चुराए नहीं हैं डाक्टर साहब…’’
”जैसा मैं कहता हूं, वैसा लिखो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो’’, डॉक्टर की आवाज़ मास्टर जी को साँप की फुफकार जैसी सुनाई दी, ”लिखो, मुझसे भयानक ग़लती हुई है। मैं इस ग़लती के लिए ‘कुत्ता प्रेमी संघ’ से सच्चे दिल से क्षमा-याचना करता हूँ और आइंदा ऐसी ग़लती न करने की शपथ लेता हूँ। साथ ही यह वचन देता हूँ कि आज की तारीख़ में मैं पिल्लों को वापस वहीं छोड़ दूंगा, जहां से चुराए थेे। नीचे अपने दस्तख़्त कर दो।’’                मास्टर जी का लिखा माफीनामा अपने हाथ में लेकर जब डॉक्टर ने पढऩा शुरू किया तो उसके माथे पर बल पड़ गए। उसने वह माफीनामा उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा,”ऐसी ही हैंडराइटिंग है आपकी?
क्या लिखा है, कुछ समझ में आता है ?’’ मास्टर जी ने माफीनामा अपने हाथों में थामकर देखा। उसे पढऩे में सचमुच मेहनत करनी पड़ रही थी। उनके हाथ काँप रहे थे, इसे लिखते हुए भी उनके हाथ लगातार काँपते रहे थे, तभी तो जिस लिखाई पर उन्हें गर्व था, आज वही लिखाई कीड़े-मकौड़ों जैसी नजऱ आ रही थी। डॉक्टर ने उनके हाथों से कागज़़ खींचते हुए थानेदार से कहा,”एक और कागज़़ दीजिए, मैं ही लिख दूं, इनके साइन करवा लेंगे।’’
डॉक्टर ने उस माफीनामे का अनुवाद अंग्रेज़ी में करके उसे दस्तख़्त के लिए मास्टर जी के आगे बढ़ा दिया। उन्होंने दस्तख़्त कर दिए पर एक बार फिर वे यह नहीं समझ पाए कि माफीनामा अंग्रेज़ी में क्यों लिखा गया है। उठने से पहले डॉक्टर ने फिर याद दिलाया कि आज पिल्ले वहीं पहुंच जाने चाहिएं, जहाँ से उठाए गए थे। चलते-चलते थानेदार ने पूछने के अंदाज़ में डॉक्टर से कह ही दिया,” डॉक्टर साहब, पिल्ले तो चार ही थे न ! छ: शायद ग़लती से लिखवाए गए।’’
‘पिल्ले चार हों या छह, क्या फर्क पड़ता है ? बात तो चोरी की है।’ कहते हुए वे माया अग्रवाल के साथ थाने से बाहर हो गए। मास्टर जी अब भी कुर्सी पर पत्थर की तरह बैठे थे…सच कहती थी यह औरत…दिखा ही दिए दिन में तारे…। दिनेश ने उनसे कहा,”आइए अंकल, हम भी चलें।’’ वे जैसे कुछ सुन ही नहीं रहे थे। उनकी आँखें शून्य में ताके जा रही थीं, चेहरा जैसे सूज गया था…इतना अपमान उन्हें पहले कब सहना पड़ा था…वे मन ही मन धरती माँ से उन्हें अपनी गोद में जगह दे देने के लिए गुहार लगा रहे थे…पर वे सीता नहीं थे कि धरती उन पर दयालु हो जाती। थानेदार ने उनकी यह हालत देखी तो उसे सहज ही उन पर दया आ गई। उसने उनके पास जाकर उनके कंधे पर अपना हाथ रखते हुए कहा,”आपके साथ ज़्यादती हो रही है, मैं जानता हूँ पर पुलिस की नौकरी बड़ी बेलिहाज़ नौकरी है। आप समझदार आदमी हैं, मेरी मजबूरी समझ सकते हैं। उठिए और कृपा करके पिल्ले तलाश कर लीजिए। भगवान से ��ुआ करें कि वे मिल जाएँ ताकि आपको मुसीबत से छुटकारा मिल जाए। धीरज रखिए, चिंता करने से कुछ नहीं होगा। मुझसे जितनी मदद संभव होगी, मैं करूँगा पर अब सारे केस का दारोमदार पिल्लों के मिलने पर है। पिल्ले मिलें और माया अग्रवाल यह लिख कर दे कि वह संतुष्ट है तो जान छूटे। अगर ज़रूरत हुई तो कल मैं आपको कॉल करूंगा। अब उठिए।’’ वे उठ खड़े हुए। थानेदार की बातों से उन्हें तसल्ली मिली थी। कम से कम जिस पुलिस अधिकारी के पास केस है, वह तो उन्हें निर्दोष मानता है। उनका हाथ अपने आप थानेदार के सर पर चला गया, उनके मुंह से निकला,”जीते रहो !’’ और वे थाने से बाहर आ गए।

                …अगली दोपहर…एक बार फिर वे थाने में थे…उसी बेंच पर। माया अग्रवाल और डा. नरवाल भी कल वाली कुर्सियों पर बैठे थे। डा. नरवाल ने बात शुरू की,”अब क्या किया जाए मास्टर जी ? तीन पिल्ले तो आपने पार्क में वापस छोड़ दिए, चौथे का क्या हुआ ?’’
”मैं कल सारा दिन उसी पिल्ले को ढूँढ़ता रहा पर वो कहीं मिला ही नहीं। आज सुबह भी मैं इसी काम में लगा रहा। पता नहीं वो कहां चला गया।’’
”आपकी इस बात से मैडम का दुख तो दूर नहीं हो सकता।’’
”ये क्या जाने मां का दर्द। मुझे ही पता है, दो दिन मैंने कैसे काटे हैं, अन्न का एक दाना भी नहीं खाया गया। हाय मेरा पॅपी !’’ माया अग्रवाल की आँखों में आँसू छलछला आए थे, उसने अपनी आँखों पर नज़ाकत से रूमाल रखा जैसे किसी नवजात शिशु को स्पर्श कर रही हो।
कितनी फरेबी है यह औरत, कितनी मक्कार-मास्टर जी के भीतर गुस्सा उबल उठा। उनका जी हुआ, उसे कुर्सी समेत उठाकर बाहर फेंक दें या दनादन उस पर डंडों की बरसात कर दें पर गुस्से और भय के द्वन्द्व में जैसे उनकी चेतना ही खोती जा रही थी। बड़ी मुश्किल से वह बोल पाए,’मैं उसे ढूंढने की पूरी कोशिश करूंगा।’
‘कोशिश…! क्या कोशिश करेगा ये आदमी ! इस आदमी ने मेरे पॅपी को मार डाला है और अब ड्रामा कर रहा है। इस पर पॅपी के मर्डर का केस लगाइये इंस्पेक्टर साहब ! जेल की सलाखों के पीछे जब ये तड़पेगा, तभी मेरे दिल को चैन पड़ेगा।’’ बोलते-बोलते माया अग्रवाल के मुंह से फेन निकलने लगा था। उसकी तर्जनी मास्टर जी की तरफ तलवार की तरह तनी थी…हाँ, वह तलवार ही थी जिसने मास्टर जी को ऊपर से नीचे तक चीर डाला था…उनकी आत्मा को लहूलुहान कर दिया था। बेंच पर बैठे मास्टर जी की गर्दन की नाडिय़ाँ उभर आई थीं और तेज़ी से फुरफुरा रही थीं…उनकी साँसें तूफान की चपेट में आए समुद्र की लहरों की तरह पछाड़ खा रही थीं…उनके कण्ठ में अजीब सी गुरगुराने की ध्वनि जैसे फंस गई थी…वे बेंच से खड़े हुए, उनकी बाँहें सामने तनी थीं, गर्दन गोलाकार चक्कर खा रही थी…भौं…भौं…कुत्ते की भाँति भौंकते हुए वे तेज़ी से दौड़े और माया अग्रवाल की तनी हुई उंगली को दाँतों से चबा डाला। माया अग्रवाल बेतहाशा चीखने लगी। एकबारगी थानेदार और डॉ. नरवाल सन्न से खड़े रह गए, फिर डॉ. नरवाल ने मास्टर जी की छाती पर दोहत्थड़ से प्रहार करते हुए ज़ोर से धक्का दिया। मास्टर जी बेंच से टकराते हुए फर्श पर जा गिरे, उनका सर दीवार से टकराया और अब वे ज़मीन पर चित्त पड़े थे। उनको इस हालत में देखकर वहाँ मौजूद तीनों लोग बुरी तरह घबरा गए। माया अग्रवाल अपनी उंगली से बहते लहू का दर्द भूल गई थी। पसीने से तरबतर डॉ. नरवाल मास्टर जी को देखने के लिए आगे बढ़े कि तभी…मास्टर जी उठे, तेज़ी से अपने हाथों की उंगलियों को पैरों के पंजों की तरह ज़मीन पर टिकाया, चौपाये की तरह चलते हुए थोड़ा सा आगे बढ़े, मुंह को ऊपर उठाया और लगातार भौंकने लगे-भौं…भौं…भौं…

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (अंक8-9, नवम्बर2016 से फरवरी 2017), पेज- 20 से 24

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