अवधू भजन भेद है न्यारा

साखी – माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।
कर का मनका डारि के, मन का मनका फेर।।टेक –

अवधू, भजन भेद है न्यारा।।
चरण – क्या गाये क्या लिखी बतलाये, क्या भर्मे1 संसारा।
क्या संध्या-तर्पण के कीन्हें, जो नहि तत्व विचारा।।
मूंड मुंडाये सिर जटा रखाये, क्या तन लाये छारा2।
क्या पूजा पाहन3 के कीन्हें, क्या फल किये अहारा4।।
बिन परिचै साहिब हो बैठे, विषय करै व्यवहारा।
ग्यान-ध्यान का मरम5 न जाने, बात करे अहंकारा।।
अगम अथाह महा अति गहरा, बीज खेत निवारा6।
महा तो ध्यान मगन है बैठे, काट करम की छारा।।
जिनके सदा अहार अंत में, केवल तत्व विचारा।
कहै कबीर सुनो हो गोरख, तारौ सहित परितारा।।

  1. भ्रमित होना 2. भभूत रमाना 3. पत्थर 4. भोजन 5. भेद 6. डालना

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.