कबीर – जोगी मन नी रंगाया

साखी – सिद्ध भया तो क्या भया, चहु दिस1 फूटी बास2।
अंदर वाके  बीज है, फिर उगन की आस3। टेक

जोगी मन नी रंगाया, रंगाया कपड़ा।
पाणी में न्हाई-न्हाई पूजा फतरा4,
तने मन नी रंगाया चरण – जाई
जंगल जोगी धुणी लगाई हो।
राख लगाई ने होया गदड़ा5।।
जाई जंगल जोगी आसन लगाया।
डाडी रखाई ने होया बकरा।।
मुंड मुंडाई जोगी, जटा बड़ाई हो।
कामी6 जलाई ने होया हिजड़ा।।
दूध पियेगा जोगी बालक बछवा हो।
गुफा बणाई ने होया उन्दड़ा7।।
कहे कबीर सुणो भाई साधो हो।
जम8 के द्वारे मचाया झगड़ा।।

  1. दिशा 2. कामना 3. उम्मीद 4. पत्थर 5. गधा 6. कामवासना 7. चूहा 8. यम

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.