कबीर – मन, तुम नाहक दूंद मचाये

साखी – मन मतंग माने नहीं, जब लग गथा3 न खाय।
जैसे विधवा इस्त्राी, गरभ रहे पछताय।।टेक

मन तुम नाहक दूंद मचाये।
चरण – करि असनान, छूवो नहिं काहू, पाती फूल चढ़ावे।
मुरित से दुनिया फल मांगे, अपने हाथ बनाये।।
यह जग पूजै देव-देहरा, तीरथ व्रत नहावे।
चलत-फिरत में पांव थकित भये, दुख कहां समाये।।
झूठी काया झूठी माया, झूठे झूठन खाये।
बांझिन गाय दूध नहिं देत है, माखन कहां से पाये।।
सांचे के संग सांच बसत है, झूठे मारि हटाये।
कहैं कबीर जहं वस्तु है, सहजै दरसन पाये।।

  1. बेकार 2. उत्पात (नाटक) 3. गंदगी

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