कबीर – पंडित वाद वदे सो झूठा

साखी – दुविधा2 जाके मन बसे, दयावन्त जीव नाही।
कबीर त्यागो ताहि को, भूलि देखो जिन्ह नाहीं।।टेक –

पंडित वाद वदे सो झूठा
राम कहे जगत गति होवे तो खांड3 कहे मुख मीठा।
चरण – पावक4 कहे पांव जो डाहै5, जल कहै तृष्णा बुझाई।
भोजन कहे भूख सो भागे, तो दुनिया तर जाई।।
नर के संग सूवा6 हरि बोले, हरि परताप न जाणै।
तब कहीं उड़ जाए जंगल में, तो हरि सुरति7 न आवे।।
बिन देखे बिन दरस परस8 बिना, नाम लिए क्या होई।
धन के कहे धनिक जो होई, तो निर्धन रहे न कोई।।
सांची प्रीत विषय माया सो, हरि भक्तन को फांसी।
कहे कबीर एक राम बिनु, बांधे जमपुर जासी।।

  1. बोले 2. कष्ट/संशय 3. शक्कर 4. आग 5.  जलना 6. पक्षी(तोता) 7. याद (ध्यान) 8. परख

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