कबीर – साधौ पांडे निपुन  कसाई

साखी – एकै त्वचा हाड़ मूल मूत्रा, एक रुधिर एक गूदा।
एक बूंद से सृष्टि रची है, को ब्राह्मण को शुद्रा।।टेक

साधौ, पांडे निपुन कसाई।
चरण – बकरी मारि भेड़ी को धावै2, दिल मे दरद3 न आई।
करि असनान तिलक दै बैठे, विधि सो देवि पुजाई।
आतम4 मारि पलक मेूं बिनसे5, रुधिर की नदी बहाई।।
अति पुनित6 ऊंचे कुल कहिये, करम करावै नीचा।
इनसे दिच्छा7 सब कोई मांगे, हंसि आवे मोहि भाई।।
पाप-कपट की कथा सुनावै, करम करावै नीचा।
बुड़त दो परस्पर दीखे, गहे बांहि जम खींचा।।
गाय वधै सो तुरुक कहावै, यह क्या इनसे छोटे।
कहै कबीर सुणो भाई साधो, कलि में ब्राह्मण खोटे।।

  1. कुशल 2. तैयार होना 3. दया 4. आत्मा 5. नष्ट होना 6. पवित्रा 7. दीक्षा (गुरु बनाना)

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