वैश्वीकरण -हरभजन सिंंह रेणु

कविता

मैं
खौफनाक
चाबुकधारी नहीं
कांप जाओगे जिससे।
मैं पुष्प अणु हूं
तुम्हारी सांसों
तुम्हारे लहु में
समा जाऊंगा
मस्तिष्क पर बैठ
करके सम्मोहित
कर दूंगा मदहोश।
और फिर
मेरी नजर के सामने
नाचते गाते
कहोगे
हम आजाद हैं
सोच भी सकते हैं।
पंजाबी से अनुवाद :  गीता ‘गीतांजलि’
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -21

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