हरभजन सिंंह रेणु – सांझा लंगर

कविता

 

आओ मेरे लाल
मेरी आंखों के तारो!
मैं अब तुम्हारी भूख
तुम्हारी रुलाई
सहन नहीं कर सकती
लो यह रस्सी
गर्दन में डालकर
झूल जाओ इस पर
सुख की नींद सोने के लिए।

मैं कभी भी अब
तुम्हारे पिता की इंतजार नहीं करूंगी
जो कल कह गया था-
‘अब नहीं रहा जाता यहां
मैं किसी दूसरे मौहल्ले में जाऊंगा
शायद वहां सांझा-लंगर लगा हो।’

पंजाबी से अनुवाद : पूरन मुद्गल व मोहन सपरा

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर, 2016) पेज -21

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