बदहाल मानसिकता – कृष्ण चंद्र महादेविया

लघु कथा


आज फिर युवा बेटी के पेट में दर्द शुरू हुआ तो लक्ष्मी ने अपने पति को भिजवा कर तुरंत गांव की दाई को बुलवा लिया। बुढिय़ाई दाई ने आते ही युवा बेटी के पेट पर कई बार ऊपर से नीचे, दाएं से बाएं पेट की मालिश की, किन्तु पेट की दर्द कतई शांत न हुई। दाई ने आंखें गोल-गोल घुमाते लक्ष्मी से कहा-‘लगता है तुम्हारी बेटी के पेट में गर्भ है।’

‘नहीं नहीं दाई मौसी, कंवारी बेटी के पेट में बच्चा कहां से आएगा?’….आप ध्यान से देखिए न मौसी’ लक्ष्मी गिड़गिड़ाई।

‘कई महीनो का है री….।’ दाई      ने पुन: पेट टटोलते अपनी अकल दिखाई।

‘नहीं…मां, नहीं मां ये झूठ बोल रही है।’ भीषण दर्द सहते युवा बेटी ने बहुत कठिनाई से कहा।

मैं झूठी, सच्ची तो यह है। … मगर मैं कहे देती हूं, इसके पेट में पाप है।’ बच्चे जनाते-जनाते मैं बूढ़ी हो गई हूं, हां …। मैं चलती हूं।

दाई भड़कती हुई चली गई, जबकि लक्ष्मी उसे रोकती ही रह गई। बेटी के पेट के दर्द के साथ अब मन में भी दर्द होने लगा था।

लक्ष्मी और उसके शौहर ने आपस में मशविरा करके दर्द में तड़पती बेटी को शहर के अस्पताल में ले जाना ही ठीक समझा। अस्पताल में महिला डाक्टर ने सांत्वना देने के साथ खूब गहराई से जांच की। अल्ट्रासाऊंड कराकर बारीकी से जांच के बाद पेट में रसौली होने की बात बताई। आप्रेशन से रसौली निकाल दी गई और बेटी को असहनीय पीड़ा से निजात मिली। स्वस्थ हो जाने पर वे बेटी को गांव से अपने घर ले आए। पर गांव में कुंवारी मां का शोर पहले ही मच चुका था। रसौली की सच्चाई किसी को भी हजम नहीं हो रही थी। जितने मुंह उतनी बातें। समाज की बदहाल मानसिकता के लिए आखिर कौर जिम्मेवार है? …कौन?

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016), पेज-28

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