माई दे मालोटा – कमलेश चौधरी

हरियाणवी कहानी

हरियाणा के जिस स्थान पर मैं रहती हूं, वह कुछ सालों पहले तक ठेठ गांव  था। धीरे-धीरे वह विकसित होकर कस्बे का रूप धारण कर गया। अब वह कस्बाई सीमाओं मं कसमसाता हुआ शहर बन जाने को बैचेन हैं दो प्राइवेट बैंक एक राष्ट्रीय  बैंक, अनाज मंडी, सब्जी मंडी, सरकारी व प्राइवेट स्कूल, दो पेट्रोल पम्प आदि शहर की सब सुविधाएं यहां देखी जा सकती हैं। कुछ वर्षों पहले तक खाद के कट्टे से सिल कर बनाए गए बस्ते पीठ पर लादे सरकारी स्कूल में जाते बच्चों से गांव की गलियां गुलजार हो उठती थी। अब पीली बसें घूमती हैं जो घर के दरवाजे से बच्चोंं को इस अंदाज में लपकती हैं, जैसे उनका अपहरण करके ले जा रही हो। दोपहर को दरवाजे पर पटकती है मानो कह रही हो- यह लो संभालो अपनी औलाद को। गांव के बाहर सड़क के साथ-साथ नई कालोनी बस गई है जो दिनोंदिन फैलती जा रही है। मगर गांव के अंदर वहीं परम्परा को दर्शाते चिन्ह दिखाई देते हैं, जैसे गली में टोला बना कर बतियाती औरतें, गली में गड़े हुए भैंसों के खूंटे, कहीं पर घास लेकर आती झोटा बुग्गी, सिर पर चारे का बोझ उठाए महिलाएं दिखाई दे जाती हैं। मगर बाहर की कालोनी पर पूरी तरह शहर का रंग चढ़ा हुआ दिखाई देता है।

एक व्यक्ति ने गांव के अंदर वाला घर छोड़ कर बाहर की कालोनी में कोठी बना ली। पुराने घर को ताला लगाकर वे बाहर वाली कोठी में रहने के लिए चले गए। एक दिन मैंने देखा कि उसके बरामदे में एक कुतिया और उसके तीन पिल्ले ठंड से ठिठुर रहे थे। मैं एक पुरानी बोरी वहां पर बिछा कर आ गई। कुछ बची-खुची रोटी भी उनके आगे डाल दी। बच्चे बहुत ही छोटे थे। वे केवल मां का दूध ही पी सकते थे। दो दिन तक मैं उसे रोटी डाल कर आती रही। तीसरे दिन मैं रोटी देने गई तो एक दिल दहलाने वाला नजारा देखकर मैं हिल गई। कुत्तिया मर चुकी थी और उसके पिल्ले कूं-कूं करते सूखे उदर में दूध ढूंढ रहे थे। कुत्तिया के मृत शरीर को वहां से उठवा दिया गया। मेरा घर निकट होने के कारण मैं उन बच्चों को यदा कदा संभालती रही। बच्चे जोकि पिल्लों से प्रेम करते थे, शायद वक्त बदल गया था कोई भी उनकी रक्षा करने के लिए सामने नहीं आया। एक नर पिल्ले को मैंने अपने निजी परिचित को दे दिया। उनको अपने ट्यूबवैल पर रखने के लिए कुत्ता पालना था। सो वे खुश होकर उस छोटे पिल्ले को ले गए। तीन दिन तक मैं दो पिल्लों की देखरेख करती रही।

एक दिन में उनमें से भी एक पिल्ला मर चुका था और दूसरा कड़कड़ाती ठंड में नाली में गिरा हुआ पूरी ताकत से आर्तनाद कर रहा था। अब मुझ से उसका तड़पना देखा नहीं गया और नाली से निकाल कर अपने घर ले आई। हल्के गर्म पानी से उसको साफ किया। अचानक वह तड़पा और उसकी निर्जीव देह मेरे हाथ में लटक गई। इस धरती पर जो जीव आता है, उसका अन्त निश्चित है। मगर इस प्रकरण में पड़ोसियों की संवेदनहीनता, छोटे बच्चों का इस तरह पिल्लों से नाता तोड़ लेना, साथ में मेरा उपहास करना, साथ देना दूर ऊपर से मजाक भी बनाना मुझे बुरी तरह व्यथित कर गया। देहाती समाज में जीव-जंतुओं के प्रति जो अपनापन होता था वह शायद मिट गया है। कुत्ते का टुकड़ा निकालना, गौ ग्रास अलग से रखना, जेठ के महीने पेड़ों के नीचे पानी का कुल्हड़ रखना, छत पर दाने फैंकना ये परम्पराएं खत्म होती जा रही हैं। यह बात अब मेरी समझ में आने लगी थी। इस घटना से मुझे अपना बचपन याद आ गया।

हम बच्चे कुत्तिया के पेट को देखकर पहचान जाते थे कि यह पिल्ले देने वाली है। फिर हम उसके लिए भिठ बनाते। ऐसी जगह जहां उसके बच्चे सुरक्षित रह सकें। टूटे-फूटे ईंट रोड़े उठाकर दीवार बनाई जाती। बांस के डंडों की छत बनाकर उस पर घास-फूंस ढक दिया जाता। नीचे पराली बिछा दी जाती। फिर रोटी का टुकड़ा दिखा कर कुत्तिया को भिठ तक ले कर जाते। जब कुत्तिया बच्चे देती तो फिर पूरी गली के बच्चों का मलोटा मांगने का अभियान शुरू हो जाता। कुम्हार के घर से खराब मटका मांग कर लाते उसके नीचे वाले भाग को उठाकर घर-घर जाकर कुत्तिया के लिए मलोटा मांगते थे। घर की मालकिन को गीत गा-गा कर आर्शीवाद देते और कुत्तिया के लिए खाना देने की प्रार्थना करते। देखिए हमारा मलोटा गीत –

माई दे मलोटा, तेरा जीवै नन्हा मोटा
तेरी छलनी में कपास, तेरी नौ बेटों की आस
तेरे बार आगे रोड़े, तेरी बहू ल्यावे घोड़े
तेरे बार आगे ईंट, तेरी बहू ल्यावै छींट

जिस घर में जवान लड़की हो, तो बच्चे कहते-बुआ दे मलोटा, बुढिया को कहते-ताई दे मलोटा। घर में नई बहू होती तो कहते-भाभी दे मलोटा। जब तक कुछ खाने का सामान मिलता, हमारा मलोटा कीर्तन जारी रहता। कोई घर ऐसा नहीं था, जहां से हमें कुछ ना मिलता हो। यदि कभी ऐसा हो भी जाता, तो हम बच्चों का बद्दुआ देने का भजन शुरू हो जाता-

जो न दे मलोटा, उसका मर जा नन्हा मोटा
उसकी छलनी में कपास, उसके बेटे मारैं लात
उसके बार आगै घोड़े, उसकी बहू मारै रोड़े
उसके बार आगे छींट, उसकी बहू मारै ईंट

जैसे ही हमारी बद्दुआओं का पिटारा खुलता तो घर से कोई न कोई आकर मलोटा दे ही जाता। रोटी, दलिया, खिचड़ी, लस्सी तो अकसर मिल जातेे थे। कभी-कभी कोई दयालु औरत थोड़ा-मक्खन व गुड़ की डली भी मलोटे में डाल देती थी। जब तक कुत्तिया के बच्चे घर-घर फिर कर पेट भरने लायक नहीं हो जाते, तब तक हमारा मलोटा अभियान जारी रहता। मलोटा मांगते समय एक और गीत जो हम अक्सर गाया करते, मुझे पांच दशकों के बाद भी ज्यों का त्यों याद है। जो गली के कोने से शुरू होकर पूरे समाज को अपनी सीमाओं में समेटने वाला है-

माई दे दे रोटियां, जीवें तेरी झोटियां
झोटियों के पाली, जीवें तेरे हाली
हालियों की जूती, जीवें तेरी कुत्ती
कुत्तियों के पंजे, जीवें तेरे गंजे
गंजों के रोड़े, जीवें तेरे घोड़े
घोड़ों की काठी, जीवें तेरे हाथी
हाथियों के सूंड, जीवें तेरे भूण्ड
भूंडों की दांतरी, जीवें तेरी बान्दरी
बांदरी कातें चरखे, जीवे तेरे घर के
घर के करें काम, जीवें तेरे सारेगाम
गांव राम एक, जीवे म्हारा देश

जब आज के बचपन से उस बचपन की तुलना करती हूं तो लगता है दिल में कुछ दरक गया है। बहुत कुछ खो गया है। जो कुछ खो गया है, उसकी निश्चित परिभाषा देनी नामुमकिन है। जेट-नेट के युग में जीने वाली पीढ़ी चाहे कितनी ही तरक्की कर ले मगर उस मानवीय संवेदना को कभी नहीं पा सकेंगे, जिसको पाकर मानव सच्चे अर्थों में मानव बनने का अधिकारी बनता है।

मैंने उस पिल्ले को गर्म स्वेटर में लपेट कर धूप में रख दिया। तनिक सी आशा थी कि शायद सांस बाकी हों और गर्मी पाकर इसके प्राण लौट आएं। धूप का प्राकृतिक सेक भी व्यर्थ हो गया। मैंने जमादार को नमक और पैसे देकर कहा-भाई इसकी मिट्टी को ठिकाने लगा दो। जमादार की पत्नी भी उसके साथी थी। अगले दिन वह आई तो मेरा दिल नहीं माना और मैं उससे पूछ बैठी-पिल्ले को ठीक से दबा दिया था ना? वह बोली-बीबी जी, झूठ नहीं बोलूंगी। आपके दिये पैसों की तो वह कम्बख्त दारू पी गया। पिल्ले को कहीं कुरड़ी पर फैंक दिया होगा। मैं जड़ हो गई। मानवीय कुटिलता का वीभत्स रूप मेरे सामने था। लाख कोशिश के बाद भी आंसू नहीं रुक पाए। मेरे दिमाग की स्क्रॉल पट्टी पर लिखा हुआ दिखाई दे रहा था-माई दे मलोटा।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर 2016), पेज-52-53

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