जोहड़ जैसे प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाना होगा

 सत्यवीर नाहड़िया 

देहात की मनोरम छटा में चार चांद लगाने वाले जोहड़ों का अस्तित्व खतरे में है। कभी लोकजीवन की अगाध श्रद्धा व आस्था के केंद्र रहे जोहड़ आज प्रदूषण के गढ़ बन चुके हैं। सांस्कृतिक धरोहर के रूप में सुविख्यात रहे ये प्राकृतिक जल स्रोत आज अपनी बदहाली पर आंसू बहाने पर विवश हैं। जोहड़ वाटर हार्वेस्टिंग तथा वाटर रिचार्जिंग जैसी जल संरक्षण की विधियों के ये प्राकृतिक नायाब नमूने थे और पर्यावरण के संतुलन संरक्षण एवं संवर्धन में अहम भूमिका निभाते थे। किंतु इन सब पहलुओं की चिंता किसे है – यह पहलू भी चिंतनीय है।

लोक आस्था के प्रतीक रहे जोहड़ हमारे लोकजीवन के अभिन्न अंग रहे हैं जिसका अनुमान लोक कथाओं तथा लोकगीतों में जोहड़ों के चित्रण से बखूबी लगाया जा सकता है। लोकसाहित्य में गांव की सांस्कृतिक समृद्धि में जोहड़ को उच्च स्थान प्राप्त है। जोहड़ के बिना गांव की कल्पना तक नहीं की जा सकती। एक ओर जहां इन जोहड़ों के किनारे स्थित शिवालयों के साथ इन जलस्रोतों के प्रति भी जन आस्था के प्रमाण आज लोकजीवन में रचे-बसे हैं वहीं दूसरी ओर हमारी यह प्राचीन जोहड़ संस्कृति पर्यावरण संरक्षण तथा पेड़-पौधों के प्रति मानवीय प्रेम से जुड़ी रही है। यही कारण है कि आज भी इन जोहड़ों के किनारे बड़, पीपल व नीम की त्रिवेणी के अलावा अनेक पेड़-पौधों की विशिष्ट पहचान इन्हें प्राप्त है।

एक वक्त था जब जोहड़ों के किनारे पेयजल के प्रमुख स्रोत कुएं व पनघट हमारी प्राचीन ग्रामीण संस्कृति के केंद्र के रूप में जाने जाते थे। पनघट की रौनक देखते ही बनती थी जहां न केवल सभी सुख-दुख सांझे किये जाते थे बल्कि गांव देहात की तमाम खबरों का आदान-प्रदान इन्हीं धरोहरों पर होता था। गांव के दानवीर जोहड़ों के घाट, पनघट व कुएं आदि के निर्माण में विशेष रूचि लेते थे तथा इसे पुण्य का कार्य माना जाता था। इन पनघटों पर नेजू-डोल, कुंए की चकली, हास-परिहास की स्वर लहरियों से जो से जो आपसी सौहार्द का माहौल बनता था उसमें सारे दुख तकलीफ हल्के हो जाते थे। जोहड़ों की पवित्रता बनी रहे इसके लिए गांव की अपनी-अपनी आचार-संहिताएं होती थी जिसे अभी महिला-पुरुष, नौजवान व बच्चे लोकलाज से निभाते थे। जोहड़ों का यह रखरखाव तथा मान-सम्मान आज बीते युग की बात हो चुकी है।

आज चिंतनीय पहलू यह है कि जोहड़ न केवल अपने प्राचीन स्वरूप को याद करके किंकत्र्तव्यविमूढ़ हैं बल्कि वर्तमान बदहाली व वीरानी के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते प्रतीत हो रहे हैं। बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण, मानवीय मूल्यों में आई गिरावट तथा सामाजिक संवेदनशून्यता के चलते आज देहात की ये प्राचीन धराहरें तिल-तिल कर नष्ट हो रही हैं। प्रदूषण की मार झेल रहे इन जोहड़ों की चहुमुंखी बेकद्री जारी है। ग्रामीण अंचलों में पेयजल व अन्य उद्देश्यों के लिए पानी की जरूरतों के संसाधनों के विकल्प मुहैया होने के कारण इन जोहड़ों के रखरखाव के प्रति घोर उपेक्षा बरती जा रही है। आलम यह है कि अधिकांश गांवों में जोहड़ आजकल गंदगी के प्रमुख केन्द्र बने हुए हैं। गांव की गलियों की गंदगी की निकासी जोहड़ों में की जा रही है जिसके चलते जोहड़ों के माथे पर कालिख पुत चुकी है।

एक ओर जहां सरकारें हमारी प्राचीन संस्कृति में अहम स्थान रखने वाले इन जोहड़ों की चारदीवारी व रखरखाव के लिए विशेष अनुदान मुहैया कराती हैं तथा जोहड़ों के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अनेक परियोजनाएं जोड़ी गयी हैं किंतु जोहड़ों को प्रदूषण की इस मार से बचाने के लिए अभी तक किसी स्तर पर कोई पहल न होना चिंतनीय है। पर्यावरण संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाले इन जोहड़ों के अस्तित्व को बचाने के लिए नये सिरे से प्रयास करने होंगे जिसके लिए सामाजिक संगठनों तथा पर्यावरण प्रेमियों को आगे आना होगा। यदि समय रहते इन सांस्कृतिक धरोहरों को नहीं सहेजा गया तो जल संचयन, संरक्षण एवं संवर्धन में प्रमुख भूमिका वाले इन जोहड़ों के अस्तित्व को बचाने में बहुत देर हो चुकी होगी।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर 2016), पेज-40

 

 

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