भारत में भाषा बंटवारे की राजनीति – जोगा सिंह

1

joga singh

आलेख

भारत के राजनीतिक गठन में सैद्धांतिक स्तर पर भाषा को मुख्य आधार माना गया है, परन्तु वास्तविक रूप में ऐसा हो नहीं रहा। भाषा का शिक्षा व प्रशासन आदि के साथ सीधा संबंध होने के कारण भाषा के बारे लिए गए निर्णय से गहरे परिणाम निकलते हैंं। भारतीय जनगणना विभाग की ओर से भारत भाषाओं की बांट बड़ी अवैज्ञानिक व मंदभावना से प्रेरित रही है। इस पर्चे में इस अवैज्ञानिकता के सबूत पेश किए गए हैं और भारत में भाषाई विभाजन व भाषाई व्यवहार के कुछ निष्कर्ष पेश किए गए हैं :

  1. भारत में भाषाओं की संख्या :

    1961 की जनगणना में भारत में 1652 नई मातृ भाषाएं चिन्हित की गई हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 216 मातृ भाषाओं और 114 भाषाएं हैं। परन्तु 2001 की जनगणना के अनुसार भारत में 234 मातृ भाषाएं और 114 भाषाएं हैं। मातृ भाषा और भाषा के बीच अलगाव पर जनगणना विभाग का आधार स्पष्ट नहीं हैै, क्योंंकि भाषा वैज्ञानिक क्षेत्रों में अंग्रेजी के not her tongue और language शब्द समानार्थी हैं। अगर इस बात को एक तरफ भी रख दें तो जनगणना विभाग के अलग-अलग वर्षों के आंकड़े अपने-आप में एक प्रमाण हैं कि भारतीय जनगणना विभाग भारत में भाषाओं की स्थिति बारे या तो स्पष्ट नहीं है या फिर निर्णय ईमानदारी से नहीं कर रहा।

  1. भाषा-उपभाषा विभाजन का आधार :

    भाषा-उपभाषा विभाजन का भाषा वैज्ञानिक आधार आपसी बोध ( (natural intelligibility)) है। मतलब यह  है कि अगर दो भाषाएं बोलने वाले बिना किसी प्रशिक्षण के एक-दूसरे के भाषा रूपों को समझ सकते हैं तो वे भाषा रूप एक ही भाषा की उपभाषाएं होती हैं। इस आधार पर परख की जाए तो भारतीय जनगणना विभाग ने कुछ भाषाओं को किसी दूसरी भाषा की उपभाषाएं और कुछ उपभाषाओं को भाषाएं घोषित किया हुआ है। नीचे दिए जा रहे उदाहरण इस तथ्य को स्पष्ट करते हैं:

राती दी बुक्कली च सुत्ती दी कंजका दी अक्ख खुल्ली
कच्छ-कोल अश्कें कुतै अतरै दी शीशी डुल्ली।
कंजका ने माऊ गी पुच्छेआ—-
मां, ए ह् केह् झुल्लेआ जे रात उट्ठी मैह्की ।

उपरोक्त पंक्तियां एक डोगरी कविता से हैं, जिसको भारत सरकार ने नई भाषा का दर्जा दिया हुआ है। कोई भी पंजाबी भाषी इन पंक्तियों को सहज ही पंजाबी की किसी उपभाषा समझेगा।

इस आधार पर अब कुछ और भाषाई रूप देखते हैं :

आज हमारि या प्राचीन अर समिर्ध भासा हरचणि च किलैकि हम अपड़ी भासा प्रयोग नि करणा छाँ । हमारि नै छिवांळ (पीढ़ी) ईं भासाथैं छ्वड्न लगीं च ।

जु आज हम अपड़ी भासा बचौणौऽ परयास नि करला त भोळ ईंन लुप्त ह्वे जाण। ये पेजाऽ माध्यमन गढ़वळि भासा कु परचार-परसार करला अर यख अपड़ी भासामा बच्यौंला। जै भारत, जै उत्तराखण्ड, जै गढ़देस!!!

यह पंक्तियां गढ़वाली भाषा में से हैं, जिसको भारतीय जनगणना विभाग ने हिन्दी की उपभाषा  घोषित किया हुआ है। परन्तु कोई भी हिन्दी वक्ता गढ़वाली को इतनी आसानी से समझ नहीं सकता, जितनी आसानी से पंजाबी वक्ता डोगरी को समझ लेता है। इसलिए स्पष्ट है कि भारतीय जनगणना विभाग भाषा-उपभाषा का अलगाव वैज्ञानिक आधार पर नहीं कर रहा।

यहां यह ध्यान देने योग्य है कि भोगौलिक रूप से गढ़वाली और राजस्थानी क्षेत्र टकसाली हिन्दी (खड़ी बोली) के क्षेत्रों के साथ लगते इलाके हैं, परन्तु फिर भी इनके बीच इतना भाषाई अलगाव है कि ये अलग-अलग भाषाएं हैं, जो इलाके खड़ी बोली के इलाके को गढ़वाली और राजस्थानी भाषा इलाके के मुकाबले बहुत दूर हैं। उनकेे  हिन्दी के भाषाई अलगाव का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है, परन्तु फिर भी भारतीय जनगणना विभाग ने अवधी, बघेली, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मगही और पवारी जैसी बड़ी संख्या वाली नई भाषाओं को भी हिन्दी की उपभाषाएं घोषित किया हुआ है।

  1. 8वीं सूची का आधार :

    भारत सरकार के भारतीय भाषाओं संबंधी राजनीतिक निर्णय की सिद्धांतहीनता सामने है। 2001 में भारत में केवल 2,26,449 व्यक्तियों ने अंग्रेजी को अपनी मां बोली लिखाया है। परन्तु अंग्रेजी भारत के हर क्षेत्र में प्रभाव जमाए बैठी है। 14,135 मां बोली भाषाओं वाली संस्कृत अनुसूचित भाषाओं में शामिल है, परन्तु 95,82,957 वाली भीली, 27,13,790 वाली गोंडी, 20,75,258 वाली खंडेसी, 17,51,489 वाली कुरुख, 10,61,352 वाली मुंडाली, 17,22,768 वाली तुलु और ऐसे ही कई अन्य का कोई वारिस नहीं है और यह भाषाएं दम तोड़ रही हैं। हैरानी की बात तो यह है कि अंग्रेजी 8वीं सूची मेंं न होकर भारत की मालिक बनी बैठी है परन्तु 8वीं सूची में शामिल होने के बावजूद भी संथाली को कोई सरकारी रूतबा हासिल नहीं है।

  1. राष्ट्रीय भाषा :

    भारतीय संविधान 8वीं सूची में शामिल 22 भाषाओं को राष्ट्रीय भाषाओं का नाम देता है, परन्तु इन 22 भाषाओं को ही राष्ट्रीय भाषाएं क्यों माना जाए, दूसरी भाषाओं को क्यों नहीं। भारत की सारी भाषाएंं ही भारत की राष्ट्रीय भाषाएं हैं। और तो और, 22 भाषाओं को संवैधानिक रूप से राष्ट्रीय रूतबा हासिल होने के बावजूद भी सरकार का कोई न कोई नेता चौथे दिन शरारतपूर्ण तरीके से केवल हिन्दी को ही राष्ट्रीय भाषा कहता रहता है। यह खेल बड़ा खतरनाक है।

  1. कुछ भयानक परिणाम :

    भारतीय राजनीतिक जीवन के बहुत सारे सवाल भाषा के साथ जुड़े हुए हैं। इसमें एक सवाल भारत का राजनीतिक गठन है। अगर किसी भाषा को कोई सरकारी दर्जा हासिल नहीं है, तो उसको किसी तरह की राजनीतिक सरपरस्ती हासिल नहीं हो सकती और वह भाषा भाषाई क्षेत्रों से बाहर होती जाती है। इसका परिणाम उस भाषा की निश्चित रूप में समाप्ति है। इसी कारण भारत की 196 भाषाएं यूनेस्को की समाप्ति के खतरे वाली सूची में शामिल हैं। सरकारी सरपरस्ती कैसे भाषा को जीवन दे सकती है, इसकी मिसाल खासी भाषा है, जो पहले समाप्त होने के कगार पर थी, परन्तु मणीपुर सरकार ने स्कूलों में पढ़ाई जानी शुरू करने के बाद यूनेस्को ने इसको खत्म होने की खतरे वाली सूची से बाहर निकाल लिया है।

किसी भाषा को भाषा का दर्जा न देने के साथ और उसका भाषाई क्षेत्र में किसी और भाषा के प्रभाव के साथ शिक्षा, प्रशासन, विकास और सांस्कृतिक आदि में बड़े नुक्सान होते हैं। लगभग सारा भारत ही इस बड़े नुक्सान को झेल रहा है। यह स्थिति उन क्षेत्रों में ज्यादा भयानक है, जहां क्षेत्रीय भाषाओं की शिक्षा और प्रशासन आदि में कोई स्थान हासिल नहीं है।

  1. सरकारी कामकाज की भाषा :

    भारत का कोई भी प्रदेश एक भाषाई प्रदेश नहीं हैं। परन्तु फिर भी लगभग हर प्रदेश में अंग्रेजी को छोड़कर केवल एक भाषा को ही सरकारी भाषा का दर्जा हासिल है। यह उस प्रदेश में रह रहे अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती है। भारत के संविधान की 347 और 350-ए धाराएं स्पष्ट रूप से किसी प्रदेश की अल्पसंख्यक भाषाओं को सरकारी रूतबा दिए जाने का अधिकार देती हैं। परन्तु प्रदेश सरकारें इसके लिए बिल्कुल भी गंभीर नहीं हैं। इसका परिणाम यह है कि शिक्षा और विकास में बड़े नुक्सान हो रहे हैं और बड़ी प्रशासनिक मुश्किलोंं का सामना करना पड़ रहा है। बड़े प्रदेशों के तो हालात यह हैं कि सरकारी कामकाज की भाषा प्रदेश के किसी व्यक्ति की भी मातृ भाषा नहीं है। ऐसे हालात में प्रशासन के सुचारू होने की कल्पना करना शेखचिल्ली के सपनों से भी दूर की बात है।

  1. भाषा का सवाल और भारत की एकता :

    भारत एक बहुराष्ट्रीय (बहुकौमी) देश हैं। इनकी अपनी-अपनी भाषाएं हैं और अपनी-अपनी संस्कृति। भारत की सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक हकीकतों को दूर करके भारत की एकता कायम नहीं रखी जा सकती। यह उन हकीकतों को स्वीकार करके और उनकी नींव पर राजनीतिक और प्रशासनिक ढांचा निर्मित करके ही कायम रखी जा सकती है। यदि भारत के राजनीतिक ढांचे का रूप भारत के भाषाई ढांचे के अनुकूल नहीं होता तो राजनीतिक स्थिरता कायम नहीं हो सकती। परन्तु कई भारतीय राजनीतिज्ञों के मन में यह बात घर कर गई लगती है कि भाषाओं के मामले छेड़ने के साथ भारत की एकता को भी खतरा होगा। यह एक भ्रम है। बात बल्कि इसके विपरीत है। अगर यह मामले न हल किए गए तो फिर भारत की एकता को खतरा जरूर है।

उपरोक्त विचार-चर्चा ये नतीजा निकाला जा सकता है कि आजादी के बाद भी भारतीय हुकूमतों ने भारत के बहुभाषाई, बहुसांस्कृतिक और बहुराष्ट्रीय होने की हकीकत को भारतीय शासन प्रबंध और नीतियों का ठोस आधार नहीं बनाया। इस  का भारत को भारी मूल्य शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान और अर्थव्यवस्था में पिछड़ेपन और अपनी भाषाओं व संस्कृति को देश निकाले के रूप में देना पड़ रहा है। जरूरत है इस हकीकत को पहचानने  और भाषाई सवालों को ठीक ढंग से हल करने की।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर- अक्तूबर 2016), पेज- 27-28

Advertisements

1 COMMENT

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.