रसायनमुक्त वैकल्पिक कृषि क्रांतिकारी कृषि – राजेन्द्र चौधरी

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खेती-बाड़ी

वर्तमान में प्रचलित रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक आधारित खेती संकट में है इसके बारे में शायद ही कोई मतभेद है। सरकारी और कृषि संस्थानों के दस्तावेज भी इस संक ट की चर्चा से भरे पड़े हैं। बहस का असल मुद्दा यह है कि क्या इस रसायन आधारित खेती का कोई विकल्प है, और अगर है तो वह विकल्प क्या है? कई लोगों के लिये दूसरी हरित क्रांति का अर्थ नवीनत्तम तकनीक जैसे आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) बीज इत्यादि है। ये धारा, ऐसे बीजों और अन्य ऐसे प्रौद्योगीकीय उपायों के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है, जो कृषि  को निगमीकरण और केंद्रीकरण की ओर ले जाती है. यह धारा तथाकथित ‘हरित क्रांति’ की आलोचना की बजाय उसको अगले सोपान पर ले जाती है।Mahila keet pathshala in Lalit Khera village in Jind

इस के ठीक उलट, दूसरी ओर, अनेक भिन्नताओं के बावज़ूद, इस पर सहमति है कि रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक इत्यादि पर आधारित खेती को तो छोड़ना ही होगा। बिना रसायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक के प्रयोग के खेती की वैकल्पिक पद्धतियां अनेक नामों से जानी जाती हैं- कुदरती खेती, ऋषि खेती, नानक खेती, जीरो बजट खेती, जैविक खेती, शाश्वत खेती, वैकल्पिक खेती इत्यादि, इन वैकल्पिक पद्धतियों में कई महत्वपूर्ण फर्क हैं परंतु इन सबमें एक समानता भी है। इन सब विधियों में रसायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक इत्यादि का प्रयोग नहीं किया जाता। आम प्रचलन में इन भिन्न-भिन्न पद्धतियों के लिये जैविक खेती शब्द भी प्रयोग किया जाता है।

यहां जैविक खेती की दो विभिन्न धाराओं में फर्क करना भी जरूरी है। एक रूप में जैविक खेती भी कम्पनी आधारित है। कई रासायनिक उर्वरक बनाने वाली कम्पनियां अब जैव-उर्वरक और जैव-कीटनाशक बनाने लग गई हैं, तो कई कम्पनियां जैविक उत्पादों की बिक्री से ले कर जैविक खेती कराने तक में शामिल हैं।  दूसरी ओर, जैविक खेती का बिना खर्च, बिना कर्र्ज वाला स्वावलम्बी रूप है जिसमें किसान को बाहर से कुछ भी खरीदना नहीं पड़ता। यह केवल श्रम और स्थानीय संसाधन आधारित खेती है। जन आंदोलन तो इस तरह की स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित खेती को ही बढावा दे रहे हैं न कि कम्पनी आधारित ‘जैविक’ खेती को। इस तरह की स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित खेती की सब पद्धतियों को  इस लेख में, अगर विशिष्ट संदर्भ में अर्थ अन्यथा न हो तो, हम एक श्रेणी में रख कर समानार्थी मानेंगे और इन सब के लिये अक्सर वैकल्पिक कृषि   शब्द का उपयोग करेंगे।

‘वैकल्पिक कृषि’ में पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान दोनों का योगदान है। हालांकि ‘वैकल्पिक कृषि’ में निश्चित रूप से रासायनिक उर्वरकों तथा कीटनाशकों के उपयोग का निषेध है परन्तु ‘वैकल्पिक कृषि’ इतने तक सीमित नहीं है। वैकल्पिक कृषि  का व्यापक वैज्ञानिक आधार है। कृषि  वैज्ञानिको द्वारा एक सवाल बार-बार उठाया गया। इतने पशु ही कहां हैं कि गोबर की खाद मात्र से फ़सल के लिये सारे पोषक तत्वों की पूर्ति हो सके। वो हिसाब लगा कर बतातें हैं कि यूरिया डालने से पौधे को इतनी नाइट्रोजन मिलती है और इतनी नाइट्रोजन की पूर्ति के लिये इतने गोबर की जरुरत होगी। इस गणित में एक बड़ा झोल है।

हमें पौधे को पूरा भोजन बाहर से देने की जरुरत ही नहीं है। नाइट्रोजन तो हवा में बहुत है। इसीप्रकार से पृथ्वी में अन्य तत्वों की भी आमतौर पर कमी नहीं है। परन्तु प्राकृतिक रूप से मुफ्त में मौजूद ये तत्व दो रूप में पाये जाते हैं। एक छोटा हिस्सा फसल को सीधे-सीधे उपलब्ध रूप में पाया जाता है, परन्तु बड़ा हिस्सा इस रूप में उपलब्ध नहीं होता कि पौधा उन्हें सीधे-सीधे प्रयोग कर ले। प्राकृतिक रूप से मुफ्त में मौजूद इन तत्वों को पौधों के प्रयोग लायक बनातें हैं मिट्टी में मौजूद जीवाणु। परन्तु कीटनाशकों और रासायनों के प्रयोग से ये जीवाणु लगभग खतम होने के कगार पर हैं। हमें तो बस यह सुनिश्चित करना है कि मिट्टी में ये जीवाणु फिर पर्याप्त मात्रा में हो जाएं, इनको पर्याप्त मात्रा में मिट्टी में वापिस लाने के तरीके किसानों ने खोज लिये हैं।

मिट्टी में जीवाणुओं को वापिस लाने की पहली शर्त तो यह है कि इनको खतम करने वाले रासायनों और कीटनाशकों का प्रयोग बंद हो। परन्तु इतने से काम नहीं चलेगा। इन जीवाणुओं को भोजन भी तो चाहिये। इस के लिए जरूरी है कि हम खाने वाली चीज को खा लें, बेचने वाली चीज को को बेच दें परन्तु धरती से उपजी बाकी सब वनस्पति को वापिस मिट्टी में मिला दें। असल में मिट्टी में मिलाने की भी जरुरत नहीं है। इससे खेत को ढकना भर है, (विशेषज्ञ इसे मुल्चिंग या आच्छादन करना कहतें हैं)।

इसके कम से कम तीन फायदे होंगे। एक तो मिट्टी से निकले बहुत से तत्व वापिस मिट्टी में मिल जायंगे और दूसरा जीवाणुओं को भोजन मिल जाएगा ताकि वो जी सके और प्राकृतिक रूप से मुफ्त में उपलब्ध पोषक तत्वों को पौधों को उपलब्ध करा सकें। मिट्टी के ढके रहने से जल का भी संरक्षण होगा। कम पानी में ज्यादा भूमि पर खेती हो पायेगी। इसी तरह हवा में मुफ्त में उपलब्ध नाइट्रोजन को पकड़ पाने वाली फसलों को अपने फसल चक्र में शामिल करें और भी बहुत सी जरूरी बाते हैं। संक्षिप्त में ‘वैकल्पिक कृषि’ एक फसली खेती (मोनोकल्चर) के खिलाफ है। जैव विविधता को बढ़ावा देती है, कृषि अवशेषों (बायोमास) के स्थानीय स्तर पर पुन: प्रयोग को बढ़ावा देती है। किसान के अपने/स्थानीय उच्च पैदावार के बीजों के विकास को बढ़ावा देती है, प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से सौर ऊर्जा का अधिकतम दोहन करने करने के लिए हर समय खेत में फसल चाहती है, पशु पालन ‘वैकल्पिक कृषि’ का एक अभिन्न हिस्सा है।

मिश्रित और पूरा साल की खेती है जिसके चलते पूरे साल खेत में काम रहता है। इसलिये ‘वैकल्पिक कृषि’ में वर्ष भर काम और रोजगार मिलता है। फसलों की विविधता और रोग/कीट नियंत्रण के स्थानीय उपायों के चलते व्यक्तिगत ध्यान की आवश्यकता होती है, जिसके चलते अनुपस्थित किसान के मुकाबले स्वयं खेती करने वाले, और बड़े पैमाने के मुकाबले छोटे पैमाने पर खेती करने वाले के यह ज़्यादा अनुकूल है। (‘वैकल्पिक कृषि’ की दाभोलकर पद्धति का दावा है कि पांच व्यक्तियों का एक परिवार एक एकड़ के चौथाई हिस्से और प्रतिदिन 1000 लीटर पानी पर न केवल गुजर-बसर कर सकता है बल्कि खुशहाल जीवन जी सकता है)

प्रकृति के साथ मिल कर काम करती है न कि उस पर कब्जा, यह तेजी से घटते तैलीय संसाधनों से स्वतंत्र है, जबकि रासायनिक उर्वरक इन पर आधारित हैं। स्थानीय और प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित होने के कारण कार्बन उत्सृजन को कम करती है और इस तरह पर्यावरण सुधार में योगदान देती है। कम लागत के खेती के तरीके नकदी की जरूरत कम कर देते हैं। इसके चलते ऋण पर निर्भरता घट जाती है और कर्ज भुगतान का दबाव न होने के कारण किसान कटाई के तुरंत बाद ही फ़सल बेचने के लिए मजबूर न होकर अपनी सुविधानुसार बेच सकता है। बाहरी आदानों के उपयोग को कम करता है और इस तरह विकेन्द्रीकृत निर्णय और विकास के पक्ष में है। इससे क्षेत्रीय असमानता एवं शहरों की ओर पलायन पर अंकुश लग सकता है।  अंत में, यह हानिकारक रसायनों से मुक्त स्वास्थ्यवर्धक भोजन उपलब्ध कराती है।

‘वैकल्पिक कृषि’ से हमारा तात्पर्य उपरोक्त वर्णित सब/अधिकांश तत्वों को अभिन्न अंग के रूप में सम्माहित करने वाली खेती से है। यानी ‘वैकल्पिक कृषि’,आत्मनिर्भर कृषि, स्थानीय संसाधनों पर आधारित कृषि, विकेन्द्रीकृत विकास और प्रकृति के साथ अधिक सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देने वाली खेती है। इन सबका मिला-जुला प्रभाव, पिछली कुछ सदियों से चली आ रही विकास की राह बदलने का है, और यह एक क्रांतिकारी संभावना है। बशर्ते कि ‘वैकल्पिक कृषि’ दुनिया का पेट भर सके।

असली सवाल यही है कि क्या ‘वैकल्पिक कृषि ‘ दुनिया का पेट भर सकती है? वर्तमान में, अक्सर ‘वैकल्पिक कृषि’ के उत्पाद उच्च कीमत वाले होते हैं इस उच्च कीमत का कारण ‘वैकल्पिक कृषि’ की कम उत्पादकता बताया जाता है। कई किसान जो रसायनों के हानिकारक परिणामों से परिचित होते हैं, वे अपने स्वयं के उपभोग के लिए, रसायनों का प्रयोग बंद कर देते हैं और पाते हैं कि उनकी उपज घटी है। इसके अलावा ‘वैकल्पिक कृषि’ के पक्षधरों का ध्यान निर्यात बाजार या अमीरों पर केंद्रित होता है जिससे इसके केवल सभ्रांतवादी सनक होने का आभास होता है। इससे यह भी प्रतीत होता है कि आम आदमी तो विषैले रासायनिक भोजन खाने के लिये अभिशप्त है।

लेखक ने पिछले 2 साल से हरियाणा में ‘वैकल्पिक कृषि’ के प्रचार-प्रसार का काम शुरु किया है, उपलब्ध साहित्य की व्यापक समीक्षा और ‘वैकल्पिक कृषि’ अपनाने वाले किसानों के खेतों की यात्रा और हरियाणा के प्रारम्भिक नतीजों के आधार पर यह लेखक आश्वस्त है कि ‘वैकल्पिक कृषि’ एक विश्वसनीय विकल्प है जो पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ तरीके से दुनिया को भोजन उपलब्ध करा सकती है।

भारत में अब किसानों की बड़ी संख्या और कृषि भूमि के अच्छे खासे हिस्से पर ‘वैकल्पिक कृषि’ अपना चुकी है। कुछ किसान तो दो या अधिक दशकों से ‘वैकल्पिक कृषि’ अपना चुके हैं।

दुर्भाग्य से, ‘वैकल्पिक कृषि’ अब भी हाशिये पर ही बनी हुई है और इसको न तो मुख्यधारा के कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों ने, और न ही किसानों के संगठनों ने गंभीरता से लिया है। ‘वैकल्पिक कृषि’ के अनुभव की पड़ताल ही नहीं की गई और पूर्वाग्रहों के चलते ही इसे नकार दिया गया है। दूसरी ओर, वैकल्पिक कृषि अपनाने वाले किसानों के पास न तो संसाधन हैं, न समय और प्रशिक्षण की वो ‘वैज्ञानिक’ आधार पर अपनी पद्धति को सही साबित कर सकें। जिन किसानों को ‘वैकल्पिक कृषि’ अपनाने से फायदा हुआ है वो अपने काम में व्यस्त हैं। इसलिये ‘वैकल्पिक कृषि’ का फैलाव धीरे-धीरे हो रहा है।

‘वैकल्पिक कृषि’ के कई ऐसे रूप हैं जो तर्क से परे हैं। होमा कृषि में दैनिक हवन पर जोर देने के साथ बिल्कुल निश्चित समय में एक या दो विशिष्ट मंत्रों के जाप से चमत्कार का दावा किया जाता है।  भैंस व अन्य पशुओं को नकार कर, गाय का महिमामंडन किया जाना, गोमूत्र से मानव, पशु या फसल के सभी रोगों के इलाज का दावा समझ से बाहर हो जाता है। लेकिन लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतों का इसके चलते ‘वैकल्पिक कृषि’ को नजरअंदाज करना सही नहीं है।

‘वैकल्पिक कृषि’ विकेन्द्रीकृत और समतामूलक विकास के मॉडल और गांवों के पुनर्जीवन की नींव बन सकती है।  ‘वैकल्पिक कृषि’ की क्रांतिकारी संभावनाओं के चलते सामाजिक बदलाव की प्रगतिशील ताकतें  इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (सितम्बर-अक्तूबर 2016), पेज- 14से 15

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1 COMMENT

  1. जैविक खेती रसायन मुक्त होती है जिससे मानव जीवन रसायनों के घातक प्रभाव से बच जाता है।
    Roopkumar2012

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