दो मुंह वाला देवता

अमृत लाल मदान

                मामी जी को दो दिनों के लिए तावडू वापिस जाना पड़ा, जहां जाकर उन्हें अपने और मामा जी के मैले कपड़े धोने थे, धुले और कपड़े अस्पताल लेकर आने थे तथा कुछ अन्य जरूरी घरेलू कार्य करने थे। क्योंंकि मैं उनके साथ पूरे चौबीस घंटे दिल्ली के इस बड़े अस्पताल में बिता चुका था, मुझे मरीज मामा जी के रूटीन  का पता चल गया था कि कब कब दवाई देनी है। सो, मामा जी की देखभाल ठीक प्रकार से हो पाएगी। फिर भी जाते-जाते वह कह गई कि जाते ही यहां मोती लाल को भी भेज देंगी। एक रोज दुकान बंद रहेगी तो कोई सुनामी नहीं आ जाएगी।
मोती लाल मामा जी का इकलौता पुत्र था, पर उसे अपने पिता यानी मेरे मामा से कोई विशेष लगाव न था। वह अविवाहित रहकर अपनी दुकान के अलावा अपने राष्ट्र की सेवा में तन-मन से लगा हुआ था। भारत मां के सम्मुख अपने बीमार पिता की सेवा उसे अत्यंत तुच्छ लगती थी।
हरियाणा में मेवात क्षेत्र के द्वार तावडू में मेरे मामा कपड़े की दुकान करते थे। पता नहीं वहां के रेतीले पानी में कैसा प्रदूषण फैल गया था कि वह पीलिया के शिकार हो गए थे। पहले तो वह कस्बे के मुल्ला मौलवियों-ओझाओं से इलाज कराते रहे, प्रसिद्ध गर्म पानी के चश्में में भी गायत्री मंत्र का जाप करते हुए स्नान करते रहे, लेकिन बीमारी बढ़ती गई। दिल्ली आकर जांच कराने से ज्ञात हुआ कि खून पानी बनने लगा है। मामा जी के पैर सूजने लगे थे और टांगें भी। उनकी आंखों का पीलापन भी डराने लगा था। मैं मामा जी के पैताने बैठा चिंताग्रस्त हो रहा था कि क्या होगा उनका।  इस सरकारी अस्पताल में  दाखिल हुए उन्हें दस दिन हो चले थे। उन्हें कितनी बार तो मूत्र और शौच का दबाव सताता था। टैस्ट भी होते थे।
वार्ड में  जो अन्य मरीज दाखिल थे वे भी लगभग गंभीर बीमारियों से ग्रस्त थे। अधिकतर मरीज तो निर्धन या निम्न मध्यवर्गीय थे। किसी किसी बिस्तर पर दो मरीज भी लेटे थे। उनके सहायक एक-दूसरे की यथासंभव सहायता भी कर देते थे। उदासी के इस वातावरण में कभी-कभी हंसी मजाक की फुहार भी छूट जाती तो अच्छा लगता। रोगी के साथ एक ही सहायक रह सकता था। नाश्ते से पहले जब बड़े डाक्टर अपनी टीम के साथ राऊंड  पर आए तो मैंने उनसे पूछना चाहा कि क्या मामा जी  की हालत में कुछ सुधार भी है, पर सबकी कठोर मुख मुद्रा देख मेरी हिम्मत न हुई। पता नहीं ये सरकारी डाक्टर ऐसी मुद्रा क्यों बनाए रखते हैं कि चंगा होता मरीज भी देखकर अधमरा हो जाए या फिर पूरा मुर्दा।
उनके  जाने के बाद चाय नाश्ते वाला आया। नाश्ते की ब्रेड की प्लेट मामा जी के आगे रखते हुए मैंने कहा, ‘मामा जी, आज तो हालत में सुधार लग रहा है।’
‘हां, तुम्हारी मामी जो चली गई है थानेदारनी सी।’ वह हंसते हुए बोले। मैंने झूठमूठ कहा, ‘देखो डाक्टर साब ने आपकी केस-हिस्ट्री में भी सुधार की बात लिखी है।’ ‘ये कीड़े-मकौड़े झरीटने वाले अपने सुधार तो कर लें पहले। मुंह पर तो बारह बने रहते  हैं इनके, जैसे घर में बीवियों से लड़कर आते हो यहां।’ इन मामा जी को हम मसखरा मामा भी कहा करते थे। ‘तुमने भी कुछ खाया कि नहीं, भानजे’ पूछ रहे थे वह। ‘नहीं मामा जी, यह सरकारी नाश्ता तो  आपके लिए है। मैं बाहर जाकर कैंटीन में खा लूंगा कुछ।’ मैंने कहा।
‘अच्छा मेरी लात तो खा लेगा न यहां  भी।’
मैं हतप्रभ। तभी मामाजी खिलखिला कर हंस पड़े। ऐसा हंसे कि उनके पीले चेहरे पर खून की लाली पूत गई हो जैसे।  फिर बोले, ‘याद है भांजे, कभी मैंने तुम्हारी और मोती की पूजा लातों से भी की थी।’
‘ओह मामा जी कैसे भूल सकता हूं कि उस लात ने ही मुझे सिखाया था कि किसी दूसरे की टांग में अपनी टांग नहीं अड़ाया करते।’
‘लेकिन तुम्हारे भाई मोती ने तो नहीं सीखा यह सबक।’ वह फिर हंसे।  पर इस बार उनकी हंसी कुछ-कुछ लाल-पीली थी।
हुआ यूं था कि एक बार मैं लड़कपन में गर्मी की कुछ छुट्टियां बिताने तावडू आया हुआ था। मामा जी दोपहर दुकान से आ खाना खा कर थोड़ी देर सुस्ताने लेट जाते और मोती तथा मुझे अपनी एक-एक टांग दबाने को सौंप देते। एक रोज बैठे हम अपनी-अपनी टांग दबा रहे थे कि  हम दोनों में झगड़ा शुरू हो गया। मोती ने कहा, ‘मेरी वाली टांग बढिय़ा है।’ मैंने कहा, ‘नहीं मेरे वाली बढिय़ा है।’ मोती ने कहा, ‘मेरे वाली ज्यादा हृष्ट-पुष्ट है।’ मैंने कहा, ‘नहीं मेरे वाली मोटी ताजी है।’ बात बढ़ते बढ़ते इतनी बढ़ गई कि हम एक-दूसरे की टांगों के बाल नोचने लगे, फिर जब टांगों को दांतों से काटने की नौबत भी आ गई तो मामा ने गुस्से से लाल-पीला होते उठ कर दोनों को एक-एक लात जमा  दी। लेकिन क्रम बदलते हुए यानी मोती वाली टांग मुझे और मेरी वाली टांग उसे। हम दोनों फर्श पर लुढ़क गए और रोने लगे। मामी ने ही आकर हमें उठाया और चुप कराया।
‘पर अब मेरी टांगों में वो ताकत कहां रही – खून ही पानी बन गया जब।’ वह फिजूल ही दूसरों के मामलों में अब भी टांग अड़ाता फिरता है। कभी लव जेहाद के नाम पर, कभी घर वापसी के बहाने से।’ मामा ने ठंडी आह भरते हुए नाश्ते की प्लेट परे खिसका दी।
तभी मैंने देखा कि दाढ़ी और फैज टोपी वाले दो ग्रामीण व्यक्ति एक बुजुर्ग मरीज को संभाले-पकड़े अंदर ला रहे थे। उनके आगे प्रधान नर्स थी और पीछे एक मुस्लिम युवती, जो काफी पढ़ी-लिखी लग रही थी। प्रधान नर्स इस नये मरीज को एक ऐसे बिस्तर की ओर ले गई, जिस पर एक रौबीला सा मोटा सा मध्यवर्गीय मुस्लिम मरीज अकेला लेटा था। उसके साथ बैठे बाहुबली से लगते एक सहायक ने साफ इंकार कर दिया। यह कहते हुए कि नए मरीज को किसी और मरीज के साथ जगह  दी जाए। प्रधान नर्स खीज कर नए मरीज को मामा जी के बिस्तर पर ले आई, क्योंकि  मामा जी काफी दुबले-पतले थे। नए मरीज के पीछे उसकी केस हिस्ट्री वाला बोर्ड भी मामा जी के बोर्ड के साथ टांग दिया गया।
मामा जी एक ओर सरक गए थे पर उनके मुख पर खिन्नता का कोई भाव नहीं था, अपितु एक स्वागती मुस्कान थी। ‘आओ मियां जी, अब आप ही मेरे हम बिस्तर हो जाओ। मेरी बेगम तो सुबह मुझे  छोड़ कर चली गई।’ मामा जी यहां भी मजाक करने से न चूके थे। नया मरीज हंस कर शुक्रिया कहते हुए आराम से मामा जी के बगल में लेट गया। उसके साथ आए ग्रामीण व्यक्ति शीघ्र  ही फल और दवाई की थैली देकर विदा हो गए, जबकि सिर तक अच्छी तरह से ढकी सुंदर सी वह युवती एक स्टूल खींच कर पाश्र्व में बैठ गयी, सकुचाती सी।
बातचीत में पता चला कि नए मरीज का नाम रहमान है और साथ आई उसकी पोती का नाम जहीन। वह गुडग़ांव के राजकीय कालेज में बी.ए. में पढ़ रही थी। दोस्ते बने दोनों हम-उम्र मरीज अब मेवाती-अलवरी लहजे में बातें करने लगे। ‘जाओगो-खाओगो, पीओगो’ वाली बोली में, जो मामा जी दुकान पर बैठे देहाती गाहकों से अक्सर बोला करते थे। यह भी मालूम पड़ा कि रहमान चाचा किस दुकान से कपड़ा खरीदते थे, वह मामा की थोक की दुकान से कपड़ा ले जाता था।
मामा जी की दुकान पर जर्री के  सलमे-सितारों की कढ़ाई वाली ओढ़नियां भी खूब बिका करती थीं
‘फिर तो भाई साब यहां आना मेरे लिए घर वापसी है एक तरां की’
‘हां रहमान  भाई, हम एक तरफ के ही तो हैं, मेवात से।’
‘पर आप तो पाकिस्तान से आकर बसे थे, यहां आपके मेवाती बोलने के लहजे से ऐसा लगता है।’
‘हां ऐसा ही है रहमान भाई।’
‘फिर आपकी घर वापसी तो….’ चुप रह गए रहमान चाचा।
‘मैं तो चाहता हूं कि उड़कर देख आऊं अपना वो वतन/पर मेरा बेटा….’ आगे मामा जी से भी न बोला गया।
‘क्यों, क्या कहता है आपका बेटा?’
‘कहता है…कहता है – मत याद करो अपने वतन को। वहां की मुल्तानी बोली भी मत बोलो मां के साथ घर में।’ मामा का गला रूंध रहा था ‘पर क्यों?’
‘उसे पाकिस्तान के नाम से ही चिढ़ है। कई बार तो नफरत से मुझे भी पाकिस्तानी कह दिया करता है वह।’
‘आप कुछ नहीं, कहते उस नामाकूल को?’
‘जी तो करता है कि दो लातें जमा  दूं, … पर जवान बेटा है…’
‘यानी कि आप घर वापसी के हक में हैं…’
‘हां वतन के आधार पर, न कि मजहब के आधार पर।’ चुप रह गए रहमान चाचा। फिर मुझे बोले, ‘बेटा मुझे जरा पेशाब कराने ले जाओगे? अचानक पे्रशर बन गया है।’
‘जब खून पानी बनने लगता है तो ऐसा प्रेशर भी बढ़ जाता है।’ मामा जी कह रहे थे।
जाहिर था कि इस काम के लिए जहीन तो दादा को लेकर पुरुष प्रसाधन सुविधा की ओर न जा सकती थी। मैं जब रहमान चाचा के साथ वापिस आया तो मामा को फिर मजाक सूझा। बोले, ‘अब तो मूत्रालय जाना भी घर वापसी जैसा लगता है। है न?’
‘हां भाई। कहीं  भी बार-बार जाओगो तो ऐसा ही होओगो।’
पास ही जहीन एक कोने में  जाकर किसी से बात कर रही थी। हमारे आते ही उसने फोन बंद कर दिया, पर इतना जरूर सुन लिया मैंने, ‘मैं फिर करूंगी बात कुंवर जी।’ उसके चेहरे पर शर्म की लाली भी दौड़ गई थी। वह अपने स्टूल पर बेचैन  सी आ बैठी।

                अब दोनों बुजुर्गों ने बिस्तर पर अपनी दिशाएं  बदल लीं। रहमान चाचा ने ही सुझाया था कि क्यों न एक ओर सिर रखने की बजाए पैताने-सिरहाने लेटा जाए। इससे दोनों को लेटने की तो सुविधा जरूर हुई किंतु बात करने की सुविधा न रही। वैसे भी दवाई के प्रभाव से या थकान से दोनों को नींद भी आ रही थी। दोनों अपना-अपना कंबल ओढ़े  लेट गए। जहीन सेल फोन पर संदेशों के आदान-प्रदान में व्यस्त लग रही थी। थोड़ी देर में वार्ड के द्वार पर एक स्मार्ट सुंदर नौजवान आन खड़ा हुआ। वेशभूषा से वह सम्पन्न किसानी परिवार का लगता था। पढ़ा-लिखा भी। शायद वह जहीन का सहपाठी था। उसे देखते ही जहीन शर्माती हुई सी उठ खड़ी हुई और ‘अंकल मैं थोड़ी देर में आती हूं’ कहती हुई वह युवक के साथ बाहर चली गई।
कहीं ये मामला लव जेहाद का तो नहीं, मैं बैठे-बैठे सोचने लगा। पर नहीं लव जेहाद की स्थिति तो तब बनती है जब लड़की हिन्दू हो और लड़का मुस्लिम। पर यहां तो स्थिति बिल्कुल विपरीत है, सोच कर मैं कुछ आश्वस्त हुआ। लेकिन तभी यह विचार भी आया कि राजधानी के इस  इलाके  में मुस्लिम आबादी भी काफी है। पास ही किसी मस्जिद से अजान की आवाज भी आ रही थी। तभी मैंने देखा कि रौबदार मुस्लिम मरीज का बाहुबली सहायक बाहों की मछलियां फड़काता हुआ तेजी से बाहर निकल गया था। हे भगवान दोनों प्रेमियों की रक्षा करना – मैंने दुआ मांगी। मैं सोच ही रहा था कि जहीन लौट कर आए तो मैं नाश्ता करने कैंटीन पर जाऊं कि तभी पीछे आहट हुई। देखा तो  मोती लाल आया था। आओ मोती मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे स्टूल पर वह बैठ गया, मैंं सामने जा बैठा।
‘पिता जी सो गए हैं?’
‘हां, इंजेक्शन के नशे में है शायद।’
‘लेकिन लगता है कि यहां दो मरीज पड़े हैं।’ मोती बिस्तर पर ढकी पसरी चार टांगें देख रहा था। दो इधर दो उधर।
‘हां मोती। बिस्तरों की कमी है न वार्ड में।’
‘यह दूसरा कौन है?’
‘मरीज ही है कोई’
‘पर कौन? कहीं इन्फेक्शन हो गया तो….’
‘तावडू के निकट पुन्हाना का है।’
‘पिता जी किधर लेटे हैं? इधर या उधर?’
‘पहचान सको तो खुद ही पहचान लो।’ मैंने रूखा उत्तर दिया। लेकिन जिस  शख्स ने कभी अपने पिता की दो टांगों में  भी अपनी परायी का भेद किया था, वह पिता की कैसे पहचान करता।
‘पिता जी, पिता जी।’ उसने हल्के से आवाज दी। उत्तर में जिस मरीज ने कंबल से मुंह बाहर निकाला, उसके चेहरे पर तो दाढ़ी उगी थी। मोती को जैसे बिजली का झटका लगा।
‘भाई साब ऐसे कैसे होने दिया आपने? पिता जी के साथ यह…’
‘कुछ दूसरे बिस्तरों पर भी तो दो-दो मरीज हैं, बड़े डाक्टर के हुक्म से…’
‘धर्म भ्रष्ट कर दिया हमारा तो। जानते हो मेरे साथ मेरे दल के कुछ लोग भी आए हैं पिता जी का हाल पूछने। वे देखेंगे तो…’
‘तो ले आओ उन्हें मामा जी से मिलवाने के लिए यहां।’ तभी मामा जी ने भी अपना कंबल हटा फैंका।
‘कहां हैं वे?’
‘जलपान कर रहे हैं बाहर अस्पताल की कैंटीन पर।’
‘तो बेटा जाओ और लाकर दिखाओ उन्हें वार्ड के कूड़ेदान में पड़ी खून से सनी पट्टियां और मवाद से सने फाहे। और कहो कि फर्क करें इनमें कि कौन किस धर्म की पट्टी है या फाहा है।’
मामा जी गुस्से में कांप रहे थे। मैंने उन्हें शांत करना चाहा। पर मामा जी फिर गरजे, ‘मन करता है लातें मार-मारकर भगा दूं तुम्हें और तुम्हारे उन दोस्तों को, लेकिन मजबूर हूं, क्या करूं।’
इसी बीच रहमान चाचा भी उठ गए। बोले, ‘चुप करो कुंदन भाई, गुस्सा मत करो बच्चों पर।’ फिर मोती को संबोधित हो बोले, ‘बेटा जैसे ही कोई बिस्तर खाली हुआ, मैं चला जाऊंगा।’
‘कैसे नहीं होगा दूसरा बिस्तर खाली। आखिर हमारे सिंहासन पर बैठने का लाभ ही क्या। मैं देखता हूं जाकर।’ दंभ से कहता हुआ मोती वार्ड से निकल गया। लेकिन काफी देर कोई कार्रवाई नहीं हुई, कोई बिस्तर खाली नहीं कराया गया।  शायद डाक्टर लोग अपने धर्म के पक्के निकले। इसी बीच कुंदन मामा और रहमान  चाचा गले मिलकर एक तरफ लेट गए। जहीन भी अपने स्थान पर आकर बैठ गयी, पर काफी परेशान लग रही थी।
मामा जी के कहने पर मैं नाश्ता करने कैंटीन पर गया तो पता चला कि थोड़ी देर पहले वहां मारपीट हुई थी। बाहर से आए कुछ लोगों ने एक मुस्लिम लड़की और हिन्दु नौजवान के इकट्ठेे बैठने पर एतराज किया था। झगड़ा बढऩे पर एक मुस्लिम पहलवान ने आकर दोनों को बचाया था और उन शरारती तत्वों से मारपीट कर बाद में वह पुलिस के डर से कहीं भाग गया था।
खिन्न अवस्था में मैं वार्ड में लौटा तो देखा कि बिस्तर पर दोनों बुजुर्ग मरीज नहीं थे। जहीन फोन पर कोई संदेश देखने में व्यस्त थी। पूछने पर उसने पुरुष प्रसाधन यानी वॉशरूम की ओर संकेत कर दिया और फोन पर झुक गई। फिर मैंने जो दृश्य देखा वो अविस्मरणीय था। दोनों बुजुर्ग एक-दूसरे का हाथ पकड़े बिस्तर की ओर बढ़ रहे थे। एक ने थोड़ी ठोकर खाई तो दूसरे ने संभाल लिया। दूसरे के हाथ से छड़ी छूट कर गिरी तो पहले ने उठाकर दे दी। दोनों प्रसन्नचित्त हो किसी लतीफे पर हंस रहे थे। मुझे लगा कि यही हमारा राष्ट्र देवता है, सहिष्णुता व सहयोग का प्रतीेक दो मुंह वाला देवता।

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा(सितम्बर-अक्तूबर 2016, अंक-7), पेज- 2

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