स्टैण्ड – सुशीला बहबलपुर

कविता

जाने कितने ही लोग
आते हैं।
संघर्ष के रास्ते पर
बदलते अपना जीवन
जो सिर्फ चाहते हैं
खुद के साथ-साथ
बदलना समाज को
लेकिन कुछ नियम
कानून-कायदे
व होते हैं सिद्धांत भी
संघर्ष से सटे रास्ते पर
चलने के लिए।
मगर नहीं ले पाते
वो स्टैण्ड
अपने जीवन सम्बन्धी
नहीं कर पाते तर्क-वितर्क
वो।
पारम्परिक ढांचों के खिलाफ
आखिर उसी सांचे में फिट हो
जाते हैं।
वो भी
जिन्होंने रखे थे कदम
संघर्ष के रास्ते
अफसोस नहीं कर पाते,
वो!
आत्मसात उस विचार को
जो दृढ़ बनाता है।
उसके अंदर के इन्सान को!

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-29

 

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.