सच कहूं – सुशीला बहबलपुर

कविता

जी चाहता है
मन करता है आज
बार-बार
खोल के रख दूं
अपने अन्दर का इन्सान
जिसमें हैं खामियां काफी
अन्दर के इन्सान
और
बाहर के इन्सान में भी
है काफी अन्तर
झकझोरता है बार-बार
अन्दर का इन्सान
नहीं है कुछ भी अस्पृश्य
प्रगतिशील इन्सान के लिए।
पर!
रोकता है टोकता है
बार-बार मुझे बाहरी इन्सान
नहीं है ये काबिल
हमारे साथ चलने हेतु
फिर इसी के समक्ष
खड़ा हो जाता है
एक और सवाल
स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-28
 

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