आधुनिकता – सुशीला बहबलपुर

कविता

जिन माओं ने नहीं उठाये ये
किताबों से भरे बैग कभी।
आज सौभाग्यवश उन्हीें माओं को।
मिला है मौका बैग उठाने का।
गांव में इसी वर्ष जो
इंग्लिस मीडियम स्कूल खुला है।
स्कूल के साथ-साथ
खुल गए घर से बाहर
जाने के रास्ते।
उन खुश किस्मत औरतों के
जिनके बच्चे पढऩे जाते हैं।
इस नए स्कूल में
मानो उनका बचपना लौट आया हो।
इस शहरी प्रचलन ने।
तोड़ दिए कुछ रिवाज गांव के।
बच्चों के साथ वो भी।
कर रही है कुछ नया।
अन्जाने में ही सही
आखिर कुछ तो टूट रहा है।
इस सामाजिक ढांचे में

स्रोतः सं. सुभाष चंद्र, देस हरियाणा (जुलाई-अगस्त 2016) पेज-28

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