लघुकथाएँ – हरभगवान चावला

हरभगवान चावला की कहानियां रोजमर्रा के जीवन से अपना कथ्य लेती हैं। मामूली लगने वाली घटनाएं कैसे जीवन को प्रभावित करती हैं, यह हरभगवान चावला की लघुकथाएँ पढ़कर समझा जा सकता है। वर्तमान जीवन का ऐसा ही एक पहलु है पालतू कुत्ता। कुत्ते का हमारे जीवन में प्रवेश कई मायनों में ध्यान देने योग्य है। हो सकता है कि जानवर के साथ मनुष्य के सम्बन्ध उसकी भावनात्मक बुद्धि को बढ़ाता है किन्तु एक सवाल है कि क्या कुत्ते को मनुष्य से ऊपर वरीयता देना आदमी के अकेलेपन की तरफ तो इशारा नहीं करता? खैर, प्रस्तुत है ‘कुत्ता’ शृंखला की चार लघुकथाएँ-

कुत्ता – 1

“किराया दस हज़ार रुपये महीना होगा।”
“ठीक है।”
“सीढ़ियों की सफ़ाई आपके ज़िम्मे होगी।”
“मंज़ूर है।”
“रात साढ़े दस बजे से पहले घर आ जाना पड़ेगा।”
“ठीक है, हमें ज़्यादा देर बाहर रहकर करना भी क्या है।”
“घर में कितने सदस्य हैं?”
“तीन। मैं, मेरी बीवी और हमारा पेट लूथर।”
“तो कुत्ता भी रहेगा आपके साथ?”
“हाँ, पर प्लीज़ कुत्ता मत कहिए उसे, वह हमारे घर का ज़रूरी सदस्य है। हमारी शादी को चार साल हो गए हैं और हमने अभी बच्चा प्लान नहीं किया। जानते हैं क्यों, क्योंकि लूथर अभी छोटा है। हम सोचते हैं, पहले यह पल जाए, उसके बाद ही बच्चे के बारे में सोचें।”

कुत्ता – 2

“आज सज-धजकर कहाँ जा रहे हो?”
“एक बर्थडे पार्टी है होटल ताज में, लेकिन उलझन में हूँ कि दूसरे बर्थडे पर गिफ्ट क्या दिया जाये?”
“कुछ भी दे दो, कोई कपड़ा, खिलौना या कोई सोने की चीज़।”
” अरे नहीं यार, इनमें से कुछ नहीं दे सकता। दरअसल बर्थडे किसी बच्चे का नहीं, रॉबर्ट का है। रॉबर्ट पेट है मेरे दोस्त का।”

कुत्ता – 3

लड़की के लिए लड़का देखने जाना था। लड़की के पिता ने अपने जीजा यानी लड़की के फूफा को भी साथ ले लिया। उनको स्पष्ट बता दिया गया था कि लड़की और लड़का एक दूसरे को पसंद कर चुके हैं, घर-वर देखना सिर्फ़ औपचारिकता भर है। लड़के वालों के घर एक कुत्ता है। जब भी कुत्ता सामने पड़ जाए, उसे प्यार करना है। उसे कुत्ता तो हरगिज़ नहीं कहना है। उसका नाम मार्टिन है, बुलाओ तो इसी नाम से ही बुलाना और उसकी तारीफ़ करना, न कर सकें तो चुप बने रहना।”
“मतलब यह कि हम लड़का देखने नहीं, कुत्ता देखने और कुत्ते की तारीफ़ करने जा रहे हैं।”
“आप यही समझ लें। बेटी का रिश्ता इसी कुत्ते, सॉरी मार्टिन पर ही निर्भर है।”

कुत्ता -4

स्वीटी की शादी के तुरंत बाद तारा डूब गया, सो मायके में पहला फेरा दो महीने टल गया। तारा ठीक हुआ तो स्वीटी का फोन आया, “माँ, हम अभी नहीं आ सकते। स्कूबी बहुत बीमार है। कई दिनों तक आईसीयू में रखा था। न्यूरो सर्जन समेत कई डॉक्टर्स उसके इलाज में लगे हैं। अब उसको घर तो ले आए हैं, पर वह अभी भी सीरियस है। घर के सभी लोग बहुत दुखी हैं और अक्सर अपने पेट की हालत देखकर रोने लगते हैं। सबको इस हालत में छोड़कर आना मुमकिन नहीं है। दुआ करो कि स्कूबी जल्दी ठीक हो जाए।” माँ ने पहली बार एक कुत्ते के लिए न सिर्फ़ दुआ की, बल्कि एक धार्मिक स्थल पर मन्नत भी मान आई।

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