शिवमूर्ति – प्रतापनारायण मिश्र

हमारे ग्राम-देव भगवान् भूतनाथ से अकथ्य अप्रतर्क्स एवं अचिंत्य हैं। तो भी उनके भक्तजन अपनी रुचि के अनुसार उनका रूप, गुण, स्वभाव कल्पित कर लेते हैं। उनकी सभी बातें सत्य है। अशरीरी आकारहीन (मनुष्य की भांति वे नसें आदि बन्धन से बद्ध नहीं) है। इससे हम उनको निराकार कह सकते हैं और प्रेम-दृष्टि से अपने हृदयमन्दिर में उनका दर्शन करके साकार भी कह सकते हैं। यथातथ्य वर्णन उनका कोई नहीं कर सकता। तो भी जितना जो कुछ अभी तक कहा गया है और आगे कहा जायेगा सब शास्त्रार्थ के आगे निरी बकबक है और विश्वास के आगे मनः शान्तिकारक सत्य है!!! महात्मा कबीर ने इस विषय में कहा है वह निहायत सच है कि जैसे कई अंधों के आगे हाथी आवे और कोई उसका नाम बता दे, तो सब उसे टटोलेंगे। यह तो सम्भव ही नहीं है कि मनुष्य के बालक की भांति उसे गोद में ले के सब कोई अवयव का बोध कर लें। केवल एक अंग टटोल सकते हैं और दांत टटोलने वाला हाथी को खूंटी के समान, कान छूनेवाला सूप के समान, पांव स्पर्श करने वाला खम्भे के समान कहेगा। यद्यपि हाथी न खूंटे के समान है और न खम्भे के। पर कहने वालों की बात झूठी भी नहीं है। उसने भलीभांति निश्चय किया है और वास्तव में हाथी का एक अंग वैसा ही है जैसा वे कहते हैं। ठीक यही हाल ईश्वर के विषय में हमारी बुद्धि का है। हम पूरा पूरा वर्णन या पूरा साक्षात कर लें तो वह अनन्त कैसे और यदि निरा अनंत मान के अपने मन और वचन को उनकी ओर से बिलकुल फेर लें तो हम आस्तिक कैसे। सिद्धान्त यह हमारी बुद्धि जहां तक है वहां तक उनकी स्तुति, प्रार्थना, ध्यान, उपासना कर सकते हैं और इसी से हम शान्ति लाभ करेंगे।

उनके साथ जिस प्रकार का जितना सम्बन्ध हम रख सकें उतना ही हमारा मन, बुद्धि, शरीर, संसार-परमार्थ के लिये मंगल है। जो लोग केवल जगत् के दिखाने को वा सामाजिक नियम निभाने को इस विषय में कुछ करते हैं, उनसे तो हमारी यही विनय है कि व्यर्थ समय न बितावें। जितनी देर पूजा पाठ करते हैं, जितनी देर माला सरकाते हैं उतनी देर कमाने, खाने पढ़ने गुनने में ध्यान दें तो भला है! और जो केवल शास्त्रार्थी आस्तिक हैं वे भी व्यर्थ ईश्वर को अपना पिता बना के निज माता को कलंक लगाते हैं। माता कहके बेचारे जनक को दोषी ठहराते हैं, साकार कल्पना करके व्यापकता का और निराकार कहके अस्तित्व का लोप करते हैं। हमारा यह लेख केवल उनके विनोदार्थ है, जो अपनी विचार शक्ति को काम में लाते हैं और ईश्वर के साथ जीवित सम्बन्ध रख के हृदय में आनन्द पाते हैं तथा आप लाभकारक बातों को समझ के दूसरों को समझाते हैं। प्रिय पाठक ! उसकी सभी बातें अनंत हैं, तो मूर्तियां भी अनंत प्रकार से बन सकती है और एक एक स्वरूप में अनंत उपदेश प्राप्त हो सकते हैं, पर हमारी बुद्धि अनंत नहीं है, इससे कुछ एक प्रकार की मूर्तियों का कुछ-कुछ अर्थ लिखते हैं।

मूर्ति बहुधा पाषाण की होती है, जिसका प्रयोजन यह है कि हमारा दृढ़ सम्बन्ध है। दृढ़ वस्तुओं की उपमा पाषाण से दी जाती है। हमारे विश्वास की नींव पत्थर पर है। हमारा धर्म पत्थर का है। ऐसा नहीं कि सहज में और का और हो जाये। इसमें बड़ा सुभीता यह भी है कि एक बार बनवा के रख ली, कई पीढ़ी को छुट्टी हुई। चाहे जैसे असावधान पूजक आवें कोई हानि नहीं हो सकती है। धातु की मूर्ति से यह अर्थ है कि हमारा स्वामी द्रवणशील अर्थात् दयामय है। जहां हमारे हृदय में प्रेमाग्नि धधकी वहीं हमारा प्रभु पिघल उठा। यदि हम सच्चे उसके हैं तो वह हमारी दशा के अनुसार बर्तेंगे। यह नहीं कि उन्हें अपने नियम पालने से काम। हम चाहे मरें या जियें। रत्नमयी मूर्ति से यह भाव है कि हमारा ईश्वरीय सम्बन्ध अमूल्य है। जैसे पन्ना, पुखराज की मूर्ति बिना एक गृहस्थी भर का धन लगाए नहीं आती। यह बड़े ही अमीर को साध्य है, वैसे ही प्रेममय परमात्मा भी हमको तभी मिलेंगे जब हम अपने ज्ञान का अभिमान छोड़ दें। यह भी बड़े ही मनुष्य का काम है। मृत्तिकाकी मूर्ति का यह अर्थ है कि उनकी सेवा हम सब ठोर कर सकते हैं। जैसे मिट्टी और जल का अभाव कहीं नहीं है, वैसे हो ईश्वर का वियोग कहीं नहीं है। धन और गुण का ईश्वर प्राप्ति में कुछ काम नहीं। वह निर्धन के धन हैं। “हुनरमंदों से पूछे जाते हैं बाबे हुनर पहिले।” या यों समझ लो कि सब पदार्थ आदि और अन्त में सब ईश्वर से उत्पन्न हैं, ईश्वर में ही लय होते हैं। इस बात से दृष्टान्त मिट्टी से खूब घटता है। गोबर की मूर्ति यह सिखाती है कि ईश्वर आत्मिक रोगों का नाशक है, हृदय मन्दिर की कुवासनारूपी दुर्गंध को हरता है। पारे की मूर्ति में यह भाव है कि प्रेमदेव हमारे पुष्टिकारक सुगंध पुष्टिवर्द्धनं। यदि मूर्ति बनाने वा बनवाने की सामर्थ्य न हो तो पृथ्वी और जल आदि अष्ट-मूर्ति बनी बनाई पूजा के लिये विद्यमान है।

वास्तविक प्रेममूर्ति मनोमन्दिर में विराजमान है। पर यह दृश्य मूर्तियां भी निरर्थक नहीं हैं। मूर्तियों के रंग भी यद्यपि अनेक होते हैं पर मुख्य रंग तीन है। श्वेत जिसका अर्थ यह है कि परमात्मा शुद्ध है, स्वच्छ है, उसकी किसी बात में किसी का कुछ मेल नहीं है। पर सभी उसके ऐसे आश्रित हो सकते हैं जैसे उजले रंग पर सब रंग। श्वेत रंग केवल सतोगुण का सूचक है, ईश्वर त्रिगुणातीत होते हुए भी तीनों गुणों का आश्रय है- त्रिगुणात्मक भी है (ब्रह्मा, विष्णु, शिव, श्वेत, रक्त, कृष्ण)। यह त्रिगुणातीत तो हुई, पर त्रिगुणालय भी उसके बिना कोई नहीं। यदि हम सतोगुणमय भी कहें तो बेअदबी नहीं करते। दूसरा लाल रंग है जो रजोगुण का वर्ण है। ऐसा कौन कह सकता है कि यह संसार भर का ऐश्वर्य किसी और का है। और लीजिये, कविता के आचार्यों ने अनुराग का रंग लाल कहा है। फिर अनुरागदेव का रंग और क्या होगा? तीसरा रंग काला है। उसका भाव सव सोच सकते हैं कि सब से पक्का यही रंग है, इस पर दूसरा रंग नहीं चढ़ता। ऐसे ही प्रेमदेव सब से अधिक पक्के हैं, उन पर और का रंग क्या चढ़ेगा? इसके सिवा बाह्य जगत् के प्रकाशक नैन हैं। उनकी पुतली काली होती है, भीतर का प्रकाश ज्ञान है, उसकी प्रकाशिनी विद्या है, जिसकी समस्त पुस्तकें काली मसी में लिखी जाती है। फिर कहिये जिससे भीतर-बाहर दोनों प्रकाशित होते हैं, जो प्रेमियों को आंख की ज्योति से भी प्रियतर है, जो अनंत विद्यामय है उसका फिर और क्या रंग हम मानें?

हमारे रसिक पाठक जानते हैं, किसी सुन्दर व्यक्ति की आंखों में काजल और गोरे गोरे गाल पर तिल कैसा भला लगता है कि कवियों भर की पूरी शक्ति, रसिकों भर का सर्वस्व एक बार उस शोभा पर निछावर हो जाता है। यहां तक कि जिनके असली तिल नहीं होता उन्हें सुन्दरता बढ़ाने को कृत्रिम तिल बनाना पड़ता है। फिर कहिये तो, सर्वशोभामय परमसुन्दर का कौन रंग कल्पना करोगे ? समस्त शरीर में सर्वोपरि शिर है उस पर केश कैसे होते हैं? फिर सर्वोत्कृष्ट देवाधिदेव का और क्या रंग है? यदि कोई बड़ा मैदान हो लाखों कोस का और रात को उसका अन्त लिया चाहो तो सौ दो सौ दीपक जलाओगे। पर क्या उनसे उसका छोर देख लोगे? केवल जहां दीप-ज्योति है वहीं तक देख सकोगे, फिर आगे अंधकार ही तो है? ऐसे ही हमारी, हमारे अगणित ऋषियों की सबकी बुद्धि जिसका ठीक हाल नहीं प्रकाश कर सकती उसे अप्रकाशवत् न मानें तो क्या मानें ? रामचन्द्र, कृष्णचन्द्रादि को यदि अंग्रेजी जमाने वाले ईश्वर न मानें तो भी यह मानना पड़ेगा कि हमारी अपेक्षा ईश्वर से और उनसे अधिक सम्बन्ध था। फिर हम क्यों न कहें कि यदि ईश्वर का अस्तित्व है तो इसी रंग ढंग का है।

अब आकारों पर ध्यान दीजिये। अधिकतर शिवमूर्ति लिंगाकार होती है जिसमें हाथ, पांव, मुख कुछ नहीं होते। सब मूर्तिपूजक कह देंगे कि हम तो साक्षात् ईश्वर नहीं मानते, न उसकी यथातथ्य प्रतिकृति मानें। केवल ईश्वर की सेवा के लिये एक संकेत चिह्न मानते हैं। यह बात आदि में शैवों के ही घर से निकली है, क्योंकि लिंग शब्द का अर्थ ही चिह्न है।

सच भी यही है जो वस्तु बाह्य नेत्रों से नहीं देखी जाती उसकी ठीक-ठीक मूर्ति क्या ? आनन्द की कैसी मूर्ति ? दुःख की कैसी मूर्ति ? केवल चित्तवृत्ति ! केवल उसके गुणों का कुछ द्योतन !! बस ! ठीक शिवमूर्ति यही है। सृष्टिकर्तृत्व, अचिन्त्यत्व, अप्रतिमत्व कई एक बातें लिंगाकार मूर्ति से ज्ञात होती हैं। ईश्वर यावत् संसार का उत्पादक है। ईश्वर कैसा है यह बात पूर्ण रूप से कोई वर्णन नहीं कर सकता। अर्थात् उसकी सभी बातें गोल हैं बस जब सभी बातें गोल है तो चिह्न भी हमने गोल मोल कल्पना कर लिया। यदि ‘न तस्य प्रतिमास्ति’ का ठीक अर्थ यही है कि ईश्वर की प्रतिमा नहीं है, तो इसकी ठीक सिद्धि ज्योतिर्लिंग ही होगी; क्योंकि जिसमें हाथ, पांव, मुख, नेत्रादि कुछ भी नहीं है उसे प्रतिमा कौन कह सकता है? पर यदि कोई मोटी बुद्धिवाला कहे कि जो कोई अवयव ही नहीं तो फिर यही क्यों नहीं कहते कि कुछ नहीं है। हम उत्तर दे सकते है कि आंखें हाँ तो धर्म से कह सकते हो कि कुछ नहीं है? तात्पर्य यह है कि कुछ है, और कुछ नहीं है। दोनों बातें ईश्वर के विषय में न कही जा सकें, न नहीं कही जा सकें, और हां कहना भी ठीक है। एवं नहीं कहना भी ठीक है। इसी भांति शिवलिंग भी समझ लीजिये। यह निरवयव है, पर मूर्ति है। पर वास्तव में यह विषय ऐसा है कि मन, बुद्धि और वाणी से जितना सोचा, समझा और कहा जाय उतना ही बढ़ता जायेगा और हम जन्म भर बका करेंगे पर आपको यही जान पड़ेगा कि अभी श्री गणेशायनमः हुआ है। इसी से महात्मा लोग कह गये हैं कि ईश्वर को बाद में न ढूंढ़ो पर विश्वास में। इसलिये हम भी योग्य समझते हैं कि सावयव (हाथ, पांव इत्यादि वाली) मूर्तियों के वर्णन की ओर झुकें।

जानना चाहिये कि जो जैसा होता है उसकी कल्पना भी वैसी ही होती है। यह संसार का जातीय धर्म है कि जो वस्तु हमारे आसपास है उन्हीं पर हमारी बुद्धि दौड़ती है। फारस, अरब और इंग्लिश देश के कवि जब संसार की अनित्यता वर्णन करेंगे तो कबरिस्तान का नक्शा खींचेगे, क्योंकि उनके यहां श्मशान होते ही नहीं हैं। वे यह न कहें तो क्या, कहें कि बड़े-बड़े बादशाह खाक में दबे हुए सोते हैं। यदि कबर का तख्ता उठाकर देखा जाय तो शायद दो चार की हड्डियां निकलेंगी, जिन पर यह नहीं लिखा कि यह सिकन्दर की हड्डी है, यह दारा की। इत्यादि हमारे यहां उक्त विषय में श्मशान का वर्णन होगा, क्योंकि अन्य धर्मियों के आने से पहले यहां कब्रों की चाल ही नहीं थी।

यूरोप में खूबसूरती के बयान में अलकावलि का रंग काला कभी न कहेंगे। यहां ताम्रवर्ण सौन्दर्य का रंग न समझा जायेगा। ऐसे ही सब बातों में समझ लीजिये तब समझ में आ जायेगा कि ईश्वर के विषय में बुद्धि दौड़ाने वाले सब कहीं सब काल में मनुष्य ही हैं। अतएव उसके सवरूप की कल्पना मनुष्य ही के स्वरूप की सी सब ठौर की गई है। इंजील और कुरान में भी कहीं-कहीं खुदा का दाहिना हाथ, बायां हाथ इत्यादि वर्णित है, वरंच यह खुला लिखा हुआ है कि उसने आदम को अपने स्वरूप में बनाया। चाहे जैसी उलट फेर की बातें कही जायें, पर इसका यह भाव कहीं न जायेगा कि ईश्वर यदि सावयव है, तो उसका भी रूप हमारे ही रूप का सा होगा। हो चाहे जैसा, पर हम यदि ईश्वर को अपना आत्मीय मानेंगे तो अवश्य ऐसा ही मान सकते हैं, जैसों से हमारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध है। हमारे माता, पिता, भाई, बन्धु, राजा, गुरु जिनको हम प्रतिष्ठा का आधार एवं आधेय कहते हैं उन सबके हाथ, पांव, नाक, मुंह हमारे हस्तपादाटि से निकले हुए हैं, तो हमारे प्रेम और प्रतिष्ठा का सर्वोत्कृष्ट सम्बन्धी कैसा होगा। बस इसी मत पर सावयव सब मूर्ति मनुष्य की सी मूर्ति बनायी जाती है। विष्णुदेव की सुन्दर सौम्य मूर्तियां प्रेमोत्पादनार्थ हैं, क्योंकि खूबसूरती पर चित्त अधिक आकर्षित होता है। भैरवादि की मूर्तियां भयानक हैं जिसका यह भाव है कि हमारा प्रभु हमारे शत्रुओं के लिये भयजनक है। अथच हम उनकी मंगलमयी सृष्टि में हलचल डालेंगे तो वह कभी उपेक्षा न करेगा। उसका स्वभाव क्रोधी है पर शिवमूर्ति में कई एक विशेषताएं हैं। उनके द्वारा हम यह उपकार यथामति ग्रहण कर सकते हैं। सिर पर गंगा का चिह्न होने से यह भाव है कि गंगा हमारे देश की सांसारिक और परमार्थिक सर्वस्व है और भगवान् सदाशिव विश्वव्यापी हैं। अतः विश्वव्यापी की मूर्ति कल्पना में जगत् वा सर्वोपरि पदार्थ ही शिरस्थानी कहा जा सकता है। दूसरा अर्थ यह है कि पुराणों में गंगा की विष्णु के चरण से उत्पत्ति मानी गई है और शिवजी को परमवैष्णव कहा है। उस पर वैष्णवता की पुष्टि इससे उत्तम और क्या हो सकती है कि उनके चरण निर्गत जल को सिर पर धारण करें। ऐसे विष्णु भगवान् को परमशैव लिखा है कि विष्णु भगवान् नित्य सहस्र कमल पुष्पों से सदाशिव की पूजा करते थे। एक दिन एक कमल घट गया तो उन्होंने यह विचार करके कि हमारा नाम कमलनयन है अपना नेत्र-कमल शिव जी के चरण कमल को अर्पण कर दिया। सच है इससे अधिक शैवता क्या हो सकती है। हमारे शास्त्रार्थी भाई ऐसे वर्णन पर अनेक कुतर्क कर सकते हैं। पर उनका उत्तर हम कभी पुराण-प्रतिपादन से देंगे। इस अवसर पर हम इतना ही कहेंगे कि ऐसे सन्देह बिनाकविता पड़े कभी नहीं दूर होने के। हां, इतना हम कह सकते हैं कि भगवान् विष्णु की शैवता और भगवान् शिव की वैष्णवता का आलंकारिक वर्णन है। वास्तव में विष्णु अर्थात् व्यापक और शिव अर्थात् कल्याणमय ये दोनों एक ही प्रेमस्वरूप के नाम हैं। पर उसका वर्णन पूर्णतया असम्भव है। अतः कुछ कुछ गुण एकत्र करके दो स्वरूप कल्पना कर लिये गये हैं, जिसमें कवियों को वचन शक्ति के लिये आधार मिले।

हमारा मुख्य विषय शिवमूर्ति है और वह विशेषतः शैवों के धर्म का आधार है। अतः इन अप्रत्ययं विषयों को दिग्दर्शनमात्र कथन करके अपने शैव भाईयों से पूछते हैं कि आप भगवान् गंगाधर के पूजक होके वैष्णवों से किस बिरते पर द्वेष रख सकते हैं? यदि धर्म से अधिक मतवालेपन पर श्रद्धा हो तो अपने प्रेमाधार भगवान् भोलानाथ को परमवैष्णव एवं गंगाधर कहना छोड़ दीजिये। नहीं तो सच्चा शैव वही हो सकता है जो वैष्णव मात्र को अपना देवता समझे। इसी भांति यह भी समझना चाहिये कि गंगा जी परम शक्ति हैं। इससे शैवों का शाक्तों के साथ भी विरोध अयोग्य है। हमारी समझ में तो आस्तिक मात्र को किसी से द्वेष बुद्धि रखना पाप है, क्योंकि सब हमारे जगदीश जी की ही प्रजा है, सब हमारे खुदा ही के बन्दे हैं। इस नाते सभी हमारे आत्मीय बन्धु हैं। पर शैव – समाज का वैष्णवों और शाक्त लोगों से विशेष सम्बन्ध ठहरा। अतः इन्हें तो महामैत्री से परस्पर रहना चाहिये। शिवमूर्ति में अकेली गंगा कितना हित कर सकती है? इससे जितने बुद्धिमान जितना विचारें उतना ही अधिक उपदेश प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये हम इस विषय को अपने पाठकों के विचार पर छोड़ आगे बढ़ते हैं।

बहुत मूर्तियों के पांच मुख होते हैं। जिससे हमारी समझ में यह आता है कि यावत् संसार और परमार्थ का तत्व तो चार वेदों में आपको मिल जायेगा, पर यह न समझियेगा कि उनका दर्शन भी वेद विद्या ही से प्राप्त है। जो कुछ चार वेद सिखलाते हैं उससे भी उनका रूप, उनका गुण अधिक है। वेद उनकी वाणी है। केवल चार पुस्तकों पर ही उस वाणी की इति नहीं है। एक मुख और है जिसकी प्रेममयी वाणी केवल प्रेमियों के सुनने में आती है। केवल विद्याभिमानी अधिकाधिक चार वेदों द्वारा बड़ी हद तक चार फल (धर्मार्थ, काम, मोक्ष) पा जायेंगे, पर उनके पंचम मुख सम्बन्धी सुख औरों के लिये हैं।

शिवमूर्ति क्या है और कैसी है यह बात तो बड़े-बड़े ऋषि, मुनि नहीं कह सकते हम क्या है। पर, जहां तक साधारणतया बहुत सी मूर्तियां देखने में आई है उनका कुछ वर्णन हमने यथामति किया, यद्यपि कोई बड़े बुद्धिमान इस विषय में लिखते तो बहुत सी उत्तमोत्तम बातें और भी लिखते, पर इतने लिखने से भी हमें निश्चय है कि किसी न किसी भाई का कुछ भला हो ही रहेगा। मरने के बाद कैलाशवास तो विश्वास की बात है। हमने न कैलाश देखा है न किसी देखनेवाले से वार्तालाप अथवा पत्र-व्यवहार किया है। हां, यदि होता होगा तो प्रत्येक मूर्ति के पूजक को ही रहेगा। पर हमारी इस अक्षरमयी मूर्ति के सच्चे सेवकों को संसार ही में कैलाश का सुख प्राप्त होगा, इसमें सन्देह नहीं है, क्योंकि जहां शिव है वहां कैलाश है। सो जब हमारे हृदय में शिव होंगे तो हमारा हृदय-मन्दिर क्यों न कैलाश होगा? हे विश्वनाथ! हमारे हृदय मन्दिर को भी कभी कैलाश बनाओगे? कभी वह दिन दिखाओगे कि भारतवासी मात्र केवल तुम्हारे हो जायें और इस भूमि पर फिर कैलाश हो जाय? जिस प्रकार अन्य धातुपाषाणादि निर्मित मूर्तियों का रामनाथ, वैद्यनाथ, आनन्देश्वर, खेरेश्वर आदि नाम होता है वैसे इस अक्षरमयी शिवमूर्ति के अगणित नाम हैं। हृदयेश्वर, मंगलेश्वर, भारतेश्वर इत्यादि, पर मुख्य नाम प्रेमेश्वर है। कोई महाशय प्रेम को ईश्वर न समझें। मुख्य अर्थ है कि प्रेममय ईश्वर। इनका दर्शन भी प्रेम-चक्षु के बिना दुर्लभ है जब अपनी अकर्मण्यता का और उनके एक एक उपकार का सच्चा ध्यान जमेगा तब अवश्य हृदय उमड़ेगा और नेत्रों से अश्रुधारा बह चलेगी। उस धारा का नाम प्रेम गंगा है। उसी के जल से स्नान कराने का महात्म्य है। हृदय-कमल उनके चरणों पर चढ़ाने से अक्षय पुण्य है। यह तो इस मूर्ति की पूजा है जो प्रेम के बिना नहीं हो सकती। पर यह भी स्मरण रखिये कि यदि आपके हृदय में प्रेम है तो संसार भर के मूर्तिमान् और अमूर्तिमान् सब पदार्थ शिवमूर्ति हैं, अर्थात् कल्याण के रूप हैं नहीं तो सोने और हीरे की मूर्ति तुच्छ है। यदि उससे स्त्री का गहना बनवाते तो उसकी शोभा होती, तुम्हें सुख होता, भैयाचारे में नाम होता, विपत्ति काल में निर्वाह होता। पर मूर्ति से कोई बात सिद्ध नहीं हो सकती। पाषाण, धातु, मृत्तिका का कहना ही क्या है? स्वयं तुच्छ पदार्थ है, केवल प्रेम ही के नाते ईश्वर है, नहीं तो घर की चक्की से भी गये बीते, पानी पीने के भी काम के नहीं, यही नहीं प्रेम के बिना ध्यान ही में क्या ईश्वर दिखाई देगा? जब चाहो आंखें मूंद कर अंधे की नकल कर देखो। अंधकार के सिवाय कुछ न सूझेगा। वेद पढ़ने में हाथ, मुख दोनों दुखेंगे। अधिक परिश्रम करोगे दिमाग में गर्मी चढ़ जायेगी। खैर इन बातों के बढ़ाने से क्या है? जहां तक सहृदयता से विचार कीजियेगा वहां तक यही सिद्ध होगा कि प्रेम के बिना वेद झगड़े की जड़, धर्म बेसिर पैर के काम, स्वर्ग शेखचिल्ली का महल, मुक्ति प्रेम ही बहन है। ईश्वर का तो पता ही लगना कठिन है। ब्रह्म शब्द ही नपुंसक है। और हृदय मन्दिर में प्रेम का प्रकाश है तो संसार शिवमय है क्योंकि प्रेम ही वास्तविक शिवमूर्ति अर्थात् कल्याण का रूप है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *