साबिर की कविताओं में बुल्लेशाह-फरीद की गूंज सुनाई देती है-अरुण कुमार कैहरबा

पश्चिमी पंजाब के प्रसिद्ध शायर व कवि साबिर अली साबिर भारत और पाकिस्तान के दोनों पंजाब में समान रूप से जाना-माना नाम है। उनकी रचनाएं बहुत ही सीधे-सादे शब्दों में गहरे अर्थ लिए होती हैं। उनकी शायरी में बाबा बुल्लेशाह और बाबा फरीद की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई और सुनाई देती है। साबिर को कभी आमने-सामने तो नहीं सुन पाए, लेकिन पाकिस्तान में आयोजित मुशायरों के वीडियो देखने से पता चलता है कि उनको सुनने के लिए काव्य रसिक दूर-दूर से पहुंचते हैं। इसी तरह वीडियो भी दोनों देशों के लोग देखते हैं। उनकी रचनाओं को उनके मुंह से सुनना बहुत ही शानदार अनुभव होता है।

हरियाणा के लोक इतिहास की तह तक जाने वाले लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुरेन्द्र पाल सिंह अपने गहरे सरोकारों के लिए पहचान रखते हैं। पंजाबी के मकबूल रचनाकार साबिर अली साबिर को हिन्दी के पाठकों तक ले जाने का यह महत्वपूर्ण कार्य उन्होंने अनुवाद के जरिये किया है, किताब को यूनिक्रिएशन पब्लिशर्स ने प्रकाशित किया है। अनुवाद के लिए सुरेन्द्र पाल सिंह ने एक शब्द की रचना से लेकर अधिकतर छोटे आकार की रचनाओं का चयन किया है। अनुदित रचनाओं में छंदमुक्त कविताएं और $गज़ल भी शामिल हैं। यह काम बहुत ही सुंदर व सार्थक बन पड़ा है। हिन्दी पाठकों तक साबिर की कविताएं पहुंचना किसी उपलब्धि से कम नहीं है। इसके लिए अनुवादक को हार्दिक बधाई।

साबिर अली साबिर की रचनाएं संवेदना और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से महत्वपूर्ण हैं। संवेदना की बात करें तो साबिर अन्य अनेक सूफी-संत कवियों की तरह सच की तलाश में लगे हैं। सत्य का शोध करने के लिए तमाम तरह के झूठ व प्रपंच को पहचानते हैं। उसे बहुत बेबाकी के साथ अभिव्यक्त करते हुए उसका खंडन करते हैं। हिन्दी संत कवि कबीर की तरह का उनका मिजाज है, जो झूठ और पाखंड के प्रचारकों को बुरी तरह लताड़ता है। साबिर को जो दिखाई देता है, वे उसे कहने में जरा भी संकोच नहीं करते।  वे अपनी कविता ‘झूठ’ में कहते हैं- ‘सच अकेला एक है, गाँव है झूठ का।’ सच और झूठ की जंग में साबिर अकेले सच के साथ मजबूती के साथ खड़े होते हैं। इकबाल ने कभी कहा था-‘मजहब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना।’ लेकिन वक्त ने मजहब के नए-नए रंग देखे हैं। धर्म ने आज जो रूप ले लिया है, अनुवादित पुस्तक की सबसे छोटी कविता ‘मजहब’ में एक ही शब्द में वे पूरा सच कह जाते हैं। इस कविता को सरसरी तौर पर पढ़ कर तो यही लगता है कि मजहब के बारे में कवि ज्यादा कुछ कहना नहीं चाहता। लेकिन इस कविता में वे मजहब को ‘माफिया’ की संज्ञा देते हुए एक शब्द में ही बहुत कुछ कह जाते हैं। क्योंकि मजहब के नाम पर कुछ लोगों को पाप कर्म करने का लाइसेंस मिल गया है। इसी के नाम पर वे दूसरे धर्म के लोगों को इन्सान भी मानने को तैयार नहीं है। अपनी धार्मिकता के दंभ का ही नया रूप दिखाते हुए वे मॉब लिंचिंग करते हैं। इसी के नाम पर वे दंगा करते हैं। कवि का कहना है कि इस तरह की घटनाओं से ऐसा नहीं कि कुछ हो नहीं रहा है। धर्म का नाम लेकर तरह-तरह के काम करने वाले लोगों का सच उजागर हो रहा है। वे कहते हैं- ‘कौन क्या है, नंगा हुआ है।’ एक अन्य कविता में वे साहस के साथ उन पंडत, फादर और मुल्लों को ललकारते हैं, जोकि भगवान के नाम पर इन्सानों को मारते हैं।

एक अन्य कविता में वे कहते हैं-‘गंगा है या मक्का है, सीधा-सीधा धक्का है।’ कविता- ‘रब्बा तेरे हुक्म बिना’ में भी कवि साबिर अली साबिर रब से ही सवाल करते हैं कि यदि तेरे बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो फिर दुनिया में ये क्या हो रहा है? कवि का रब से भी ज्यादा बंदे में यकीन है। अपनी कविता ‘रब्ब और बंदा’ में वे कहते हैं कि बंदा ही रब का निर्माता है। यदि इन्सान ने भगवान को ना बनाया होता तो भगवान भी इन्सान बन गया होता। जिस सच को कवि व्यक्त कर रहा है, उसके प्रति लोगों का दृष्टिकोण ‘ये कहां लिखा है’ कविता में उजागर हुआ है। कवि जब भी कुछ कहता और लिखता है तो लोग सवाल करते हैं कि कहां लिखा है। फिर कवि उनसे ही सवाल करता है कि जो बात आज तक किसी ने नहीं कही और ना ही लिखी हो उसे कोई कहे और लिखे ना, ऐसा भी तो किसी ने नहीं लिखा है। कवि अव्यक्त को व्यक्त करना महत्वपूर्ण मानता है। कवि मौजूदा दौर में चुप्पी साध गए कलमकारों की मतलबपरस्ती को समझता है। चुप हो गए लोगों को मरा हुआ ही मानता है। सिर उठाकर अपनी बात कहने में यकीन रखता है। यदि हम अपनी बात ना कह पाएं तो फिर हमारे होने का कोई मतलब नहीं है। अभिव्यक्ति के खतरे उठाने के लिए कवि तैयार है। वह अपनी कविता-‘पहुँच’ में कहता है-‘अब तो मेरे गले में ही उलटना है, जो जहर का प्याला तेरा है।’

कवि साबिर अपने समय के यथार्थ को व्यक्त करता है। ‘अंदेशा’ कविता में पांच साल की एक बच्ची की असुरक्षा का चित्र अंकित किया गया है। लड़कियों के लिए असुरक्षित हो चुके वातावरण के प्रति चिंता व्यक्त की गई है। कवि की नजर आगे कदम बढ़ाने वाले रास्ते पर है। रास्ते को देखना, उसके बारे में पूछना और बदला जाना तो उन्हें पसंद है, लेकिन रास्ते को रोका जाना उन्हें पसंद नहीं है। न्यायिक व्यवस्था के बारे में वे ‘अदालतें’ कविता में कहते हैं कि अदालतें भी कमजोर लोगों के लिए न्याय नहीं करती हैं।
पंजाबी की एक कहावत है-पेट ना पईयां रोटियां ते सब्बे गल्लां खोटियां। अपनी एक क्षणिका-भूख में वे कहते हैं- ‘जोर की भूख लगी हो तो बगल में बैठी लडक़ी भी सुंदर नहीं लगती।’ साबिर का सूफियाना अंदाज कईं कविताओं में मुखर हो जाता है। ‘तू मैं’ कविता इसका सुंदर उदाहरण है। ‘बड़ी लंबी कहानी’ में यथार्थ और दार्शनिकता के दर्शन होते हैं। वे अपनी कविता में प्यार को अहमियत देते हैं। कवि के अनुसार प्यार सबसे पहले आता है और रब से भी पहले आता है।

संकलित संग्रह में बहुत ही कम शब्दों में गहरी और दार्शनिक बात कहने के प्रयोग पाठकों को आकर्षित करते हैं। देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर की तर्ज पर ये कविताएं गहरे अर्थ लिए हुए हैं। इनमें गहरा फलसफा है। ‘आस्था’ को वे ‘गले में पड़ा ढ़ोल’ कह कर ही कविता पूरी कर देते हैं। तो एक दूसरे का हालचाल पूछने पर कही जाने वाली उक्ति ‘शुक्र है रब का’ को ‘आम झूठ’ की संज्ञा देते हैं। साबिर धारा के विपरीत चलने वाले मोहब्बत और इंकलाब के रचनाकार हैं। वे अपनी रचनाओं के बारे में पंजाबी में कहते हैं- सीद्दा-सादा बयान देणा है, हक खादा ना खाण देणा है। शेर सुण के ही दाद नहीं देणी, विचली गल्ल ते ध्यान देणा है। आकार में भले ही कोई कविता अत्यंत छोटी हो या फिर कुछ बड़ी। उन सबके बीच सार की बात है, जिस पर हम ध्यान देते हैं तो संग्रह की सभी रचनाएं समय की आलोचना पेश करने वाली और दिशा दिखाने वाली हैं।

साबिर जैसे महत्वपूर्ण कवि की पहचान करके उन्हें भारत के हिन्दी पाठकों तक ले जाने का जो काम सुरेन्द्र पाल सिंह ने किया है। इसी तरह के प्रयास वे निरंतर करते रहें, इसके लिए हमारी ढ़ेर सारी शुभकामनाएँ।

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