लघुकथाएँ – खलील जिब्रान

1. इंसाफ़

एक रात शाही महल में एक भोज हुआ। इस मौके पर एक आदमी आया और उसने शहजादे के सामने नमन किया। सभी मेहमान उसकी तरफ़ देखने लगे। देखा कि उसकी एक आंख बाहर निकल रही है और घाव से खून बह रहा है।

शहजादे ने पूछा, “तुम्हारे साथ हादसा कैसे हुई।” आदमी बोला, “जैसे ही खिड़की से कूदा, सिर जुलाहे के करघे से टकरा गया और आंख फूट गई। ऐ शहजादे, मैं इस जुलाहे के मामले में इंसाफ़ चाहता हूं।”

शहजादे ने जुलाहे को बुलवाया और फ़ैसला दिया कि उसकी एक आंख निकाल दी जाए।

जुलाहा बेहद घबराया। सोचने लगा कि बिना कसूर मुसीबत गले आ गई। जिस तरह शहजादे ने फैसला सुनाया था, वह तो बिना सोचे सुनाया। उसने सोचा उसमें बुद्धि नहीं है, अतः उसे अक़्ल से सिखाना होगा। अपने बचाव में वह सोचने लगा क्यों न मैं अपना बचाव करूं और अपनी मुसीबत किसी और के सर मढ़ दूं। बिना घबराए उसने फ़ैसला लिया और बोला, “शहजादे, आपका न्याय सही नहीं है। मेरी आंख क्यों निकलवा रहे हैं। मेरे पेशे में दोनों आंखों की ज़रूरत है, ताकि मैं कपड़े को दोनों तरफ़ से देख सकूं, जिसे मैं चुनता रहा हूं। मेरे पड़ोस में एक मोची है। उसकी दो आंखें हैं, लेकिन उसे अपने पेशे के लिए दोनों आंखों की जरूरत नहीं।”

यह सुनकर शहजादे ने मोची को बुलवाया। वह आया और उसकी दोनों आंखों में से एक आंख निकाल ली गई।

2. तीन चींटियां

एक आदमी धूप में सो रहा था कि उसके शरीर पर इधर-उधर घूमती हुई तीन चींटियां नाक पर आ गई। तीनों बेहद थकी और निराश थीं। उनके मन में वैसे ही भाव थे, जैसे बेहद मेहनत के बाद किसी के हाथ निराशा लगने पर पैदा होते हैं। फिर भी एक-दूसरे को देखकर वे काफ़ी खुश हुईं। सारी निराशा के भावों को छिपाकर मुस्कराते हुए अपने-अपने कुल की रीति के अनुसार एक-दूसरे को
प्रणाम करने के बाद आपस में बातें करने लगीं।

पहली चींटी ने कहा, “मैंने इन पहाड़ों और घाटियों से अधिक बंजर जगह नहीं देखी। यहां सारा दिन खाने के लिए दानों की तलाश की, लेकिन एक भी दाना नहीं मिला।”

दूसरी चींटी ने कहा, “मुझे भी कुछ नहीं मिला। जबकि एक-एक जगह छान मारी। मेरे ख्याल से यह वही नर्म और बैठक जमीन है, जिसके बारे में हमारे क़ौम वाले कहते हैं कि यहां कुछ पैदा नहीं होता।

तीसरी चींटी ने सिर उठाया और कहा, “मेरी सखियो। इस वक़्त हम बड़ी चींटी की नाक पर बैठे हैं, जिसका शरीर इतना बड़ा है कि हम उसे देख नहीं सकते। इसकी छाया इतनी फैली है कि हम उसका अंदाजा नहीं लगा सकते। इसकी आवाज इतनी भारी है कि हमारे कान सह नहीं सकते, वह हर जगह मौजूद है।”

तीसरी चींटी ने यह बात कही, तो दूसरी दोनों चींटियों ने एक-दूसरे को देखा और वह जोर से हंसीं। उसी समय वह आदमी नींद में ही हिला। चींटियां लड़खड़ाईं। गिरने के

भय से उन्होंने अपने छोटे पंजे उसकी नाक के मांस में गड़ा दिए। सोते में ही आदमी ने अपनी नाक को ज़ोर से खुजलाया और तीनों चींटियां उंगलियों में पिस गई।

3. पवित्र नगर

मैं जवानी में सुना करता था कि एक ऐसा शहर है, जिसके निवासी धर्मग्रंथों के अनुसार धार्मिक जीवन बिताते हैं। मैंने कहा, “इस शहर की मैं जरूर खोज करूंगा और उससे कल्याण के कार्य करूंगा।”

यह शहर बहुत दूर था। मैंने अपने सफर के लिए बहुत सारा सामान इकट्ठा किया। चालीस दिन बाद उस शहर को देखा और इकतालीसवें दिन उस शहर में गया। मुझे यह देखकर बड़ा अचरज हुआ कि नगर के सारे निवासियों के सिर्फ एक हाथ और एक आंख थी।

मैंने महसूस किया कि वे खुद भी आश्चर्य में डूबे हैं। मेरे दो हाथों और दो आंखों ने उन्हें अचरज में डाल दिया। जब वे मेरे बारे में बात कर रहे थे, तो मैंने पूछा, “क्या यह वही पवित्र नगर है, जिसका हरेक निवासी धार्मिक जीवन जीता है।”

उन्होंने उत्तर दिया, “हां, यह वही नगर है।”

मैंने पूछा, “तुम्हारी यह हालत कैसे हुई? तुम्हारी आंख और एक हाथ कहां गए?”

मेरी बात से प्रभावित हुआ और बोला, “आओ, देखो।”

वे मुझे एक देवालय में ले गए, यह शहर के बीच में था। उस देवालय के आंगन में हाथों और आंखों का एक बड़ा ढेर लगा था। वे सब सड़ रहे थे। यह देखकर मैंने कहा, “खेद है किसी क्रूर विजेता ने तुम्हारे साथ यह जुल्म किया है।”

उन्होंने आपस में धीरे-धीरे बातें शुरू कीं। एक बूढ़े ने आगे बढ़कर मुझसे कहा, “यह हमारा काम है। किसी विजेता ने हमारी आंख और हाथ नहीं काटे। ईश्वर ने हमें अपनी बुराइयों पर विजय प्रदान की है।”

वह मुझे एक ऊंची जगह पर ले गया। शेष अब हमारे पीछे थे। वहां पहुंचकर देवालय के ऊपर एक शिलालेख दिखाया, जिसके शब्द थे-

“यदि तुम्हारी दाई आंख तुम्हें ठोकर खिलाए तो उसे बाहर निकाल दो क्योंकि सारे शरीर के नरक में रहने की बजाय एक अंग का नाश अच्छा है। यदि तुम्हारा दाहिना हाथ तुम्हें बुराई करने के लिए मजबूर करे, तो उसे भी काट दो, ताकि तुम्हारा केवल एक अंग समाप्त हो जाए और सारा शरीर नरक में न पड़ने पाए।”

यह पढ़कर मुझे सारा रहस्य समझ में आ गया। मैंने पलट कर सभी लोगों को संबोधित किया, “क्या तुम लोगों में पुरुष या स्त्री ऐसी नहीं, जिसके दोनों हाथ और दोनों आंखें हैं?”

सबने उत्तर दिया, “नहीं, कोई नहीं। वहां वे बालक, जो कम आयु के कारण इस शिलालेख को पढ़ने और इसको हिदायतों के अनुसार काम करने में मजबूर हैं, वही बचे हैं, और कोई नहीं।”

हम देवालय से बाहर आए, तो फ़ौरन पवित्र नगर से भाग लिया क्योंकि मैं बच्चा नहीं था और उस शिलालेख को अच्छी तरह पढ़ और समझ सकता था।

4. ईश्वर की खोज

दो आदमी घाटी में घूम रहे थे। एक ने पहाड़ की ओर अपनी उंगली से इशारा करते हुए कहा, “देखो, वहां एक कुटिया है, जिसमें एक आदमी रहता है। उसने बहुत समय से बैराग ले रखा है। वह सिर्फ ईश्वर की खोज में लीन है। जगत्

में उसकी और कोई इच्छा नहीं है।”

दूसरे आदमी ने कहा, “वह इस कुटिया के एकांत का त्याग करके, फिर हमारे जगत में वापस नहीं आ जाएगा, तब बतलाए ईश्वर की प्राप्ति संभवन ही है। उसे चाहिए, वह हमारे सुख-दुःख का भागी बने। शादी-भोज के अवसरों पर नाचे और मृत्यु के अवसर पर रोते हुए का साथ दे।”

पहला आदमी इस बात से मन में संतुष्ट हुआ, लेकिन आदतवश बोला, “जो तुम कहते हो, उससे में सहमत हूं, फिर भी मेरा ऐसा विश्वास है कि वह संन्यासी एक सद्गुरुष है और यह तो तुम्हें मानना ही पड़ेगा कि अपने गुणों का प्रदर्शन करने वालों से भरी दुनिया में एक सपुरुष अपने को छिपाकर जगत् का अधिक भला करता है।”

5. सभ्यता

तीन कुत्ते धूप खाते हुए बातें कर रहे थे।

पहले कुत्ते ने जैसे सपने देखते हुए कहा, “सच में यह बड़ी खुशी की बात है कि हम इस ‘श्वान-युग’ में पैदा हुए हैं। सोचो कि कितनी सुविधा से हम लोग जल, थल और आकाश की यात्रा करते हैं। हमारे आराम के लिए यहां तक कि हमारी आंख, कान और नाक के सुख के लिए भी कैसे-कैसे आविष्कार हुए हैं।”

दूसरा कुत्ता बोला, “इतना ही नहीं, कला के बारे में भी हमारा झुकाव है। चांद को देखकर हम अपने पूर्वजों की अपेक्षा ज़्यादा ताल-स्वर से भौंकते हैं। जब हम पानी में अपना परछाईं देखते हैं, तो हमें अपना चेहरा पिछले जमाने से अधिक सुगठित नज़र आता है।”

तीसरे कुत्ते ने कहा, “सबसे अधिक आश्चर्य वाली बात तो यह है कि इस श्वान-युग में कितनी विचारों में पक्की समानता है।”तभी उन्होंने देखा कि कुत्ते पकड़ने वाला आ रहा है। तीनों कुत्ते छलांग लगाते हुए गली में भागे। भागते हुए तीसरे कुत्ते ने कहा, जान बचाना चाहते हो, तो फ़ौरन भागो, ‘सभ्यता’ हमारी पीछे पड़ी है।”

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