गज़लें – मेहरू

“उजाले हर तरफ होंगे” ग़ज़ल संग्रह के रूप में देसहरियाणा ने मनजीत भोला की प्रगतीशील मूल्यों की रचनाएं प्रकाशित की थी। उन ग़ज़लों को प्रदेश और प्रदेश से बाहर सराहा गया। मेहरू की इन ग़ज़लों में प्रेमी की ख्वाइशों के साथ-साथ धर्म-जाति के ज्वलंत प्रश्न भी हैं। वर्तमान समय में जाति का सवाल कई मायनों में दलित विमर्श के दायरे को लांघकर व्यापक हो गया है। जाति उस हर प्रगतीशील आदमी के गले की फांस बनी हुई है जो समता, स्वतंत्रता, बंधुता के मूल्यों में विश्वास करता है। मेहरू के लिए भी जाति एक बेमतलब की ही बात है। प्रस्तुत हैं ग़ज़लें-

(1)

फ़कत सच को निभाये इतनी हिम्मत कौन करता है।
पँचायत में गरीबों की वकालत कौन करता है।

अगर तुम भूल जाओ जाति मजहब की सलाखों को
समझ आएगा नफ़रत की सियासत कौन करता है।

किसी बेबस को दी होगी उक़ूबत जुल्म की हद तक
जरा सी बात पे वर्ना बगावत कौन करता है।

कमी तेरी रही होगी उसे अपना बनाने में
नहीं तो टूटकर इतनी भी नफ़रत कौन करता है।

किसी को धर्म प्यारा तो किसी को जाति है प्यारी
वतन की नेक दिल से अब इबादत कौन करता है।

जिसे मौका नहीं मिलता वही नादिम रहा मेहरू
बिचारी औरतों की ज़ु'फ़ ख़जालत कौन करता है।

(2)

अपने घर की सँभाल रखते हो।
अच्छा है अच्छे ख़्याल रखते हो।

आँखों में ही जवाब है मेरे
दिल में जो भी सवाल रखते हो।

हाथ में देखकर सुकूं आया
जो दिया था रुमाल रखते हो।

रोज़ की ये नई खरीदारी
क्या दो नंबर का माल रखते हो।

देशप्रेमी हो ये पता चलता है
खून में जो उबाल रखते हो।

हँसके मिलना तुम्हारा खलता है
क्योंकि दिल में मलाल रखते हो।

(3)

बिन रिश्वत ना आने वाले।
क्या बिजली क्या थाने वाले।

हर दफ्तर का हाल यही है
लुट के आएँ जाने वाले।

सत्ता का सुख भोग रहे हैं
जनता को लड़वाने वाले।

नयन तुम्हारे बोल रहे हैं
मन का दर्द छुपाने वाले।

हर दुख सुख को मय में देखें
मयखाने में जाने वाले।

सबका पेट भरा है समझें
माल मुफ्त का खाने वाले।

नज़रों से भी गिर जाते हैं
ज्यादा नज़र उठाने वाले।

सब मर्यादाएँ भूल गये
लिखने वाले गाने वाले।

मर जाएँ तब समझे जाएँ
मेहरु कलम चलाने वाले।

(4)

कभी धर्म की तो कभी जात की।
लड़ाई छिड़ी है बिना बात की।

वतन की तरक्की कहाँ इसतरह
बड़ी मुश्किलें हैं छुआछात की।

न खर्चे घटे हैं न आमद बढ़ी
रगड़ कर पिसाई हुई गात की।

तुम्हें दूर से देखता मैं रहूँ
मेरी हद यही तक है औकात की।

बिछुडते हुए कुछ कहा था मगर
कभी सुध न ली मेरे हालात की

(5)

यूँ छलक गये दो जाम तुम्हारे होठों से।
जब निकला मेरा नाम तुम्हारे होठों से।

चलते चलते थक गया सफ़र में उल्फ़त के
काश मिले कुछ आराम तुम्हारे होठों से।

मेरी एक तमन्ना बाकी रब की मर्ज़ी
छूके गुजरे इक शाम तुम्हारे होठों से।

मैं मय पीने को मयखाने में क्यों जाऊँ
गर चल जाता हो काम तुम्हारे होठों से।

पत्थर हूँ तुम छू लो तो पारस हो जाऊँ
जो लग जाए कुछ दाम तुम्हारे होठों से।

लोगों के होठों पर आने से पहले ही
मैं हो जाऊं बदनाम तुम्हारे होठों से।
मेहरू हरियाणा के कैथल जिले के गांव मटौर के निवासी हैं।

संपर्क-9467563820

4 thoughts on “गज़लें – मेहरू

  1. Avatar photo
    Sumit Kumar says:

    अपने घर की सँभाल रखते हो।
    अच्छा है अच्छे ख़्याल रखते हो।

    हँसके मिलना तुम्हारा खलता है
    क्योंकि दिल में मलाल रखते हो।

    नज़रों से भी गिर जाते हैं
    ज्यादा नज़र उठाने वाले।

    मर जाएँ तब समझे जाएँ
    मेहरु कलम चलाने वाले।

    तुम्हें दूर से देखता मैं रहूँ
    मेरी हद यही तक है औकात की।

    लोगों के होठों पर आने से पहले ही
    मैं हो जाऊं बदनाम तुम्हारे होठों से।

    क्या कहने ! वाह ????

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      मेहरू says:

      बहुत बहुत शुक्रिया सर

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    अनूप अंजान कलियाना says:

    Aapko बहुत-बहुत Badhai ji aapki Acchi rachnaen Hain

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    1. Avatar photo
      मेहरू says:

      बहुत बहुत शुक्रिया सर

      Reply

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