कविताएँ – तनुज

तनुज

तनुज के लिए कविता देश की मौजूदा आबो हवा से भिड़ने का जरिया है। कविता ही में अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं, कविता ही में वे अपने घर के भूगोल को समझने के प्रयास करते हैं और कविता ही में वे “मार्क्सवाद जिंदाबाद” भी कहते हैं। कविता के प्रति यह प्रीत ही उनके इस साहस का कारण बनती है कि वो प्रोफ़ेसर को कविता पर बात करने के लिए ललकारते हैं

1. कृतज्ञता

सिवाय उस स्त्री के,
किसी ने मुझे कुछ भी नहीं दिया
जो उड़ कर चली गई
उन नीले पंखों वाले घोड़े पर बैठ
किसी दूसरी ही दुनिया में।



2. पिताजी का पेट

पिताजी के पेट पर समस्त ब्रह्माण्ड की रौशनी है।
बहुत छोटा है हमारा घर,
यहीं सबसे महफ़ूज जगह थी हम दोनों भाइयों के लिए
जहाँ हम खेल सकते थे सारे अतार्किक खेल।
माँ इसी पर अपना समस्त घरेलू काम निभाती है
इसी पेट की ओट लेकर करती होगी 
उनसे प्यार जिससे टिका होगा एक
स्वस्थ सवर्ण गृहस्थ,
हम सब पिताजी के साथ पिताजी के पेट में रहते थे
पिताजी की कार्यसूची भी बंटी हुई है उनके पेट में
वे पेट की एक दिशा से दफ़्तर के लिए निकलते थे
और अपने पेट की दूसरी दिशा से वापस लौट जाते थे
और आज भी पिताजी का अविरल मानना है :
पेट की समृद्धि से इतना अधिक वास्ता रखना चाहिए
कि धर्मों और जातियों के पाखण्डों में
पेट के लिए कभी नहीं पड़ना चाहिए
हालाँकि उन्होंने नहीं दी थी इसकी शाश्वत आश्वस्ति 
कि इस वज़ह से कभी भी
पेट पर 
चल सकती है
गोली या छुरा..

3. मार्क्सवाद ज़िन्दाबाद

किसी फाशिस्ट ने कभी मेरे सिर पर 
औचक डंडे बरसाए,
जैसा मेरे पुरुखों के साथ होता रहा है
और वे खोते रहें अपनी स्मृतियाँ ;

इस प्रक्रिया में
मैं यदि 'माँ' शब्द भी भूल जाऊँ
तो भी नहीं भूलना चाहता हूँ :
"मार्क्सवाद जिन्दाबाद"

4. कविता पर बात

प्रोफ़ेसर,
यह ज़्यादा सहज होता
कि दुनिया की कोई भी ताकत 
हमारे बीच नहीं होती,
और हम सिर्फ़ कविता पर बात करते!

5. जीना इतना मुश्किल कभी नहीं था

अब किसी भी रूप में
प्रकट हो सकते हैं हत्यारे :
ज़रूरी नहीं वो किसी राजनीतिक दल का सदस्य हो।

वो आपकी माँ हो सकती हैं,
जिसमें पाया था आपने करुणा अपार।

वो आपके पिता भी हो सकते हैं,
जिनके कन्धे पर रहते थे हमेशा सवार।

आपकी धर्म-पत्नी झोंक सकती हैं
कभी भी
धर्म की रसोई में..

या वो प्रेमिका जिसके रहते  
जीवन के हज़ारों सपने थे साकार

उस भव्यता के नीचे 
सारे अपराध हैं क्षम्य,
सारी नैतिकताएं हैं तुच्छ...

6. कविता लिखने के बाद

अब मैं इस चासनी में लिथड़ कर बिता सकता हूँ,
पूरा एक दिन..

अब वतन की आब-ओ-हवा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती!

मैंने पाया है जीवन से एक अमृतफल,
जिसकी खाल उधेड़ते-उधेड़ते
लगा दूँगा पूरा एक दिन!

यह हर्ष और उन्माद
मेरी मानसिकता ही बदल डालेंगे कुछ पलों के लिए,
झाड़कर अपना पुरातन मस्तिष्क
पहना पाऊंगा ख़ुद को हीरे जड़ा हुआ मुकुट..!

करूँगा बेवफाई,
छेड़ूँगा सारे पुराने प्यार के तार,
और एक-एक से निपटूंगा कहकर :
तो मैं अब राजा,
और उन सभी के अस्तित्व मुझे प्रभावित नहीं करते।

इस सबके बाद
फिर किसी यात्रा पर निकल जाऊँगा
नितान्त अकेला,
यह सोचते हुए कि अकेलेपन एक भ्रम है
क्योंकि हम भाववादी लोग 
उन स्त्रोतों की पहचान नहीं कर पाते
जिससे उपमाएं आती हैं।
तनुज बनारस में रहते हैं। कविताएँ लिखना इनके लिए एक आवश्यक कर्म है। विश्व कविता के हिंदी अनुवाद में निरंतर हस्तक्षेप है। सम्पर्क - 9693867441

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