सरफ़रोशी – गंगा राम राजी

गंगा राम राजी

नरेन्द्र देव जोशी लाहौर में एक जज के घर 15 मई 1892 में पैदा हुए। लाहौर उस समय क्रांतिकारियों का गढ़ था। लाला लाजपतराय, अजीत सिंह, और सारे युवा समुदाय की कर्म भूमि लाहौर। पंजाब केसरी लाला लाजपतराय के आंदोलन ‘साइमन कमीशन वापस जाओ’ ने सभी युवाओं को प्रभावित किया था। जोशी इसमें पूर्णरूप से भाग लेने लगे और जब पंजाब केसरी अंग्रेजों की लाठी से घायल हुए तो इस आंदोलन को बल मिला।

उसे पंजाब के मैदान इसलिए रास नहीं आए क्योंकि अंग्रेजों ने उसकी शूट एट साइट के आर्डर दे रखे थे। यह बात तो तय थी ही कि मरने का उसे कोई भय नहीं था। वह जिंदा इसलिए रहना चाहता था कि उसे अंग्रेजों की नाक में धुंआ देते रहना है यही उद्देश्य उसने अपने जीवन का बना रखा था। शादी नहीं की, घर से बहुत पहले ही निकल गया था। कबीर की तरह ‘ जो घर फूंके अपना वह चलें हमारे साथ।

लाहौर में स्कूल कालेज विश्वविद्यालय अधिक मात्रा में थे। पढ़े लिखे युवाओं का समुद्र था लाहौर। यही कारण है कि अधिक से अधिक नौजवान क्रांतिकारियों के साथ जुड़ने लगे थे। नरेंद्र भी पीछे कहाँ रह सकता था। जब उसने मैट्रिक पास कर ली तो वह क्रांतिकारियों के संपर्क में तो आ गया था। मैट्रिक पास करते ही उसी समय 1907 में पगड़ी संभाल जट्टा आंदोलन भगत सिंह के चाचा द्वारा चलाया जा रहा था। इसी आंदोलन में नरेंद्र आंदोलनकारियों के साथ हो लिया था। समझो क्रांतिकारी गतिविधियों की शुरूआत यहीं से हुई। ‘पगड़ी संभाल जट्टा ’ बांके दयाल द्वारा लिखे गीत को सामूहिक गान में गाया जाने लगा। इस गीत में जोशी अपने दोस्तों के साथ भाग लेने लगा। इनके पिता जी उस समय अंग्रेज हकूमत के जज थे। उन्हें सरकार की ओर से नरेंद्र की गतिविधियों के बारे वार्निंग हुई तो बेटे को लाख समझाया परन्तु नरेंद्र बोला, ‘‘ देश को आजाद कराने के आंदोलन का साथ मेरे हाड मांस जैसा साथ है। जिंदा रहने के लिए दोनों को साथ साथ रहना होगा … नहीं छोड़ सकता डैड ..’’

दो टूक जबाव सुनने पर और इन गतिविधियों को नहीं छोड़ने के कारण बाप ने बालक नरेंद्र को घर से निकाल दिया। फिर क्या था बालक नरेंद्र अब स्वतंत्र था तो फुल टाइम आदोलन में कूद पड़ा। आस पास के लोग उसे जोशी के नाम से पुकारते थे। कुर्ता, सफेद पाजामा, सर नंगा, भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह के मिलने के बाद वह पगड़ी धारण करने लगा था। कुछ दिनों बाद पगड़ी की जब जीत हुई तो नंगे सर ही साथियों के संग चल पड़ा, रूका नहीं।

उन्हीं दिनों 1907 में किसानों का आंदोलन जोरों पर था। लोगों में जोश भरने के लिए, इसी आंदोलन के लिए भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह संधू ने ‘पगड़ी संभाल ओ जट्टा’ बांके दयाल द्वारा लिखित गीत से आंदोलन में जान क्या डाल दी , सभी आंदोलनकारियों की जुबान पर ‘ पगड़ी संभाल ओ जट्टा ’ चढ़ गया। पंजाब के हर घर में छोटे बड़े की जुबान पर यह गाना था, यहां तक कि इस गाने के जोश में अंग्रेजों की फौज में पंजाबी फौजिओं में बगावत हो गई, फौजी फौज छोड़ने लगे।

इस गाने से आंदोलन इतना भड़का कि अंग्रेजों को किसानों के आगे झुकना पड़ा। पंदरह साल के जोशी ने इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया था। उसके जोश को देखते हुए अजीत सिंह ने उसे जोशी क्या कहा उसे सब जोशी ही कहने लगे। यहीं से उसकी जोशी नाम की स्थापना हुई थी। यहीं से जोशी ने पगड़ी डालना आरम्भ कर दी।

जोशी में जोश था, भला वह महात्मा गांधी के रास्ते पर चलने वाला कैसे हो सकता था। परन्तु महात्मा गांधी की इज्जत बहुत करता था। इज्जत इसलिए करता था कि गांधी गरीब लोगों के साथ है, भारतीय समाज को अच्छी तरह से पढ़ने वाला एक मात्र नेता। हमारे देश में रोजी रोटी के अतिरिक्त तन ढांपने के लिए भी कपड़ा नहीं है और गांधी उनके साथ खड़ा मिलता। इसी कारण वह महात्मा गांधी की इज्जत करता।

उसके अराध्य देव पंजाब के क्रांतिकारी, अजीत सिंह थे। इन क्रांतिकारियों की सोच ‘ लातों के भूत बातों से नहीं मानते ’ के साथ वह सहमत था। बाप द्वारा उसे घर से निकालने के कारण उसे क्रांतिकारियों से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ। अब देश ही उसका घर है उसकी जिम्मेवारी है। सर पर तो कफन पहले ही बांध रखा था। सारे संसार में अंग्रेज मीठी मीठी बातों में राष्ट्र के नायकों को फंसा के रखते रहे और कब्जा करते रहे। यह कहावत ‘ आग लेने आई और घर वाली बन गई’ इन पर पूरी उतरती है। इसलिए वह कहता था कि ‘ इनका इलाज गुरिल्ला युद्ध’ ही है। यह सारी सीख उसे अजीत सिंह की टोली से क्या मिली, इसे अपने जीवन का ध्येय मान लिया था।

बात 1912 की है। 1907 में किसान आंदोलन में जीत के बाद, सभी क्रांतिकारियों के हौंसले बुलंद थे। लाहौर और अमृतसर बराबर क्रांतिकारियों के गढ़ बने हुए थे। इसी सिलसिले में वह अमृतसर आया हुआ था शहर पहुंचते ही दो अंग्रेजों से झगड़ा हो गया। वे उसे अंग्रेजी में गाली दे रहे थे तो यह उन्हें पंजाबी में ही गालियां दे रहा था। जब वह उन्हें ‘ भैन दी … ’ आदि बोलता था तो पास तमाशा देखने वाले गांव वासी जोर से ठहाका मारते थे, तालियां बजाते। इससे अंग्रेजों को लगा कि यह कुछ उनके बारे गंद बोल रहा है, वे उसे अब गुस्से से बदतमीजी से बोलने लगे जिसे अंग्रेजी में बोलते हैं शाउटिंग करने लगे।

अब वह अपनी बेइज्जती समझने लगा था। इससे पहले अंग्रेज किसी पुलिस वाले को बुलाते उसने दोनों अंग्रेजों को अपने बाजुंओ से ऐसे जकड़ा कि उनकी आंखें ही बाहर निकल आंईं। दोनों अंग्रेजों की जब सांस बंद हुई तो मछली की तरह तड़फते रहे, वहीं ढेर हो गए। उसे मालूम था कि अब धर पकड़ होगी, वह वहां से भाग गया। अंग्रेज उसे ढूंढते रहे वह नहीं मिला। गायब हो गया। अब सीने में क्रांति की आग सुलग रही थी। अंग्रेजों ने उसे पकड़ने के लिए चारों ओर जाल बिछा रखा था। जोशी अंग्रेजों के हाथ नहीं आना चाहता था। 1918 में वहां से भाग कर किसी तरह से सूरत पहुंच गया। अंग्रेजों को उसकी जानकारी मिली तो सूरत की पुलिस अलर्ट हो गई। पुलिस के अलर्ट होने की खबर उसे भी एक क्रांतिकारी से मिल गई। तो भागते हुए सूरत के जंगल में पुलिस से मुठभेेड़ क्या हुई, टांग में गोली लग गई। अब भागा तो जा नहीं रहा था वहीं पर घने जंगल के एक पेड़ पर चढ़गया … पुलिस को चकमा दे दिया गया, पुलिस का ध्यान पेड़ पर नहीं गया था वे उसे जमीन पर ही देखते रहे।

जोशी पुलिस को चकमा देने में निपुण था। सूरत छोड़ अपनी टांग का इलाज कर वह पंजाब में लौट आया था। 1919 के अप्रैल की 13 तारीख, बैसाखी का दिन। भेस बदल कर जोशी जलिंयावाले बाग के बाहर एक ओर छुपके से खड़े होकर अंदर देख सुन रहा था कि तोपें चलने की आवाज सुनाई दी। अब जोशी कैसे चुप रह सकता था पंजाबी की गालियां और पत्थराव बस यहां पकड़ा गया …. लेकिन किसी और नाम से पांच वर्ष तक अंदर जेल में। अंग्रेजों के रजिस्टर में तो जोशी मृत घोषित हो चुका था। 1924 में जेल से छूट कर बाहर आ गया। बाहर निकलते ही बिस्मिल अज़ीमाबादी का गीत गुनगुनरने लगा।

‘सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है। ’

अब पंजाब छोड़ दिया था। अंग्रेजो की नज़र हर जेल से छूटने वाले पर रहती थी। भागते हुए लखनऊ पहुंच गया। चैन से तो यहां नहीं बैठ सकता था। यहां के क्रांतिकारियों से मुलाकात, अब जोशी की पहचान देश के क्रांतिकारियों में होने लगी थी। देश के क्रांतिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरूद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की इच्छा से हथियार खरीदने के लिए ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक रेल लूटने की योजना बनाई गई। इस योजना को अंजाम के लिए 9 अगस्त 1925 का दिन चुना गया और स्थान लखनऊ के पास एक गांव काकोरी चुना गया। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्लाह खान, राजेंद्र लाहड़ी, केशव चक्रवती , मुकुंदी लाल, बनवारी लाल सहित जोशी के साथ दस और क्रांतिकारी थे।

डकैती में सफल हुए परन्तु जब सरकार की ओर से धर पकड़ हुई, जोशी यहां से भागने में सफल हुआ। परिणाम अपनों में से ही सरकारी गवाह बन गए और राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान आदि पकड़े गए। अठाराह महीने मुकदमा चला, 19 दिसंबर 1927 को इन्हें इस कांड के लिए फांसी पर लटका दिया गया। 1928 में गुमनाम जोशी अंग्रेज सरकार के हाथ चढ़गए, पकड़े गए 1932 में हिसार में एक वर्ष का कारावास। इसी सिलसिले में 1934 में तीन वर्ष का कारावास हुआ।

अब जोशाी जी 42 वर्ष के हो चुके थे। अपना सारा यौवन क्रांतिकारी गतिविधियों में गुजारा। अब आंदोलन चरम सीमा पर पहुंच रहा था। गरम क्रान्तिकारी विचारधारा नर्म धारा के आगे कमजोर पड़ने लगी थी। जोशी पर अभी भी सरकार की नजर थी ही। इसी बीच हिमाचल के कामरेड क्रांतिकारी भूप सिंह इन्हें अपने साथ जिला मंडी के लूणापानी ले आए। वहीं पर भूपसिंह ने इन्हें एक छोटा सा एक कमरे वाला मकान बना कर दिया। अब वे यहीं पर आकर रहने लगे थे। अंत में आर्य प्रतिनिधी सभा में काम करने लगे। जीवन के अंत तक सामाजिक कार्य में सक्रीय रहे। बल्ह किसानों की समस्या, उनके हल का झगड़ा स्वतंत्र भारत की सरकार से भी चलता रहा।

99 वर्ष आठ महीने के हुए तो आस पास के उनके जानने वालों में जिनमें नेर चैक से पं. ओम प्रकाश जी प्रमुख थे, उनका शतक जन्मदिन समारोह मनाने की तैयारी करने लगे। उपन्यासकार राजेश जोशी जब 89 वर्ष के हुए तो उन्होंने एक कविता लिखी थी,

मुझे ग्यराह रन और बनाने हैं,
एक छक्का,एक चौका और एकल रन,
या दो चैके और तीन एकल रन,

परन्तु उन्होंने रन पूरे नहीं किए और आउट हो गए। इधर केवल चार महीने शेष थे शतक पूरा नहीं कर पाए जैसे कभी तेंदुलकर आउट हो जाता रहा कभी 99 पर या 98 पर , इधर भी केवल चार महीने रह गए थे शतक को पूरा करने में । जाओ सैनिक जाओ तुम्हें याद करते रहेंगे हिमाचल वासी, मंडी वासी।

अलविदा सैनिक तुम्हें हमारा प्रणाम।

संपर्क- 9418001224

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