कविताएँ – देवेश पथ सारिया

देवेश पथ सारिया

1. होटल में चिपका बाल

एक बाल ही था वह 
होटल के उस कमरे में 
बाथरूम की दीवार पर चिपका हुआ 

इतनी ऊंचाई पर भी नहीं 
कि उसे हाथ बढ़ाकर छुआ ना जा सके 
फिर भी जाने कब से चिपका था बाल  

एक मंझोला होटल था वह 
रेलवे स्टेशन के पास 
वहीं रूकते थे
थोड़े दूर के गांवों-कस्बों से आने वाले लोग
जो आये होते 
प्रतियोगी परिक्षा देने,
या किसी इंटरव्यू के लिए, 
या कचहरी में हाज़री लगाने 
जैसे कुछ कामों से 

ठहरने वालों में से कई
नहाकर, तैयार होकर निकल जाते 

उस इलाक़े में 
लड़के लम्बे बाल नहीं रखते थे 
और लम्बे बाल रखने वाले साधु 
या तो मंहगे होटलों में रुकते हैं 
या फुटपाथ पर 
इसलिए संभावना यही अधिक थी 
कि बाल किसी निम्न मध्यमवर्गीय स्त्री का रहा होगा 
(याद रखिए कि होटल मंझोला था)
और चूंकि देश अपना ही था 
तो बहुत अधिक नहीं थी 
एक कस्बाई परिवेश में 
स्वछन्द उड़ पाने की संभावनाएं 
उस घुंघराले बाल वाली महिला की 

संभावनाओं के गणित से 
वह किसी 
मध्यमवर्गीय भारतीय स्त्री का बाल था 
जिसे मैंने दीवार से हटाया 
खिड़की खोली 
और उड़ा दिया बाहर 
खुली हवा में
आज़ाद 

शुद्धता एक मिथक है

रिसर्च ने मुझे सिखाया
कि किसी परिणाम के कोई मायने नहीं
जब तक उसमें एरर ना बताई जाए

एक छोटे से स्केल से मापकर
फटाक से जो हम बोल देते हैं-
तीन सेंटीमीटर लंबाई
बिना एरर के वह बकवास है

एरर परिभाषित करने के तरीकों में है
यह भी कि दोहराते जाओ मापन का कार्यक्रम
अनंत बार में पहुंच जाओगे शुद्धतम मान तक

अनंत एक आदर्श स्थिति है
वह बस सैद्धांतिक हो सकती है
इसलिए शुद्धता भी एक मिथक है

बहुत करीब से देखने पर नहीं होता कुछ भी आदर्श
सममितता की होती है सीमा
माइक्रोस्कोप से देखने पर धूल
त्रिविमीय विस्तार में समान त्रिज्या की
गोलीय रचना नहीं होती

अच्छे कैमरे से जूम करके देखने पर
रेंगने वाला वह लंबा कीड़ा
मुझे दिखा
पुरानी हिंदी फिल्मों के खलनायक जैसा
दुराचारी नहीं
कैरीकेचर-सा

"घर-घर मिट्टी के चूल्हे हैं"
इससे आगे की पंक्ति
मुझे मेरे एक रिश्तेदार ने सुनाई थी-
"पैंट के नीचे सभई नंगे हैं"

उस दूर के रिश्तेदार को
मेरे क़रीबी रिश्तेदार
ख़ानदान की नाक कटाने वाला बताते थे

कवि और कच्चा रास्ता

कितना उपजाऊ है वह कच्चा रास्ता
जो कवि के घर के सामने से गुज़रता है
वहाँ दृश्य और कविताएँ उगती हैं
किसी भी लिहाज़ से
डामर से लिपी, पुती, चमकती सड़क से अधिक भाग्यशाली
दिन भर जीवन के कई दृश्य
ताकता है वहीं से
क़स्बे का कवि
कच्चे रास्ते का कवि
कच्चे रास्ते से चुनता है कविता के कंकड़
देखता है
हर रोज़ कमर पर बच्चा टिकाए
एक दिन का राशन ख़रीदने जाने वाली
औरत को
जिसकी साड़ी के छींटें
स्वाभिमान के रंग से पगे हैं
कभी उड़ आता है
धुएँ के साथ
गिनती भर मसालों से बघारी
सब्ज़ी का स्वाद
दिन ख़त्म होने के बाद
रोड लाइट की पीली उदास रोशनी मे
थके मज़दूरों को लौटते देखता है
रात गहराने पर
आवारा कुत्तों की धींगामुश्ती का गवाह बनता है
कवि जो तस्वीरें खींचने लगा है
कुछ दृश्य‌‌ कैमरे में उतार लेता है
जिन्हें देख लोग लिखते हैं कविताएँ
कुछ दृश्य, कोई गंध सिर्फ़ वही सहेज पाता है
हर दृश्य का मर्म कैमरा नहीं पकड़ पाता
किसी कैमरे का रेजोल्शयून
कवि के मन जितना कहाँ

विरोधाभास

वे जो कट्टर राष्ट्रवाद
और वसुधैव कुटुंबकम
दोनों की बात
करते हैं साथ-साथ
क्या वे यह चाह रहे होते हैं
कि सारी दुनिया 
एक घर हो
और दुनिया की स्थाई राजधानी
उनका अपना घर हो?

सच्ची देशभक्ति


"मैंने सोचा,
पाया कि मुझ में यह कमी है। 
मेरी प्राथमिकता है कि मैं इसे दूर करूं
मैं ऐसा ज़रूर करूंगा 
क्योंकि मैं ख़ुद से प्यार करता हूं"

यहां 'मुझ' और 'ख़ुद' को
बदल दीजिए 'देश' शब्द से

फिर जो प्राथमिकता तय होगी
गिरेबान में झांकने वाली
प्रचलित परिभाषा से इतर
सच्ची देशभक्ति वही होगी। 


देवेश पथ सारिया बतौर रचनाकार हिन्दी कवि हैं। अनुवाद एवं कथेतर-गद्य लेखन में भी रुचि रखते हैं। ताइवान में खगोल शास्त्र में पोस्ट डाक्टरल शोधार्थी हैं तथा मूल रूप से राजस्थान के राजगढ़ (अलवर) से सम्बन्ध रखते हैं। 

1 thought on “कविताएँ – देवेश पथ सारिया

  1. Avatar photo
    Jai pal Ambala City teacher jaipalambala62@gmail.com says:

    देवेश पथ सरिया की कविताएं मनुष्य की मिट्टी में लथपथ कविताएं हैं।

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