एक ‘असफल प्रयास’ की सफलता – राजेंद्र चौधरी

देश चुनाव की दहलीज़ पर है. पूरी कोशिश होनी चाहिए कि सरकार जनता के प्रति समर्पित एवं जवाबदेह हो. बेहद ज़रूरी है ऐसी सरकार का होना परन्तु काफ़ी कुछ है जो बिना सरकार की भागीदारी के भी हो सकता है. यह कोई नई खोज नहीं है परन्तु हाल ही में एक ‘असफल प्रयास’ की सीमित सफलता से पुन: इस का अहसास हुआ.

कई साल पहले ढाका विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर ने कुछ महिलाओं की थोड़ी सी आर्थिक मदद की थी. डूबते को तिनके का सहारा. ये थोड़ी सी आर्थिक मदद भी उन गरीब औरतों के बहुत काम आई और उन्होंने ने जल्दी ही ये पैसे वापिस भी लौटा दिये. प्रोफेसर का उत्साह बढ़ा और इस प्रयोग की चारों ओर चर्चा होने लगी. उन्हें नोबल पुरस्कार मिला. दुनिया भर की सरकारें इसे ग़रीबी ख़त्म करने  के  रामबाण तरीके के तौर पर देखने लगी. सरकारी विभाग और गैर-सरकारी संस्थाएं ऐसे ‘स्वयं सहायता समूह’ बनाने लग गई.  ‘स्वयं सहायता समूह’ का अँग्रेजी में संक्षिप्त नाम ‘एसएचजी’ ज़बान पर चढ़ गया. सामूहिक-करण की इस प्रक्रिया से वंचित तबके के सशक्तिकरण, विशेष तौर पर महिला सशक्तिकरण की बहुत आस थी. 

हम ने भी यह काम करना चाहा परन्तु हमारे कई क्रांतिकारी साथियों का यह मानना था कि ये समूह बहुत गरीब इलाकों में कामयाब हो सकते हैं परन्तु हरियाणा जैसे सम्पन्न राज्य में इन की ज़रूरत नहीं है. इसलिए पड़ताल करने के लिए हम एक दलित बस्ती में सर्वे के करने गए. सर्वे का उद्देश्य यह जानना था कि क्या हरियाणा में 500-1000 रुपये जैसे छोटे कर्ज़ों की भी ज़रूरत पड़ती है या नहीं. हमारे भारी भरकम सर्वे फार्म तो नहीं भरे गए परन्तु एक स्वयं सहायता समूह शुरू हो गया. पुराने सामाजिक कार्य के संपर्क के चलते वहां कि एक महिला का ‘हम मास्टरों’ में भरोसा था और बस्ती की महिलाओं का उस युवती में. 

हरियाणा के झज्जर जिले के डीघल गाँव की एक अनूसूचित जाति की बस्ती में 2000 में इस की शुरुआत हुई थी. शुरू में हम हर बैठक में जाते. उन्हें हिसाब-किताब रखने का तरीका सिखाया, बैठक करना सिखाया परन्तु किसी तरह का कोई आर्थिक सहयोग हमारी तरफ से नहीं था. तीन चार साल अच्छा काम चला. धीरे-धीरे उसी बस्ती में 4 समूह शुरू हो गए. अब हमारी खास ज़रूरत नहीं रह गई थी. स्थानीय औरतें खुद काम सँभालने लगी परन्तु हर समूह में एक ही औरत पर सारी ज़िम्मेदारी आ गई. हमारा आना जाना कम हो गया. कुछ अन्य सामाजिक काम शुरू कर दिए तो इन समूहों की बैठकों में जाना घटता चला गया. फिर तो साल-दो साल में जाने लगे. एक बार गए तो पाया कि बड़े पैमाने पर धांधली हो रही थी. समूह की सचिव पैसे तो नियमित तौर पर इकट्ठे करती पर बैंक में जमा न करा कर खुद प्रयोग करने लग गई. अन्य सदस्यों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. पहले समूह से शुरू हुई ये बीमारी चारों समूहों में फ़ैल गई. उन की चोरी की नियत नहीं थी बस ज़रूरत पड़ने पर हाथ आया पैसा खुद प्रयोग करने लगी. परन्तु समूह की हिसाब रखने की प्रक्रिया इतनी सरल और पारदर्शी थी कि पैसे की चोरी हो ही नहीं सकती थी. जब हम ने दो साल बाद जा कर हिसाब किताब देखा तो सब कुछ सामने आ गया. फिर वायदे हुए कि अब ऐसा नहीं होगा. हम फिर दो साल तक नहीं गए और ये मर्ज़ बढता गया. एक एक समूह में लाख रुपये के करीब का घपला हो गया. वापिस करने का वायदा तो था परन्तु मेहनत-मज़दूरी करने वाले के लिए एक लाख रुपये वापिस करना कौन सा आसान काम है. समूहों ने अपनी सचिव बदल ली और समूह गिरते पड़ते चलते रहे परन्तु हमें इन समूहों से कोई विशेष आशा नहीं रह गई थी. इसलिए अन्य व्यस्तता के चलते हमारा आना-जाना दो-दो साल तक न होता. 

हाल ही में एक समूह ने फ़ोन कर के हमें बुलाया कि हमारा आडिट कर दो. आडिट मतलब उन के रखे हिसाब को जांच कर के संक्षिप्त वार्षिक रिपोर्ट बनाना. फुर्सत मिलने पर दो साल बाद फिर इस बस्ती में गए तो औरतों के गिले शिकवे थे: ‘मास्टर कहाँ फंसा गया हमें तूं. इस से अच्छा तो बैंक में पैसे रखते तो फ़ायदे में रहते.’ खैर इस समूह ने 3-4 साल से फंसे अपने 62 हज़ार रुपये निकलवा लिए थे. अब वो बांटने थे और समूह को बंद करना था. इस समूह का आडिट किया. इस समूह का आडिट खत्म करते-करते एक दूसरे समूह ने भी अपने फंसे हुए 1 लाख 20 हज़ार रुपए निकलवा लिए और आडिट का अनुरोध किया. क्योंकि औरतें निराश थी और समूह बंद करने का सोच रही थी, तो हम ने सोचा चलो एक बार इन समूहों के पूरे सफ़र पर निगाह मार लें. देखा तो ऐसे चौकाने वाले आंकड़े सामने आये कि हम भी हैरान रह गए. निम्न तालिका में इन का संक्षिप्त विवरण है. 

डीघल (झज्जर, हरियाणा) के समता बचत समूहों की नवीनतम स्थिति (सितम्बर 2023) 
विवरणसमूह 2समूह 3कुल
शुरू कब हुआ 20052008
कब तक का हिसाब सितम्बर 23 अगस्त -23
अब तक वितरित कुल कर्ज़ 10094006332501642650
समूह द्वारा अब तक वितरित ब्याज़ 414055203665617720
एक सदस्य को मिला ब्याज़ 2076512825
अंतिम हिसाब के समय कुल सदस्य 171027
वार्षिक ब्याज़ दर 20.31%23.96%
सदस्य की अंतिम बचत 40006700
समूह की कुल अंतिम बचत 6870066700135400

अनुसूचित जाति के मजदूर-मेहनतकश परिवारों के इन दो समूहों ने बिना किसी किस्म के बाहरी अनुदान के इन 15 से 18  सालों में लगभग साढ़े सोलह लाख रुपये क़र्ज़ के रूप में वितरित किये हैं. यह क़र्ज़ इन्होनें खुद अपनी बचत के आधार पर दिया है. इस में बैंक अथवा अन्य किसी बाह्य संस्था का कोई पैसा नहीं है. इन समूहों ने इस बीच 6.17 लाख रुपया इन महिलाओं से ब्याज़ और जुर्माने के रूप में कमाया है और यह पैसा वापिस इन्हीं में बांटा है. एक रुपया भी समूह से बाहर नहीं गया है. अगर ये बचत समूह न होते तो पहले तो इन्हें साढ़े सोलह लाख रुपये  का क़र्ज़ ही नहीं मिलता और मिलता भी तो कम से कम दो गुणा यानी 12 लाख रुपया ब्याज़ के तौर पर चुकाना पड़ता. सब से बड़ी बात तो यह पैसा वापिस इन की जेब में नहीं आता, यह बस्ती से बाहर किसी अन्य की जेब में चला जाता. ये सब आंकडें उन महिलाओं के बीच रखने से पहले उन से पूछा कि कितना ब्याज़ तुम्हें मिला है, तो उन का जवाब था ‘ख़ाक ब्याज़ मिला है’. परन्तु हिसाब लगाने पर हम पाते हैं कि उन्हें लगभग 20 से 24% प्रति वर्ष की दर से ब्याज़ मिला है यानी लगभग 2 रुपया सैकड़ा. और यह स्थिति तो तब है जब ये समूह मात्र 5-7 साल ही ठीक ठाक चलें हैं और पिछले 10 साल से तो गिरते पड़ते चल रहे हैं. पिछले 4-5 सालों से इन समूहों को डूबे हुए पैसे पर कोई ब्याज़ भी नहीं मिला है. 

चाहे 4 साल बाद ही सही, बिना ब्याज़ ही सही, इन समूहों ने अपने डूबे हुए पैसे का बड़ा हिस्सा वसूल लिया है; बिना पुलिस या अदालत के. शायद बैंक भी इतना डूबा हुआ पैसा इस तबके से वसूल नहीं सकता था क्योंकि कुर्क करने के लिए तो इन के पास कुछ ख़ास है नहीं. यह डूबा हुआ पैसा इस लिए वापिस आया क्योंकि ख़र्च करने वाले और जिन का पैसा डूबा था, दोनों पड़ोसी ही तो थे. पड़ोसी को धोखा दे कर वहीं रहना मुश्किल होता है. आखिर सुबह-शाम का उलाहना कौन सुने? फिर हिसाब-किताब भी बिलकुल स्पष्ट था कि गबन हुआ है. बीच-बचाव भी हुआ; ब्याज़ माफ़ कर दिया गया. यह सब स्थानीय स्तर पर हुआ. पैसे की इस वसूली में हमारी कोई भूमिका नहीं थी सिवाय आडिट करने के.

यह सब हुआ है बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के, केवल उन की अपनी 20-25 रुपये की साप्ताहिक बचत के भरोसे. नियमित हिसाब-क़िताब भी उन्हीं में से एक महिला करती है. बैंक में पैसे जमा कराने या निकलवाने का काम भी वे स्वयं करती हैं. बाहरी सहायता केवल प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन के रूप में रही है या साल-दो साल में होने वाले निष्पक्ष आडिट यानी सचिव द्वारा रखे हिसाब-किताब ही जांच. यह आडिट भी हमारे मार्गदर्शन में वे स्वयं करती थी. बस इतना भरोसा ज़रूर था कि कोई गलती होगी तो ‘मास्टर’ पकड़ लेगा और निष्पक्षता से मार्गदर्शन करेगा.  

भले ही ये ‘समता स्वयं सहायता समूह’ अपने उच्च उद्देश्यों -व्यापक सशक्तिकरण, सामूहिक-करण  – की दिशा में कोई विशेष उपलब्धि नहीं हासिल कर पाए. समूह लेनदेन तक सीमित रह गए थे, एक व्यक्ति केन्द्रित हो गए थे. ना अन्य सामाजिक मुद्दों पर कुछ खास काम हुआ है और ना ही कोई सामूहिक काम-धंधा शुरू हुआ है. बैठक ठीक से नहीं हो पाती, महिलाएं आती हैं अपनी किश्त देती हैं और चली जाती हैं. परन्तु हफ्ते के 20-25 रुपये जोड़ कर, और इतनी छोटी राशि भी कितनी ही महिलाएं समय पर नहीं दे पाती थी, एक समय पर यह समूह एक सदस्य को 30-30 हज़ार तक का क़र्ज़ दे पाए, मुसीबत के वक्त उन का संबल बन पाए.  यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है. ये महिलाएं बिना लाग-लपेट कहती हैं : “… (इलाके की सम्पन्न/भूमि मालिक जाति का नाम) और जमीदारों से बचा दिया है. ना किसी की बेगार, न किसी के आगे गिड़गिड़ाना. ज़रूरत पड़े तो फट से कर्ज़ ले लो”.

शोध का महत्व भी पुन स्थापित हुआ है. यह साबित हुआ कि ऊपरी तौर पर जो दिखता है, वह हकीकत से दूर भी हो सकता है. अंतिम रिपोर्ट समूह के बीच रखने से पहले तक स्वयं उन की नज़रों में इस समूह से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ था; एक दूसरे के प्रति गिले-शिकवे ही थे. हमारी नज़र में भी समूह की सफलता संदिग्ध थी परन्तु जब ठोस आंकडें उन के बीच आये, तो समूह बंद करने के निर्णय पर फिर विचार होने लगा.  एक समूह बंद हो गया है. शायद इस का मुख्य कारण यह है कि मुख्य भूमिका निभा रही महिला के बेटे की अच्छी नौकरी लग गई है और अब उस के परिवार की आर्थिक हालत सुधर गई है. दूसरा समूह चल रहा है. यह समूह इस के बावज़ूद चल रहा है कि निवास परिवर्तन की संभावना के चलते हम ने उन्हें बता दिया है कि शायद अब हम आडिट न कर पायें.  हमें डर था कि शायद अब यह समूह आगे न चले परन्तु यह जान कर खुशी हुई  कि हमारे न होने के संभावना के बावज़ूद इन महिलाओं ने समूह चलाए रखने का फैसला किया है  

इस खट्टे-मीठे सफ़र में कई अनूठी बातें हुई. शुरू से ही ये सभी समूह एक-एक महिला पर केन्द्रित हो गए. हमारे बार बार कहने पर कोई दूसरी महिला हिसाब-किताब संभालने को आगे नहीं आई; एक ही रट थी  कि ‘और कोई पढ़ी लिखी ही नहीं है. यही है जो दो अक्षर पढ़ सकती है’. परन्तु जब गबन सामने आये तो सभी समूहों ने अपने सचिव एवं पदाधिकारी बदल लिए. फिर उन्हीं घरों से पढ़ी-लिखी महिला निकल आई जहाँ पहले ये दावा था कि और कोई तो पढ़ा-लिखा है ही नहीं. सुखद अनुभव यह भी रहा कि पदाधिकारी बदलने के बाद फिर कोई गबन नहीं हुआ; शायद बाकी सदस्य थोड़ा ध्यान देने लग गई होंगी कि बैंक में पैसे जमा हो रहे हैं या नहीं. 

समूह की बैठक में आते-जाते बस में कई बार दलित एवं अन्य परिवर्तन कामी संगठनों के कार्यकर्ताओं से भेंट हुई. उन को इन प्रयोगों के बारे में बताया और अनुरोध किया कि अपने संगठन के प्रभाव क्षेत्र में भी ऐसे स्वयं सहायता समूह बनवाएं. इस दिशा में उन के प्रयासों का सहयोग करने का वायदा भी किया. परन्तु किसी भी ‘सक्रिय परिवर्तन-कामी’ व्यक्ति या संगठन ने इस काम में रुचि नहीं ली.  परन्तु इस बीच ‘एसएचजी’ ने व्यापारियों को ज़रूर आकर्षित किया है. ‘छोटे छोटे’ क़र्ज़ मुनाफे का धंधा बन गए हैं और इस धंधे में लगी कंपनियां शेयर बाज़ार तक में छा गई. अब इस का नाम माइक्रोफाइनांस हो गया है यानी छोटे छोटे कर्ज़ देने की व्यवस्था. कहने को तो उद्देश्य वही रहा जो स्वयं सहायता समूह का था, वंचित तबकों की वित्तीय सहायता, परन्तु सार तत्व बदल गया.  गरीब की, एक दूसरे की सहायता के भाव से शुरू हुआ ये अभियान मुनाफ़ा वसूली तक पहुंचा तो मुनाफ़ा खोरी के सारे गुणदोष इस में भी आ गए; ऊंची ब्याज़ दर, ज़ोर-ज़बरदस्ती से कर्ज़ वसूली और फिर गरीब कर्जदारों द्वारा आत्महत्या. हालात यहाँ तक पहुँच गए कि इन कंपनियों की मुनाफाखोरी पर रोक लगाने के लिए एक समय पर तत्कालीन आंध्र प्रदेश सरकार को कदम उठाने पड़े थे. 

क्या सामाजिक परिवर्तनकामी ताकतें, जनपक्षीय राजनैतिक समूह सरकार सुधार के साथ साथ, स्वतंत्र, स्थानीय एवं सामुदायिक उपायों पर भी ध्यान देंगी? अगर देना चाहें तो स्वयं सहायता समूह इस का एक सशक्त दावेदार है. यह गरीबी की समस्या का रामबाण इलाज तो नहीं है, पर मलहम ज़रूर है. और इस के लिए चाहिए मात्र एक निष्पक्ष आठवीं-दसवीं पास व्यक्ति जो उन्हें समूह बनाने के लिए प्रेरित कर सके, हिसाब क़िताब रखना सिखा सके और निष्पक्ष निगाह रख सके. कोशिश हो तो ऐसे समूह व्यापक सामाजिक परिवर्तन की स्थानीय इकाई के रूप में भी विकसित हो सकते हैं.

लेखक – महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर रहे और कुदरती खेती अभियान, हरियाणा के सलाहकार हैं।
Ph: 09416182061

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