सुंदरी के सौंदर्य से सराबोर ‘सुंदरबन’ -सुरेन्द्र पाल सिंह  

सुरेन्द्र पाल सिंह

गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना नदियों के बीच एक विशाल डेल्टा में अनजाने से नामों वाली अनेक छोटी बड़ी नदियाँ हैं, बंगाल की खाड़ी का बैकवॉटर है, खारे पानी में उगने वाले हरे भरे जंगल हैं, बिना इंसानों वाले और इंसानी बस्ती वाले अनेक द्वीप हैं, मगरमच्छ हैं, जंगली सुअर हैं, हिरण हैं, अनेक प्रकार के पक्षी हैं और सबसे बढ़कर रॉयल बंगाल टाइगर नाम का दुर्दांत शेर है। खारे पानी में राजी-खुशी से अपनी जड़ों को ज़मीन से बाहर निकालकर साँस लेते हुए जो पेड़ यहाँ छाया रहता है उसका नाम है सुंदरी। उसीके नाम से यहाँ के विशाल वन और जलभाग के क्षेत्र को पुकारा जाता है – सुंदरबन और अंग्रेज़ी में इसे जाना जाता है मैंग्रोव फ़ॉरेस्ट के नाम से।

इतने  विशाल भूभाग और जलभाग की कल्पना को तब तक ज़ेहन में उतारना मुश्किल है जब तक कि स्वयं वहाँ जाकर कुदरत के इस अद्भुत करिश्मे को साक्षात निहार ना लिया जाए। मेरा वहाँ छ: फ़रवरी 2024 को गीता के साथ जाना हुआ। रास्ता, दूरी, खाने-पीने और ठहरने की व्यवस्था के बारे में कोई अग्रिम अनुभव ना होने की वजह से एक टूअर एंड ट्रैवल एजेंसी का सहारा लेना। कोलकाता में साइंस सिटी के सामने से चलने वाली एक मिनी बस में अन्य यात्रियों के हम भी हमसफ़र बन गए। नाश्ते और पानी की व्यवस्था मिनी बस में ही थी। कोलकाता से निकलने वाले एक गंदे नाले के समानान्तर एक दो लेन वाली सड़क पर क़रीब 120 किलोमीटर की दूरी पर गडखाली नामक क़स्बे में हमारा वाहन रुका। रास्ते में क़रीब क़रीब 20-30 किलोमीटर पहले ही सड़क के दोनों ओर वेटलैण्ड की भाँति पानी भरी क्यारियाँ लंबी दूरी तक दिखाई देने लगती हैं और कोलकाता से चलता आ रहा गंदा नाला भी यहीं पर उन्हीं में कहीं एकाकार हो जाता है। कुछ छोटे बड़े क़स्बे और बाज़ार से गुजरते हुए रास्ते में कैनिंग नाम का बड़ा क़स्बा भी आता है जहां से लंबे अरसे से सियालदह तक रेलगाड़ी का आना जाना रहता है।

गडखाली से हम एक छोटे मोटरबोटहाउस में ट्रांसफ़र हुए। जब बोट कुछ देर बाद अथाह जलसागर में पहुँची तो हमारे गाइड ने बताया कि वहाँ चार नदियों का संगम है जिनके नाम हैं – गोमती, मतला, विद्याधरी, और दुर्गदुहानी। हमारी बोट धीमी गति से चलती रही, चाय-पानी और भोजन की उत्तम व्यवस्था थी। खाने में सीफ़ूड का उदार समायोजन था। सेवादार लड़कों का मिज़ाज गर्मजोशी वाला था और आसपास दिखाई देता रहा साफ़ पानी, कचरामुक्त किनारे और दूर तक जलराशि और हरियाली का मनमोहक सम्मिलन।असल में कुदरत का सारा जादू बंगाल की खाड़ी के बैकवाटर का है जिसमें गहरे और विशाल जंगलों वाले टापुओं और अनेक नदियों और नहरों का समावेश इस प्रकार से है कि चारों तरफ़ केवलमात्र शुद्ध और खूबसूरत प्रकृति का ही नज़ारा दिखाई देता है। गाइड लगातार निर्जन और बस्तियों वाले द्वीपों के बारे में, पशु-पक्षियों के बारे में, बाघ और मगरमच्छों द्वारा मनुष्यों के शिकार की घटनाओं के बारे में बताता रहा। धीमी गति से चलती बोट से कभी तो चारों ओर केवलमात्र जलराशि ही दिखाई देती है और कभी हरे भरे जंगलों वाले द्वीप। प्रकृति के सौंदर्य का आग़ोश इतना मनमोहक और खुमारी वाला हो सकता है इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी। अधिकतम द्वीपों के नाम के पीछे खाली शब्द जुड़ा हुआ है जैसे परिखाली वन, परिखाली टू आदि आदि।गाइड ने बताया कि खाली शब्द खाले से बना है यानी पानी का नाला। संयोग से उत्तर भारत में भी पानी के नाले को खाला कहा जाता है। 

शाम को बोट ने पाखीराला नाम के छोटे क़स्बे के फेरी पॉइंट पर उतारा जहाँ से हम पैदल चलकर टूरिस्ट विशेष बाज़ार से गुजरते हुए रुकने के स्थान पर पहुँचे। यहाँ चाय-पान, बोनफायर और लोकनृत्य के अलावा सी फ़ूड वाले डिनर की उतम व्यवस्था थी।

अगले दिन भी सारा दिन बोट में मस्ती और सुस्ती भरा कार्यक्रम था। हमारी तरह कुछ और बोट भी सैलानियों को घुमाते हुए दिखाई दे रही थी। इसके अलावा बांग्लादेश आते जाते हुए अनेक कारगो शिप भी दोनों देशों के झंडे लगाए हुए दिखाई देते रहे। बीच बीच में कुछ निर्जन द्वीपों पर बोट से उतर के बहुमंज़िला वॉच टॉवर पर चढ़कर दूर तक की प्रकृति को निहारने और कभी मगरमच्छ, कहीं चीतल, कहीं जंगली सुअर और पानी पर तैरते हुए बतख़, सारस, बगुला, किंगफिशर की अनेक वैरायटी, हेरोन व अन्य पक्षियों जैसे मैंग्रोव पिटा, पेलिकन, एशियन ओपनबिल, वुड सैंडपाइपर, बाज़ आदि को देखते देखते वक्त का एहसास ही नहीं रहा। पूरे सुंदरबन में रॉयल बंगाल टाइगर की संख्या क़रीब एक सौ के आसपास बताई जाती है लेकिन हमारे ग्रुप को उसके दर्शन का संयोग नहीं मिला।  

शाम को हमने पुरानी आदत के अनुसार वहाँ के जनजीवन में ताकाझांकी करने में यथासंभव वक़्त गुजारा। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए वापसी पर स्थानीय जीवनशैली को नज़दीक से देखने के लोभवश हमने टूअर एंड ट्रैवल वालों का साथ छोड़कर एक ऑटोरिक्शा से पाखिराला से गोशाबा के फ़ेरीपॉइंट पहुँचकर एक पारम्परिक फेरी वाली नाव पाँच रुपये वाला भाड़ा देके विद्याधरी नदी को पार करके गडखाली पहुँचे। और, वहाँ से एक रोडवेज़ की बस से कैनिंग पहुँचकर अकल्पनीय भीड़ वाली ट्रेन से सियालदह और सियालदह से लोकल ट्रेन द्वारा दमदम पहुँचके यात्रा के इस पड़ाव को ख़त्म किया। अभी यह देखना बाकी है कि उस अद्भुत सौंदर्य का सम्मोहन कब तक अचेतन मन में अपनी जगह घेर के रखेगा। 

यह तो था एक संक्षिप्त विवरण उस स्थान का जहाँ हम गए, घूमे फिरे, खाया पिया और लौट के आ गए। परन्तु, क्या किसी रमणीक स्थान की इतनी ही कहानी होती है? उसके पीछे छुपा हुआ दर्द, तकलीफ़, हादसे, इतिहास, संस्कृति की अनगिनत दास्तानों के जाने बिना कैसे कहूँ कि एक यात्रा पूरी हो गई। लम्बे अरसे से एक कशिश थी जो मुझे सुंदरबन लेकर गई और अब इस सफ़रनामे का हिस्सा बन रही है उस कशिश की कुछ ख़ास बोटियाँ।

एक नज़र इसके इतिहास पर:  

सन् 1757 में प्लासी का युद्ध और नवाब सिराजुद्दोला की हार के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी की कठपुतली के तौर पर मीर जाफ़र बंगाल का नया नवाब बना। नवाब से ईस्ट इंडिया कम्पनी  ने  24 परगना की जमींदारी ले ली और इस प्रकार से सन् 1781 तक साढ़े पच्चीस हज़ार वर्ग किलोमीटर के जंगलों की सफ़ाई करके बड़े बड़े प्लॉट (एस्टेट) बनाकर नए भूस्वामियों को लीज पर दिये जाने का सिलसिला शुरू हो गया।

एक नया प्रयोग: सन् 1903 में एक नया ज़मींदार आया- स्कॉटलैंड से सर डेनियल मैकेनों हेमिल्टन जिसने गोशाबा, रंगाबेलिया और सात्जेलिया की दस हज़ार एकड़ यानी तीस हज़ार बीघा ज़मीन की ज़मींदारी अपने हाथों में ली और इस ज़मीन के 236 ऐसे टुकड़े बनाए जहाँ बसासत की संभावना हो सकती थी। जंगल साफ़ किए गए, पानी को रोकने के लिए छोटे बड़े बांध बनाए गए और बिना किसी जाति या धर्म का भेद करते हुए छोटा नागपुर, बीरभूम, बाँकुरा, मयूरभंज आदि से लोगों को यहाँ मुफ़्त में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया। बाद में कुल इलाक़ा 22 हज़ार एकड़ तक हो गया जिसमें से 17 हज़ार एकड़ में लोग बस गए। वस्तुस्थिति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गोशाबा की जनसंख्या जो वर्तमान में अढ़ाई लाख से ऊपर है वहाँ सन् 1909 में केवल 900 लोग रहते थे जिनमें से 600 तो मज़दूर थे। 

सर हेमिल्टन ने यहाँ पहला को-आपरेटिव अभियान चलाया। बिना ब्याज के ऋण की सुविधा, स्कूली शिक्षा, नाईट स्कूल, डिस्पेंसरी, अन्नाज के गोदाम आदि सुविधाओं का प्रावधान किया। 

सन् 1943 में जब बंगाल में भीषण भूखमरी से 25 -30 लाख लोग अकाल मृत्यु के ग्रास बने तो उस वक़्त सुंदरबन अकाल से मुक्त था।

सर हेमिल्टन के प्रयोग से प्रभावित होकर सन् 1932 में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर भी गोशाबा आए थे। गांधी जी भी वहाँ आने को उत्सुक थे लेकिन समयाभाव की वज़ह से उनके सचिव महादेव देसाई सन् 1935 में यहाँ आकर रुके थे।

सन् 1947 में नोआखली में दंगों के बाद फिर से एक बड़ी संख्या में यहाँ बसने के लिए लोग आए। सन् 1971 में बांग्लादेश आंदोलन के दौरान अनेक शरणार्थियों को दण्डकारण्य में बसाया गया था लेकिन जीवनयापन कठिन होने की वजह से वहाँ से एक बड़ी भीड़ ने सन् 1979 में सुंदरबन की ओर रुख़ कर लिया था। 

बोनबीबी, जंगलीशाह, दुखे और दक्षिणराय: 

ख़तरे से भरा जीवनयापन हो तो ख़तरों से निजात पाने को मनुष्यमात्र में किसी ना किसी अलौकिक शक्ति का सहारा लेने की नैसर्गिक प्रवृति होती है। ख़तरे का कारक भी दैवीय शक्तियों वाला होता है। तो, जो भी आपदा आती है उसका कोई दैवीय विधान है, ऐसी मान्यता मानव की अंतस्चेतना में विद्यमान रही है।

 रॉयल बंगाल टाइगर एक रूप बदलने वाली अलौकिक शक्ति है और उस शक्ति का नाम है दक्षिण राय। दुखे नाम का छोटा लड़का दक्षिणराय का मासूम शिकार है। अल्लाह बोनबीबी को दुखे को न्याय दिलवाने को भेजता है। बोनबीबी अपने भाई शाहजंगली की मदद से दक्षिणराय को हरा कर दुखे को बचा लेती है। फिर एक आपसी समझौता होता है कि जंगल की रक्षा का काम दक्षिणराय के ज़िम्मे रहेगा और मनुष्य को बचाने के लिए बोनबीबी। यहाँ दुखे सुन्दरबन वासियों के प्रतीक है। दक्षिणराय शेर के रूप में किसी आदमी को तभी खाएगा जब वह अपनी ज़रूरत से फ़ालतू लोभवश जंगल से लेगा। यानी शेर द्वारा शिकार किया जाना एक दैवीय न्याय है। इसप्रकार से यदि कोई आदमी शेर द्वारा खा लिया गया है तो मृतक का परिवार एक सामाजिक कलंक को ढोने को मजबूर होता रहा है। लेकिन, साँप डसने या मगरमच्छ से मारे जाने वाले मृतक के परिवार से सामान्य व्यवहार होता है। 

 19वीं सदी अब्दुर रहीम द्वारा लिखित किताब ‘बोनबीबी जौहरनामा’ में बोनबीबी की लोककथा है। इसके अलावा इस लोककथा के अन्य संस्करण भी उपलब्ध हैं।

प्रत्येक जंगल में पानी के किनारे किसी बड़े पेड़ के नीचे बोनबीबी का पूजा स्थान होता है जहां लोग नारियल और मिठाई चढ़ाकर अपनी सुरक्षा के लिए मन्नत माँगते हैं। उसकी लोककथाओं के कई संस्करण हैं, लोकगीत हैं, पारंपरिक जात्रा भी होती हैं, मेले भी भरे जाते हैं और आजकल बोनदेवी के नाम से भी पूजी जाती है। पूजा दक्षिणराय की भी की जाती है। इसके अलावा साँपों से बचने के लिए एक अन्य लोकदेवता मनसा की भी पूजा की जाती है।

बिधोबापाड़ा अर्थात् विडो-विलेज:

सुंदरबन में रोजी-रोटी के मुख्य साधन रहे हैं- मछली पकड़ना, शहद इकट्ठा करना और चावल की पैदावार। मछली पकड़ने या शहद इकट्ठा करने के लिए घने जंगल में या गहरे पानी में कई कई दिनों के लिए जाना पड़ता है। दोनों ही जगह कभी भी व्यक्ति शेर का निवाला बन सकता है। तो जब भी कोई व्यक्ति अपने रोज़गार के लिए निकलेगा तो उसकी वापसी हो पाएगी या नहीं यह सवाल तलवार की तरह लटकता रहता है। ऐसे में उसकी पत्नी को क्या क्या करना या नहीं करना होगा:

दिन में दो बार बोनबीबी की पूजा 
कोई नए वस्त्र नहीं पहनेगी 
कोई आभूषण नहीं पहनेगी माथे पर सिंदूर नहीं लगाएगी 
बालों को कंघी नहीं करेगी 
कोई नदी पार नहीं करेगी 
नॉन-वेज भोजन नहीं करेगी 
किसी सामाजिक या धार्मिक समारोह में शामिल नहीं होगी 
किसी अन्य पुरुष से बात नहीं करेगी 

इतना कुछ करने के बाद भी यदि उसका पति घर नहीं लौटता है तो इस दैवीय श्राप के कलंक को ढोने के लिए अभिशप्त उस महिला को ‘स्वामी खेगो’ यानी पति को खा जाने वाली के नाम से तानाकशी और सामाजिक बहिष्कार का शिकार होना पड़ता रहा है। नतीजे के तौर पर इन बहिष्कृत औरतों को अलग बस्तियों में रहने को मजबूर होना पड़ा जिन्हें विडो विलेज कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर आरामपुरा, जोलेपुरा, लाहिड़ीपुर आदि ऐसे इलाक़े हैं। बात यहाँ तक ही नहीं रुकती बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए ऐसी महिलाएँ कोलकाता में मेहनत मज़दूरी के लिए भटकते हुए एशिया के सबसे बड़े वैश्यालय सोनागाछी की ओर भी पहुँच जाती हैं। एक अध्ययन के अनुसार सुंदरबन से सैकड़ों औरतें हर साल देह बाज़ार की गलियों में पहुँचती हैं। इंडिया टुडे के एक आँकड़े के अनुसार पिछले दशक में लगभग छ: सौ औरतें टाइगर विडो बनी थी।

सुंदरबन एक विहंगम दृश्य:

गंगा, मेघना और ब्रह्मपुत्र नदियों के बीच डेल्टा में क़रीब दस हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैले हुए सुंदरबन का 40% भारत में और बाकी 60% बांग्लादेश में है। 

भारत के हिस्से वाले चार हज़ार वर्ग किलोमीटर वाले इलाक़े में 102 द्वीप हैं जिनमें से 54 द्वीपों पर इंसानी बस्तियाँ हैं जबकि पूरे सुंदरबन में क़रीब 200 द्वीप और 15 नदियाँ हैं। ज्वार-भाटे से बने हुए 400 जलमार्गो का जाल बना हुआ है। 

सुंदरबन दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव फ़ॉरेस्ट है।

सन् 1973 में इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया था, सन् 1978 में रिज़र्व फ़ॉरेस्ट, सन् 1984 में 1330 वर्ग किलोमीटर को नेशनल पार्क और सन् 1989 में इसे सुंदरबन बायोस्फीयर (जैव मंडल) का रुतबा दिया गया।

इसी दौरान सन् 1987 से  इसे वर्ल्ड हेरिटेज साईट की सूची में शामिल होने का गौरव मिला हुआ है। 

सुंदरबन दुनिया में साइबेरिया के बाद रॉयल बंगाल टाइगर का सबसे बड़ा ठिकाना है जिनकी संख्या लगभग एक सौ के आसपास है और इनपर भारत या बांग्लादेश की नागरिकता का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता। यह पेड़ पर चढ़ सकता है, पानी में तैर सकता है और 60 किलोमीटर प्रति घंटा की स्पीड से दौड़ सकता है। मैंग्रोव फ़ॉरेस्ट में इसके अलावा कोई और नस्ल का टाइगर नहीं है। 

यहाँ 334 क़िस्म के पेड़-पौधे, 120 क़िस्म की मछलियाँ, 35 तरह के रेंगने वाले रेपटाइल और 42 प्रकार के स्तनधारी (मैमल) जन्तु पाए जाते हैं। 

कुछ प्रेरक प्रसंग:

सुंदरबन का अद्भुत डॉक्टर – कभी पंजाब से आए एक व्यक्ति ने बंगाल के सुल्तान द्वारा दी गई जगदलपुर की ज़मींदारी सँभाली थी और उसके वंशज डॉ. गोपीनाथ बर्मन ने सन् 1947 में सुंदरबन को अपना ठिकाना बनाया और सन् 2007 में अपनी मृत्यु तक  डॉ. बर्मन का एक ही मक़सद रहा कि अधिकतम मरीज़ों का मुफ़्त ईलाज किया जाए। अंधविश्वासों से ग्रस्त मरीज़ों को विशेषकर शेर के आक्रमण से घायल व्यक्तियों की सर्जरी, इंजेक्शन, मरहम- पट्टी के लिए शुरुआत में उन्हें ओझे-सयानों का विरोध सहना पड़ा लेकिन धीरे धीरे उनके हाथों की शिफ़्त ने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया। अत्यंत गम्भीर घायल व्यक्तियों को कोलकाता के बड़े अस्पताल में भिजवाने का इंतज़ाम किया जाता था।  

‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ और ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ जैसी पुस्तकों के लेखक डोमनिक लेप्पियर का योगदान  – ‘पद्मभूषण’ और ‘सिटीजन ऑफ़ ऑनर ऑफ़ कलकत्ता’ से अलंकृत प्रसिद्ध लेखक डोमनिक लेप्पियर ने अपनी आधी रॉयल्टी संदेशखाली, कुलटाली, बसंती और गोशाबा में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए दे दी। सन् 2007 के आँकड़ों के अनुसार उनके सहयोग से एक लाख टीबी के मरीज़ों का, नौ हज़ार कुष्ठरोगियों का और तीन हज़ार सर्जरी वाले ईलाज हुए।

वर्तमान स्थिति:

ख़तरे से बचाव- सरकारी आँकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष औसत ३६ व्यक्ति टाइगर के शिकार बनते हैं। यह संख्या उन लोगों की है जिन्हें  मछली पकड़ने या शहद इकट्ठा करने के लिए परमिट मिला हुआ होता है। अनाधिकृत रूप से प्रवेश किए हुए व्यक्तियों के परिवार वाले ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट क़ानूनी दावपेंचों से बचने के लिए नहीं करते हैं। ख़ैर, बचाव के लिए आजकल फ़ॉरेस्ट विभाग की ओर से करेंट वाले डम्मी पुतले जंगल में टिका दिए जाते हैं जिन्हें टाइगर असली इन्सान समझकर शिकार का प्रयास करता है लेकिन बदले में करेंट का झटका खाता है। इस प्रकार से टाइगर की इन्सानों पर आक्रमणकारी प्रवृति निरुत्साहित होती है। एक दूसरा प्रयोग मछली पकड़ने वाले मछुआरे किश्ती में बैठे हुए अपने सिर के पिछली ओर एक इन्सान के चेहरे वाला ऐसा मास्क लगाते हैं जिससे टाइगर को लगता है कि उसे देखा जा रहा है। रॉयल बंगाल टाइगर कभी सामने से अटैक नहीं करता है और इस प्रकार से मछुआरों पर पीछे से हमले का ख़तरा टल जाता है।

इसके अलावा गहरे जंगल और पानी में जाने के लिए फ़ॉरेस्ट विभाग परमिट के माध्यम से नियंत्रण रखता है।  

रोजी-रोटी का सवाल- सुंदरबन के बाशिंदों के लिए पारम्परिक रूप से केवलमात्र तीन तरह के कामों से ही जीवनयापन करना पड़ता रहा है- मछली पकड़ना, शहद तोड़ना और चावल की खेती। लेकिन अब अनेक नए क़िस्म के रोज़गार भी उभरे हैं। मसलन, टूरिज्म से होटल इंडस्ट्री, गाइड सर्विस, ऑटो-रिक्शा, हैंडलूम और हैंडिक्राफ़्ट आदि आदि। यातायात के साधनों में सुधार के साथ दूर जाकर काम-धंधा तलाशना भी आसान हो गया है। 

एनजीओ और सरकार के प्रयास- पश्चिम बंगाल सरकार का दावा है कि सुंदरबन की एक लाख महिलाओं को एम्ब्राइडरी, टेलरिंग, बी-कीपिंग, फिशिंग आदि कामों की ट्रेनिंग दी जा चुकी है। महिलाओं के अनेक स्वयं सेवी संगठन भी इसी काम में लगनपूर्वक जुटे हुए हैं। टूरिज्म के हिसाब से बाज़ार में बदलाव और वहाँ मिलने वाला हैंडिक्राफ़्ट का सामान इस ओर इशारा करते हैं। महिलाओं के सशक्तिकरण के इस प्रकार के प्रयासों से और समय के साथ बदलती हुई परिस्थितियों के साथ साथ सामाजिक बंधन भी कमजोर हुए हैं व अंधविश्वासों की पकड़ भी ढीली हुई है। 

निष्कर्ष:  

जाहिरी तौर पर तो टूरिस्ट का मक़सद तो मौज मेले के लिए घुमक्कड़ी करना होता है। उस हिसाब से तो सुंदरबन की ख़ूबसूरती बेमिसाल है। लेकिन टूरिस्ट एक इन्सान भी होता है और इंसानी संवेदनशीलता के साथ यदि हम घुमक्कड़ी करे तो घुमे जाने वाले स्थान के कितने ही दिलचस्प आयाम हमारी जानकारी में आते हैं। मौज-मस्ती के साथ साथ ऐतिहासिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को समझने का प्रयास ही घुमक्कड़शास्त्र का सटीक सिद्धांत है।    

संदर्भ: 
1. 'Hamilton Zamindari System: An analytical review' by Dr. Sujit Mandal
2. 'Maach and Chaash brought us to Sundarbans' by Urvashi Sarkar
3. 'The Amazing Doctor of Sundarbans' by Soumen Dutta
4. 'Tiger Widows of Sundarbans' by Inderjit Badhwar
5. 'Tiger Widows of Sundar and: How religion and myth stigmatise human-wildlife conflict' by Amrit Dass Gupta
6. 'Stigma of Tiger attack: Study of tiger widows from Sundarban Delta, India's - Indian Journal of Psychiatry, Jan-March 2016
सुरेन्द्र पाल सिंह -
जन्म – 12 नवंबर 1960 शिक्षा – स्नातक – कृषि विज्ञान स्नातकोतर – समाजशास्त्र सेवा – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन – सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर – देस हरियाणा 
कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से – सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि । 
पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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1 thought on “सुंदरी के सौंदर्य से सराबोर ‘सुंदरबन’ -सुरेन्द्र पाल सिंह  

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    सुरेंद्र says:

    धन्यवाद ‘देस हरियाणा’.
    उम्मीद है पाठकों की टिप्पणियां मिलेगी और भविष्य में लेखन में और सुधार हो पाएगा।

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