श्री करतारपुर साहब (पाकिस्तान) की यात्रा – सुरेंद्र पाल सिंह

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म – 12 नवंबर 1960 शिक्षा – स्नातक – कृषि विज्ञान स्नातकोतर – समाजशास्त्र सेवा – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन – सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर – देस हरियाणा कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से – सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि । पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

हम कुछ मित्र आग़ाज़- ए- दोस्ती यात्रा के मंच से शान्ति और मुहब्बत का पैगाम लेकर प्रत्येक वर्ष आज़ादी दिवस के मौके पर राजघाट दिल्ली से चलकर पाकिस्तान बॉर्डर तक जाते हैं। एक बार हुसैनीवाला में शहीदों की समाधिस्थल तक भी जाना हुआ और बाकी समय वाघा बॉर्डर तक। बीच बीच में भिन्न भिन्न अवसरों पर भिन्न भिन्न स्थानों पर भी यात्रा रहती हैं। जैसे कि तीन वर्ष पहले शहीद भगत सिंह के जन्मदिन पर मसूरी जाना हुआ और पिछले साल पाकिस्तान में स्थित करतारपुर साहब में भी एक जत्था गया था।

इस बार फिर से अनेक मित्रों ने भारत के गृहमंत्रालय से करतारपुर साहब जाने के लिए परमिट माँगा और एक जनवरी 2024 के लिए आग़ाज़-ए-दोस्ती के 25 इच्छुक आवेदकों में से 9 शान्तिकर्मी यात्रा पर निकल पाए।
तो हम गुज़रे वर्ष के आखिरी दिन अमृतसर के लिए अपने व्यक्तिगत वाहनों से चल पड़े। फगवाड़ा के पास जीटी रोड पर पंजाबी विरासत की शानदार प्रतीक हवेली पर विख्यात विद्वान और शहीद भगत सिंह के भानजे प्रो. जगमोहन सिंह भी हमारी टीम का हिस्सा हो गए।

अमृतसर जाना हो तो स्वर्णमंदिर जाने की कसक जोर आजमाइश करती ही है। तो वहाँ जाना हुआ। स्वर्णमंदिर के सामने के गलियारे का नया रूप हमारे लिए आकर्षक था। साल 2023 का आखिरी दिन और नए वर्ष के आगमन की वजह से गोल्डन टेम्पल के बाहर और अंदर कुछ विशेष गहमागहमी मिली। गुरु का लंगर छकने के लिए भी लंगर हॉल की ऊपरी मंजिल में जाना पड़ा और प्रतीक्षा भी अच्छी खासी करनी पड़ी। दरबार साहब में मत्था टेकना तो संभव नहीं हुआ क्योंकि शाम को देर हो चुकी थी और कीर्तन समाप्त होने से पहले संगत की लाइन खत्म होने का नाम नहीं ले पा रही थी। खैर, कीर्तन समाप्त होने के बाद श्री गुरु ग्रंथ साहब को दरबार साहब से प्रकाशघर तक ले जाने का रिचुअल देखने को मिला जब अकालतख्त के सामने पूरा प्रांगण खचाखच भरा हुआ था और श्रद्धाभाव से ‘जो बोले सो निहाल… ‘और ‘सतनाम वाहेगुरु’ की आवाजें सभी के मुँह से निकल रही थी।

एक जनवरी 2024 को नए साल की शुरुआत पर हम दो कारों से डेरा बाबा नानक की ओर चल पड़े। मेरी गाड़ी में बगल में प्रो. जगमोहन सिंह का बैठना हमारे लिए सौभाग्य था क्योंकि सिक्ख और पंजाब के इतिहास पर उनकी जबरदस्त पकड़ का लाभ हमें पूरे रास्ते मिलता रहा। जब रास्ते में फतेहगढ़ चूड़ियां आया तो उन्होंने बताया कि यहाँ महाराजा रणजीत सिंह के शरीके (कुनबे वाले) रहते थे। पंजाब की संस्कृति में शरीके ईर्ष्या और कॉम्पिटिशन का ऑब्जेक्ट माना जाता है। जैसेकि एक कहावत है- यदि शरीके का मुँह लाल हो तो अपना मुँह भी लाल होना जरूरी है चाहे इसके लिए खुद के मुँह पर थप्पड़ मारने पड़े। तो, जब महाराजा रणजीतसिंह हाथी पर बैठकर फतेहगढ़ चूड़ियां आया तो उसके शरीके के लोग पेड़ों पर चढ़कर बैठ गए ताकि वे हाथी से ऊँचे दिखाई दें।

इसी प्रकार प्रो. जगमोहन सिंह से सिक्ख इतिहास के बारे कुछ ना कुछ भिन्न भिन्न जानकारी मिलती रही। बातचीत के सिलसिले में उन्होंने बताया कि वे सरदार बघेल सिंह के वंशज हैं। सन 1783 में सरदार बघेल सिंह ने दिल्ली पर कब्जा करके वहाँ के तमाम ऐतिहासिक गुरुद्वारे बनवाए थे। उससे पहले साईं मियां मीर के हाथों रखी गई नींव पर पाँचवे गुरु अर्जुन देव ने सन 1605 में स्वर्ण मंदिर की तामीर करवाई थी। यानी गुरुद्वारों का असली प्रचलन दिल्ली के गुरुद्वारों के बाद ही शुरू हुआ था। चर्चा के दौरान कूका आंदोलन, गुरूद्वारा लिब्रेशन मूवमेंट, अंग्रेजों द्वारा सिंहसभा को विशेष सरंक्षण, जलियांवाला बाग के हत्यारे जनरल डायर का गोल्डन टेम्पल में सम्मानित किया जाना जैसे अनेक वृतान्त सुनने को मिले जिन्हें विस्तार में लिखना मुख्य विषय से इतर हो जाएगा।

डेरा बाबा नानक कस्बा इंडो-पाक बॉर्डर पर आखिरी बस्ती है जिससे एक किलोमीटर बाद ही भारत-पाक सीमा से हमें करतारपुर कॉरिडोर की एंट्री मिलती है।

डेरा बाबा नानक का ज़िक्र किए बिना करतारपुर यात्रा का वृतान्त अधूरा पड़ जाएगा।

डेरा बाबा नानक के बारे यह दावा किया जाता है कि इसकी स्थापना बाबा नानक की तीसरी पीढ़ी के बाबा धर्मचंद ने की थी। यहाँ अनेक छोटे बड़े गुरुद्वारे हैं जिनमें से अधिकांश गुरु नानक के वशंज होने का दावा करने वाले बेदी वंश से जुड़े हुए हैं। एक गुरुद्वारे के प्रांगण में उदासीन पंथ की स्थापना करने वाले गुरु नानकदेव के पुत्र श्रीचन्द जी से जुड़ा हुआ अष्टकोणीय कुआँ है और 9वीं पीढ़ी के वशंज बाबा काबली मल्ल की समाधि है। दूसरे गुरुद्वारे में शीशे के फ्रेम में जड़ा हुआ एक वस्त्र रखा हुआ है जिसके बारे में वहाँ लिखा हुआ है कि गुरु नानक देव जी का यह चोला बाबा काबली मल्ल बल्ख-बुखारा से लाए थे। इस चोले के बारे अनेक कहानियां प्रचलित हैं जिनमें चमत्कार का तड़का भी है। जैसेकि एक सपने के बाद बाबा काबली मल्ल को यह चोला एक गुफ़ा में मिला आदि आदि। इसी फ्रेम में बेबे नानकी का रुमाल भी प्रदर्शित है। तो, इन गुरुद्वारों को ‘गुरुद्वारा चोला साहब’ के नाम से जाना जाता है। कस्बे में तमाम गलियां और मुहल्ले बाबा नानक के बेदी वशंजों के नाम पर हैं जिनमें से अधिकांश बाबा माणकचंद और बाबा मेहरचंद के नाम से जुड़े हैं। एक गुरुद्वारे के परिचय बोर्ड पर यह भी लिखा हुआ कि वहाँ से मिले हुए लौंग का प्रसाद खाने से निःसंतान औरतों को सन्तान प्राप्ति होती है। मिलाजुलाकर यहाँ गुरुनानक देव जी की शिक्षा को छोड़कर आस्था का कारोबार ओज पर है। करतारपुर जाने वाले अधिकांश यात्री आस्थावश डेरा बाबा नानक में रुकते ही हैं।
हमारे लिए यहाँ रुकने का दूसरा कारण कोविड नेगेटिव की पर्ची भी लेना था जिसकी अनिवार्यता के बारे में हमें रास्ते में ही पता चला। खैर, ‘विशेष’ दोस्ताना माहौल में हमें यहाँ पर्ची और डॉलर मिल गए।

डेरा बाबा नानक से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर जब हम सीमा पर पहुँचें तो पूरे सिस्टम और बिल्डिंग को देखकर विस्मित हो गए। एक विशाल शेड के अन्दर और बाहर पंजाबी संस्कृति और सिक्ख गुरुओं से जुड़ी अनेक पेंटिंग्स और कलाकृतियां सुरुचिपूर्ण और मनमोहक हैं। किसी भी अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट की तरह तमाम औपचारिकताएं पूरी होने के बाद एक ओपन ऑटो रिक्शा से हमें क़रीब 500 मीटर की दूरी पर पाकिस्तान की सीमा पर छोड़ दिया गया। यहाँ भी पासपोर्ट, परमिट आदि की जाँच और जामातलाशी हुई। प्रत्येक यात्री को बीस अमेरिकन डॉलर यहाँ जमा करवाने होते हैं। भारतीय रुपये के बदले पाकिस्तानी करेंसी भी यहाँ मिलती है।

यहाँ से एक बस के द्वारा हम श्री करतारपुर साहब की ओर चल पड़े। खूब चौड़ी सड़क के दोनों और उपजाऊ और हरे भरे खेत दिखाई देते हैं। क़रीब चार किलोमीटर की दूरी पर हमारा गंतव्य स्थान था। पूरे रास्ते मे कोई गाँव नहीं मिला। लेकिन, गंतव्य स्थान जाने वाली सड़क की बाईं ओर करीब एक किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव दिखाई देता है।

बस से उतरने के बाद दर्शनी ड्योढ़ी में हमारे समूह का स्वागत पाकिस्तान सुरक्षाबल के एक पुरुष और महिला ने किया। ठेठ पंजाबी में सत श्री अकाल के साथ संबोधन शुरू करते हुए उन्होंने गुरुद्वारा की इमारत, लंगर हॉल, दरबार साहब, प्राचीन कुआँ, खेत, दीवान हॉल, सरोवर, बाज़ार आदि के बारे में समझाया। दर्शनी ड्योढ़ी में ही जोड़ा घर में जूते जमा करवाके हम फोटोग्राफी और भ्रमण पर छोटे बड़े समूहों में निकल पड़े। कड़कती ठण्ड से पाँवों को बचाने के लिए तमाम रास्तों पर मैट बिछाए हुए हैं। पूरा प्रांगण अत्यंत विशाल है जिसके केंद्र में दरबार साहब है। दरबार साहब के मुख्य द्वार के सामने एक मज़ार बनी है जिसपर लिखा हुआ है कि बाबा नानक के मुस्लिम शिष्यों ने श्रद्दावश बाबा जी के वस्त्र और फूलों को यहाँ दफ़न किया था। हमने आगाज़-ए-दोस्ती की ओर से मिलकर सम्मानपूर्वक इस मज़ार पर एक चादर चढ़ाई। दरबारसाहब की पहली मंजिल के बाहर संगमरमर के पत्थर पर लिखा हुआ है कि इसका स्लैब पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह द्वारा सन 1920 में एक लाख पेंतीस हज़ार छः सौ रुपये के खर्चे से रखवाया था। प्रो. साहब की दृष्टि इतनी पैनी है कि उन्होंने इशारा किया कि सन 1919 में जलियांवाला बाग कत्लेआम के तुरंत बाद सन 1920 में अंग्रेज़ सरकार के वफ़ादार पटियाला के महाराजा द्वारा उठाया गया यह कदम जख्मों पर मरहम लगाने का प्रयास था। उन्होंने यह भी बतलाया कि करतारपुर की ज़मीन बाबा नानक को मुस्लिम रंधावा परिवार द्वारा दी गई थी और बाबा नानक (1469-1539) ने चार उदासियां (लम्बी यात्राएँ) पूरी करके अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष यहाँ पर खेतीबाड़ी करते हुए आध्यात्मिक संदेश देते हुए गुजारे थे।

दरबार साहब के भूतल पर बाबा नानक की समाधि है। कहा जाता है कि हिन्दू और मुस्लिम शिष्यों द्वारा आपसी विवाद के चलते अन्तिम संस्कार के लिए गुरुनानक जी का पार्थिव शरीर किसी को भी नहीं मिल पाया था। पहले तल पर गुरुग्रंथ साहिब का पाठ और कीर्तन पारंपरिक तरीके से होता है। पूरे गुरुद्वारे का प्रबन्ध पाकिस्तान गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा किया जाता है। मज़ार के एकदम नज़दीक एक प्राचीन कुआँ है जिसे बाबा नानक खेतों में सिंचाई के लिए करते थे। इसके बगल में एक प्यूरीफायर प्लांट लगा है जिससे इस कुएँ का पानी साफ करके डेढ़ लीटर की प्लास्टिक बोतलों में भरा जाता है और कुछ टूटियां भी पानी पीने के लिए लगाई गई हैं। कोई भी यात्री मर्ज़ी के अनुसार बोतल ले जा सकता है और इच्छानुसार वहाँ पर रखी गई एक टोकरी में पैसे डाल सकता है। कुँए के नज़दीक ही एक चार पांच फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर शीशे के बक्शे में एक बम रखा हुआ है जिसके बाहर लिखा हुआ है कि इंडियन एयरफोर्स ने सन 1971 की लड़ाई में गुरुद्वारे पर यह बम फेंका था लेकिन चमत्कारिक रूप से इस बम से गुरुद्वारे को कोई नुकसान नहीं पहुंचा।

हमारा अगला पड़ाव रिलिजियस डिस्कोर्स हॉल में था जहाँ बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियां हैं और अनेक प्रकार की कलाकृतियां और पेंटिंग्स दर्शायी गई हैं। यहाँ से चलकर हम लंगर हॉल में गए। अन्य गुरुद्वारों की तरह यहाँ भी पंगत में बैठने और बुजुर्गों के लिए बेंच रखे हुए हैं। लंगर में खाने के लिए इतनी वैराइटी हैं कि पेट भर जाता है लेकिन नियत नहीं। मेरे बगल में प्लाटिक की हरे रंग की टोकरी को टोपी की तरह ओढे हुए कुछ नौजवान बैठे थे। पूछने पर पता लगा कि वे 17 घण्टे का सफर करके सिन्ध से यहाँ आए थे। सिर पर टोकरी बारे उन्होंने बताया कि गुरुद्वारे में सिर ढकने की रवायत के अनुसार उन्होनें दर्शनी ड्योढ़ी में रखी हुई इन टोकरियों का प्रयोग टोपी की तरह किया है और वापसी पर इन टोकरियों को वहीं पर छोड़ दिया जाएगा। ध्यान देने पर दिखाई दिया कि इस तरह की टोपी वाले मुस्लिम श्रद्धालुओं की संख्या अच्छी खासी थी। लंगर तैयार करने वाले भी अधिकांश पुरुष और महिला सेवादार भी मुस्लिम हैं। सिंध से आए एक परिवार की आठ साल की एक बच्ची जिस प्यार और सत्कार से लंगर बाँट रही थी उससे तो श्रध्दा और मोहब्बत का माहौल ही कुछ और बन गया था।

यह सारा कुछ देखकर तसल्ली हुई कि बाबा नानक की ‘वंड छक्को’ की भावना आज भी खूबसूरत रूप में जिंदा है।
लंगर के बाद वहीं पर चाय पीने और मिलने जुलने का सिलसिला खत्म होने पर हम दर्शनी ड्योढ़ी वापस आए और जोड़ा घर से अपने अपने जूते वापस लेकर बाहर निकलकर प्रांगण के बाईं ओर बाहर की ओर बने हुए बाज़ार में पहुँचें। बाज़ार में क़रीब 25-30 दुकानें आमने सामने बनी हैं। कपड़े विशेषकर महिलाओं के सूट, जूतियां, मिठाई मुख्यतः सोहन हलवा, डॉयफ्रूट की दुकानों पर शॉपिंग करना खुशनुमा अनुभव था। कीमतें क़रीब क़रीब हमारे देश के बराबर ही हैं। बार्गेन चलता है और पेमेंट पाकिस्तान की कर्रेंसी में ही होती है जिसके लिए एक्सचेंज काउंटर भी वहाँ मौजूद है। बोस्की के सूट की ख़रीददारी हमने भी की ताकि यादगार बनी रहे और कभी यह कपड़ा हमारे यहाँ लोकप्रिय था लेकिन अब उपलब्ध नहीं है।

चार बजे के आसपास पब्लिक साउंड सिस्टम से अनाउंस होने लगा कि सभी यात्री वापसी के लिए बसों में सवार हो जाएं।
और, वापसी पर जब हमारे एक मित्र ने पाकिस्तान के बस ड्राइवर को धन्यवाद देते हुए बोला कि ये हिंदुस्तान -पाकिस्तान की दीवारें तोड़ क्यों नहीं दी जाती तो उसके भावुकपूर्ण शब्द थे – दीवारें टूटे या ना टूटे लेकिन ये मुहब्बत भरा आना जाना और मेलजोल तो बना ही रहना चाहिए।
बॉर्डर पर वापसी की प्रक्रिया भी वैसी ही थी जैसी आने की। और इस प्रकार हमनें एक ऐतिहासिक स्थान की तीर्थयात्रा पूरी की।

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