‘1947’ उपन्यास पर समीक्षात्मक टिप्पणी – नरेश कुमार

नरेश कुमार

‘1947’ पंजाबी के चर्चित उपन्यासकार परगट सिंह सतौज द्वारा लिखा गया बेहतरीन उपन्यास है। हिंदी में इसका अनुवाद परमानंद शास्त्री जी ने किया है। किसी महत्वपूर्ण कृति का जितनी अधिक भाषाओं में अनुवाद होगा,उसकी पाठकों तक पहुंच उतनी ही अधिक होगी । रचना जितने ज्यादा पाठकों द्वारा पढ़ीं जाएगी लेखक का मंसूबा जाहिर है कि पूरा होगा । समाज और अधिक संवेदनशील होगा तो इतिहास में जो दुख हमने तगमे की तरह धारण किए हुए हैं,ऐसे तगमो की संख्या में बढ़ोतरी नहीं होगी।

अनुवाद द्वारा भाषाओं में सांझी संस्कृति का विस्तार होता है। भाषाएं अमीर होती जाती है । मानव मन की बारीक से बारीक अभिव्यक्ति को व्यक्त करने की सामर्थ्य पैदा होती है। शब्दकोश में नये शब्द जुड़ते हैं। एक शब्द मरने का मतलब है एक पूरी संस्कृति का मर जाना। “1947′ उपन्यास में कितने ही लोक बोली के शब्दों को पढ़कर मैं रुका और उन शब्दों में पसरे ताप और मिठास को मैंने महसूस किया। इस तरह के भावानुवाद के लिए मैं परमानंद शास्त्री सर को बधाई देता हूं कि आप जैसे भाषाप्रेमी ही भाषाओं को बचाए हुए हैं। आप ही सांझी संस्कृति के बोड (बरगद बाबा) हो। बाकी सब ढ़ोग है भाषाओं को बचाने के नाम पर। मैं यहां आपके सम्मुख उपन्यास से कुछ शब्द रख रहा हूं, टिब्बे, टिब्बे की टीसी, ढलान, कसिये, सरकंडा, डोलू, बखारी, अंगोछे, दाई, खुण्ड, छमके, फिरनी, सौदा -सुल्फ आदि ऐसे शब्द उपन्यास में भरें पड़े हैं जो हमारी सामासिक संस्कृति के वाहक है।

हिंदी में अनुदित उपन्यास की भूमिका के आरम्भ में दी गई गुरुवाणी की महत्वपूर्ण पंक्तियां –

"दावा अग्नि बहुतु तृण जाले।
कोई हरिया बूटु रहियो री।।"


अर्थात् वन में लगी आग पूरे वन को जला देती है। कोई विरला ही हरा पेड़ बचता है। ये पंक्तियां पूरे उपन्यास को पढ़ते हुए मन में बराबर चलती रहती हैं। टी.एस.इलियट कहता है कि “हमारा मन पके हुए सूअर की माँस की बू,दाँते की भव्य कविता का पाठ और प्रणय -जाल में उलझने की मधुर अनुभूति एक साथ कर सकता है। यानी ऐन्द्रिय सुखानुभाव, भव्यता का अनुबोध और आवेगों की अतिशयता हमारे मन में एक साथ हो सकती है।” इस उपन्यास को पढ़ते हुए मेरे मन में भी आजादी के साथ आई विभाजन रूपी त्रासदी से उपजी हिंदुस्तान की सारी दुखदायक अनुभूति तैरती रही। साथ ही इस दावानल को रोकने,जले हुए पर मरहम पट्टी लगाते पात्र जो जो खुद भी झूलसे, जख्मी हैं कोशिश करते हैं (अजमेर, नज़ीर,कामरेड,अमर) विभाजन के समय जब खून और हवस के भूखे भेड़िए अपना मुंह खून से सना रहे थे।तब मानव प्रेमी अपनी जान जोखिम में डालकर तथाकथित हिन्दू, मुसलमान आपस में मदद कर रहे थे। हालांकि जब भी बंटवारे का जिक्र आता है तो ऐसी मानवीय मिसालो को कम ही बताया जाता है।जो सांझी संस्कृति की विरासत है वह इस उपन्यास में सुकून देती हैं।

ज्ञातव्य है साम्प्रदायिकता, धर्म, संस्कृति की आड़ लेकर आती । आजादी के साथ साथ हिंदू, मुस्लिम दंगों के रूप में आप देखते ही है। उपन्यास में एक फ़कीर सुलेमान की हत्या की गई, इसी तरह की घटनाओं ने पूरे हिंदुस्तान की हवा में ज़हर घोल दिया। लोग एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। यहां तक कि मिल्ट्री ने भी दंगाइयों के साथ मिलकर नरसंहार करवाया जिसमें मामदीन जैसे असंख्य परिवार, चंद मिनट पहले जन्में बच्चों तक का कत्लेआम कर दिया गया। लेकिन उपन्यास पढ़ते हुए पाते हैं कि कई जगहों पर साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक मजबूत आवाज उठने पर साम्प्रदायिकता दब भी गई। लेकिन सवाल बार-बार दिमाग में आता है कि कब हम भूल जाते हैं इंसान होना,। हमारे शहीदों को कहाँ मालूम था कि आजादी के साथ-साथ हमें सौगात में ऐसा भी मिलेगा। ऐसा कलंक मानव जाति पर लगेगा कि धोने से भी नहीं धुलेगा।

मामदीन के भतीजे सलीम का प्रश्न पूरे मानव समाज को निरुत्तर कर गया कि -“बंटबारा मेरे अम्मी -अब्बा को मार कर क्यों हुआ।”दंगों ने हिंदुस्तान की धुरी तोड़कर रख दी। नज़ीर उर्फ नसीब ने हीर का पाठ करते हुए जो सुनाया वो इस बात कि तस्दीक करता है –

लख वैदगी वैद लगाए अके
धुरों टुटड़ी किसे ना जोड़नी वे…"

उपन्यास पढ़ते हुए हर पेज पलटते वक्त हाथ कांपता है, मन भी पत्ते की तरह कांपता है कि कोई न कोई अनहोनी होगी।ये भय, अंदेशा,डर बयां करता है कि हमारी संवेदना मानव के पक्ष में है। पाकिस्तान जाते हर काफिले, कैंप के साथ सुरक्षा का भाव लिए पाठक का मन जाता है जो स्वाभाविक भी है। मनुष्यत्व को हिंसा, अन्याय पसंद नहीं।

उपन्यास पाठक को बांध कर रखता है । एक टीस का खुंटा गड़ जाता है वो निकलने का नाम नहीं लेता ,बस घटनाओं के साथ कभी और गहरा हो जाता है कभी अजमेर, नज़ीर के मिलेने, मामदीन के परिवार के वारिस मिलने पर थोड़ा हल्का जरूर होता है। ध्यातव्य है कि जब भी युद्ध या बंटवारा होता है सबसे ज्यादा अगर किसी पर ज़ुल्म होता है तो वो है औरत। आप इस उपन्यास में पढ़ते हुए भी बखूबी जान सकते हैं कि सबसे ज्यादा बलात्कार, मारपीट की शिकार महिलाओं के बनाया जाता है जिसने विभाजन के दौरान पूरी मानवता को शर्मशार कर दिया। उसी समय के दो विश्वयुद्धों के इतिहास को आप उठाकर देख लो चाहे वर्तमान में होने वाले युद्धों को देख सकते हैं। लेखक ने स्वयंनूभूति और स्वानुभूति की खाई को भरने का बेहतरीन प्रयास किया है। यही लेखक की उपलब्धि है।

नरेश कुमार हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं. 

1 thought on “‘1947’ उपन्यास पर समीक्षात्मक टिप्पणी – नरेश कुमार

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    admin says:

    भारत-विभाजन एशिया की ऐसी त्रासदी है जैसे कि यूरोप में द्वितीय विश्वयुद्ध। सांप्रदायिकता का दंश लोगों की संवेदना और मानवीयता लील जाता है।

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