कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा – अरुण कुमार कैहरबा


कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती और शहीद उधम सिंह के शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में स्वतंत्रता समता बंधुता मिशन भारत द्वारा कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक स्थलों की निकाली गई सत्यशोधक यात्रा की रिपोर्ट

हम जिस गांव-शहर में रहते हैं, उसे कितना जानते हैं? उस स्थान को प्रचारित कैसे किया जाता है? उसकी पहचान किन चीजों से बनी है? क्या जिस तरह से उसकी पहचान को प्रचारित किया गया है, वह वास्तविक है या मिथ्या। वह पहचान पूरी है या अधूरी। ऐसे बहुत से सवाल हमारे अपने स्थान के बारे में उस समय गूंजने लगे जब स्वतंत्रता समता बंधुता मिशन भारत द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन के अमर शहीद उधम सिंह की शहादत दिवस और कथा सम्राट प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष्य में कुरुक्षेत्र के कुछ महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा में हिस्सा लेने का मौका मिला। देस हरियाणा के संपादक प्रो. सुभाष चन्द्र के नेतृत्व में निकाली गई सत्यशोधक यात्रा में कुरुक्षेत्र ही नहीं प्रदेश भर के प्रबुद्ध नागरिकों, साहित्यकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। यात्रा के लिए कुरुक्षेत्र किरमच रोड़ पर स्थित पहली पातशाही गुरुद्वारा, बौद्ध विहार, गुरुद्वारा दसवीं पातशाही और शेखचिल्ली का मकबरा शामिल किए गए।
यात्रा सुबह साढ़े आठ बजे तब शुरू हो गई, जब विभिन्न स्थानों से आए हुए प्रबुद्ध नागरिक शहीद उधम सिंह की प्रतिमा के पास इकट्ठे हुए। यहां पर सभी ने शहीद उधम सिंह की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद उधम सिंह अमर रहे, उधम सिंह तेरे सपनों को मंजिल तक पहुंचाएंगे, इंकलाब जिंदाबाद, राम मोहम्मद सिंह आजाद अमर रहे सहित अनेक नारे लगाकर श्रद्धांजलि अर्पित की। यहां पर कार्यक्रम का संचालन धर्मेन्द्र फुले ने किया। मुख्य वक्ता के रूप में एडवोकेट रजविन्द्र चंदी ने आजादी के आंदोलन में क्रांतिकारी आंदोलन और शहीद उधम सिंह पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय की चुनौतियां आज मुंह बाए हुए हैं। डॉ. कृष्ण कुमार ने आज के समय की भागमभाग को चिह्नित करते हुए अपनी कविता सुनाई। यहां से यात्रियों का जत्था गुरुद्वारा पहली पातशाही के लिए रवाना हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. टीआर कुंडू ने की। संचालन डॉ. धर्मेन्द्र फुले ने किया।
किरमच मार्ग पर स्थित गुरुद्वारा पहली पातशाही अपनी ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है। यहां पर 1515 में कवि, समाज सुधारक एवं सिक्खों के पहले आध्यात्मिक गुरु नानक देव जी पधारे थे। भाई हरकिरण सिंह ने बताया कि गुुरु नानक देव जी यहां पहली उदासी के दौरान आए थे। वे सूर्य ग्रहण के अवसर पर यहां आए थे। सूर्य ग्रहण पर कुरुक्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग आते हैं। उस अवसर का गुरु नानक देव जी ने लोगों में वैज्ञानिक चेतना एवं जागरूकता फैलाने के लिए लाभ उठाया। उन्होंने लोगों को अंधविश्वास से निकालने के लिए लंगर तैयार करवाया और लोगों में सूर्य ग्रहण सहित किसी भी अवसर पर किसी भी तरह के अंधविश्वासों से मुक्ति पाने का आह्वान किया। गुरुद्वारे के सामने ही सत्यशोधक यात्रियों को संबोधित करते हुए डॉ. रविन्द्र गासो ने कहा कि गुरु नानक जी हमारे देश के क्रांतिकारी व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने अपने समाज की विसंगतियों की पहचान की। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर यात्राएं करके लोगों के साथ जनसंवाद किया और लोगों को कुरीतियों से निकालने का प्रयास किया। इस अवसर पर देस हरियाणा की सांस्कृतिक टीम से जुड़े संस्कृतिकर्मी अरुण कैहरबा, गुरदीप, विकास साल्यान, नरेश मीत, दयाल चंद व महिन्द्र खेड़ा सहित अनेक साथियों ने हरियाणवी चेतना गीत के जरिये लोगों में एकता का आह्वान किया। कार्यक्रम का संचालन देस हरियाणा टीम सदस्य विकास साल्यान ने किया।


यहां से यात्रियों का जत्था बौद्ध विहार के लिए रवाना हुआ। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के एक सिरे पर स्थित बौद्ध विहार को बहुत कम देखा और जाना गया है। यह ऐतिहासिक धरोहर साबित करती है कि कुरुक्षेत्र बौद्ध भूमि भी है। यहां पर मुख्य वक्ता के रूप में स्वतंत्रता समता बंधुता मिशन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि बौद्ध विहार में बौद्ध धर्म का संदेश देने के साथ ही प्रैक्टिस भी करवाई जाती थी। कुरुक्षेत्र में राजा हर्ष का टीला भी है। राजा हर्ष और उनके दरबार में लेखक बाण भट्ट भी बौद्ध थे। चीनी यात्री ह्यूनसांग यहां आए थे और उन्होंने यहां के बारे में लिखा भी है। ह्यूनसांग कुरुक्षेत्र के बौद्ध विहार के बाद यमुनानगर के चनेटी में गए थे, जहां पर बौद्ध स्तूप है। महात्मा बुद्ध के दर्शन और कार्य करने की पद्धतियों से समानता का संदेश गया। उनके जीवन ने करुणा और तार्किकता के विचार को पूरी दुनिया में फैलाया। किसी भी देश में चले जाएं, वहां चाहे भारत का और कुछ ना मिले, लेकिन बुद्ध जरूर मिल जाएंगे। बुद्ध चीन, जापान व कोरिया सहित जितने देशों में गए, वहां पर विज्ञान और तकनीक ने बहुत ज्यादा तरक्की की है। जब इस बात पर विचार करते हैं कि आखिर इन देशों में विज्ञान व तकनीक क्यों फली-फूली तो उसमें हमें बुद्ध की सोच साफ नजर आएगी। बुद्ध तार्किक तरीके से सोचते हैं। कार्य-कारण को समझ कर जीवन में अपनाते हैं। उन्होंने बताया कि महात्मा बुद्ध ने स्थापत्य और मूर्ति कला के विकास में अहम योगदान दिया है। बुद्ध की 300-400 तरह की मूर्तियां मिलती हैं। वे मूर्तियां देश में मूर्ति कला के विकास में अहम योगदान देती हैं। समाज के उस तबके को बुद्ध विचार ने अपनाया जिन्हें मनुष्य होने का दर्जा भी नहीं दिया गया था। उन्होंने कहा कि गुरु नानक और महात्मा बुद्ध दोनों ने पीडि़त व कमजोर लोगों के बीच जा-जाकर सच्चाई का रास्ता दिखाया और सम्मान दिलाया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. धर्मेन्द्र फुले ने किया।
इसके बाद हाथों में बैनर लिए हुए यात्री गीत गाते हुए गुरुद्वारा दसवीं पातशाही पहुंचे। यहां पर यात्रियों ने सिर नवाया और विश्व शांति की प्रार्थना की। गुरुद्वारा साहब में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय पंजाबी विभाग के अध्यक्ष डॉ. कुलदीप सिंह और भाई अवतार सिंह ने बताया कि दसवें गुरु गोबिन्द सिंह यहां पर आए थे। अन्य गुरु साहबों की तरह ही उन्होंने भी यहां पर अंधविश्वासों का पर्दाफाश किया। कुरुक्षेत्र में दस में से आठ गुरु और सात पातशाहियां आई हुई हैं। यहां पर सारी संगत ने चाय पान किया और आगे की यात्रा के लिए पैदल ही प्रस्थान किया।  
हाथों में बैनर लेकर फिर पैदल यात्रा शेख चिल्ली के मकबरे के लिए रवाना हुई। इस दौरान अरुण कैहरबा, दयाल चंद जास्ट, नरेश कुमार मीत, विकास साल्यान, राज कुमार जांगड़ा, अंजू, मोनी, प्रियंका, मनीषा, नीरू, स्वाति, गुरदीप भोंसले, सूरजभान बुटानखेड़ी आदि ने गीतों व नारों के जरिये लोगों को एकता व सामाजिक सद्भाव का संदेश दिया। शेख चिल्ली के मकबरे के  प्रांगण में डॉ. राम कुमार ने मध्यकालीन इतिहास पर विस्तृत व्याख्यान दिया। डॉ. सुभाष चन्द्र ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि सत्यशोधक यात्रा एक प्रयोग है। जहां हम रहते हैं, उस स्थान को जाकर जानने का। ऐसे प्रयोग अन्य स्थानों पर भी दोहराए जाएंगे। देस हरियाणा से जुड़े राज कुमार जांगड़ा ने कहा कि जल्द ही हिसार में भी सत्यशोधक यात्रा आयोजित की जाएगी। कार्यक्रम का समापन अरुण कैहरबा व दयाल जास्ट द्वारा गाए गए चेतना गीत- लड़ते हुए सिपाही का गीत बनो रे- के साथ हुआ। कार्यक्रम में नितिन ने अपनी कविता भी सुनाई।
इस मौके पर कवि डॉ. ओमप्रकाश करुणेश, सोनीपत से डॉ. इकबाल सिंह, डॉ. वीरेन्द्र नरवाल, डॉ. सुनील थुआ, करनाल जिला से आए महेन्द्र खेड़ा, नरेश कुमार मीत, मान सिंह चंदेल, धर्मवीर लठवाल, सुरेश नगली, सूरजभान बुटानखेड़ी, नीरू, सार्थक, गुरदीप भोंसले, योगेश शर्मा, गौरव, कपिल भारद्वाज, मंजीत भोला, बलजीत बटालवी, नरेश दहिया, अशोक चौहान, अमित कुमार, कृष्ण कुमार, तेलू राम व ईसरगढ़ से रामनरेश सहित अनेक साहित्यकारों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सक्रिय हिस्सेदारी की।

अरुण कुमार कैहरबा, हिन्दी प्राध्यापक, मो.नं.-9466220145

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