दो पंक्तियों के बीच एक सघन अर्थ की खोज – योगेश शर्मा

योगेश शर्मा

राजेश जोशी का काव्य संग्रह है ‘दो पंक्तियों के बीच’। इस काव्य संग्रह की पहली ही कविता भी इसी शीर्षक से है। यह कौन सी जगह है, किसकी जगह है और इस जगह के बारे में बात करना ही क्यों महत्वपूर्ण है ? कवि के काव्य कर्म को समझने के लिए ये जरूरी सवाल हैं।

राजेश जोशी को प्रायः “खांटी कम्युनिस्ट कवि” कहा जाता है। इसके पीछे एक कारण यह है कि बहुतेरे पाठकों को जोशी की आक्रामक और व्यवस्था विरोधी कविताएँ कंठस्थ हैं। राजेश जोशी महज उन कविताओं से ही नहीं बने हैं। उनका काव्यकर्म व्यापकता में फैला है। अर्थ की भूमि पर भी वो दूर तक पसरे हुए हैं। जिनकी मान्यता यह है कि राजेश जोशी की निर्मिति महज व्यवस्था विरोधी कविताओं से हुई है, वो इस तरह की अतिवादी उक्ति उछालें तो अधिक चिंता की बात नहीं।

हाल ही में बनास जन का राजेश जोशी पर एक अंक निकला है, “इसलिए राजेश, अंक 51” इस अंक को पढ़कर राजेश जोशी के साहित्यिक कर्म के प्रति एक सुलझी हुई समझ विकसित की जा सकती है। इसमें वरिष्ठ कवि अरुण कमल का एक लेख है “राजेश जोशी का महत्त्व” । इस लेख की खूबसूरती इस बात में निहित है कि एक कवि दुसरे कवि को एक सार्थक पूर्णता में समझने के लिए प्रयासरत नजर आता है वो पाठक को राजेश जोशी की कविताओं के पाठ के बाद उनके प्रति एक दृष्टि विकसित करने में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उनका मानना है कि- “राजेश जोशी इस तरह की सिर्फ सीधी कविता ही नहीं लिखते बल्कि वो यह भी जानते हैं कि ये व्यवस्था बहुत देर तक राजनीतिक शक्ति से लेकर हमारी रसोई तक, हमारे निजी सम्बन्धों तक फैली हुई है। जो लोग राजेश को सिर्फ ऊपर से पढ़कर रह जाते हैं और उसके भीतर की पाठ ध्वनियों को नहीं देखते वे उसकी विविधता और गहराई को नहीं समझ सकते। राजेश जोशी की एक किताब का नाम ही है ‘दो पंक्तियों के बीच” इसको लिखते हुए राजेश ने समूची कविता के बनने पर और कविता के होने पर भी विचार किया है।”1

अरुण कमल पाठक को संकेत कर रहे हैं कि राजेश जोशी का वितान प्रचलित मान्यताओं के मुकाबले बहुत अधिक है। राजेश जोशी के विस्तार को जानने के लिए पाठक को सतर्कता से उसके पाठ ध्वनियों का अनुगमन करने की जरूरत है। जाहिर है कि राजेश जोशी इस समूची कविता में जिस नेपथ्य- अर्थ’ की तरफ संकेत कर रहे हैं, अरुण कमल उसी ‘नेपथ्य- अर्थ’ को उसकी बहुस्तरीयता के सन्दर्भ में पाठ-ध्वनि कह रहे हैं। यहाँ अरुण कमल एक मंसूबा स्पष्ट होता है, वह हैं कविता में दो पंक्तियों के बीच के सघन अर्थ का बचाव। यह सघनता कवि की प्रासंगिकता और उसकी ‘रीच’ के लिए बहुत अनिवार्य है। मैनेजर पाण्डेय का एक लेख है ‘इस अकाल वेला में।’ इस लेख में उन्होंने एक बहुप्रचलित तथ्य की तरफ संकेत किया है- “यह जानी पहचानी बात है कि हर व्याख्या की एक राजनीति होती है, वह व्याख्या चाहे वेद की हो, उपनिषदों की, रामायण-महाभारत की कबीर तुलसी के पाठों की या फिर भारतीय संविधान की।”2 कवि होने के नाते शायद अरुण कमल व्याख्याओं के पीछे की राजनीति एवं कवि पर थोपी गई उस ‘खास किस्म की लोकप्रियता के खतरे से वाकिफ हैं। यह विशेष प्रकार की लोकप्रियता साठोत्तरी हिंदी कविता के स्तम्भ धूमिल पर भी थोपी गई थी जिसका परिणाम सर्वविदित है। इसी खतरे से बचने के लिए अरुण कमल का संकेत विशेषतौर पर ‘दो पंक्तियों के बीच’ की तरफ है।

हर अच्छी कविता प्रायः अपनी बुनावट में भी विशेष होती है। शब्द के आधार पर भी और अर्थ के आधार पर भी यह रचना इन दोनों आधार पर विशेष साबित होती है क्योंकि यह महज एक कविता भर नहीं बल्कि अर्थ की सघनता के पक्ष में एक शाश्वत दलील है। इस कविता को पढ़कर अंग्रेजी की एक प्रसिद्ध कहावत याद आती है- “Read between the lines।“ कहावत का आशय है कि अभिदार्थ की बजाय निहितार्थ तक पहुँचो। पंक्तियों के बीच में भी कुछ ना कुछ अवश्य चलता रहता है। पाठक की जिम्मेदारी है कि जो कहा नहीं गया, जिसकी और मात्र संकेत भर किया गया है, वह उसकी पड़ताल करे।

कोई बहुत गूढ़ बात सहजता से कही गई है, जो कवि का आजमाया हुआ तरीका है। सम्पूर्ण सम्प्रेषण के लिए कविता के शिल्प को जिस युक्ति से साधा है वह देखते ही बनता है। बार बार पाठ करने के बाद अर्थ की अंदरूनी सतह खुलती है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों मै कवि का उद्घोष है-

कविता की दो पंक्तियों के बीच में वह जगह हूँ
जो सूनी सूनी सी दिखती है हमेशा

यह कविता स्वयं उस जगह का बयान है जो कवि के लिए दो पंक्तिओं के बीच में है- भले ही यह हमेशा सूनी सूनी सी दिखती है लेकिन इसी अभिव्यक्ति में यह अन्तर्निहित है कि यह वास्तव में सूनी नहीं है। यदि इसका सूनापन एक भ्रम है तो फिर वास्तव में वहां है क्या? जाहिर है पंक्तियों के बीच में भी कुछ चल रहा है, कुछ इतना महत्वपूर्ण कि जिसको ज्यों का त्यों प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस सन्दर्भ में यह अप्रस्तुत है। इसकी प्रस्तुति के खतरों में निहित है कि यह किसी बड़े तिलिस्म की पोल खोलकर किसी मायावी का पर्दाफाश कर सकता है। कवि कवितागत तरीकों से बात कर रहा है। अगली पंक्तियाँ देखिए-

यहीं कवि को अदृश्य परछाई घूमती रहती हैं
अक्सर मैं कवि के ब्रह्मांड की एक गुप्त आकाशगंगा हूँ

कवि का ब्रह्माण्ड असल में उसकी प्रतिबद्धता में प्रतिबिंबित होता है। जोई-जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे यानि जो शरीर में है वही सब ब्रह्माण्ड में है शरीर का ही एक हिस्सा मन भी है। मन के बारे में प्रसिद्ध बात है कि इसके भी तीन हिस्से हैं। यह गुप्त आकाश गंगा उसी तरह दूसरा हिस्सा है जिससे प्रेरित होकर कवि कुछ कहता है। फ्रायड के शब्दों में इसे अवचेतन कहते हैं। कवि की असल प्रतिबद्धता के सूत्र यहीं मिलते हैं। राजेश जोशी अभिव्यक्ति में चतुराई बरतने की कला से वाकिफ हैं। हमेशा सब कुछ नहीं कहा जा सकता। प्रायः ऐसा बहुत कुछ होता है जिसे कहने के लिए कवि को एहतियात बरतनी पड़ती है। दुष्यंत कुमार का एक शेर है- “तिरा निज़ाम है सिल दे जबान-ए-शायर को ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए।” यह वो दौर था जब दुष्यंत कुमार ने एहतियात की बात की थी क्योंकि अर्थ तक पहुँचने की कुछ जिम्मेदारी तो प्रबुद्ध पाठक को भी उठानी होगी, और इस यात्रा में जोखिम निहित है- “कबीर यहु घर प्रेम का, खाला का घर नाँहि / सीस उतारै हाथि करि, सो पैठे घर माँहि।” पाठक सारी जिम्मेदारी की अपेक्षा रचनाकार से नहीं कर सकता। इसके लिए राजेश का कवि काव्यगत निष्पत्ति की प्रक्रिया में ही पाठक के साथ संवाद के सूत्र तैयार करता है। यह अभिव्यक्ति की चतुराई है कि वह पाठकों से इस जोखिम को उठाने की मांग कर रहा है और उनको तैयार भी आगे की पंक्तियों से यह और भी अधिक पुष्ट होता है-

जैसी दिखती हूँ
उतनी अकंपित उतनी निर्विकार-सी जगह नहीं हूँ
एक चुप हूँ जो आ जाती है बातचीत के बीच अचानक
तैरते रहते हैं जिसमें बातों के छूटे हुए टुकड़े
कई चोर गलियाँ निकलती है मेरी गलियों से
जो ले जा सकती हैं
सबसे छिपाकर रखी कवि की एक अज्ञात दुनिया तक
बेहद के इस अरण्य में कुलांचे मारती रहती हैं
कितनी ही अनजान-सी छवियाँ
शब्दों की ऊँची आड़ के बीच मैं एक खुला आसमान हूँ
कवि के मंसूबों के उकाब जहाँ भरते हैं लंबी उड़ान

राजेश जोशी संवादी कवि हैं। भाषा में वक्तृत्व कौशल है। वह कविता में दो पंक्तियों के बीच की जगह को मात्र कवितागत स्पेस नहीं मानते बल्कि आसानी से उसे (कविता को) एक बातचीत के रूप में स्थापित कर देते हैं पुनः कबीर याद आते हैं। ‘सुनो भई साधो’ । यह एक बढ़िया ट्रिक है क्योंकि यह अप्रस्तुत है। वो उस खाली जगह को एक चुप’ के रूप में देखते हैं। ये चुप वह ‘चुप्पी’ नहीं है जो आदमी को चुप्पा आदमी बनाती है (मदन कश्यप की कविता ‘चुप्पा आदमी के सन्दर्भ में)। राजेश जोशी जानते हैं इस चुप में व्यापक अर्थ के संकेत होते हैं। वो पाठक पर रचना को थोपते नहीं बल्कि उसको भावोत्पादन की प्रक्रिया में इन्वोल्व करके रखते हैं। बीच बीच में कवि कुछ रहस्यात्मक उक्तियों का प्रयोग करने से गुरेज़ नहीं करता जैसे ‘चोर गलियां और कवि की एक अज्ञात दुनिया। कवि जानता है कि रहस्यात्मक चीजें प्रायः दैनिक जीवन की नीरसता को तोड़ती हैं लेकिन वो इस युक्ति का एहतियातन प्रयोग काव्यगत नीरसता को तोड़ने के लिए करते हैं ताकि निहितार्थ तक पहुँचने में पाठक की दिलचस्पी भंग ना हो। राजेश जोशी जैसे बहुज्ञ कवि की अज्ञात दुनिया कोई तिलस्मी दुनिया नहीं है। इसके विपरीत वह महज कवि होने से अधिक एक सामान्य मनुष्य की दुनिया है। इस बात में भी कोई दो राय नहीं है कि राजेश जोशी की कविता इसलिए बड़ी है क्योंकि उसके समाजशास्त्रीय मूल्य अधिक व्यापक हैं लेकिन कवि की अज्ञात दुनिया प्रायः अनछुई ही रह जाती है जहाँ से कवि वास्तविक उर्जा प्राप्त करता है। इसी दुनिया से उसके कहन तथा मुहावरे की प्रामाणिकता का निर्धारण भी होता है।

उर्दू में कल्पना शक्ति के लिए ‘उड़ान’ शब्द का प्रयोग किया जाता है यथा, फलां कवि की उड़ान बढ़िया है। कवि ने समझदारी से ‘शब्दों’ को उड़ान के आगे आड़ के रूप में प्रस्तुत किया है। कविता की प्रासंगिकता पाठक वर्ग की समझदारी पर निर्भर है। अर्थ हमेशा समय और सन्दर्भ सापेक्ष होता है। शब्द उसे देशकालातीत नहीं बनाते बल्कि उसकी उड़ान बनाती है।

यहाँ कवि के मंसूबों के उकाब उड़ान भरते हैं। रसूल हमजातोव याद आ रहे हैं: “हवाई जहाज उड़ने से पहले देर तक शोर मचाता है, फिर सारा हवाई अड्डा लाँघकर उसे उड़ान भरने के मार्ग पर लाया जाता है, इसके बाद वह और भी जोर से शोर मचाता है, फिर खूब तेजी से दौड़ता है और यह सब करने के बाद ही उड़ता है। हेलीकाप्टर दौड़ तो नहीं लगाता, मगर जमीन से ऊपर उठने के पहले वह भी देर तक शोर मचाता है, गड़गड़ाता है और तनावपूर्ण कैंपकपाहट के साथ देर तक खूब काँपता है। केवल पहाड़ी उकाब ही चट्टान से एकबारगी आसमान में उड़ जाता है और आसानी से अधिकाधिक ऊपर चढ़ता हुआ छोटे-से बिंदु में बदल जाता है।”3 रसूल हमजातोव ने जिन अर्थों में उकाब का जिक्र किया है वह राजेश जोशी से भिन्न नहीं है। महान रूसी साहित्यकार हमजातोव भी अधिक शब्दों के शोर के प्रति लेखकों-पाठकों को चेता रहे हैं वहीं राजेश जोशी भी इसी खतरे की तरफ संकेत कर रहे हैं। वह रचनात्मक चौकसी के साथ मंसूबों, उकाब और उड़ान को एक पंक्ति में पिरोते हैं और वो भी उस कविता की जिसमें कवि की सारी मेहनत पाठक को छिपे हुए अर्थों तक पहुँचाने में लगी है। मंसूबों का अर्थ सता के विरोध के लिए रूढ़ लगा है, उकाब बिना शोर किए हुए ऊँचा उड़ता है और उड़ान कविता के अर्थों की व्यापक भूमि है जिस तक हर हालत में पहुँचना प्रत्येक प्रतिबद्ध पाठक की जिम्मेदारी है।

कविता के अंत में कवि उसी नाटकीय रहस्यात्मकता के साथ पाठकों को हिदायत देता है कि कविताओं का पाठ बिना किसी शोर शराबे के होना चाहिए-

यहाँ आने से पहले अपने जूते बाहर उतार कर आना
कि तुम्हारे पैरों की कोई आवाज़ न हो
एक जरा-सी बाहरी आवाज़ नष्ट कर देगी
मेरे पूरे जादुई तिलिस्म को।

यहाँ कविताओं के प्रति एक विशिष्ट आदर के भाव की दरकार है। भारतीय समाज में जूतों को प्रायः व्यक्ति की हैसियत के साथ जोड़कर देखा जाता है। परसाई और धूमिल यहाँ अनायास ही याद आते हैं जहाँ परसाई ने ‘प्रेमचंद के जूतों के माध्यम से दिखावे की प्रवृति की ओर संकेत किया था वहीं धूमिल ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा था कि- “मेरी नजर में हर आदमी एक जोड़ी जूता है।”4 यह पैरों की आवाज़ वह आवाज नहीं है जो चलते हुए आती है। यह पैरों की आवाज उसके जूतों की आवाज है, उसके वर्गीय पूर्वाग्रहों की आवाज है जिसको बाहर उतारे बिना कविता के मर्म को भेदा नहीं जा सकता। जिस बाहरी आवाज की तरफ कवि संकेत कर रहा है वो उसके पूर्वग्रह ही हैं। एक पूर्वग्रह पूरी कविता के अर्थ को गर्त तक लेकर जा सकता है। इससे बचाव आवश्यक है। कविताएँ आत्मसात होने की प्रक्रिया से गुजरनी चाहिए।

यह समय कविता में बहु-स्तरीय अर्थ सम्प्रेषण का समय है। ऐसे में कविताओं के अर्थ को सीमित करके नहीं अपितु भिन्न भिन्न आयामों में बरतने की जरूरत है। इस कविता में राजेश जोशी अपनी कविताओं की बाकि तमाम व्याख्याओं के समानांतर यह उद्घोष कर रहे हैं कि हर संभव निहितार्थ तक पहुँचो और इस संदर्भ में पाठक को शिक्षित करने के लिए वह अपने सर्वप्रचलित ‘सुसंगत तरीके’ से इस कविता को एक मुहिम की तरह हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं।

सन्दर्भ -
1. कमल, अरुण. राजेश जोशी का महत्व. नई दिल्ली: बनास जन, 2022
2.  पाण्डेय, मैनेजर. आलोचना में सहमति असहमति नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 2013
3. हमजातीय, रसूल. मेरा दागिस्तान. नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन, 2020
4. धूमिल, सुदामा पाण्डेय. संसद से सड़क तक नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन, 2009
साभार- बोहल शोध मंजूषा, अंक मई, 2023

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