14 जुलाई : बास्तीय डे – सुरेन्द्र पाल सिंह

उल्लेखनीय है कि यह दिन वामपंथ के उदय और विकास के इतिहास का भी दिन है। फ्रांस की क्रांति के बाद नेशनल असेम्बली में क्रांति के समर्थक बाईं ओर बैठते थे तो उन्हें (left wing) वामपंथी की संज्ञा मिल गई थी। खैर, यहां सवाल एक व्यक्तिविशेष और उसकी विचारधारा का नहीं है बल्कि पूरी दुनिया में इतिहास के एक बड़े परिवर्तन करने वाले अविस्मरणीय सामाजिक-राजनीतिक प्रस्फुटन को याद करने वाले विशेष मौके पर एक राष्ट्र के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल होने का है। एक राष्ट्र के नाते हमारे देश की आज़ादी की लड़ाई में टीपू सुल्तान का फ्रेंच रिपब्लिक का हिस्सा बनने का प्रकरण हो या क्रांतिकारी आंदोलन हो या भारत के संवैधानिक मूल्यों में फ्रेंच रिवोल्यूशन की एक अमिट छाप है।

क्या है बास्तीय डे:

14 जुलाई फ्रांस का नेशनल डे भी है। इस दिन सन 1789 में फ्रांस में एक ऐसी घटना घटी थी जिसने पूरी दुनिया मे एक भूचाल ला दिया था। इस घटना का एक रुचिकर संस्मरण सम्राट लुइस 16वें और घटना की सूचना देने वाले ड्यूक के बीच हुए सम्वाद से मिलता है:
सम्राट: यह तो बगावत है।
ड्यूक: नहीं सर्! यह क्रान्ति है।

तो, आइये, 14 जुलाई1789 के घटनाक्रम पर एक नज़र डाली जाए।

बास्तीय एक किला था जिसमें तरह तरह के कैदी रखे जाते थे। पेरिस के बाग बगीचों, सड़क चौराहों पर तृतीय वर्ग के लोग (परिवर्तन की वकालत करने वाली आम जनता) उत्तेजित होकर बहस कर रहे थे कि सम्राट अपनी रक्षा के लिए विदेशी सैनिक बुलवा रहा है। इस भीड़ ने घुम घुमकर हथियार इकट्ठा करना शुरू कर दिया। 14 जुलाई 1789 को इस उत्तेजित भीड़ को किसी ने बताया कि बास्तीय किले में बहुत से हथियार हैं। भीड़ किले की ओर चल पड़ी। किलेदार ने गोली चलाई, भीड़ की उत्तेजना बढ़ गई, और किले के रक्षक मार दिए गए। किले की ईंट से ईंट बजा दी गई और तमाम कैदियों को रिहा कर दिया गया। इसीके साथ पूरे फ्रांस में विद्रोह की आग फैल गई जो मुख्यतः सामंतों और उनके किलों पर हमलों के रूप में थी।

बास्तीय डे का पूर्वपक्ष:

फ्रांस में सत्ता सामंतों के हाथ में थी जो एक सम्राट के आधीन थे। 16वीं सदी में यूरोप में पूंजीवाद का जन्म हुआ। आर्थिक सत्ता तो पूंजीपति वर्ग के हाथों में आ गई लेकिन राजनीतिक सत्ता अभी भी सामन्तों के हाथ में थी। सम्राट लुइस 15वें द्वारा यूरोप के बड़े बड़े युद्धों में शामिल होने और शान ओ शौकत भरी जीवनशैली से फ्रांस का खज़ाना खाली हो गया था। सम्राट लुइस 16वें के वक़्त आर्थिक स्थिति और अधिक बिगड़ गई थी। उसकी पत्नी ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी अंतोनियो फ्रेंच भी नहीं जानती थी और बेहद विलासिता से जीने वाली थी। उसीने तो कहा था कि जनता को रोटी नहीं मिलती तो केक क्यों नहीं खा लेती।
समाज में तीन प्रकार के विभाजन थे- सामंत, पादरी और तृतीय वर्ग। पहले दो वर्गों को टैक्स से छूट थी। तीसरे वर्ग में किसान, कामगार, उदीयमान पूंजीपति थे जो तमाम तरह के टैक्स देते थे। लेकिन, उनकी स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक थियेटर में एक पूंजीपति टिकट लेकर नाटक देख रहा हो और एक सामंत या पादरी के आने पर उसे अपना स्थान छोड़ देना पड़ता था।

राजधानी में असंतोष, अविश्वास और षडयंत्र का माहौल था। जब समस्याएं नहीं सुलझ पा रही थी तो सम्राट को उस प्रतिनिधि सभा का अधिवेशन बुलाना पड़ा जो पिछले 175 वर्षों से निष्क्रिय थी। इससे जनता में उत्साह बढ़ा, चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई, लोगों ने अपने अपने मांगपत्र तैयार करने शुरू कर दिए।

तृतीय वर्ग ने घोषणा कर दी कि मत तीनों सदनों के मिलेजुले अधिवेशन में प्रतिनिधियों की संख्या के आधार पर लिए जाएं। ना नुकर करते हुए सम्राट को यह बात माननी पड़ी लेकिन वह अपने आप को असुरक्षित महसूस करने लगा। रानी अधिक घबरा गई। सामंत और पादरी देश छोड़कर भागने लगे। कुछ वर्ष पहले अमेरिकन क्रांति में ब्रिटेन के विरुद्ध क्रांतिकारियों के पक्ष में लड़ने गए फ्रांसीसी भी सक्रिय हो गए। और, इस सिलसिले का अंजाम था बास्तीय डे जब एक किले को नेस्तनाबूद करते हुए कैदियों को रिहा करके विद्रोह का एक बड़ा ऐलान कर दिया गया।

वैचारिक पक्ष: फ्रांस की क्रांति की जमीन तैयार करने कितने ही लेखकों और दार्शनिकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी जिनमें मुख्य थे:

वॉल्तेयर (1694-1778): फ्रांस में धार्मिक-राजनीतिक जकड़बंदी पर हमला करने वाला यह दार्शनिक और इतिहासकार अभिव्यक्ति की आज़ादी का मुखर पैरोकार था।
मॉन्तेस्क़यु (1685-1755): किसी भी राज्य में तीन शक्तियां- विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका का इस्तेमाल यदि एक व्यक्ति यानी राजा करे तो देश में विकास को बाधित करने वाला दमघोंटू तन्त्र पैदा हो जाता है।
रूसो (1712-1778): सामान्य इच्छा ही सार्वभौम इच्छा है। मनुष्य प्रकृत्या स्वतंत्र है परंतु हर जगह जंजीरों में जकड़ा हुआ है (मैन इज बोर्न फ्री बट एवरीव्हेर ही इज इन चेन्स)।
दिदरो (1713-1784): दुनिया का पहला इनसाइक्लोपीडिया लिखने वाले दिदरो ने ज्ञान की विभिन्न शाखाओं पर जानकारी संकलित करते हुए प्रबोधन काल की नई व्याख्याएं शामिल की। फ्रांस की सरकार ने इसपर प्रतिबंध लगाकर इसकी प्रतियां जलानी शुरू करदी थी।

बास्तीय डे के बाद: सारे फ्रांस में उथलपुथल मच गई।सामंत और पादरी फ्रांस छोड़कर भागने लगे। प्रतिनिधि सभा ने उनके विशेषाधिकारों को खत्म करते हुए तमाम नागरिकों पर टैक्स लागू करने का कानून बना दिया। सामन्तों की ज़मीन पर किसानों ने कब्जा करना शुरू कर दिया।

17 अगस्त 1789 को दुनिया के इतिहास में पहली बार मानव अधिकारों की घोषणा की गई। पादरियों के विशेषधिकार समाप्त होने के बाद वे राज्य के कर्मचारी हो गए। इतिहास का पहला लिखित संविधान जारी हुआ।
सम्राट लुइस 16वें को रानी मैरी अंतोनियो के साथ भागते हुए सीमा पर पकड़ लिया गया। इन दोनों को कुछ सामन्तों के साथ देश के साथ विश्वासघात के आरोप में सामान्य अपराधियों की तरह गिलोतिन के हवाले कर दिया गया।
क्रांतिविरोधियों को सजा देने के लिए एक क्रांतिकारी ट्रिब्यूनल बनाया गया। जैकोबिन और जैरौंदिन समूहों ने कितने ही लोगों को शक के आधार पर गिलोतिन पर लटका दिया। अराजकता के इस माहौल में नेशनल कन्वेंशन ने एक सामूहिक नेतृत्व की व्यवस्था की जिसमें डायरेक्टरी के नाम से पांच डायरेक्टर द्वारा बारी बारी से अध्यक्षता करनी थी।

इसी दौरान विदेशी सेना फ्रांस में घुसने लगी। नेपोलियन ने कमांडर का काम संभाला। इटली के अभियान में उसने फ्रांस से विदेशी सेना को खदेड़ा और फ्रांस की सीमा का राइन नदी तक विस्तार कर लिया। डायरेक्टरी को हटाकर सत्ता अपने कब्ज़े में लेकर सन 1804 में जनमत संग्रह के द्वारा फ्रांस का सम्राट बन गया। सन 1815 में वाटरलू की लड़ाई में यूरोप की सामूहिक सेना के सामने हार का मुंह देखना पड़ा। इस दौर में पुरातन सामंती व्यवस्था को लागू करने का प्रयास किया गया लेकिन सन 1830 और सन 1848 की दो और क्रांतियों ने अन्ततः फ्रांस में पूंजीवादी व्यवस्था को स्थायी रूप दे दिया गया।
और, अन्त में: अनेक देशों में क्रांतियां हुई लेकिन उनका सबब स्थायी रूप नहीं ले पाया। सवाल उठता है क्रांति मंजिल है या रास्ता? मानव समाज लगातार परिवर्तनशील है इसलिए क्रांति भी सतत है। नए परिवर्तन के लिए, नए लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए असफल या अधूरी क्रांतियों को आगे बढ़ाने के लिए भौतिक परिवर्तन और परिवर्तनकामी चेतना का संयोग इतिहासनिर्माण की प्रक्रिया का अटूट अंग है।

फ्रेंच रिवोल्यूशन के तीन मूल्य – स्वतंत्रता, समानता और बन्धुता आज भी पूरी मानव जाति के सामने बड़े चैलेन्ज हैं। इन मूल्यों को हासिल करने के लिए फ्रांसीसी जनता ने इतिहास के पटल पर जो छाप छोड़ी है वह एक लंबे समय तक परिवर्तनकामी शक्तियों के लिए एक प्रेरणास्रोत रहेगी।


सुरेन्द्र पाल सिंह
सम्पर्क – 9872890401 

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