समाज और धर्म के नाम पर- भदंत आनंद कौसल्यायन

जो बात जितनी आसान मालूम होती है, वह प्रायः उतनी ही कठिन होती है। दिन भर ‘समाज’ और ‘धर्म’ की चर्चा करते रहना आसान है, किन्तु यह बताना आसान नहीं है कि ‘समाज’ किसे कहते हैं और ‘धर्म’ किसे?

यूँ कहना चाहें तो कह सकते हैं कि वृक्षों के समूह का नाम ‘जंगल’ है और व्यक्तियों के समूह का नाम ‘समाज’, किन्तु ऐसा लगता है कि ‘समाज’, इतना ही कुछ नहीं है, इससे कुछ अधिक है। क्या अधिक? यही तो आसानी से बताया नहीं जा सकता।

और ‘धर्म?’ सामान्य तौर पर कह सकते हैं कि ‘समाज’ के लिए हितकर नियमों का नाम ‘धर्म’ है। क्या धर्म इतना ही है? नहीं? इससे बहुत अधिक। समाज की तो कदाचित कुछ परिभाषा हो भी जाए, धर्म की तो हो ही नहीं सकती। ‘रहस्यवादी’ कवि की कविता की तरह ‘धर्म’ न किसी की समझ में आता है और न पकड़ में।

सुविधा के लिए ‘धर्म’ के दो भेद क्यों न कर लें? एक ‘चिंतन’, दूसरा ‘आचरण’। दोनों व्यक्तिगत और समाजगत हो सकते हैं। चिंतन अपेक्षाकृत व्यक्ति-परख है और आचरण समाज-परख।

धर्म के नाम पर जो चिंतन आज बाजार में बिकता है, वह कई प्रकार का है। कुछ तो आत्मा-परमात्मा संबंधी है। यदि आप बाजार से दवा की कोई ऐसी बोतल अपने किसी रोगी संबंधी के लिए ले आए हों जिसके ऊपर दवाई का लेबल तो लगा हो, परन्तु अन्दर कुछ न हो तो आपके घरवाले आपको क्या कहेंगे? मैं समझता हूँ मूर्ख। महान् आश्चर्य है कि आत्मा-परमात्मा की उलझनों में रहने वाले दार्शनिक कहलाते हैं, पंडित कहलाते हैं।

एक बार सिंहल में एक बालक को मैं संस्कृत की एक किताब पढ़ाने लगा। उसमें आरम्भ में ही मंगलाचरण अर्थात् ईश्वर स्तुति थी। लड़के ने पूछा- “ईश्वर क्या?” “ अब क्या बताऊँ, ईश्वर क्या है?” उसने पूछा- ब्रझा? मैंने कहा, उसके चार मुँह होते हैं। वह बोला-विष्णु? मैंने कहा नहीं, वे समुद्र में शेषनाग पर शयन करते हैं। वह बोला महेश? मैंने कहा उसके गले में साँपों की माला होती है। तब वह थोड़ा खीजकर बोला- तो ईश्वर क्या? अब क्या बताऊँ कि ईश्वर क्या है? मैंने कहा-

“पग बिन चले, सुने बिन काना’
कर बिन करम करे विधि नाना।”

उसके पाँव नहीं हैं किन्तु वह चलता है, उसके कान नहीं हैं किन्तु वह सुनता है, उसके हाथ नहीं हैं, किन्तु वह नाना प्रकार के कर्म करता है- वह ईश्वर है।

है न इस बोतल में शून्यवाद ही शून्यवाद। कई स्थानों से इस प्रकार की खाली बोतल बेची जाती हैं बड़ी सस्ती। लोग यह देखते ही नहीं कि वे किसी भी भाव महँगी हैं, क्योंकि अन्दर से एकदम खाली हैं।

एक बार किसी ने पूछा- “स्वामी जी, साकार और निराकार में क्या अन्तर है?” मैंने कहा- “भाई! पहले लोगों ने ‘साकार’ ईश्वर की कल्पना की। किसी ने कहा- ईश्वर साकार नहीं, निराकार है। तब से दिखाने के संकट से सदा के लिए छुट्टी मिल गई।”

धर्म के नाम पर जो इतनी भयानक चीजें बाजार में बिकती हैं, वे हैं स्वर्ग- नरक की कल्पनाएँ। स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं को भयानक कहने जाकर मैंने प्रकारांतर से ‘ईश्वर’ को भी भयानक कह दिया। यह शायद अच्छा नहीं हुआ। किन्तु जरा इस अन्यायपूर्ण दुःख, दारिद्रमय संसार को देखिये। और तब देखिये लोगों की इस मान्यता को, इसे ‘ईश्वर’ ने बनाया और साथ-साथ इस मान्यता को भी कि वह कल्पनामय है, न्यायी है।

ईश्वर की कल्पना की अपेक्षा स्वर्ग-नरक की कल्पनाओं की जो बड़ी विशेषता है, वह यह कि स्वर्ग-नरक निराकार कल्पनाएँ नहीं हैं। बाजार में आपको किसी देश का बड़ा नक्शा लेना हो तो दुकानें खोजनी पड़ें, किन्तु यह स्वर्ग-नरक के नक्शे आप चाहे सड़क पर बैठे दुकानदारों से ले लीजिए-खास जर्मनी के बने हुए। आदमी का बच्चा कहीं आरे से चीरा जा रहा है, कहीं कोल्हू में पेरा जा रहा है।

आप कहेंगे कि ऐसे चित्र भले ही झूठे हैं, किन्तु उन्हें देखकर लोग ‘पाप’ करने से डरते हैं। क्या आप किसी एक भी चोर बाजार के व्यापारी का नाम बता सकते हैं, जो इन चीजों को देखकर ब्लैक मार्केट करने से बाज आया हो? यदि नहीं, तो ये चित्र आखिर किसके लिए हैं?

धर्म की दुकान पर तीसरा तैयार माल है- पुरोहित शाही। वकील मुकदमे हराता या जिताता है। इन भगवान् के वकीलों का अधिकार, इन पुरोहितों का अधिकार इससे कहीं बढ़कर है। वे चाहें तो आपको स्वर्ग पहुँचा सकते हैं और चाहें तो नरक का भी सीधा द्वार दिखा सकते हैं।

एक लड़के की मुसीबत याद आ गई। सुनिये! कोई और वैसा आदमी न होने से वह लड़का अपने घर के किसी बड़े-बूढ़े की अर्थी के फूल हरिद्वार, गंगा जी में डालने चला। ‘फूलों’ का जमीन में रखना मना है। उसने एक पेड़ पर टाँग दिये। स्वयं नीचे सो रहा। आँखें खुलीं तो क्या देखता है कि फूल नदारद। हो सकता है कि खाने की कोई चीज समझ कुत्ता उन्हें उठा ले गया हो। और यह भी हो सकता है कि साथ में बँधे एक-दो पैसे के लालच से उन्हें कोई खोल ही ले गया हो।
किन्तु लड़का अब क्या करे? गंगा जी जाये तो क्यों जाए और न जाये तो कैसे न जाए? आखिर घर के लोगों की भावनाओं का ख्याल कर उसने झूठ-मूठ गंगा को जाना तय किया। मन तो भारी था ही, शरीर भी भारी हो गया। जैसे-तैसे वह गंगा पहुँचा। वहाँ रास्ते में एक साथी मुसाफिर को अपनी बात सुनाई। मुसाफिर बोला “कोई चिन्ता नहीं।” वह उस लड़के के साथ-साथ गंगा तट पर आया। वहाँ पहुँचकर बोला- “मैं पण्डा हूँ। मैं तुम्हारा सब इंतजाम कर देता हूँ।” उसने लड़के के दोनों हाथों को बालू से भर दिया और कहा कि कल्पना करो कि यही फूल हैं। लड़के ने श्रद्धा से आँखें बन्द कर लीं।

पण्डे ने पूछा, “अब बताओ, दक्षिणा क्या दोगे?” लड़के ने इधर-उधर देखा। इस प्रकार की मेहनत की मजदूरी पाँच पैसे भी दी जा रही थी। लड़का अपराधी था। उसने दस पैसे देना स्वीकार किया। पण्डा बोला “ढाई रुपये से कम न लूंगा।” लड़के की स्थिति ढाई आने से अधिक दे सकने की नहीं थी। न मानसिक न आर्थिक। पण्डा बोला- “तो बच्चे खड़े रहो।” उस दिन भगवान के दरबार का वह वकील उस लड़के को मानसिक दास्य की लोह श्रृंखला में बाँधकर गंगा के प्रवाह में अकेला छोड़ आया।

लड़के को मार्मिक वेदना हुई। किन्तु उसके हृदय में सच्चा धर्म था। धर्म ने उसकी रक्षा कर ली। उसने आँखें बन्द करके बड़ी श्रद्धा से कहा- जय गंगा माई की। और हाथ धोकर बाहर निकल आया। अब पण्डा फिर उसके पीछे लगा जो ही राम, सो ही राम। लड़का बोला ” अब पैसे किस बात के? मैंने अपना काम आप किया है।’

यूँ आज के ‘गीदड़ों’ की तरह तीर्थ स्थानों पर पण्डों का भी उपयोग है ही, किन्तु मुसीबत तो यह है कि जिसका बाप पुरोहित उसका बेटा भी पुरोहित ही। कुशल इतनी है कि देश की यह बीमारी केवल पुरोहितशाही तक ही सीमित है। यदि रेलवे ड्राइवरों और रेलवे गार्डों के भी कहीं यह आवश्यक हो जाए कि उनके बाद उनका पुत्र भी रेलवे गार्ड और रेलवे ड्राइवर होना ही चाहिए, तब तो आपकी रेलें चल चुकीं।

नरक स्वर्ग की सड़क निरुपयोगी जीवन की गाड़ी हो, पुरोहित ड्राइवर हो और पुरोहित ही गार्ड हो, तो जितनी चाहो उतनी लम्बी निरर्थक यात्रा हो ही सकती है।

धर्म ‘चिंतन’ के क्षेत्र से उतरकर जब आवरण का रूप धारण करता है, तो समाज रचना उसका आवश्यक अंग बन जाता है। आर्थिक दृष्टि से तो आज का समाज दो वर्गों के अखाड़े के अतिरिक्त और कुछ नहीं, किन्तु धार्मिक दृष्टि से वह है ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का समूह। उनमें अछूत कहे जाने वाले की गिनती इसलिए नहीं की गई, क्योंकि वे इस चारदिवारी के बाहर के हैं। गाँधी जी ने हमारी इस वर्ण-व्यवस्था को पड़ी हुई लकीर कहा है। यह पड़ी हुई लकीर नहीं। यह धर्म के सहारे खड़ी हुई सीढ़ी है। इसका सबसे नीचे का सिरा कथित शूद्र है और ऊपर का ब्राह्मण। कहा जाता है कि कथित शूद्र का काम है वैश्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण सबकी सेवा करना। क्षत्रिय का काम है वैश्य और शूद्र से सेवा लेना तथा ब्राह्मण की सेवा करना और ब्राह्मण का काम है सबसे सेवा लेना और किसी की सेवा न करना। यह अव्यवस्था, जिसे वर्ण-व्यवस्था का नाम दिया गया है। यदि इसे ‘धर्म’ का सहारा न हो, तो क्या यह दो घड़ी भी रह सकती है?

और छ: सात करोड़ लोगों को ‘अछूत’ मानना! वे ‘अछूत’ ही पैदा हों, ‘अछूत’ ही जिएं और अछूत’ ही मर जाएँ उन्हें दुनिया में कोई चीज पवित्र न कर सके। क्या यह ‘धर्म’ ही की कृपा नहीं? ऐसा क्यों? इसके दो कारण हैं, एक तो यह है कि दुनिया में शक्तिशाली की इच्छा का नाम ही ‘न्याय’ है, धर्म का एक बड़ा हिस्सा वर्ग विशेष की इच्छाओं की ही छाया मात्र है।

और दूसरा कारण यह है कि एक समय समाज हित के विचार से जो नियम बनाये जाते हैं या जिन्हें स्वीकार किया जाता है। कालान्तर में वे निरुपयोगी ही नहीं समाज हित के बाधक बन जाते हैं।

और वह ‘धर्म’ ही क्या, जो बदलते हुए समाज के साथ-साथ स्वेच्छा से बदलता रहे। यदि धर्म में यह सामर्थ्य होती, तो मानव इतिहास में इतनी क्रान्ति ही क्यों होती? धर्म का काम है धारण करना, पकड़े रहना। यह काम धर्म का नहीं कि वह निरंतर ‘प्रगतिशील’ हो। यह उसका स्वभाव ही नहीं है।

‘धर्म’ और ‘समाज’ के नाम पर आदमी जब ‘समाज’ का इतना कल्याण होते देखता है, तब स्वभावतः प्रश्न उठता है कि क्या किया जाए? कुछ लोगों का मत है कि झूठे ‘धर्म’ का खण्डन और सच्चे ‘धर्म’ का प्रचार किया जाए, किन्तु कुछ लोग धर्म मात्र के खण्डन के पक्षपाती हैं।

‘सत्य’, ‘अहिंसा’ आदि धर्म के जो दस लक्षण हैं, वह आज सभी की जिह्वा पर है। धर्म प्रचार कोई सिगरेट अथवा सिनेमा नहीं है, जो कि चीखने-चिल्लाने से हो सके। ‘सत्य’ बोलना एक चीज है और ‘सत्य’ का प्रचार करना बिल्कुल ही दूसरी चीज। पहला काम किसी माई के लाल का है और दूसरा तो हर आदमी, जिसकी जीविका का साधन ‘धर्म’ प्रचार है, कर ही सकता है। किन्तु कोई माई का लाल भी आज के समाज में क्या खाकर सत्य बोलेगा? ‘विश्वास न हो तो ‘सत्य’ बोलकर देखिए, कैसी बेहिसाब की पड़ती है। इस ‘सत्य’ बोलने ही से न जाने कितनों को जहर के प्याले पिलाये गए, न जाने कितनों को फाँसी के तख्तों पर झुलाया गया और न जाने कितने आज भी जेलों में पड़े सड़ रहे हैं।

तब क्या धर्म मात्र का खण्डन किया जाए? नहीं, धर्म का खण्डन करने से भी धर्म जिद ही पकड़ता है। धर्म-प्रचार से जिन लोगों की स्वार्थ सिद्धि होती है वे आपके मुकाबले पर एक-से-एक कर बुद्धिमान् व्यभिचारी को लाकर खड़ा कर सकते हैं। आप धर्म खण्डन करके उनसे पार नहीं पा सकते। तब उपाय केवल एक है और वह है वैज्ञानिक ढंग से सभी धर्मों का स्वाध्याय-अध्ययन। शायद आप कहें कि मैं आजकल होने वाले सर्वधर्म सम्मेलनों का बड़ा पक्षपाती हूँ। बिल्कुल नहीं।

लोग कहते हैं, सर्वधर्म-सम्मेलनों से शान्ति होगी। उस दिन कानपुर के घसिहारों की मण्डी देखी थी। सभी एक जगह बैठकर अपनी-अपनी घास बेच रहे थे। हल्ला इतना था कि कान फटे जा रहे थे। सभी धर्म वाले एक जगह इकट्ठे होकर अपने धर्म की नीलामी बोलने लगें, तो क्या इससे कहीं कुछ शान्ति हो सकती है?

मेरी समझ में दो बातें कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं; एक तो, अब यह ‘अपने’ और ‘पराये’ धर्म का भेद मिट जाना चाहिए। मानव ने सृष्टि के आदि काल से जितने धर्मों को जाना-पहचाना है, उन सब धर्मों पर हर मानव बच्चे का अधिकार है। उसे जो बात जहाँ से अच्छी मिले, वहाँ से लेने और तदनुसार चलने का अधिकार होना चाहिए। दूसरे ज्ञान के क्षेत्र में यह ‘धार्मिक’ और ‘लौकिक’ का मिथ्या वर्गीकरण उठ जाना चाहिए। या तो सभी ज्ञान धार्मिक हैं या सभी ज्ञान लौकिक हैं। यदि धार्मिक ज्ञान की किताब कहती है कि जमीन चपटी है और लौकिक ज्ञान की बात कहती है कि गोल है, तो दोनों कथनों में जो सत्य लगे, तो उसे ग्रहण करना हर किसी का ‘धर्म’ होना चाहिए। सभी जगह से ज्ञानार्जन और सभी मनुष्यों के प्रति मैत्री यही आज के मानव का ‘धर्म’ है। इसके अतिरिक्त धर्म दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता।

“सब्बे सत्ता सुखी होंतु “
(सभी प्राणी सुखी हों!)

(आकाशवाणी नागपुर के सौजन्य से)

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