वक्ता में हों इतिहासकार, दार्शनिक, वकील व पत्रकार के गुण: प्रो. सुभाष सैनी

स्वतंत्रता-समानता-बंधुता मिशन, भारत ने आयोजित की एक दिवसीय कार्यशाला

पहले सत्र का शुभारंभ प्रोफेसर सुभाष सैनी के वक्तव्य से हुआ । प्रो. सैनी ने मिशन के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए जनसंवाद के महत्व को बताया । उन्होंने कहा, ‘स्थानीय स्तर पर कार्य कर रहे जन संगठनों को निरंतर बौद्धिक इनपुट की जरूरत होती है । पहले से काम कर रहे संगठनों को सम्मान देना, उनके काम को आगे बढ़ाने, एक राष्ट्रीय संगठन से जोड़ना और उनका समन्वय करना हमारे मिशन का उद्देश्य है ।’

प्रो. सुभाष ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि जनसंवाद और आपसी संवाद में फर्क होता है । जनसंवाद के लिए हमारी आत्मगत तैयारी क्या हो? श्रोता की क्या अपेक्षा है? श्रोताओं में बहुत कम पढ़े लिखे, ज्यादा पढ़े लिखे हो सकते हैं, उनमें संस्कृति का फर्क हो सकता है । ऐसे मिश्रित समूह से कैसे संवाद किया जाए यह चुनौतीपूर्ण है । जनसंवादक के पास एक इतिहासकार की दृष्टि होनी चाहिए । इतिहासकार चीजों को संदर्भ देता है । विषय को इतिहास व वर्तमान से जोड़ता है । ऐतिहासिक शक्तियों के अंतरविरोधों, टकराहटों, संघर्षों और स्वार्थों पर ध्यान देता है और उन्हें उजागर करता है । जनसंवादक श्रोताओं को एक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य देता है, भविष्य में संभावानाओं का संकेत करता है । छोटे-छोटे अनुभवों को एक विचार के साथ जोड़ता है । जनसंवादक के पास दार्शनिक की नजर है तो वह लोगों की आशंकाओं व जिज्ञासाओं को शांत कर पाएगा । जनसंवादक में वकील के गुण होने चाहिए । वकील पक्ष और विपक्ष दोनों को ध्यान में रखता है और मुकदमा बनाता है । विषय के पक्ष और विपक्ष में तर्कों व तथ्यों की सूची बनाएं । इससे अपना पक्ष मजबूत होता है, अपनी कमजोरी, विरोधाभास समझ आते हैं । जनसंवादक के पास एक साहित्यकार की तरह संवेदनशीलता व भावना के स्तर पर दिल छू लेने वाली भाषा होनी चाहिए । जनसंवादक में पत्रकार की तरह विवरण देने, रिपोर्ट करते हुए विश्लेषण करने की क्षमता होनी चाहिए । जनसंवादक में एक धर्मगुरू या नेता के गुण हो । जो अपने संवाद में एक नैतिक संबल, हिलिंग टच दे सके । कोई उसकी मदद करने वाला है यह भरोसा दिला सके । अपने विषय को संप्रेषित करने के लिए जनसंवादक अनेक उदाहरण देता है, वे जन जीवन से जुड़े हों और उनकी प्रकृति ऐसी हो जिसके प्रति सब की श्रद्धा हो, जो सबको एक स्तर पर ले आए, जैसे प्रकृति, बच्चे आदि । इनके उदाहरण होंगे तो बात जल्दी समझने व सब को स्वीकार करने में सुविधा होगी ।

अपने वक्तव्य में प्रो. सुभाष ने उन बातों का भी जिक्र किया जिनसे एक जनसंवादक को बचना चाहिए । उन्होंने कहा, ‘भ्रमित करने वाले जनसंवादक दो असमान श्रेणियों में तुलना करते हैं । प्राकृतिक प्रक्रियाओं को सामाजिक संरचनाओं के साथ जोड़ देते हैं और इसमें ही लोग फंस जाते हैं । जैसे कि समाज में गैर-बराबरी का औचित्य ठहराने के लिए वे कहेंगे कि – हाथ की पाँच उंगलियां बराबर नहीं होती— सुनने में ये सब को ठीक लगेगा । लेकिन सबके हाथों में पाँच उंगलियां होती है, सबके दो-दो हाथ हैं – ये बराबरी है । इसको चिह्नित करने की जरूरत है । इस तुलना-पद्धति को पहचानने की जरूरत है । सही-गलत की हमारी कसौटी क्या होगी – स्वतंत्रता, समानता, बंधुता, न्याय और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र ।’‘

जैसे गांधी का जंतर – जो अंतिम व्यक्ति के हित में है वह सही, उचित व नैतिक है । ऐसे ही समाज सुधारकों, शहीदों, महापुरुषों से कुछ चीजें लें और कसौटी बना लें । हर विषय व विचार को उपरोक्त कसौटियों पर कस कर देखना चाहिए । जनसंवादक को व्यक्तियों के उदाहरण देने, हिंसक, भेदभावपूर्ण, किसी समूह-वर्ग की आस्था-भावना पर ठेस पहुंचाने वाले, बदले की भावना व आक्रोश की शब्दावली का प्रयोग नहीं करना चाहिए । ऐसी एक बात, एक वाक्य, एक शब्द समस्त संवाद का प्रभाव समाप्त कर सकता है । अच्छे जनसंवादक का लक्षण है कि वह अपने श्रोताओं में आशा जगाए । संवाद हंसी-व्यंग्य हो जिससे जीवन में आशा जगे । भय का महिमामंडन न करें, श्रोताओं में भय न फैलाएं । हमारे संबोधन में आशा रहनी चाहिए ।’‘

कम्युनिकेशन के सिद्धांतों में भी यही बात है कि एक बोलने वाला है, दूसरा सुनने वाला है, उनके बीच में एक संदेश है, यह संदेश किसी माध्यम के जरिए बोलने वाले से सुनने वाले तक जाता है । माध्यम की वजह से वह संदेश कितना सही पहुंचता है और उसका क्या प्रभाव पड़ता है । श्रोता और वक्ता के बीच जो संदेश है उसमें बाधाओं को दूर करने के लिए शब्द चयन, भाव-भंगिमाएं, विषयानुकूल आवाज का उतार-चढ़ाव, श्रोताओं की मनःस्थिति आदि अनेक बातें हैं, जिनका ध्यान रखना जरूरी है । बहुत सुस्त व उदासीन श्रोताओं में भी कुछ श्रोता जरूर होते हैं जो आपको ध्यान से सुन रहे हैं । उनको चिह्नित करो और उनको केंद्रित करके संवाद करने से वक्ता की ऊर्जा बनी रह सकती है ।’

अपने संबोधन में टी आर कुंडू ने संवाद में संदर्भ की प्रांसगिकता पर प्रकाश डाला । उन्होंने कहा कि श्रोता और वक्ता के बीच में संदेश में कई बार कम्युनिकेशन लोस हो जाता है । जो कहना चाह रहे हैं उसमें वैचारिक स्पष्टता हो । हर चीज का कोई संदर्भ होता है । प्रसंग होता है । संदर्भ बदलने के साथ कई बार अर्थ भी बदल जाते हैं । उसकी रिलेवेंस हो, उसके अनुरूप हो । हमारे सांस्कृतिक व्यक्तित्वों नानक, कबीर आदि के जरिए बातें कहने से असर पड़ता है । वर्बल लैंग्वेज व बाडी लैंग्वेज के बीच समन्वय होना चाहिए । कहने और शरीर के अंदर मेल हो । बाडी लैंग्वेज में आँखों और हाथ का सबसे अधिक प्रयोग होता है । आँखों में आँख डाल कर बैठना चाहिए । वैचारिक स्पष्टता होगी तो वक्ता लेक्चर स्टैंड से भी आगे हो जाता है ।

सुरेंदर पाल ने संवाद में भाषा की विनम्रता विषय को केंद्र रख अपनी बात रखी । उन्होंने कहा, ‘कम्युनिकेशन के दो प्रकार हैं– बोल कर, लिख कर । हम किस परिवेश में बात कर रहे हैं । अगर हम उसको नहीं देख पाए तो वह सही तरीके से नहीं पहुँच पाएगी । परिवेश के प्रति संवेदना होनी चाहिए । हर चीज की प्रतिक्रिया, आलोचना करना, उसकी भाषा सख्त करना – यह ठीक नहीं है । सोशल मीडिया पर खासतौर से- इस से हम बात नहीं कर पाते, सही संदेश नहीं जा पाता । जाँचना चाहिए कि आपकी शब्दावली क्या है । संदेश प्रभावी हो इसके लिए जरूरी है कि वह जनमानस से जुड़ा होना चाहिए ।’

जयपाल ने प्रतिभागियों को संवाद के लक्ष्यों को निर्धारित करने की बात कही । उनका कहना है कि पहले यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि स्वतंत्रता-समानता-बंधुता को स्थापित करने के लिए क्या करना चाहते हैं, क्यों करना चाहते हैं, हमारा अपना मकसद क्या है । सवाल ये है कि आप का सामाजिक अनुभव क्या है, समाज से कितने जुड़े हैं, कितना अध्ययन किया है । यह सब सामाजिक सरोकार है – स्वतंत्रता-समानता-बंधुता । इस पर स्पष्टता व प्रतिबद्धता जरूरी है ।

अरुण कैहरबा के वक्तव्य के केंद्र में श्रोताओं के अनुभव व परिवेश रहे । कैहरबा के अनुसार, ‘समाज में बहुत विविधता होती है । इसके मद्देनजर बात रखनी चाहिए । उस गांव की तासीर क्या है, राजनीतिक रूझान क्या है । लोग कितने सक्रिय हैं, कैसे रिएक्ट करते हैं, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है । हम समूह का अनुमान लगाते हैं । लेकिन कंटेट के बेसिक बिंदू क्या हो – यह तय करने से पहले उपरोक्त आंकलन करना चाहिए । संवाद में रचनात्मकता जरूरी है । रिपिटेशन से बचने की जरूरत है । पूर्व वक्ताओं ने क्या, किन बिंदुओं पर फोकस किया है । नयापन क्या-क्या हो सकता है । क्या-क्या क्रिएटिविटी समाहित कर सकता है । भाषा के जरिए क्या जुड़ाव महसूस कर सकता है । विनम्रता अंदाज क्या-क्या हो । संबोधन में आक्रामकता और भयांक्रातता नहीं, बल्कि उत्साह पैदा करना, आशा का संचार पैदा करना, खुद भी उत्साहित होना यह बहुत महत्वपूर्ण है ।’

अविनाश सैनी ने मिशन के लक्ष्यों को ध्यान में रखकर जनसंवाद करने की बात कही । उन्होंने कहा कि मुझे लगता है हमारा काम है पक्ष का निर्माण । इस पर हमारा ज्यादा ध्यान होना चाहिए । दो-तीन तरह के लोग होंगे, धुर-विरोधी और धुर-पक्ष वाले । यहां हम एक विचार से सहमत हैं । बड़ी संख्या है जो हाशिये पर हैं – हमारा लक्ष्य हाशिये वाले हों, जो अपना पक्ष नहीं चुन पाए । सहजता सबसे जरूरी चीज है । शब्दों पर बहुत ज्यादा जोर देने से कृत्रिमता आ जाती है । सच के नजदीक ही बात करनी चाहिए । हर चीज में स्थानीयता बहुत जरूरी है । संदर्भ बहुत विशिष्ट होने चाहिए । आत्मविश्वास हो, लेकिन अति आत्मविश्वास नहीं होना चाहिए ।’

सैनी ने जनसंवाद के दौरान श्रोताओं को जोड़ने की बात पर जोर देते हुए कहा कि लोगों को कुछ नहीं पता यह नहीं समझना चाहिए । ‘तुम’ की जगह ‘हम’ का इस्तेमाल होना चाहिए । खुद को उसमें शामिल करना चाहिए । अनुभव सुनाएं, ज्ञान नहीं । निराशा नहीं फैलानी चाहिए । तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता आदि दोषारोपण से बचना चाहिए । अपनी-अपनी परिस्थितियों में वह क्या कर रहे हैं उस पर भरोसा करना चाहिए । लोगों की बातों को तव्वजो देना जरूरी है । ध्यान खींचने वाले शब्द हमारे पास हों, जिससे चीज जुड़ जाए, चाहे एक लाइन की हो । अपनी मां बोली के ज्यादा से ज्यादा शब्दों का इस्तेमाल करना चाहिए ।

अंजु ने संवाद के दौरान आने वाली सामान्य बाधाओं पर बात की । उन्होंने कहा कि विषय से भटकें नहीं इससे दिशा बदल जाती है । इसका ध्यान रखा जाना चाहिए । किसी प्रश्न से प्रभावित होकर विषय न बदलें । कई बार बहुत कठिन शब्दों का इस्तेमाल होता है । कई तरह के सुनने वाले होते हैं । ऐसे में हमारा भाव उस तक नहीं पहुंचता ।

तेलूराम ने स्थानीयता की महत्ता से जुड़े अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा क्या है । हमारा टार्गेट क्या है, उसको आगे रखना चाहिए । स्थानीय समस्याओं पर स्थानीय लोगों के साथ बातचीत करना ।

नरेश दहिया ने कम समय में अपना संदेश प्रेषित करने की बात बखूबी रखी । उन्होंने कहा कि कई लोग माईक पकड़ू होते हैं । सारी बात को खत्म कर देते हैं । ज्यादा समय न लें । जिस विषय पर बोल रहे हैं उस को जीना चाहिए – अगर उसको जीओगे तो उसको दूसरों के सामने व्यक्त कर पाओगे ।

विरेंद्र गन्नौर ने क्षेत्रीय बोलियों को संवाद में शामिल करने की बात जोर रखा और कहा कि जन समूह को संबोधित करते समय – वह जन समूह कैसा है, उसकी भाषा क्या है व उसकी माँ बोली के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए । वक्ता की भाषा महत्वपूर्ण है । अलग-अलग धर्म, वर्ण, जाति के लोग जुड़े होते हैं उसको कट करना नहीं चाहिए, हमारे अंदर सब के लिए जगह होनी चाहिए ।

नरेश सैनी ने मिशन के सदस्यों से वक्तव्य के समय को लेकर प्रश्न किया । इसपर राजकुमार जांगडा ने कहा कि 20 मिनट में विषय को समेटना चाहिए । उन्होंने कहा कि झूठ का सहारा न लेकर सत्य-तथ्य बताए जाने चाहिए । भाषा और आवाज का ध्यान रखना चाहिए । एक टोन न हो । उतार-चढ़ाव होना चाहिए । अगर जरूरत पड़े तो मूवमेंट करते हुए बात करें । आँखों में आँखें डालकर बात करना, अलग-अलग लोगों को देखकर बात करनी चाहिए ।

धीरज टोहना ने कहा कि वक्ता को अच्छा श्रोता होना चाहिए । एक्टिव लिशनिंग होनी चाहिए । अगर वह अच्छा सुनेगा तो बोलेगा भी अच्छा । जब बोलते हैं तो उसका माहौल बनाना चाहिए । कुछ जयकारे से शुरू करते हैं, कुछ और तरीके अपनाते हैं । आपकी बाडी लैंग्वेज क्या है, इसका भी ध्यान रखना चाहिए ।

गीता पाल ने भाषा व परिवेश के महत्व पर बात की । उन्होंने कहा कि भाषा बहुत महत्वपूर्ण है । परिवेश के हिसाब से बात करनी चाहिए । केवल भाषण देने से काम नहीं चलेगा, लोगों से कनेक्ट करने की बात है । लोगों के बीच में जाना होगा । इसके लिए केवल भाषण देना जरूरी नहीं है । भाषण से पहले व भाषण के बाद बैठने की, चाय पीने की, किसे कैसे मिल सकते हैं यह समझ होनी चाहिए ।

विकास ने कहा कि इंटरेश्टिंग बनाकर बात करनी चाहिए । लोक भाषा के मुहावरे, लोकोक्तियां होनी चाहिए । महापुरुषों के उद्धरण होने चाहिए । अपने विषय से भटकाव ना हो । सतनाम ने कहा कि जनसंवाद में श्रोताओं की उम्र, समय, स्थान व अवसर का महत्व है, उसे नजरअंदाज न करें ।

अभिषेक व सोनिया ने एक अच्छे श्रोता के गुणों पर प्रकाश डाला ।

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