डॉ. सेवा सिंह

संत रैदास : वाणी और मानव-मुक्ति – डॉ. सेवा सिंह

रविदास की मानव मुक्ति में न पौराणिक स्वर्गारोहण है और न ही किसी अदृश्य लोक में बैकुण्ठ वास। इस मुक्ति में कोई दुरूह ब्रह्म विद्या ज्ञान भी नहीं है। वे अपनी वाणी में अपने परिवेश की समस्याओं का आत्मनिष्ठरूप प्रतिपादित करते हुए व्यक्ति को एक उच्चभावपूर्ण स्थिति में ले जाना चाहते हैं जिसमें उसके समस्त बन्धनों का अस्तित्व बना नहीं रह सकता। (लेख से)

डॉ. सेवा सिंह

संत रविदास की वाणी में मानव मुक्ति की चिन्ता सर्वोपरि है। उनकी यह प्रतिश्रुति मानवीय दुःख से सीधे-सीधे जुड़ी हुई है। भारतीय परम्परा में गौतम बुद्ध के बाद, इस दीर्घावधि में इन सन्तों ने ही मनुष्य की त्रासदी को गहराई से अनुभव करते हुए मुक्ति के सरोकारों पर ध्यान केन्द्रित किया, यद्यपि उनके सरोकार भावात्मक ही हो सकते थे।

बुद्ध को चारों ओर साधारण जन दुख और पीड़ा के सागर में उतरते दिखाई दे रहे थे, उन्होंने बताया – जन्म दुख है, वृद्धावस्था दुःख है, रुग्णावस्था दुःख है, मृत्यु दुःख है, अप्रिय जन के साथ मिलन दुःख है, प्रिय जन से विछोह दुःख है, अभीष्ट की प्राप्ति न होना दुःख है। दुःख की उत्पत्ति के सम्बन्ध में बुद्ध का कहना था कि यह अस्तित्व में आने की तृष्णा है जिससे मनुष्य बार-बार जन्म लेता है और साथ ही लालसा और इच्छा चलती है, जिसकी तुष्टि का प्रयत्न किया जाता है : सुख भोगने की तृष्णा, अस्तित्व में आने की तृष्णा, सत्ता तथा वैभव की तृष्णा ।

गौतम बुद्ध राज्य सत्ताओं के उद्भव के तहत गणों के समानता, बन्धुत्व और लोकतन्त्रीय मूल्यों के विनाश में जनजातीय जन की पीड़ा का एक तत्व मीमांसीय समाधान प्रस्तुत कर रहे थे। यदि गणों की उत्पादन पद्धति का वर्गीय उत्पादन पद्धति में रूपान्तरण रोका नहीं जा सकता था, पर बुद्ध अपनी जनजातियों के गणों के नरसंहार की वेदना से मुक्त नहीं हो सकते थे। तत्वमीमांसीय आदर्श देते हुए भी वे मूलतः समाजशास्त्रीय थे और गहरे रूप में मानवीय त्रासदी से जुड़े हुए थे।

देखने की बात है कि गौतम बुद्ध से दो हजार वर्ष बाद भक्ति आन्दोलन को, एक मूलतः भिन्न परिवेश में समाजशास्त्रीय दृष्टि से इसी प्रकार की मानव मुक्ति की चिन्ता से रूबरू होना पड़ा। लक्ष्य किया जा सकता है कि बुद्ध के सामने जनजातियों से राज्यों के रूपान्तरण का एक भविष्य भी था, शायद इसलिए वे गणों की आदिम साम्यवादी जीवन पद्धति के अनुरूप अपने संघों का ढांचा खड़ा करते हुए, नये उदीयमान वर्गों से अपने सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखने के लिए बाध्य थे। इसी प्रकार औपनिवेशिक भारत में नवोदित पूंजीवादी शक्तियों के रूप में नव्यवेदान्ती पुनर्जागरण के सम्मुख एक द्वन्द्वात्मक विकासशील स्थिति की संभावना थी। इसके विपरीत सन्तों के पास ऐसी संभवनाओं की कोई पूर्व कल्पना नहीं थी, इसलिए उनकी अनुभूतियां अधिक भावनापूर्ण और अभिव्यक्तियां अधिक रहस्यपूर्ण थीं। सन्तों के सम्मुख अन्धकारपूर्ण जटिलता के परिवेश में जड़ बना दिया गया मुनष्य था। एक ओर पतनोन्मुख सामन्तीय भयानक शोषणपरक बेगारी तथा बन्द इकाइयों वाली अर्थ व्यवस्था, अस्पृश्यता और शूद्रों पर आरोपित अनेक अमानवीय अशक्ततायें थीं, तो दूसरी ओर थी तुर्कों अफगानों के आक्रमणों के बाद एक विजातीय शासन व्यवस्था ।

सन्तों से बहुत पहले ही यथार्थपरक तर्क विर्तक का स्थान शास्त्रीय ग्रन्थों के प्रति आस्था ने ग्रहण कर लिया था। तर्क धार्मिक ग्रन्थों की सीमा में रहकर ही किया जा सकता था। मौलिक चिन्तन का कोई अर्थ नहीं था। इस पृष्ठभूमि में एक ईमानदारना सरोकार यही हो सकता था कि शास्त्रीय धार्मिक ग्रन्थों की आधिकारिक सत्ता तथा वर्ण विषमता को चुनौती देते हुए मात्र मानवीय अनुभवों के बल पर बात की जाय, जिसे सन्तों ने बखूबी अन्जाम दिया।

एक तार्किक प्रक्रिया के भीतर से गुजरने की स्थिति में न होते हुए भी उन्होंने एक अत्यन्त भावनामूलक भूमि पर मानवीय दुःखों को अपनी अनुभूतियों का अभिन्न अंग बना दिया कि उनके ये प्रयत्न शाश्वत रूप से पीड़ित मानवता की धरोहर बन सके।

जैसा कि संत रविदास ने बताया कि यह शरीर घास की टट्टी की भांति देखते ही देखते जलकर राख हो जाता है। वे देख रहे थे कि किस प्रकार मृत्यु की भयानक विभीषिका से सारा जगत ग्रस्त है। सगे-सम्बन्धी, मृत्यु के बाद तुरन्त मृतक देह को घर से बाहर निकालने में जुट जाते हैं। पत्नी का कंठहार पुरुष पति पल भर में भूत सा भयावना प्रतीत होने लगता है :

इहु तनु जैसे घास की टाटी।
जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी।।
भाई बंधु कुटंब सहेरा ओइ भी लागे काढु सवेरा 
घर की नारि उरहि तन लागी, उह तउ भूत भूत करि भागी।।  (गु. प्र. पू. 794 )

संत रविदास ने जीवन को मिट्टी का पुतला कहते हुए इसकी सांसारिक गतिविधियों को हस्यास्पाद बताया। ‘उपलब्धियों पर यह अभिमान करता है और हानि हो जाने पर यह रोने लगता है’:

माटी को पुतरा कैसे नचतु है।
देखे सुनै बोलै दउरियो फिरतु है ।। 
जब कछु पावै तब गर्व करतु है, 
माइया गई तब रोवन लगतु है ।।

संत रविदास कहते हैं ‘इस माया ने सारे संसार को ग्रस्त कर लिया है, देवता, मनुष्य तथा ऋषि-मुनि सब को इसने भ्रम में डाल दिया है। बालक, वृद्ध और युवा सब माया के ही भिन्न-भिन्न वेष हैं। रविदास अपने चारों ओर देख रहे थे कि योगी, मुनि-तपस्वी, संन्यासी, कोई आदि भी इस तृष्णा से बच नहीं पापा। यहां तक कि समग्र ब्रह्माण्ड और सृष्टिकर्ता विष्णु भी इसी के वशीभूत हैं। रविदास का मानना था कि मूलतः माया रूपी तृष्णा के कारण ही चहुं ओर अशान्ति का प्रसार हो रहा है। वे देख रहे थे कि लूट के, धन के अम्बार छोड़कर व्यक्ति को अन्त में खाली हाथ ही जाना पड़ता है। रागात्मक सम्बन्धों का सारा संसार मृत्यु के बाद बेमानी हो जाता है’। संत रविदास का कथन था-

जत देखउ तत दुख की रासी। (गु. ग्र., पृ. 710)

जीवन अस्तित्व से उनका अभिप्राय था-मानव देह हाड़-मांस और नाड़ियों का पिंजर है, जल की दीवार, हवा रूपी खंभे और रक्त वीर्य रूपी गारे जे बनी है।

जल की भीति पवन का खंभा, रक्त बूंद का गारा। 
हाड़ मांस नाड़ी को पिंजरू, पंखी बसै विचारा ।। ( गु. ग्र., पृ. 659 )

रविदास इस संसार की दुखमयता को भली प्रकार समझ रहे थे। जगत के रागात्मक सम्बन्ध इस दुख के मूल कारण हैं। उनका कथन था कि शरीर के इस कच्चे गढ़ में काम, क्रोध, लोभ, मोह और अंहकार के चोर लगे हुए हैं अर्थात् व्यक्ति के उत्थान में सांसारिक वृत्तियां सबसे बड़ी बाधा हैं। (वाणी 170)

एक अन्य स्थल पर उन्होंने बताया है कि व्यक्ति विषय वासनाओं में लिप्त होकर संशय और भ्रम में पड़ा रहता है :

ताको जनम अकारथ कहिए ।।
विषयन रतु संसार भ्रमु अटक्यौ,  भंवर फंद महुं रहिए ।। (वाणी 165)

रविदास जीवन-जगत् के सम्बन्धों की त्रासदी का बड़े गहरे में अनुभव कर रहे थे किस प्रकार धन, स्त्री, पुत्र, पिता और माता- ये सभी जिनके प्रति हम आसक्ति में डूबे रहते हैं, मृत्यु के बाद उन सम्बन्धों का कोई अस्तित्व नहीं रहता। जिस तरह वृक्ष से टूटा हुआ पत्ता फिर वृक्ष से कभी नहीं जुड़ सकता, उसी तरह एक बार बिछुड़ने के बाद इन सभी से फिर मिलन संभव नहीं-

ऐ सबु संगी दिवस च्यार के, 
धन दारा सुत पित मात रे। 
बिछुरे मिलन बहुरि नहह्वै हो, 
ज्यौं तरवर छिन पात रे।। (वाणी 67)

कितनी हृदय विदारक बात है कि दिन बीतते जा रहे हैं। सभी को एक दिन यहां से जाना ही होगा। प्रतिदिन अपने संगी साथियों को जाते हुए हम देख रहे हैं। मृत्यु का साया सदैव मंडराया करता है।

जो दिन आवहि सो दिन जाही करना कूचु रहनु थिर नांही। 
संगु चलत है हम भी चलना, दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना।। (गु. प्र., पृ. 794) 

जिस देह पर हम इतना अभिमान करते हैं, हाड़ मांस से अधिक उसका अस्तित्व नहीं है, उसमें थूक, तार और विष्टा की सड़ांध है, यह देह अत्न्तोगत्वा जलकर राख हो जाती है (वाणी 148) । कुएं में पड़े हुए मेंढक की भांति, विषय वासनाओं में लिप्त होने के कारण उसे कुछ सूझता नहीं।(गु. प्र. पृ. 346)

जीवत जगत की इस दारुण वास्तविकता तक पहुंचने में रविदास को अपने परिवेश के त्रासक अन्तर्विरोधों के भीतर से होकर गुजरना पड़ा था। रविदास चमार थे जो इस देश में ऐसी अभागी जाति है जो दीर्घकाल से अत्यन्त हीन और कमीनी मानी जाती रही है। अत्रिस्मृति तथा वेदव्यास स्मृति में अन्त्यज नाम से उल्लिखित जिन “अपवित्र” जातियों का उल्लेख हुआ है चमार उनमें वर्तमान हैं। सन् 1935 ई. के “गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एकट” के अधीन निकाले गए “आर्डर इन कौंसिल” में नौ भागों में विभक्त सूची दी गयी है जिसमें भारत के विभिन्न प्रान्तों की अछूत माने जाने वाली 429 जातियों में से केवल तीन नट, रजक और चमार ऐसी हैं जो उभय सामान्य हैं किन्तु कांउसिल आदेश के अनुसार नट और रजक देश के कुछ ही हिस्सों में अछूत माने जाते हैं जबकि चमार सारे भारत में अछूत माने जाते हैं। सन्त रविदास इसी चमार जाति में उत्पन्न हुए थे उनके एक पद से स्पष्ट है कि उनके वंशज मृत पशुओं को उठाने का और चमड़े आदि का व्यापार या पेशा करते थे। वे स्वयं जूते गांठने का काम किया करते थे।

समाजशास्त्रीय अध्ययनों में यह मानी हुई बाती है कि भारत के ब्राह्मणीय ग्रन्थों में शुद्रों पर और विशेष रूप से अस्पृश्य मानी गयी जातियों पर अशक्तताओं को लादे जाने का निरन्तर क्रम जारी रहा है। इस प्रकार के विपुल साहित्य को देखते हुए इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है कि इनका व्यवहार में प्रचलन रहा होगा। शतपथ ब्राह्मण में कहा है, शूद्र असत्य है, शूद्र श्रम है, एक दीक्षित व्यक्ति को शुद्र से भाषण नहीं करना चाहिए। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि शुद्र दूसरों से अनुशासित होता है, वह किसी की आज्ञा पर उठता है उसे कभी भी पीटा जा सकता है। मनु तथा अन्य आचार्यों के अनुसार, “शूद्र अपने स्वामी द्वारा छोड़े गये पुराने वस्त्र, छाता, चप्पलें, चटाईयां आदि प्रयोग में लाता था, स्वामी द्वारा छोड़ा गया जूठा भोजन करता था।”

शूद्रों के लिए वेदाध्ययन मना था ही, उनके समीप भी वेदाध्ययन का निषेध था। यदि शूद्र जान बूझकर स्मरण करने के लिए वेद पाठ सुने तो स्मृतियों का आदेश था कि उनके कानों को सीसा और लाख से भर देना चाहिए। शूद्रों के लिए कड़े दंड का विधान था। किसी ब्राह्मण की भर्त्सना या गाली-गलौच करने पर शूद्र को शारीरिक दण्ड दिया जाता था या उसकी जीभ काट ली जाती थी, किन्तु इस अपराध के लिए क्षत्रिय या वैश्य को सौ या एक सौ पचास कार्षापण का ही दण्ड दिया जाता था। शूद्र जीवन क्षुद्र समझा जाता था। याज्ञवल्क्य एवं मनु ने स्त्री, शूद्र, वैश्य और क्षत्रिय को मार डालना उपपातक माना है किन्तु इसके लिए जो प्रायश्चित एवं दान की व्यवस्था बताई गई है, उससे स्पष्ट है कि शुद्र का जीवन नगण्य था। आपस्तंब ने तो यहां तक कहा है कि शूद्र को मार डालने पर इतना ही पातक है जितना कि एक कौआ, गिरगिट, मोर चक्रवाह, मेंढक, नेवला, छछुदर, कुत्ता आदि निष्कृट कोटि के जीवों को मार डालने से होता है। शूद्रों का स्पर्श हो जाने पर स्नान, प्राणायाम, तप आदि प्रक्रियाओं से ही शुद्ध हुआ जा सकता था।

वस्तुतः स्मृतियों का समाजशास्त्र समाज को दो वर्गों में विभाजित किया था, एक ओर समाज के तीन वर्ग थे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, दूसरी ओर शूद्र । प्रथम तीन वर्णों को “द्विज” कोटि में रखा गया। द्विज का अर्थ है दो बार जन्म लेने वाला दूसरी बार पैदा होने का अर्थ था-उपनयन संस्कार। इस संस्कार के विशेषाधिकार के कारण ही ये समाज के विशिष्ट व्यक्ति थे। मनुस्मृति में कहा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन वर्ण द्विजाति हैं, और चौथा एक वर्ग शुद्ध है। लहसुन, प्याज आदि खाने पर शूद्र को कोई पातक नहीं होता क्योंकि उसका उपनयनादि संस्कार नहीं होता। उपनयन संस्कार से रहित शूद्रों के सम्बन्ध में धर्मशास्त्रों में बड़े विस्तार से चर्चा की गई है। एक श्रुति वाक्य है (विधाता ने) गायत्री (छन्द) से ब्राह्मण की रचना की, जिष्टुप छंद से राजन्य (क्षत्रिय) को, जगती (छन्द) से वैश्य को निर्मित किया है किन्तु शुद्र को किसी भी छंद से निर्मित नहीं किया गया, इसलिए शुद्ध संस्कार के अयोग्य है। अतः संस्कार तथा उपनयन से वंचित होने के कारण शूद्र को ब्रह्मविद्या काअधिकार नहीं दिया गया है। जैसा कि शंकराचार्य ने ब्रह्म सूत्र भाष्य में एक स्थल पर बताया है “शूद्र को ब्रह्मविद्या का अधिकार नहीं है, क्योंकि जिसने वेद का अध्ययन किया है, तथा जो वेद के अर्थ को जानता है, वही वेद-विषयक चर्चा कर सकता है।” अभिप्राय यह है कि उपनयन संस्कार के तिना ब्रह्मविद्या प्राप्त नहीं की जा सकती और शुद्ध उपनयन का अधिकारी नहीं हो सकता, और ब्रह्मविद्या से वंचित होने पर भारत की ब्राह्मणीय परम्परा का मोक्षादर्श उपलब्ध नहीं किया जा सकता। और वैसे भी शूद्रों की मानवीय मुक्ति विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के शुद्रों की जानलेवा लूट से वंचित होने में थी जो प्रभुत्वपूर्ण वर्ग के पक्ष में नहीं हो सकती थी। अतः धर्मशास्त्र के प्रणेताओं के अनुसार शूद्रों के लिए मोक्ष का प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि सृष्टिकर्ता ने उनकी सृष्टि केवल इसलिए की है कि वे विशेषाधिकार प्राप्त मुट्ठी भर लोगों की सेवा करें।

इस बात की पर्याप्त साक्षियां हैं कि मध्यकाल में उत्तरोत्तर इस वर्गीय विषमता का कसाव बढ़ता गया है। कारणों की गहरायी में न जाते हुए संक्षेप में कहा जा सकता है कि

गुप्त साम्राज्य के बाद की पांच सदियों में किसान और शिल्पी जमीन से इस तरह बांध दिये गये थे जैसा पहले कभी नहीं हुआ था क्योंकि अब जमीन तो सीधे पुरोहितों, मन्दिरों, सरदारों, सामन्तों और राज्यधिकारियों के नियन्त्रण में थी, और सर्वसत्ता सम्पन्न स्वामिवर्ग ने वैसी ही व्यवस्था कायम की जो उसकी स्वार्थसिद्धि के लिए सर्वाधिक उपयुक्त थी । भूमिधर मध्यवर्ती लोगों की राजनीतिक शक्ति तथा आर्थिक शक्ति जितनी सुदृढ़ इस काल में हुई इतनी पहले किसी काल में नहीं हुई थी।

पूर्व मध्यकाल की सामन्ती व्यवस्था में किसानों के पास गुजर बसर के बाद जो कुछ भी बच जाता था उसे श्रीमन्त वर्ग उनकी भूमि पर अपने उच्चतर अधिकारों के बल पर हड़प लेता था और यह वसूली वस्तुतः जिंसों के रूप में की जाती थी। इसके अलावा उनके शरीरों पर भी ऐसे ही अधिपत्य रखने के कारण वह उनसे बेगार लिया करता था। यह सब हमें न तो ईस्वी सन् की प्रारम्भिक सदियों से पूर्व न तुर्कों की भारत विजय के बाद किसी बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है।

तुर्कों के आने पर यहां स्थितियों में सुधार आना शुरू हुआ क्योंकि मुसलमानों ने यहां फिर से नकद अदायगी का चलन बड़े पैमाने पर शुरू कर दिया था जिससे किसानों पर भूमिधर मध्यवर्ती लोगों का प्रत्यक्ष नियन्त्रण ढीला पड़ गया।

लक्ष्य किया जा सकता है कि तुर्क शासन के पहले ही 11-12वीं शताब्दी में सामन्तीय ढांचे में दरारें पड़ने लगी थीं। जिसे इतिहास में “हिन्दू-काल” कहा जाता हैं, उस काल के अन्तिम दिनों में उत्तर भारत में कतिपय नयी आर्थिक शक्तियों का उदय हुआ और उसके परिणाम स्वरूप आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था, मुद्रा के चलन में अभाव और किसानों के शोषण की नींव पर आधारित पुरातन सामन्तवाद की जड़ें हिलने लगीं। मुद्रा के प्रसार के कारण नकद अदायगी सुलभ होने से शहरों और बाजारों का विकास हुआ है। विदेशी व्यापार के विकास के अनेक प्रमाण मिले हैं। शायद इसका कारण मध्यभारत में ईख, रूई, और सण जैसी व्यापारिक और नकद आय देने वाली फसलों की खेती का व्यापक प्रसार था। प्रो. रामशरण ने बताया है कि मध्यकाल में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मालवा और गुजरात में जो हम सिक्के का चलन फिर से आरम्भ होते देखते हैं उसका सम्बन्ध विशेषकर पश्चिमी भारत में वाणिज्य व्यापार की प्रगति से जोड़ा जा सकता है। इस काल के विदेशी व्यापार का सम्बन्ध मध्य एशिया से था। अरब व्यापारियों का आगमन दक्षिण भारत में राष्ट्रकूटों (759-973 ई.) के शासन काल में प्रारंभ हो गया था। दक्षिण भारत के अधिकांश नगरों में मुसलमानों को आवासीय भवन, गोदाम, मस्जिद, कब्रगाह आदि के लिए भूखण्ड आवंटित किए गए। मुहम्मद-बिन-कासिम की सिंघ विजय के साथ उत्तर से भी मुसलमान व्यापारियों का आगमन हुआ। 12वीं शताब्दी में गजनी की अव्यवस्थित शासन व्यवस्था ने भी शायद अप्रवास को उत्साहित किया हो, जिनमें अनेक सूफी सन्तों का भारत में प्रवेश हुआ, जिनमें शेख अली हजवेरी सबसे उल्लेखनीय तथा महत्वपूर्ण दरवेश था। पंजाब की ओर से ये आप्रवासी मध्यप्रदेशों की ओर बढ़ते गये। विदेशी तथा आन्तरिक व्यापार के साथ-साथ एक प्रकार का सांस्कृतिक आदान-प्रदान स्वाभाविक था, जिसमें शेख बहाउद्दीन जकरिया ( 1192 ई.) जैसे सूफी अपना योगदान दे रहे थे। शेख जकरिया के पूर्वज तीन पीढ़ियों से भारत में रह रहे ये तुर्क-अफगान शासन के दौरान हिन्दुओं के दैनिक सम्याचार और सांस्कृतिक जीवन पद्धति में गुणात्मक परिवर्तन हो गये थे । राजपूतों की सत्ता के बाद ब्राह्मण वर्ग संरक्षण रहित हो गया था। अपने ज्योतिष ज्ञान के कारण ब्राह्मणों के कतिपय अफगान अमीरों से संरक्षण मिलने की सूचनायें हैं। वे विभिन्न उत्सवों तथा कर्मकाण्डों की सम्पन्नता के लिए पारिवारिक पुरोहित हो गये थे। वे मन्दिरों की देखभाल और पाठशालाओं में अध्यापन करने लगे थे। अनेक ब्राह्मणों को गैर पुरोहिती धन्धों, व्यापार, साहूकारा, कृषि या अन्य निम्नस्तरीय कार्यों के लिए विवश होना पड़ा।

डॉ. जे. एस. ग्रेवाल ने अपने अध्ययनों में दिखाया है कि युद्धों तथा संघर्षों की अपेक्षा तुर्की अफगानों के महत्वपूर्ण शासकीय प्रबन्ध तथा सिंचाई की सुविधाओं के कारण लोगों के जीवन पर गहरा दीर्घकालीन प्रभाव पड़ा ।15वीं-14वीं शताब्दी में दिल्ली के सुलतानों ने बहुत बड़ी सिंचाई की योजनाएं चालू कीं। फीरोजशाह तुगलक ने अनेक दो-दो सौ मील लम्बी नहरें बनवायीं। इससे पूर्व तुर्क विजयों के साथ भारत में नयी औद्योगिकी के प्रवेश ने कृषि उत्पादन को गति प्रदान की। तुर्कों के शासनकाल में भारत में वस्त्र उद्योग, कागज, चुम्बकीय कुतबनुमा समयसूचक उपकरण तथा घुड़सवार सेना ने व्यापारिक गतिविधियों को तेज किया। इससे सम्बन्धों में भी परिवर्तन हुआ होगा। नयी तकनीक में कुशल कारीगर प्राप्त करने की ललक ने व्यक्तिगत नौकरी लागू करने को प्रोत्साहित किया होगा। कागज के प्रचलन से अखिल भारतीय बाजार के विकास में मदद मिली होगी।

इस प्रकार के समाजार्थिक परिवर्तनों में शोषित शिल्पी और किसान के लिए मुक्ति की संभावनाओं का यथार्थ आभास पैदा किया। यद्यपि यह आभास अनुभव के धरातल पर अधिक था, वास्तविक रूप से कम । क्योंकि पूर्वमध्यकाल के शोषण की विकरालता से मुक्त होने के बाद अब उन्हें नये उदीयमान वर्गों व्यापारी, जमींदार, अमीर-उमरा के विशेषाधिकारों की चुनौती का सामना करना था पर मुक्ति का यह आभास भी कम आह्लादक नहीं था, जिसकी अभिव्यक्ति उस युग के सांस्कृतिक साहित्यिक प्रयत्नों में स्पष्ट दिखाई देती है। वल्लभ सम्प्रदाय में दीक्षित अष्टछाप के आठ कवियों में कम से कम तीन कृष्णदास, कुंभनदास और चतुर्भुजदास शुद्र थे। रामानन्द के बारह शिष्यों में कबीर जुलाहा थे, रैदास चमार, धर्मदास अस्पृश्य, धन्ना जाट और सेन नाई थे। रामानुज ने एक अछूत आलवार भक्त निरूप्पन की ‘तिरुवैमौली’ रचना को वैष्णवों के वेद का स्थान दिया।

शताब्दियों से पददलित लोगों के लिए ये सन्त कोई यथार्थवादी रूपान्तरण पैदा करने की स्थिति में नहीं थे। उनके पास एक ही विकल्प था कि उस युग के लिए सही ढंग का भ्रम उत्पन्न किया जाये जो “उसकी सान्तवना तथा औचित्य के लिए उत्साह, नैतिक अनुमोदन, सम्रगता का आधार बने।” सन्तों ने ऐसा ही भ्रम उतपन्न किया और “एक विवेकहीन स्थिति के लिए विवेक का सृजन किया।” ऐतिहासिक दृष्टि से यदि देखा जाय तो वैज्ञानिक विकास के उस चरण पर शायद यही करना मानव मुक्ति के लिए अभिप्रेत था कि वास्तविक समस्या का एक आदर्श समस्या में परिवर्तन कर दिया जाए और बाह्य घटनाओं को आंतरिक दृष्टि से देखा जाए। इस प्रकार सन्तों ने अपने जन की वास्तविक दुर्दशा को तत्व मीमांसीय दुर्दशा में बदल दिया। इस सार्वभौम, तत्वमीमांसीय दुःख का कारण इस भौतिक जगत में नहीं हो सकता था, क्योंकि यह कारण भी उतना ही तत्वमीमांसीय होना चाहिए था। सन्तों ने इसका कारण खोजा अस्तित्व की अभिलाषा में, जन्म लेने की इच्छा में और तृष्णा में। मनुष्य के सभी दुःखों का अन्तिम कारण अविद्या बताया गया। यदि वे सन्त कारणता की इस तलाश में सफल न हो पाते कि दुःख का वास्तविक कारण इस ठोस भौतिक जगत के बाहर कहीं खोजना होगा तो लोगों ने हिंसा का मार्ग अपना लिया होता। दुःख की इस समस्या से मानव-मुक्ति के प्रयत्न में संतों के प्रेम तत्व ने ब्राह्मण्ड के कण कण से लेकर समस्त प्राणि-जगत को एक सूत्र में बांधकरभावाभिभूत कर दिया।

इस दिशा में गुरु रविदास की मानव-मुक्ति का आदर्श-अभिनव है। रविदास का एक आत्मकथात्मक पद है-

जाति भी ओछी पांति भी ओछी, ओछा कसब हमारा 
तुम्हारी क्रिपा तैं ऊंच भये हैं, कहै रविदास चमारा।। (मु. प्र. पू. 486)

प्रभु कृपा का यह अद्भुत नवोन्मेष है जिसमें अछूत समझी जाने वाली ओछी जाति के पीड़ा भाव का शमन ही नहीं हुआ होगा बल्कि इससे श्रेष्ठ होने का दृढ़ विश्वास भी पैदा हुआ होगा।

इतना ही नहीं उन्होंने एक अन्य पद में कथन किया है-

मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता, नितिह बनारसी आसा-पासा 
अब बिप्र परधान तिहि करहि इंडउति, तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ।। (गु. ग्र., पृ. 1293)

रविदास की मानव मुक्ति में न पौराणिक स्वर्गारोहण है और न ही किसी अदृश्य लोक में बैकुण्ठ वास। इस मुक्ति में कोई दुरूह ब्रह्म विद्या ज्ञान भी नहीं है। वे अपनी वाणी में अपने परिवेश की समस्याओं का आत्मनिष्ठरूप प्रतिपादित करते हुए व्यक्ति को एक उच्चभावपूर्ण स्थिति में ले जाना चाहते हैं जिसमें उसके समस्त बन्धनों का अस्तित्व बना नहीं रह सकता।

रविदास प्रश्न उठाते हैं कि किस प्रकार व्यक्ति मुक्त हो सकता है, जन्म मृत्यु के बन्धन से छुटकारा पा सकता है, शास्त्रों ने विविध रूप में अपने समाधान प्रस्तुत किये हैं। उनके आदर्श विधि-निषेध के विवाद में उलझे हुए हैं। तीर्थ स्नान कोई लाभ नहीं देता, उससे आन्तरिक शुद्धि सम्भव नहीं। इस प्रकार अनेक कर्मकाण्डों की निष्प्रयोजनता सिद्ध है। केवल सतिगुरु पारस पत्थर के स्पर्श से भक्ति का उद्भव होता है और भव बन्धन कट जाते हैं।

रविदास को जितनी अपने राम पर आस्था है उतना ही वे अपने सत्यकर्मों पर भरोसा करते हैं (दर्शन 102)। उनके सत्यकर्म किसी प्रकार के वैदिक कर्मकांड अथवा तीर्थ, व्रत, उपासना से सम्बद्ध नहीं है। मध्यकाल के ये सभी सन्त साधक जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है, श्रमजीवी जातियों से सम्बन्धित थे। उनका सत्य कर्म श्रम साधना था। रविदास ने अनेक स्थलों पर ईमान शब्द का प्रयोग किया है जिसका अभिप्राय ईमानदारी, सत्य भाषण, सदाचरण और सत्यनिष्ठा में श्रमिक जीवन व्यतीत करते हुए प्रभु भक्ति में अनुरक्त होना था, जिससे कि सांसारिक राग द्वेष व्यक्ति को इस ईमान से विचलित न कर पायें।

उनका कथन है :

कायम दायम राम इक, दोयम सत्त इमान 
"रविदास" राम अरू सत्त बिन, बिरथा सब कुछ जान || दर्शन 28

एक अन्य स्थल पर उन्होंने बताया-

"रविदास" सत्त करि आसरे, सदा सत्त सुख पाय । 
सत्त इमान नहिं छोडिए, जग जाय तउ जाय ।। दर्शन 29

सत्य के आधार पर ही सच्चा अर्थात् स्थिर और सदीवी सुखी मिल पाता है। अतः व्यक्ति को सत्य और ईमान नहीं छोड़ना चाहिए, भले ही इसके लिए सांसारिक सुखों का कितना भी त्याग क्यों न करना पड़े।

इस प्रकार रविदास अपनी भाव भक्ति के लिए सत्याचरण को पूर्व शर्त के रूप में प्रतिपादित करते प्रतीत होते हैं। यह मध्यकालीन भक्ति की मौलिक देन है। इसमें रविदास ने बड़े स्पष्ट शब्दों में परम्परित रूप से तथाकथित नीची जाति का एक कटु व्यंग्य के रूप में वर्णन करते हुए बताया कि अन्तिम निर्णय जाति के आधार पर नहीं बल्कि सत्य कर्मों पर निर्भर करता है। जिन कर्मकांडों और वैदिक अध्ययन-अध्यापन का पौराणिक ग्रन्थों ने दलितों के लिए निषेध किया है, वे स्वयं सदाचरण के अभाव में कितने व्यर्थ, बेमानी और आडम्बरयुक्त हैं। ये सब भक्ति के मार्ग में बाधक हैं। साहसपूर्वक उन्होंने चुनौतीपूर्ण शब्दों में इन सबका भरपूर खण्डन किया।

रविदास कहते हैं-मैं चमार जाति का हूं (स्पष्टतया मुझे मन्दिर प्रवेश का निषेध है, पर मैं न मस्जिद से घृणा करता हूं और न मन्दिर से प्रेम क्योंकि इन दोनों में न राम है और न अल्लाह ही ( दर्शन 146 ) । इसलिए वे कहते हैं कि मैं न मन्दिर में पूजा करने की अपेक्षा रखता हूं और न मस्जिद में जाने की आवश्यकता है (दर्शन 68)। हजारों वर्ष तक मुल्ला की अजान भी उसका कल्याण नहीं कर सकती, जब तक हृदय में शैतान का निवास है ( दर्शन 74)। कितनी अद्भुत बात है कि सर्वव्यापक परमात्मा का मुसलमान पश्चिम में विद्यमान होना मानते हैं और हिन्दू पूर्व में (दर्शन 76 ) ।

सत्य की पहचान के बिना भक्ति स्वयं एक भ्रम का रूप धारण कर लेती है। रविदास का सत्य पर ही अटल विश्वास है। इसके अभाव में भक्ति के सभी साधन और उपकरण – नाचना, गाना, जप, तप और दान भ्रम हैं। सेवा और पूजा भी भ्रम बने रहते हैं और हम भ्रम में भ्रम की पहचान से ग्रस्त रहते हैं षड्कर्म भ्रम हैं, समस्त वेद तथा अनेक प्रकार के कर्मकाण्ड भ्रम हैं। घर या वन में कर्मकांडों में ग्रस्त रहकर हम भ्रम में भटकते रहते हैं। इस प्रकार भ्रम के अन्धकार में रहने के हम अभ्यस्त हो गये हैं।(वाणी 7, बानी 6)।

रविदास की सत्यान्वेषण की यह दृष्टि भक्ति के परम्परागत प्रतिमानों से मूलतःभिन्न थी। सत्य ही उनका परम त था, जिसे पाने के लिए वे शास्त्रीय ज्ञान को हेय मानकर जीवन के सहज श्रम साध्य ईमान पर प्रेम साधना में अग्रसर हुए थे। शास्त्रीय ग्रन्थों ने साधना में द्विज-द्विज विषमता की भेदमूलक व्यवस्था को अधिक गहरा दिया था। ब्राह्मणीय प्रकार के विधि विधान में सदैव एक पुरोहितिय तत्व की आवश्यकता बनी रहती थी धनी व्यक्ति अपने साधनों के बल पर पुरोहित से पुण्य भी खरीद सकता था और मोक्ष का दावेदार हो सकता था लेकिन रविदास की भक्ति तो मन का भाव थी, जिसमें बड़े होने की भावना नहीं रहती

भगती वैसी रे भाई आई भगति तउ गई लड़ाई (वाणी 18, वानी, 16 ) 11

सुनहु रविदास की इस भक्ति का सार तत्व प्रेम है जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अनेक रूपकों के माध्यम से की है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार कोयल आम की मंजरी के लिए तरसती है और पपीहा स्वाति की जल की एक बूंद के लिए व्याकुल रहता है, उसी प्रकार मैं प्रियतम के विरह में व्यथित हूं-

कोइल तरसे अंब कूं चातिग तरसत नीर । 
रविदास लोचे दरस कूं प्राण परत नहीं धीर (वाणी 33 ) ।।

जिस प्रकार चकोर चन्द्रमा के प्रेमाभिभूत होता है, और इस प्रेम के वशीभूत कमल सूर्य से और पपीहा स्वाति के मेघ से एकान्तिक अभिन्नता बनाये रखने के लिए व्यग्र रहता है, रविदास ने यही एकमात्र कामना व्यक्त की है कि मेरे मन में भी उसी प्रकार का ईश्वरीय प्रेम बना रहे:

ससि चकोर सूरज कंवल, चात्रि धन की रीति । 
रविदास इवि मुहि राषिओ, हित चित पूरण परीति ।। वाणी 34 

स्वाभाविक है कि जिन शास्त्रों ने वर्ण व्यवस्था के नियम विधान आरोपित किये थे, उन ग्रन्थों की साधना के निषेद्ध पर ही जातिबन्धन से मुक्त, भाव भक्ति का स्वरूप बनाया जा सकता था। शताब्दियों से अक्षर ज्ञान से वंचित किये गये रविदास के जन के पास एक सच्चा भाव था, जिसमें कथनी करनी की एकता और ईमान था और यह भाव भी अकेले का नहीं। इसे समूह में, संगति में ही पाया जा सकता था:

साध संगति बिना भाउ नहीं उपजै । 
भाव बिनु भगति नहीं होइ तेरी || प्र.गु. पू. 659

जाहिर है कि साथ संगति की संकल्पना में जाति पाति का निषेध अन्तर्निहित था। रविदास ने इसके लिए एक भरपूर सैद्धान्तिक आधार प्रदान किया। गुरु रविदास का कथन था कि सभी परमात्मा की सन्तान हैं, इसलिए जाति के भेदभाव का कोई अर्थ नहीं हैं। उन्होंने बताया कि लोग निम्न जातियों को निरन्तर प्रताड़ित करते हैं, वे यह नहीं जानते सभी एक परमात्मा से पैदा हुए हैं। एक अन्यपद में उन्होंने समझाने का प्रयत्न किया कि सभी एक ही मिट्टी से निर्मित बर्तन की भांति हैं। सबका स्रष्टा एक ही है। एक ही परमात्मा सबमें व्याप्त है। भले ही कोई ब्राह्मण अथवा शूद्र हो, सब एक ही प्राणतत्व से उत्पन्न हैं। एक ही ज्योति से अखिल ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई है। इसमें ऊंच नीच का भेद कैसे माना जा सकता है। ब्राह्मण और चमार जैसे जाति-विषमता का क्या अर्थ है ? ब्राह्मण और चण्डाल में अन्तर कैसे हो सकता है-

"रविदास" इक ही नूर से, जिमि, उपज्ज्यो संसार ।
ऊंच नीच किह विध भये, वामन अरू चमार
बामन अरु चंडाल महि, "रविदास" नंह अंतर जान
सभ मंह एक ही जोति है, सभ घट एक भगवान ।। 
"रविदास" उपजह सभ इक नूर ते, बामन मुल्ला सेख। 
सभ को करता एक है, सभ कूं एक ही पेख।। 
रविदास का आदर्श पुरुष एक ऐसा वैष्णव साधु पुरुष ही हो सकता था जो ऊंच-नीच, राजा रंक के भेद से मुक्त होकर भाव भक्ति में लीन रहता है क्योंकि परमात्मा का स्मरण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, डोम, चण्डाल या मलेच्छ-सबको पवित्र कर देता है।

इसीलिए रविदास को राम शरण का ही अवलम्ब है –

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी ओछा जनमु हमारा
तुम सरनागति राजा राम चन्द कहि रविदास चमारा ।। (गु. ग्र., पृ.659) 

यह पीड़ित प्रताड़ित जन का एक उच्छ्वास है, जिसे रविदास की वाणी के प्रत्येक पद में देखा जा सकता है। संत रविदास का महत्व इस बात में है कि उन्होंने अपने जन के बीच उस समता की भावना को प्रोत्साहित किया, जिससे यथार्थ जीवन में उन्हें बड़ी क्रूरता के साथ वंचित रखा गया था। उन्हें यथार्थ परिस्थितियों के प्रति विरोध की भावना व्यक्त करने के लिए मानवीय दुःख से मुक्ति का संदेश लेकर आगे बढ़ना पड़ा। इसके लिए उन्होंने साधारण समाज की साधारण नैतिकता को पुनर्जाग्रत करते हुए भक्ति भाव के माध्यम से मानव-मुक्ति का एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें समस्त प्राणि-जगत को पराभौतिक रागात्मक सम्बन्धों की एकसूत्रता में बांधने का सुझाव था।

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