डॉ. सेवा सिंह

मध्यकालीन भक्ति-आन्दोलन और मानवीय सरोकार – डॉ. सेवा सिंह

भक्ति आंदोलन के उद्भव और मूल्यांकन का इतिहास बोध तथाकथित भारतीय पुनर्जागरण की हिन्दुवादी दृष्टि से ग्रस्त है। इसके अन्तर्गत भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल की समस्त उपलब्धियों को नजरन्दाज करने के प्रयास में भक्ति आन्दोलन के योगदान की छवि नहीं बन सकी। भारतीय पुनर्जागरण के उपजीव्य दर्शनिक स्रोत वेद और वेदान्त हैं। इस दृष्टिकोण से यह धारणा पल्लवित हुई है कि भारतवर्ष पिछले आठ सौ वर्षों से परतन्त्र रहा है। इसका अनुसिद्धान्त है इस्लाम की प्रतिक्रिया में भक्ति आन्दोलन का उद्भव । (लेख से )

डॉ. सेवा सिंह

भक्ति आन्दोलन के उद्भव के पुनर्मूल्यांकन के इस प्रस्तुत प्रयास में ‘इस्लामिक प्रतिक्रिया, का प्रश्न ही मुख्य रूप से उठाया गया है। सम्प्रति अनेक कारणों से यह मुद्दा नितान्त प्रासंगिक और महत्वपूर्ण प्रतीत होने लगा है। इससे एक तो भक्ति आन्दोलन के अध्ययन-मूल्यांकन की दृष्टि प्रभावित है; दूसरे इसने भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल के प्रति एक विशिष्ट मनोवृत्ति को पल्लवित किया है।

इस्लामिक प्रतिक्रिया के सन्दर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का यह कथन प्रायः उद्धृत किया जाता है :

‘देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देव मन्दिर गिराए जाते थे, देव मूर्तियां तोड़ी जाती थीं और पूज्य पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ भी नहीं कर सकते थे। आगे चलकर जब मुस्लिम साम्राज्य दूर तक स्थापित हो गया तब परस्पर लड़ने वाले स्वतन्त्र राज्य भी नहीं रह गए। इतने भारी राजनैतिक उलट-फेर के पीछे हिन्दू जन-समुदाय पर बहुत दिनों तक उदासी छायी रही। अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान् की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था।”

इस मान्यता के प्रतिवाद में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का उद्धरण प्रस्तुत किया जाता आ रहा है : यह बात अत्यन्त हास्यास्पद है कि जब मुसलमान लोग उत्तर भारत के मन्दिर तोड़ रहे थे तो उसी समय अपेक्षाकृत निरापद दक्षिण में भक्त लोगों ने भगवान की शरणागति की प्रार्थना की। मुसलमानों के अत्याचार के कारण यदि भक्ति की भावधारा को उमड़ना था तो पहले उसे सिन्ध में और फिर उत्तर भारत में प्रकट होना चहिए था, पर प्रकट हुई वह दक्षिण में।”

वादी-प्रतिवादी के रूप में प्रस्तुत ये दो विचार-बिन्दु कतिपय उल्लेखनीय विद्वानों द्वारा इतिहास विषयक विवेक की बहस की अपेक्षा शुक्ल द्विवेदी उठा-पटक का मुद्दा बने रहे हैं, इसलिए शायद द्विवेदी जी की इस स्थापना के अन्तर्विरोधों की ओर ध्यान नहीं दिया गया।

एक स्थल पर द्विवेदीजी ने लिखा है: ‘जब नवीन धर्ममत ने सारे संसार के कुफ्र को मिटा देने की प्रतिज्ञा की और सभी पाये जाने वाले साधनों का उपयोग आरंभ किया तो भारतवर्ष इसे ठीक-ठीक समझ ही नहीं सका। इसीलिए कुछ दिनों तक उसकी समन्वयात्मिका बुद्धि कुंठित हो गयी। वह विक्षुब्ध-सा हो उठा। आगे वे लिखते हैं, “जिस प्रतिद्वन्द्वी से काम पड़ा था वह बहुत वर्जनाग्राही था, अर्थात् वह निर्दयतापूर्वक अन्यान्य मतों को तहस-नहस करने की दीक्षा ले चुका था, और धार्मिक वर्जनशीलता ही उसका मुख्य अस्त्र था। यद्यपि वह समाज धार्मिक रूप में वर्जनशील था, पर सामाजिक रूप में ग्रहणशील था। उनका मानना है कि मुसलमानों के आगमन के साथ ही साथ हिन्दू धर्म प्रधानतः आचार-प्रवण हो गया। तीर्थ, व्रत, उपासना और होमाचार की परम्परा ही उसका केन्द्र बिन्दु हो गयी। सोलहवीं शताब्दी को द्विवेदी जी अन्धकारमय युग मानते हैं, विदेशी शक्तियां भारतवर्ष के इस कोने से उस कोने तक अपना आतंक विस्तार कर चुकी थीं। युद्ध विग्रह में, वाणिज्य व्यवसाय में, भीतरी और बाहरी राज्य व्यवस्था में सर्वत्र विदेशियों और विधर्मियों का हाथ था। इस देश में रहने वालों ने अनिच्छापूर्वक, विवश होकर यह शासन व्यवस्था स्वीकार कर ली थी। बीच-बीच में सिर उठाने की कोशिश अगर कहीं हुई भी, तो तत्काल ही दर्प चूर्ण कर दिया गया। सचमुच यह युग इस दृष्टि से देखने पर अन्धकारमय दिखाई देता है।’ अन्यत्र वे लिखते हैं कि दसवीं शताब्दी के आसपास आते-आते इस देश की धर्म साधना बिल्कुल नये रूप में प्रकट होती है। निस्सन्देह यहां से भारतीय मनीषा के उतरोत्तर संकोचन का काल आरंभ होता है। यह अवस्था अठारहवीं शताब्दी तक के अंत तक चलती रही। सच पूछा जाय तो विक्रम की दसवीं शताब्दी के बाद ही भारतीय इतिहास का वह काल आरंभ होता है जिसे संकोचनशील और स्तब्ध मनोवृत्ति का काल कहा जाता है।” वे लिखते हैं कि मुसलमानों के आने के कारण हिन्दू समाज में आत्मरक्षा की प्रवृत्ति भी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया के रूप में हुई। उनकी जाति प्रथा अधिकाधिक कसी जाने लगी। छूत का भय और वर्ण संकरता की आशंका ने समूचे समाज को ग्रस लिया।’ उपर्युक्त उद्धरणों से निम्न बिन्दु उभरकर आते हैं :-मुसलमान आक्रमणकारियों ने देव मन्दिरों को गिराया, – देव मूर्तियां तोड़ी गयीं,

- इसका प्रतिरोध नहीं किया जा सकता था, भगवान की करुणा की पुकार एक मात्र मार्ग था, 
- आक्रमणकारी इस्लाम कुफ्र को गिरा देने के लिए वचनबद्ध था,
- इसके लिए वह सब प्रकार के साधनों का उपयोग कर रहा था,
- इससे हिन्दू धर्म आचार प्रवण बनने लगा,
- दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी का समय अर्थात् भारतीय इतिहास का उत्तर मध्य काल स्तब्ध मनोवृत्ति का काल हैं,
- मुसलमानों के आने के कारण आत्मरक्षा की प्रवृत्ति पैदा हुई है
- इससे अस्पृश्यता और वर्ण व्यवस्था के बन्धन दृढ़ हुए। 

उल्लेखनीय है कि हिन्दी के समस्त भक्ति साहित्य अध्ययन में इन धारणाओं को व्याप्त मान्यता प्रदान की जाती रही है। जहां कहीं विरोध के स्वर उभरे भी वहां परस्पर धारणाओं को निरस्त करने के लिए ही यत्किंचित ऐतिहासिक प्रमाण जुटाए गए हैं, जिससे भक्ति आन्दोलन के सन्दर्भ में एक समन्वित और सम्यक् इतिहास बोध बनने की संभावना नहीं बन सकी।

ऊपर रेखांकित बिन्दुओं को देखते हुए एक नजर में यही धारणा बनती है कि भक्ति आन्दोलन के हिन्दी इतिहास लेखन का मुखर और अन्तर्निहित स्वर इस्लाम विरोध है। आक्रमणकारी धर्मान्ध थे, स्तब्ध मनोवृत्ति तथा वर्ण व्यवस्था का दृढ़ीकरण इस्लामिक आक्रमण और इस्लामिक साम्राज्य का परिणाम है। यह युग अन्धकारमय है, इस इस्लामिक साम्राज्य के पतन के बाद ही हम नये युग में प्रवेश कर पाये हैं।

ध्यान देने की बात है कि इन व्यापक तौर पर मान्य धारणाओं को भक्ति आन्दोलन के हिन्दी इतिहास लेखकों द्वारा किसी भी प्रकार के साहित्यिक अथवा दस्तावेजी ऐतिहासिक साक्ष्यों के क्रमबद्ध प्रमाणों द्वारा पुष्ट नहीं किया गया है।

द्विवेदी जी ने एक स्थल पर बताया है कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।” नामवर सिंह के अनुसार इस नाटकीय घोषणा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि बहुत से विद्वान हिन्दी साहित्य के उदय को मुसलमानों और हिन्दुओं के संघर्ष का परिणाम मानते हैं।” द्विवेदी जी का मानना है कि यदि कबीर आदि निर्गुण मतवादी सन्तों की वाणियों की बाहरी रूप रेखा पर विचार किया जाय तो मालूम होगा कि यह सम्पूर्णतः भारतीय हैं और बौद्ध धर्म के अन्तिम सिद्धों और नाथपंथी योगियों के पदादि से उसका सीधा सम्बन्ध है।”

इस प्रकार द्विवेदी जी के अनुसार सन्त साहित्य का बारह आना नितान्त भारतीय बौद्ध परम्परा से सम्बद्ध है, नामवर सिंह के शब्दों में सन्त साहित्य का शेष चार आना इस्लाम के आने का परिणाम है।”

भारतीय इतिहास की परम्परा में तुर्कों के आक्रमण से पूर्वकाल को पूर्व मध्यकाल कहा जाता है तथा तुर्क -अफगान-मुगल शासनकाल को उत्तर मध्यकाल । भक्ति आन्दोलन का सम्बन्ध उत्तर मध्यकाल से है, जो हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन का पूर्व मध्यकाल है। भक्ति आन्दोलन के उद्भव के सन्दर्भ में प्रतिपादित इतिहास- दृष्टि के अन्तर्गत यदि द्विवेदी जी के ‘बारह आना’ सूत्र को प्रस्थान बिन्दु मान लिया जाय तो हमें इस पड़ताल का आरंभ पूर्व मध्यकाल और उस युग की साधनाओं की जानकारी से करना होगा।

सन्त साहित्य अध्ययन में द्विवेदी जी का महायान के प्रति विशेष मोह रहा है। महायान बौद्ध धर्म का उद्भव सातवाहन साम्राज्य में, आन्ध्र प्रदेश में प्रथम शताब्दी बी. सी. या प्रथम शताब्दी ए. डी. में हुआ होगा, ऐसा अनुमान है। महायानी ग्रन्थों के अध्ययन से मालूम हुआ है कि महायान में बुद्ध की लोकोत्तरता, बोधिसत्व, बुद्ध भक्ति, बुद्ध पूजा, बुद्ध लीला, स्तूप पूजा, सिद्धियां, चमत्कार, दश भूमियां, पौराणिक कथा- कल्पना आदि बातें चतुर्थ शताब्दी तक प्रविष्ट हो चुकी थीं। इनकी चर्चा महायान के दो ग्रन्थों ‘महावस्तु’ (दूसरी शती ई०) तथा ललित विस्तर (चौथी शताब्दी से पूर्व) में विस्तार से की गयी है। महावस्तु में बुद्ध के जीवन की जो कथाएं वर्णित की गयीं है, वे चमत्कारों से पूर्ण है, भगवान बुद्ध बोधिसत्व के रूप में चित्रित किए गए हैं। ‘बुद्धानुस्मृति सूक्त’ पौराणिक विष्णु, शिव आदि देवताओं के सूक्तों से भिन्न नहीं हैं।”

‘महावस्तु’ में प्रायः ऐसे उल्लेख मिलते हैं जिनमें बताया गया है कि बुद्ध की पवित्रता इतनी महान है कि केवल उनकी पूजा उपासना मात्र से कोई निर्वाण प्राप्त कर सकता है। केवल स्तूपों की परिक्रमा और पुष्पार्पण मात्र से अनंत सिद्धियों की उपलब्धि हो सकती है।” अनेक बुद्धों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि बोध माता पिता द्वारा उत्पन्न नहीं किए जाते, अपितु स्वयं अचानक अपने गुणों से आविर्भूत होते हैं।

‘ललितविस्तर’ ग्रंथ में बताया गया है कि बुद्ध का इस पृथ्वी पर जीवन और चरित्र केवल अलौकिक व्यक्ति की लीला है। युद्ध के केश से एक किरण निकलती है और सभी बुद्ध क्षेत्रों, बुद्धों और बोधिसत्वों को प्रकाशित कर देती है। ‘सद्धर्म पुण्डरीक (प्रथम शताब्दी) के बुद्ध देवाधिदेव से कम नहीं हैं, अनंत हैं, महाभिषग् हैं।

पालिसूत्रों की तरह पुंडरीक के बुद्ध उपदेश देते हुए स्थान-स्थान घूमते नहींअपितु गृध्रकूट पर्वत पर भिक्षुओं और भिक्षुणियों बुद्धों, बोधिसत्वों, देवताओं, अर्द्धदेवताओं के विशाल समूह से आवृत होकर बैठते हैं। जब वे धर्म वर्षा की इच्छा करते हैं तो उनके दोनों ध्रुवों के बीच की रोमावलि से प्रकाश की किरण फूटती है जिससे अठारह सहस्र बुद्ध क्षेत्र, तन्निहित जीव, बुद्ध आदि सभी उससे प्रकाशित हो उठते हैं। पुण्डरीक में वर्णित बुद्ध, शक्तिमान, सिद्ध और ऐन्द्रजालिक हैं जिनको भक्त श्रोताओं की इंद्रियों से क्रीड़ा करना अत्यधिक प्रिय है।

महायान में भक्ति का यह नया तत्व ईसा की चौथी शताब्दी तक प्रविष्ट हो चुका था। बुद्ध की यथार्थवादी विषय वस्तु प्रज्ञापारमिता में पर्यवसित हो रही थी, जिसका अर्थ था सर्वधर्मशून्यता। बताया गया है कि शून्यता में प्रतिष्ठित होने वाला व्यक्ति ही प्रज्ञापारमिता को प्राप्त कर सकता है। यह मानकर चला जाता है कि भावों की उत्पत्ति न स्वतः होती है, न परतः होती है, न उभयतः होती है, न अहेतुतः होती है। उस समय साधक के लिए किसी प्रकार का व्यवहार शेष नहीं रहता। उस समय यह परमार्थ स्वतः भासित होने लगता है कि यह दृश्यमान वस्तु समूह माया के सदृश है। स्वप्न और प्रतिबिम्ब की तरह है, अलीक और मिथ्या है। जगत की सत्ता केवल व्यावहारिक है, पारमार्थिक नहीं । जगत का जो स्वरूप हमारे इन्द्रियगोचर होता है वह उसका मायिक स्वरूप है। वास्तव में सब शून्य ही शून्य है।”

आदिबौद्ध दर्शन और महायान धर्म में भेद का मुख्य बिन्दु है – यथार्थवादी शास्ता (गुरु) बुद्ध और मुक्ति के लिए निजी उत्तरदायित्व की धारणा का, लोकोत्तर, पारलौकिक बुद्ध, उसकी भक्ति तथा मुक्ति के लिए बुद्ध के अनुग्रह पर निर्भरता सर्व मिथ्यात्व के दर्शन शून्यवाद और विज्ञानवाद में रूपान्तरण आदि बौद्धों से महायान का यह रूपान्तरण प्रत्याशित एक नये समाज की जरूरतों के मद्देनजर था। एक ऐसा समाज महायानियों की चिन्तन प्रक्रियाओं में प्रतिबिम्बित हो रहा था जिसमें वास्तविक दुख को ही भ्रम सिद्ध करके घोर यातनापूर्ण जीवन जीने के लिए विवश कर दिये लोगों की नयी व्यवस्था के साथ समानुकूलता को देखा जा सकता है। पर यह किसलिए ? इसका उत्तर विहारों को दिए गए वैभवशाली भूमि अनुदानों में अच्छी तरह मिल सकता है।

इस प्रकार के साक्ष्य मिलते हैं जिनके आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि मौर्योत्तर काल से ब्राह्मणों को भूमि अनुदानों के व्यापक प्रचलन से अर्थव्यवस्था तथा शासन प्रबन्ध सामन्तीय ढांचे में ढलने लगा था। उस समय के तमाम धर्म ग्रन्थों में भूमिदान के रूप में अर्जित पुण्य कर्मों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है। प्रो. रामशरण ने बताया है कि भूमि अनुदान का सबसे प्राचीन अभिलेखीय प्रमाण ईस्वी सन् की प्रथम शताब्दी के एक सातवाहन अभिलेख में मिलता है जिसमें अश्वमेध यज्ञ में एक गांव देने की चर्चा है।” इसके बाद ऐसे अभिलेख प्राप्त हुए हैं जिनमें निरन्तर भूमि अनुदानों की व्यापकता दिखाई देती है जिससे उत्तरोत्तर विकेन्द्रीकरण बढ़ता गया है। भूमि अनुदानों के अन्तर्गत राजा चरागाह, काण्ठागार, नमक की खान और सभी भूगर्भ सम्पदा तथा विष्टि आदि राजस्व के प्रायः सभी साधनों का परिहार कर देता था। साथ ही दाता दान किये गांवों के निवासियों पर शासन करने का अधिकार भी ग्रहीता को दे देता था। गुप्त काल में मध्यभारत के बड़े-बड़े सामन्त राजाओं द्वारा ब्राह्मणों को दान-स्वरूप बसे बसाये गांव देने के ऐसे कम से कम आधे दर्जन उदाहरण तो मिलते ही हैं। इन अनुदानों में सामन्त राजाओं ने सम्बन्धित गांवों के निवासियों को, जिनमें किसान और कारीगर दोनों शामिल थे, स्पष्ट निर्देश दिया है कि ग्रहिताओं को केवल प्रचलित कर ही नहीं दें, बल्कि उनके आदेशों का भी पालन करें। इससे अनुमान लगाया गया है कि गांव का दान वास्तव में गांववासियों सहित गांव का दान है जिसका अर्थ है गांव में राजा की करदाता प्रजा अब से अदाता को कर देगी। असम, बंगाल, विहार, बुंदेलखण्ड, राजस्थान, महाराष्ट्र और खंभात के पहाड़ी राज्यों से प्राप्त 11वीं और 12वीं शताब्दियों के कुछ अभिलेख भी शासकों द्वारा धार्मिक संस्थाओं और ब्राह्मणों को अनुदान में दी गई भूमि और गांवों के उल्लेख के साथ-साथ व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से, किसानों और कुछ जगह दस्तकारों और व्यापारियों तथा ग्राम परिचरों का भी उल्लेख करते हैं।

“बौद्ध दोहा में अज्ञान में डूबा ‘चित्त’ ‘ठंक्कुर’ संज्ञा से अभिहित किया गया है-ठंक्कुर अर्थात् ठाकुर-राजा अथवा अविद्या ग्रस्त चित्त । ठाकुर, 10वीं शताब्दी के बाद से शासक भूस्वामी अभिजात वर्ग की एक प्रसिद्ध उपाधि है। उपमिति भाव प्रपंचकथा (10वीं शताब्दी का आरंभ) में भी सामंती वर्गक्रम स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, जिसमें संसार के बन्धन को सरदार या शासक की जागीर के समतुल्य रखः गया है। इस आलेख के कुछ पद्य बताते हैं कि शासक के राज्य में रहने वाले दयनीय लोग जीवन निर्वाह के साधनों के लिए उस पर आश्रित थे और केवल मृत्यु ही उन्हें उस परिसीमित ढांचे से बाहर लाकर उस दासता से मुक्ति दिला सकती थी।

इस युग में व्यापार और उद्योग से होने वाली आय भी धार्मिक अनुदानों में देने का चलन आरंभ हो गया था। शिल्पियों और व्यापारियों की आर्थिक वृत्तियों पर एक हद तक मन्दिरों का नियन्त्रण हो गया। पालों और प्रतिहारों के राज्यों में गांवों की बिल्कुल यही स्थिति थी।

जातकों में शिल्पियों के गांवों का उल्लेख है, लेकिन पालों के अधीन गांवों की आबादी के स्वरूप की जो थोड़ी बहुत जानकारी हमें उपलब्ध है, इसमें लगता है कि इन गांवों में सिर्फ किसान ही नहीं बल्कि ब्राह्मणों से लेकर मेहों, अन्य और चाण्डालों तक सभी पेशे के लोग रहते थे। शिल्पी लोग अपनी इच्छानुसार अपना धन्धा नहीं चला सकते थे, बल्कि जिस प्रकार किसान अपने प्रभुओं की इच्छा पर चलते थे उसी प्रकार दस्तकारों को भी अपने-अपने प्रधानों की मर्जी पर चलना पड़ता था। शिल्पी अपने मन से कहीं आ जा या बस नहीं सकते थे और अपने मन से अपने धन्धे में परिवर्तन नहीं कर सकते थे। मालवा, गुजरात और राजस्थान के अभिलेखों से पता चलता है इन क्षेत्रों में जमीन का अधिकांश हिस्सा जागीरों के रूप में राज-परिवार के कुटुम्बियों, सामन्तों तथा राज्याधिकारों के हाथों में ही था।

कुल मिलाकर ईसा की दसवीं शताब्दी तक भारतीय परिदृश्य में, अधिकाधिक कृषि प्रधान स्वरूप, वाणिज्य-व्यापार तथा शहरी जीवन का पतन, मुद्रा का नितान्त अभाव, बेगार का प्रचलन, स्थानीय अर्थव्यवस्था की बन्द इकाईयां, एक बड़े शासक भूमिधर अभिजात वर्ग और भूस्वामी श्रीमंतों का उदय, निचले तबके के किसानों की दुर्दशा, कारीगरों तथा अन्य व्यवसायों का ह्रास दिखाई देता है। संभव है यदा कदा दासता में शूद्रों ने हिंसा का आश्रय लिया हो। इस सम्बन्ध में महिपाल और रामपाल के समय बंगाल में हुए कैवर्ती के सशस्त्र विद्रोह की ओर ध्यान दिलाया गया है। लेकिन इस प्रकार के उदाहरण बहुत अधिक नहीं हैं। वस्तुस्थिति यह है कि परम्परवाद की जकड़, तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थाओं में लोगों को सन्तुष्ट बनाए रखने वाली एक विशेष प्रकार की धार्मिक और सामाजिक विचारधारा, समाज का विभाजन, विशेषतः अनेक जाति समूहों के रूप में शूद्रों का भारी संख्या में उद्भव आदि बातों ने सशस्त्र विद्रोह की संभावना को बहुत कम कर दिया।

चतुर्दिक ह्रास का काल माने जाने वाले इस काल के पौराणिक ग्रन्थ में दिये गये कलियुग के वर्णनों में, गड्डमड्ड तरीकों से जाने कितनी ही घटनाओं और प्रवृत्तियों का उल्लेख किया गया है-विदेशी आक्रमण, काफी हद तक विदेशियों (यवनों, शकों, हूणों आदि) तथा सीमावर्ती लोगों की शिरकत से बने बड़े शासक अभिजात वर्ग का उदय अकाल और सूखे जैसी प्राकृतिक विपत्तियां, नगरों के ह्रास तथा वाणिज्य व्यापार और मुद्रा आधारित अर्थव्यवस्था के ह्रास के रूप में लक्षित आर्थिक स्थिति में गिरावट, शूद्रों के उत्थान, वैश्यों के पतन तथा पुराने शासक अभिजात वर्ग और पुरोहित अभिजनों की अवनति के रूप में चातुर्वर्ण्य में उत्पन्न व्याघात ; सामाजिक संघर्ष में वृद्धि, भारी करों तथा अत्याचार पूर्ण-बेगार के उल्लेखों के रूप में प्रतिबिम्बित उदीयमान शासक वर्ग के शोषणकारी कार्य और किसानों की तज्जनित परवशता; परम्परा विरोधी धर्मों का प्रभाव तथा परम्परा से चले आ रहे नैतिक और धार्मिक मूल्यों का पतन ।”

भूमि अनुदानों की सुसंगता में महायान धर्म का उद्भव हुआ है। गुप्तकाल में भूमि अनुदानों का अन्य पहलू भी है, जिसकी ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे दूर सुदूर वयनजीवी जातियों के क्षेत्रों के अनुदानों से कृषि के विस्तार के साथ-साथ इन जातियों के संस्कृतिकरण का सिलसिला शुरू हुआ। यह पूर्व मध्यकाल की एक अन्य मुख्य विशेषता है। आधुनिक नृतत्वशास्त्रियों ने इस प्रकार की जनजातियों का बड़ी गहरायी से अध्ययन किया है। इनके शुरू से ही अपने मत, विश्वास और कर्मकाण्ड रहे हैं। जादूयी प्रकार के इनके कर्मकाण्डों के अपने पुरोहित भी होते हैं जो विधिपूर्वक इन कर्मकाण्डों का निष्पादन करते हैं। ये समुदाय मूलतः मातृसत्तात्मक होते हैं। तंत्रवाद का सम्बन्ध इन्हीं मातृसत्तात्मक जनजातियों से है। इस युग में बौद्ध, शैव, वैष्णव, आदि धर्मो में तांत्रिक तत्व का समावेश इन जनजातियों के विलीनीकरण की प्रक्रिया का एक भाग है। इसके साथ ही राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक प्रभुत्व के अन्तर्विरोधों के कारण बौद्ध अथवा ब्राह्मणीय अभिजात्य धर्म के विपरीत इन जनजातियों की धर्मसाधनाओं ने विभिन्न रूपों में अपना अस्तित्व बनाये रखा है। जनजातियों के आत्मविलीनकरण की अनुकूलता की स्थितियों में इन्हें वर्ण व्यवस्था के ढांचे में शूद्र वर्ण के अन्तर्गत स्थान दिया गया। इस सामंजस्य के लिए कालान्तर में स्मृतियों एवं धर्मशास्त्रों के भाष्यों उपभाष्यों में नये-नये विधि-विधान और आचार विचार बना लिये गये। सामन्तीय सोपानात्मकता में सन्तुलन बनाये रखने के लिए आत्मसमर्पण भाव, श्रद्धायुक्त भक्ति तत्व का प्रचार प्रसार महाकाव्यों तथा पुराणों के कपोल कल्पित कथानकों के माध्यम से किया गया। सामन्तीय प्रभु वर्ग के अपने अन्याय पूर्ण वर्चस्व के लिए भक्तिभाव सबसे कारगर अस्त्र था।

अतः भक्ति आन्दोलन के प्रतिमान से भक्ति तत्व का मूल्यांकन एकांगी दृष्टि हैं। भक्ति के उद्भव की पृष्ठभूमि और प्रयोजनशीलता निर्णायक तत्व हैं। भक्ति आन्दोलन की भक्ति का स्रोत ढूंढने में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा। महायानियों की भक्ति के साथ अन्धविश्वासों का एक विराट तन्त्र है जिससे प्रादुर्भूत जगत् मिथ्यावाद के शून्यवादी और विज्ञानवादी दर्शनों ने मानवीय चेतना की यथार्थता को ही विलुप्त कर दिया था। जैसा कि बताया जा चुका है कि महायानियों की भक्ति के मूल में, भूमि अनुदान देने वाले प्रभुओं के पक्ष में उत्पीड़ित जनता की अनुकूलता का एक प्रयास था। गीता के भक्तितत्व के साथ, वर्ण-व्यवस्था के अन्तर्गत स्वधर्म की शर्त है। दक्षिण भारत का परिवेश जाने हुए इतिहासकाल से सामन्तीय ढांचे में ढलता रहा है।

निरन्तर मिलने वाले भूमि अनुदानों के बल पर विशाल, वैभवपूर्ण भव्य मन्दिरों की स्थापना का वहां एक लम्बा सिलसिला है, जिनसे भक्ति के उद्भव तथा कार्यशीलता को काटकर नहीं देखा जा सकता। जबकि मध्यकालीन भक्ति आन्दोलन का साहित्य कर्मकांडीय अन्धविश्वासों की निरर्थकता अनावृत्त करते हुए मानवीय शोषण के विरुद्ध जागरुकता और धर्मनिरपेक्ष विवेक पैदा करने में आज तक प्रासंगिक है।

अतः इतिहास के तथ्यों को नजरअन्दाज करते हुए, एकांगी दृष्टिसे, केवल वाणियों की बाहरी रूपरेखा के आधार पर ‘बाहर आना’ सूत्र से भक्ति आंदोलन का मूल्यांकन द्विवेदी जी के युग बोध में बाधक सिद्ध हुआ है शेष चार आना अर्थात् भक्ति आन्दोलन के उद्भव में एक चौथाई के लिये डा. नामवर सिंह ने इरफान हबीब के एक शोध निबन्ध के आधार पर तुर्कों के शासन द्वारा आयातित प्रौद्योगिकी का उल्लेख किया है।

प्रो. इरफान का कथन है कि 13 वीं-14 वीं शताब्दी के ये प्रोद्यौगिक परिवर्तन काफी महत्वपूर्ण थे। तुर्कों के शासन काल में भारत में वस्त्र उद्योग, सिंचाई, कागज, चुम्बकीय कुतुबनुमा, समय सूचक उपकरण तथा घुड़सवार सेना, औद्योगिकी आदि के क्षेत्रों में विकास ने शिल्प और कृषि उत्पादन को बढ़ाया। व्यापारिक गतिविधि को तीव्र किया। इससे वर्ग सम्बन्धों में भी परिवर्तन आया होगा। नयी तकनीक में कुशल कारीगर प्राप्त करने की ललक ने व्यक्तिगत नौकरी लागू करने को प्रोत्साहित किया होगा। कागज के प्रचलन से अखिल भारतीय बाजार के विकास में मदद मिली होगी। इस सन्दर्भ में नामवर सिंह जी की स्थापना है कि द्विवेदी जी की ‘बाहर आना’ वाली बात महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस्लाम के प्रभाव को पूरा का पूरा का नहीं नकारा। सिर्फ इतना ही कहा कि तीन चौथाई तत्व वही रहता। देखा जाना चाहिए कि भक्ति आन्दोलन के उद्भव में पूर्वोघृत द्विवेदी जी के उद्धरणों से ‘इस्लाम प्रतिक्रिया’ का स्वर मुखरित हुआ है।

रामविलास शर्मा ने भक्ति आन्दोलन के उद्भव और विकास को सामन्तीय शक्ति के ह्रास से सम्बद्ध माना है। उन्होंने सामन्ती ढांचे के कमजोर पड़ने के साथ आर्थिक सम्बन्धों के व्यापारिक पूंजीवाद में परिवर्तन को लक्ष्य किया है। लेकिन उल्लेखनीय बात जिसकी ओर मैं ध्यान दिलाना चाहता हूं वह यह है कि रामविलास शर्मा ने इस परिवर्तन में तुर्कों के शासन का कोई योगदान स्वीकार नहीं किया। उनका मानना है कि यह परिवर्तन उसकी अपनी शक्तियों से हो रहा था। यहां के लोगों को व्यापार करना ईरानियों, पठानों, अरबों या तुर्कों ने नहीं सिखाया था। सैकड़ों वर्षों से कायम भारतीय सामन्तवाद कभी का अपनी ऐतिहासिक भूमिका खत्म कर चुका था। उसे समाप्त करने वाली शक्तियां उसी के गर्भ में पुष्ट हो रही थीं।” ऐतिहासिक तथ्यों के सूक्ष्म विश्लेषण के अभाव में यह स्थापना सम्यक् इतिहास बोध के लिये चिन्ता का विषय हो सकती है।

इतिहास के तथ्य निरसन्देह इस बात का संकेत करते हैं कि तुर्क शासन के पहले ही 11वीं-12वीं शताब्दी में सामन्तीय ढांचे में दरारें पड़ने लगी थीं। जिसे इतिहास में ‘हिन्दू काल’ कहा जाता है उस काल के अन्तिम दिनों में उत्तर भारत में कतिपय नयी आर्थिक शक्तियों का उदय हुआ और उसके परिणामस्वरूप आत्म निर्भर अर्थव्यवस्था, मुद्रा के चलन के अभाव और किसानों के शोषण की नींव पर आधारित पुरातन सामन्तवाद की जड़े हिलने लगीं। मुद्रा प्रसार के कारण नकद अदायगी सुलभ होने के कारण शहरों का और बाजारों का विकास हुआ है। “विदेशी व्यापार के विकास के अनेक प्रमाण मिले हैं, शायद इसका कारण मध्यभारत में ईख, रुई, और साण जैसी व्यापारिक और नकद आय देने वाली फसलों की खेती का व्यापक प्रसार था। प्रो. रामशरण ने बताया है कि मध्यभारत, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मालवा और गुजरात में जो हम सिक्कों का चलन फिर से आरंभ होते देखते हैं, उसका सम्बन्ध विशेषकर पश्चिमी भारत में वाणिज्य व्यापार की प्रगति से जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि तुर्क आक्रमण से पूर्व नकद भुगतान, विष्टि का लोप आन्तरिक तथा विदेशी व्यापार के पुनरुत्थान की प्रवृत्तियां स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगती हैं।” प्रो. रामशरण ने इस व्यापारिक पुनरुत्थान के कारण बताने में अक्षमता प्रकट की है। उनका कथन है कि तुर्कों की भारत विजय के पहले की दो शताब्दियों में व्यापारिक पुनरुत्थान का क्या कारण था, यह कहना कठिन है। *

इस काल में विदेशी व्यापार का सम्बन्ध मध्य एशिया से था। अरबी व्यापारियों का आगमन दक्षिण भारत में राष्ट्रकूटों ( 753-973) के शासन काल में प्रारंभ हो गया था। दक्षिण भारत के अधिकांश नगरों में मुसलमानों को आवासीय भवन, गोदाम, मस्जिद, कब्रगाह आदि के भू-खंड आंवटित किए गए। मुहम्मद बिन कासिम की सिंघ विजय के साथ उत्तर से ही मुसलमान व्यापारियों का आगमन हुआ। 12वीं शताब्दी में गजनी की अव्यवस्थित शासन व्यवस्था ने भी शायद आप्रवास को उत्साहित किया हो, जिनमें अनेक सूफी सन्तों का भारत में प्रवेश हुआ, जिनमें शेख अलीहजवेरी सबसे उल्लेखनीय तथा महत्वपूर्ण दरवेश था। पंजाब की ओर से ये आप्रवासी मध्यदेशों की ओर बढ़ते गये। विदेशी तथा आन्तरिक व्यापार के साथ-साथ एक प्रकार का सांस्कृतिक आदान-प्रदान स्वाभाविक था, जिसमें शेख बहाउद्दीन जकरिया ( 1192 ) जैसे सूफी अपना योगदान दे रहे थे। इतिहास के इन तथ्यों के आधार पर शायद हम तुर्की शासन की पहली दो शताब्दियों की रूपान्तरित स्थितियों के कारणों को जानने के दिशा में बढ़ सकते हैं।

लेकिन दूसरी ओर, अनेक अध्ययनों से सामन्तीय शोषण के उत्पीड़न से मुक्ति की किसी भी संभावना का पता नहीं चलता। इसकी पुष्टि अनेक स्रोतों से हो जाती है। इनमें अल्बरूनी उल्लेखनीय है। उसने बताया है : वे सभी काम जो ब्राह्मण कर्म माने जाते थे, जैसे पूजा-पाठ, वेदों का उच्चारण या यज्ञ आदि का शूद्रों के लिये निषेध था और अगर यह सिद्ध हो जाये कि किसी ‘वैश्य’ या ‘शूद्र’ ने वेदों का उच्चारण किया है, तो ब्राह्मण उसे राजा के समक्ष अभियुक्त के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं। चांडाल ने ऐसा अपराध किया हो तो उसे और भी क्रूर दंड मिलना निश्चित था। अज्ञानता के शिकार इन निम्नवर्गों को विभिन्न जातियों-उपजातियों में विभाजित किया जाता था, जिसका उद्देश्य यह था कि उनमें ‘ब्राह्मण’ या ठाकुरों’ की भांति संगठन की भावना घर न कर पाए। फिर भी वैश्य एवं शुद्र को ऐसी कुछ सुविधाएं प्राप्त थीं, जो दूसरों के पास नहीं थी। उन्हें ‘निम्नजाति’ कहलाने का अधिकार था, वे ईश्वर पर चिंतन मनन कर सकते थे, जिनका आधार पौराणिक कथाएं हो सकती थीं, पर वेद कभी नहीं। इसके अतिरिक्त उन्हें किलेबन्द नगर और गांवों में रहने की अनुमति नहीं थी।

समाज को सभी औद्योगिक उत्पाद सुलभ कराने वाले ये वर्णहीन समुदाय, अपनी कोई संस्कृति या परम्परा नहीं बना पाए और फलस्वरूप अपना कोई इतिहास नहीं छोड़ गए। उपलब्ध साक्ष्यों में इनकी परिस्थितियों का काफी वर्णन मिलता है। एक प्रतिबंध इन सब पर लागू होता था कि वे किलेबन्दी नगर या बेराबंद ग्रामों के भीतर नहीं रह सकते थे। उनके उत्पादों के बिना स्वर्ण जातियों का नगरीय जीवन संभव नहीं था, लिहाजा एक निश्चित पहर में ये लोग अपने उत्पाद ले-लेकर नगर के अन्दर प्रविष्ट हो सकते थे।

अलबरूनी के अनुसार ‘ये गौरवर्ण लोग भी दो भागों में बांटे गए थे। पहला, कुछ ऊंचा वर्ग अंत्यज कहलाता था और दूसरा पूर्णतः अमानवीय जीवन व्यतीत करता था। अलबरुनी का कहना है कि ये समुदाय गांवों, कस्बों के समीप तो रह सकते थे पर उनके भीतर नहीं। ऐसे आठ समुदाय हैं जिनमें धोबी, मोची और बुनकर को छोड़कर क्योंकि बाकी समुदाय उनसे कोई सरोकार रखना पंसद नहीं करते, अन्य स्वेच्छा से आपस में विवाह सम्बन्ध करते हैं। ये आठ समुदाय हैं-धोबी, मोची बाजीगर, टोकरी और ढाल बनाने वाले नाविक मछुआरे, शिकारी या बहेलिया और जुलाहा या बुनकर हादी, डोम, चांडाल और बढ़ई सबसे निम्न कोटि के कामगार बताए गए हैं। गांव की सफाई और ऐसे दूसरे काम, जो घृणित माने जाते हैं, इन लोगों का काम है। इन्हें एक पूरा वर्ग मान लिया गया है और इनमें फर्क केवल इनके पेशे से ही पता चल जाता है। आम धारणा है कि इनकी उत्पत्ति शुद्र पिता और ब्राह्मणी मां के संयोग से हुई है, और इसलिए इन लोगों के साथ किसी नाजायज बच्चे जैसा सलूक किया जाता है। इन्हें पतित मानकर इनका बहिष्कार किया जाता है। चांडाल को छोड़कर अन्य सभी से चूंकि वे हिन्दी नहीं हैं, “मलेच्छ’ कहे जाते हैं

अलबरुनी के वृतान्त मनुस्मृति के साक्ष्यों से मेल खाते हैं। जनजातियों की नयी प्रविष्टियों से, व्यवासायों के आधार पर नयी जातियों का गठन, शूद्रों से भी निम्न स्तर, उनके प्रति अमानवीय व्यवहार पूर्व मध्यकाल की आत्मनिर्भर सामन्तीय व्यवस्था की तरह है। दसवीं शताब्दी के बाद आन्तरिक और विदेशी व्यापार की वृद्धि जो साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं उनकी सुसंगतता में सामन्तीय सम्बन्धों में परिवर्तन के प्रमाण नहीं मिले हैं। नगरों के यत्किंचित विकास ने भी प्रभु वर्ग के हितों की पूर्ति में ही वृद्धि की है; शिल्पी श्रेणियां नगरों के बाहर रखे जाने के लिये विवश कर दी गयी थीं, सामाजिक बन्धनों के कारण इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि तुर्कों केआक्रमणों के समय उनके साथ ही निम्नवर्गीय ‘हिन्दू’ कामगार नगरों की चारदीवारी के भीतर प्रवेश पा सके और वहीं बस गये।” नये शासन ने कामगार, उनके परिवार और उनकी कार्यशालाओं को ऐसे अवसर प्रदान किये जिससे आप्रवासियों तथा आक्रमणकारियों द्वारा, जो अब नये शासक बन गये थे, आयातित नयी प्रौद्योगिकी का लाभ देकर सामन्तीय ढांचे में व्यापारिक पूंजीवाद के विकास के अन्तर्गत भक्ति आन्दोलन के उद्भव की संभावनाओं को जन्म दिया है।

भक्ति आंदोलन के उद्भव और मूल्यांकन का इतिहास बोध तथाकथित भारतीय पुनर्जागरण की हिन्दुवादी दृष्टि से ग्रस्त है। इसके अन्तर्गत भारतीय इतिहास के उत्तर मध्यकाल की समस्त उपलब्धियों को नजरन्दाज करने के प्रयास में भक्ति आन्दोलन के योगदान की छवि नहीं बन सकी। भारतीय पुनर्जागरण के उपजीव्य दर्शनिक स्रोत वेद और वेदान्त हैं। इस दृष्टिकोण से यह धारणा पल्लवित हुई है कि भारतवर्ष पिछले आठ सौ वर्षों से परतन्त्र रहा है। इसका अनुसिद्धान्त है इस्लाम की प्रतिक्रिया में भक्ति आन्दोलन का उद्भव ।

सम्प्रदाय दृष्टि ने भी भक्ति आन्दोलन के मूल्यांकन में बाधा उपस्थित की है। मध्यकालीन सन्तों के नाम पर बनाये गये संगठित सम्पदायों ने कलियुग के मिथ का भरपूर उपयोग किया है। सम्प्रदाय प्रवर्तक का अवतरण कलियुग के प्रभाव को समाप्त करने के प्रयोजन में प्रस्तुत किया गया है। इन ढेरों वर्णनों का समूचा प्रभाव यह बनता है कि भारतीय इतिहास का उत्तर मध्यकाल घोर यातनापूर्ण उत्पीड़न का युग था । केवल एक उदाहरण के तौर पर, सिख गुरुओं के जीवन-वृत्तों का अधिकांश भाग, तत्कालीन साक्ष्यों की छानबीन के बिना, अतिरंजित भावात्मक तथा आस्थामूलक कथानकों के बल पर खड़ा किया गया है। महत्व प्रतिपादन के लिए ऐसा प्रयास लगभग सभी सन्तों के सन्दर्भ में हुआ है। इससे तुर्कों, अफगानों, मुगलों के शासन काल के प्रति एक अपनत्व का भारतीय भाव अवरुद्ध हुआ है। इस प्रवृत्ति ने भक्ति आन्दोलन के मूल्यांकन को गहरायी तक प्रभावित किया है।

इस बात में सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है कि भक्ति आन्दोलन ऐसा इतिहास बोध प्रदान करने में सक्षम है जिससे हम वर्तमान सांस्कृतिक संकट से उबर सकें। इसके साथ ही अपनी आध्यात्मिक प्रकृति के कारण ऐसी अन्तर्निहित संभावनायें भी इस आन्दोलन में विद्यमान हैं, जिनकी साम्प्रदायिक परिणति हो सकती है।

अतः समस्त भारत के समीचीन इतिहास को आत्मसात करते हुए, भक्ति-आन्दोलन के उद्भव का मूल्यांकन इतिहास बोध की दृष्टि से एक अत्यन्त चुनौतीपूर्ण प्रश्न है, जिसे इस आलेख में प्रस्तुत ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य के साथ खुला छोड़ देने की गुस्ताखी कर रहा हूं।

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