हरियाणा के स्कूल, स्वच्छता अभियान एवं सूचना का अधिकार – राजेन्द्र चौधरी

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक अच्छा खासा दफ़्तर, जिस में दर्जनों कर्मचारी और कमरे हों, लाखों की सम्पत्ति हो परन्तु उस में कोई सफ़ाई कर्मचारी या सुरक्षा कर्मी/चौकीदार न हो? शायद नहीं. आज कल तो विरला ही मध्यम-वर्गीय परिवार होगा जिस में साफ़-सफ़ाई के लिए कोई ‘काम वाली बाई’ न आती हो. परन्तु हरियाणा के स्कूल शिक्षा विभाग में ऐसा होता है और बरसों से ऐसा हो रहा है. 

सूचना का अधिकार कानून के तहत प्रावधान 30 दिन के अन्दर सूचना उपलब्ध कराने का है परन्तु इस कानून के तहत रोहतक ज़िले के सरकारी स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के स्वीकृत अपितु खाली पदों की जानकारी जुलाई माह में माँगी गई पूरी सूचना आज 5 माह से अधिक समय बीत जाने के बाद भी नहीं मिली है. जो आधी अधूरी सूचना मिली है, उस से शिक्षा विभाग एवं सूचना के अधिकार कानून, दोनों की दयनीय दिशा रेखांकित होती है. पहले शिक्षा विभाग की स्थिति की चर्चा करेंगे एवं फिर सूचना के अधिकार कानून की.  हालाँकि प्रस्तुत आंकड़े रोहतक जिले के ही हैं परन्तु ऐसा मानने का कोई कारण नहीं है कि रोहतक जिले के साथ कोई विशेष भेदभाव किया जा रहा है. इस लिए हम रोहतक की स्थिति को हरियाणा के स्कूलों की स्थिति का प्रतिबिम्ब मान सकते हैं. 

शिक्षा निदेशालय के अनुसार रोहतक में 411 स्कूल हैं. इन में से 123 स्कूलों के आधे अधूरे आंकड़े सूचना के अधिकार कानून के तहत उपलब्ध हुए हैं. सब से बड़े खंड, रोहतक खंड के तो मात्र एक स्कूल के आंकड़े उपलब्ध हुए हैं. स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी के पांच तरह के पद स्वीकृत हैं- सेवादार, सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार, माली, कहार, सफ़ाई कर्मचारी सह चौकीदार. पहले तीन पद – सेवादार या चपड़ासी, सफ़ाई कर्मचारी एवं चौकीदार -किसी भी स्कूल के लिए आवश्यक माने जा सकते हैं. इन में से एक के बिना भी स्कूल की व्यवस्था बनाए रखना कठिन है. शेष पदों को हम अनिवार्य न मान कर पहले तीन पदों का विकल्प मान सकते हैं. 123 स्कूलों में सेवादार के 51 स्वीकृत पद एवं कहार के 60 स्वीकृत पद ख़ाली हैं. अगर हम सेवादार एवं कहार के पद को एक दूसरे का स्थानापन्न पद भी मान लें तो 29 स्कूल ऐसे थे जिन में दोनों या एक पद स्वीकृत होने के बावज़ूद, इन पदों पर एक भी कर्मचारी कार्यरत नहीं था. यानी कम से कम इतने स्कूलों में कोई भी व्यक्ति सेवादार की ज़िम्मेदारी निभाने को उपलब्ध नहीं था. शेष स्कूलों में भी आवश्यक नहीं कि कोई सेवादार हो क्योंकि कई स्कूलों में ये पद स्वीकृत ही नहीं है. ख़ाली पद औसतन 6 वर्ष से ख़ाली हैं.  हालाँकि ऐसे स्कूल भी हैं जहाँ ये पद 34, हाँ 34 वर्षों से ख़ाली हैं. 

क्या बिना सफ़ाई कर्मचारी के स्वच्छता की कल्पना की जा सकती है? 67 स्कूलों में सफ़ाई कर्मचारी के स्वीकृत पद ख़ाली थे यानी आधे से अधिक स्कूलों में कोई सफ़ाई कर्मचारी नहीं था. ये पद औसत 7 वर्षों से अधिक समय से रिक्त थे. एक स्कूल में तो 33 वर्ष से यह पड़ रिक्त था. शेष में से भी 6 स्कूलों में केवल अंश कालिक सफ़ाई कर्मचारी थे. कई एकड़ में फैले परिसर, दर्जनों कमरों, एवं 20-30 कंप्यूटर, पंखों, इनवर्टर जैसी लाखों की सम्पति वाले इन स्कूलों में चौकीदार कितने उपलब्ध थे? 53 स्कूलों में सफ़ाई कर्मचारी सह चौकीदार (औसत 7 वर्षों से) या चौकीदार (औसत 11 वर्षों से) के स्वीकृत पद बरसों से रिक्त थे. परन्तु हम यह नहीं मान सकते कि शेष 70 स्कूलों में चौकीदार नियुक्त थे. क्योंकि सभी स्कूलों में तो ये पद स्वीकृत भी नहीं हैं. यहाँ तक कि 3 स्कूल तो ऐसे हैं जिन में कोई भी चतुर्थ श्रेणी का पद – न सेवादार, न चौकीदार और न सफ़ाई कर्मचारी या कोई और कर्मचारी- स्वीकृत नहीं है. 3 स्कूल ऐसे हैं जिन में केवल एक पद स्वीकृत है. जहाँ पद स्वीकृत भी हैं, तो वहां कम से कम 4 स्कूल ऐसे हैं जहाँ कोई भी चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी नहीं है. यानी कम से कम 5% स्कूलों में तो एक भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी उपलब्ध नहीं है. 

जहाँ ये आवश्यक पद रिक्त है, वहां इन की एवज़ में वैकल्पिक व्यवस्था क्या है? क्या सरकार इन स्कूलों को अतिरिक्त आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराती है? मात्र एक प्राथमिक स्कूल ने सूचित किया है कि उन्हें वर्ष में 10 महीनों के लिए 9360 मासिक की दर से उपलब्ध कराये जाते हैं. एक अन्य स्कूल ने सूचित किया है कि इस साल जुलाई माह में उन्हें 8000 रुपये मिले हैं. एक अन्य स्कूल ने बताया है कि एडूसेट (EDUSAT) के लिए उपलब्ध कर्मचारी का सहयोग लिया जाता है. यानी लगभग सभी स्कूलों में आवश्यक रिक्त पदों की एवज़ में सरकार स्कूलों को कोई अतिरिक्त संसाधन उपलब्ध नहीं कराती. एक स्कूल में गाँव वालों ने व्यवस्था की है एवं दर्जन भर स्कूलों में स्टाफ मासिक चंदा कर के अंशकालिक कर्मचारी को भुगतान करता है. शेष सभी स्कूलों ने निःसंकोच लिखा है कि कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. 

एक प्रतिक्रिया यह हो सकती है कि क्या हुआ? स्कूलों में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नहीं हैं तो क्या हुआ? जब सरकार विधान सभा में पिछले साल 21 दिसम्बर में स्वीकार कर चुकी है कि माध्यमिक, उच्च एवं वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापकों की 39% पद रिक्त हैं, तो फिर सफ़ाई कर्मचारी इत्यादि का न होना कौन सी बड़ी बात है. निश्चित तौर पर इतनी बड़ी संख्या में अध्यापकों के पद रिक्त होना चिंता की बात है, परन्तु ज़रा सोच कर देखें कि आप संस्था के मुखिया हैं और आप को बिना सफ़ाई कर्मचारी या चौकीदार के संस्था को चलाना है,ये भी कोई छोटी समस्या नहीं है. 

फिर स्कूलों का काम कैसे चलता है? अगर न सफ़ाई कर्मचारी हो और न कोई अतिरिक्त आर्थिक संसाधन उपलब्ध हों, तो स्कूलों का काम कैसे चलता है? निश्चित तौर पर स्वच्छता सर्वेक्षण में तो पूर्ण स्वच्छता दिखाई ही जाती होगी. कागजों में स्वच्छता में कोई कमी कैसे हो सकती है. कमी होने पर स्कूल मुखिया पर कम से कम डांट डपट की गाज़ पड़ना स्वाभाविक है. निश्चित तौर पर या तो यह काम बच्चों से करवाया जाता होगा, और सफ़ाई का ही क्यों, सेवादार का काम भी बच्चे ही करते होंगे या फिर अन्य मदों से झूठे बिल लगा कर कुछ संसाधन जुटाएं जाते होंगे और काम चलाऊ सफ़ाई व्यवस्था बनाई जाती होगी.  परन्तु चौकीदारी का क्या? यह काम तो बच्चों से भी नहीं कराया जा सकता? और सवाल केवल स्कूल में उपलब्ध लाखों की सम्पति की सुरक्षा का नहीं है. कौन यह सुनिश्चित करेगा कि स्कूल समय के बाद स्कूल भवन असामाजिक तत्वों का ठिकाना न बने? क्या कोई तर्क दिया जा सकता है कि क्यों स्कूलों में एक भी चतुर्थ श्रेणी का पद स्वीकृत नहीं है? क्यों बरसों तक स्वीकृत पद भरे नहीं जाते? क्या प्रदेश में इन पदों के लिए युवा उपलब्ध नहीं हैं? 

अब जा जाएँ सूचना का अधिकार कानून की दुर्दशा पर. कानूनन 30 या अधिकतम 35 दिनों में माँगी गई सूचना उपलब्ध कराई जानी चाहिए. परन्तु 14 जुलाई 2022 को विभाग में पहुंचे आवेदन पर अब तक पूरी सूचना नहीं उपलब्ध कराई गई है. 14 जुलाई 2022 को जिला शिक्षा अधिकारी ने खंड शिक्षा अधिकारी को आवेदन अग्रेषित कर दिया एवं खंड शिक्षा अधिकारी ने स्कूलों को आवेदन अग्रेषित कर दिया. स्कूलों ने आधी अधूरी सूचना सीधे भेजनी शुरू कर दी. कुछ खंड शिक्षा अधिकारियों ने स्कूलों द्वारा भेजी गई सूचना को ज्यों का त्यों आवेदक को भेजना शुरू कर दिया. जब उन को सूचित किया गया कि स्कूल तो यह लिख रहे हैं कि इस मद में सूचना विभाग उपलब्ध कराएगा और आप इसे यथावत अग्रेषित कर रहे हैं, तो सूचना उपलब्ध कौन कराएगा?, आवेदक को कैसे पता चलेगा कि सभी स्कूलों से सूचना आ गई है?, तो चुपी छा गई. जिला एवं खंड शिक्षा अधिकारियों को यह सूचित करने के बाद भी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ. प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को अपील करने के बावज़ूद स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि पत्र की प्राप्ति की सूचना भी नहीं मिली. खैर एक खंड शिक्षा अधिकारी ने तीनों प्रश्नों पर जानकारी भेजी एवं यह भी प्रमाणित किया कि उन के खंड के सभी स्कूलों की जानकारी भेजी जा रही है. परन्तु उन के खंड से भी एक ऐसे स्कूल से सीधी सूचना आवेदक को मिली जो खंड शिक्षा अधिकारी की सूची में शामिल ही नहीं है. ऐसी ही स्थिति एक अन्य खंड में भी है. यानी हम यह नहीं मान सकते कि खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा भेजी गई सूचना में भी खंड के सभी स्कूल शामिल हैं. जो जानकारी खंड शिक्षा अधिकारी द्वारा अग्रेषित की गई है, भेजने से पहले उस की भी सामान्य विवेकपूर्ण समीक्षा भी नहीं की गई. जस की तस फोटोकापी कर के भेज दी है; तब भी जब स्कूल ने यह लिखा है कि यह जानकारी विभाग से प्राप्त करें. एक स्कूल ने तो बिना हस्ताक्षर एवं बिना सूचना का ख़ाली छपा हुआ पत्र ही भेज दिया. एक खंड शिक्षा अधिकारी ने स्कूल द्वारा भेजे पत्र को जो फोटो खींच कर भेजा हुआ है, वह पेज मुड़ा हुआ है एवं कोई सूचना नहीं दिख रही. 

ऐसे पत्रों को देख कर सिर भन्ना जाता है. जब लिखित में संस्था से बाहर ऐसी लापरवाही से पत्र लिखे जा रहे हैं, वैधानिक ज़िम्मेदारी का निर्वाह ऐसे गैर-जिम्मेदार तरीके से किया जा रहा है तो, वहां पढाई कैसी होती होगी?  अधिक संभावना यही है कि केवल औपचारिकता ही की जाती होगी. 

हो सकता है, दूर की कौड़ी है, पर हो सकता है कि विभागीय उच्च अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर विभाग को शर्मसार करने वाले पत्राचार पर अनुशासनात्मक करवाई करें. परन्तु ऐसा करने से पहले, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि सफ़ाई कर्मचारी, चौकीदार एवं सेवादार जैसे आवश्यक पद क्यों सालों साल ख़ाली रह जाते हैं? बिना एक भी चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के कोई स्कूल कैसे चल सकता है? अगर किसी भी कारण से पद ख़ाली रह जाते हैं तो क्या यह सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं कि वैकल्पिक व्यवस्था के लिए आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराये? क्या उन के दिमाग में यह प्रश्न नहीं उठना चाहिए कि बिना सफ़ाई कर्मचारी से स्वच्छता कैसे रहेगी, बिना चौकीदार के सरकारी सम्पति कैसे सुरक्षित रहेगी?  सरकार के उच्चतम स्तर पर अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए. 

पुनश्च: राज्य सूचना आयोग को सितम्बर माह में भेजी द्वितीय अपील की प्राप्ति की सूचना दिसंबर माह में मिली है. अगर सब कुछ टीक रहा तो वास्तविक सुनवाई 31 मई को होगी यानी एक माह में मिल जाने वाली सूचना एक साल में मिल जाए तो गनीमत है.

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