स्वतन्त्रता संग्राम की लोक-चेतना – आचार्य राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी से सुरेन्द्रपाल सिंह की बातचीत।

आचार्य डॉ राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी जी पीएच.डी, डी.लिट. देशभर में लोकजीवन, लोकवार्ता और मिथकशास्त्र के गिने चुने विद्वानों में से एक हैं। उनका डॉक्टरेट ’मार्क्सवाद और रांगेय राघव’ विषय पर था और डी.लिट. का विषय है – लोकवार्ता और  परिवेश विज्ञान। प्रकृति, जीवन और अविच्छिन्नता की मौलिक अनुसंधान पद्धति के अनुसार सम्पूर्णता के सिद्धांत का अनुसंधान करते हुए जनपद सम्पदा के अंतर्गत लोक-परंपरा संबंधी पहली परियोजना ‘धरती और बीज’ को पूरा करने का श्रेय आचार्य जी को जाता है। इसके अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अंतर्गत आपने वृंदावन के उपासकों के रसदेश पर एक बड़ी शोध परियोजना पूरी की है जो अब प्रकाशित हो चुकी है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य जी वर्तमान में जनपद सम्पदा के अंतर्गत भारतीय लोकसंस्कृति और लोक की अवधारणा पर कार्य कर रहे हैं। उनके सानिध्य में बैठना और सुनने का अनुभव एक प्यासे को जलप्रपात मिलने के समान है। अभी पिछले दिनों पानीपत के रूहानी इतिहास पर एक कार्यक्रम के दौरान उनसे मुलाक़ात का सौभाग्य मिला तो बातचीत के दौरान राष्ट्रीय आंदोलन को लोक-चेतना की दृष्टि से समझने के परिप्रेक्ष्य में उनके साक्षात्कार को लिपिबद्ध करने के प्रयास को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

प्रश्न: आचार्य जी, आपका पूरा जीवन लोकजीवन के अध्ययन में गुजरा है। सामान्यत: इस प्रकार का अध्ययन लीक से हटकर है। आपकी इस विषय में इतनी रुचि और निष्ठा का कोई विशेष कारण? 

आचार्य जी: मनुष्य जीवन मूल-प्रवृत्तियों से संचालित होता है। स्व प्राकृतिक है, स्वार्थ भी उतना ही प्राकृतिक है। और, स्वार्थों का संघर्ष भी प्राकृतिक है। यह  संघर्ष  पशुओं  और अन्य-प्राणियों में भी होता है। मनुष्य भी प्राणी है। यह बात दूसरी है कि मनुष्य की समष्टि-चेतना  मूलप्रवृत्तियों का संयमन, नियमन, दमन और उन्नयन करती रहती है, आगे भी करती रहेगी। यही मनुष्य  और मनुष्यता की पहचान है। 

प्रश्न: लोक-चेतना के  मूल चरित्र और विशेषताओं को आप किस प्रकार से व्याख्यायित करते हैं?

आचार्य जी: जो जागरण है, वही लोक-चेतना है। लोक-चेतना का एक महत्वपूर्ण लक्षण है – निरन्तरता। लोक-चेतना अन्य लक्षण है – सर्वजन-हित अथवा व्यापक सरोकार। व्यापक सरोकार के बिना समष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। समष्टि जनचेतना या लोक-चेतना का कोई विकल्प नहीं होता। लोक-चेतना प्रायोजित नहीं होती। वह स्वत:स्फूर्त होती है। वह झरने की तरह झरती है, नदी की तरह बहती है, समुद्र की तरह उफनती है और ज्वालामुखी की तरह उबलती है। प्रभाष जोशी  ने  भारत  की इस लोक-चेतना  को भारत  की  अन्तर्निहित अकूत ताकत कहा था। कोई भी कानून या योजना लोकचेतना का स्थान नहीं ले सकती। अन्याय के विरुद्ध  यह समष्टि का सात्त्विक-क्रोध है। इसमें  “मैं” और “मेरे”  की राजस-तामस गन्ध नहीं होती। और,  इस  समष्टिगत और सात्त्विक क्रोध से एक तेज निकलता है और वह तेज भी समष्टि का तेज बन जाता है। वही महाशक्ति है। अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध वह  जागरण शक्ति है, सामूहिक शक्ति है। यह लोक-चेतना है, अक्षय-ऊर्जा का अव्ययस्रोत।

लोक-चेतना में अध्यात्म का सूत्र अन्तर्निहित होता है। सच तो यह है कि लोक-चेतना अध्यात्म है। सत्ता के तर्कशास्त्री जो कहना चाहें कहते रहें, सच यह है कि आस्था के बिना लोक-चेतना जगती भी नहीं, सर्व के प्रति आस्था, समष्टि के प्रति आस्था, सामान्य के प्रति आस्था। मनुष्य और मनुष्य के बीच सघन संबंध और परस्पर भरोसा अध्यात्म की ही देन है। अध्यात्म का मायने संकीर्ण नहीं हो सकता, खंडित अहम्‌ का नाम आत्म नहीं है। आत्म तो व्यापक है, जिसमें सर्व समाया हुआ है, जिसमें पूर्ण समाया हुआ है। 

प्रश्न: आपके अनुसार लोक-चेतना का एक महत्वपूर्ण अध्याय कौनसा है?

आचार्य जी: हमारा स्वतंत्रता आंदोलन लोक-चेतना का एक विशेष उदाहरण है, जिसका अध्ययन अनेक दृष्टिकोणों से अन्यान्य विद्वानों द्वारा किया गया है। किंतु, स्वतंत्रता आंदोलन को समग्रता में समझने के लिए समष्टिगत सामूहिक जागरण-शक्ति के संचार की भूमिका का अध्ययन आवश्यक है। और, यही जागरण शक्ति लोक-चेतना है। 

आज़ादी की लोक-चेतना सत्य के आग्रह के साथ जगी थी, सत्य के आग्रह से बड़ा  कौन सा अध्यात्म हो सकता है ?  यही कारण है कि संविधान का सूत्रवाक्य बना- सत्यमेव जयते। सत्यमेव जयते अध्यात्म का ही सूत्र है। सच्चाई, ईमानदारी, सामाजिकता का भाव, श्रम, समानता, लोक-कल्याण स्वतन्त्रता-आन्दोलन के जीवन-मूल्य हैं। 

भारत में विविध अनुवांशिकता, विविध जातियाँ, विविध भाषाएं, संस्कृतियाँ और धर्म-संप्रदाय हैं, तब स्वतंत्रता-संग्राम के रूप भी विविध हो तो यह स्वाभाविक ही है। आन्दोलन के विविध स्तर और विविध रूप हैं। यह विविधता लोक-चेतना का लक्षण है। स्वतंत्रता संघर्ष का तरीका कोई एक जैसा नहीं है, कोई बम फ़ेंक रहा है, तो कोई कविता लिख रहा है, कोई नारा लगा रहा है तो कोई अखबार में लेख लिख रहा है, कोई नमक बना रहा है तो किसी ने विदेशी वस्त्रों की होली जलायी है, किसी ने वन्देमातरम का नारा लगाया है तो किसी ने जय हिन्द का नारा लगाया है। किसी ने जुलूस में तिरंगा उठाया था तो किसी ने स्वराजियों का जय-जयकार ही किया था, किसी ने जुलूस पर पुष्प बरसाये, तो किसी ने जेल जाने वाले शहीदों को माला पहनायी, किसी ने खादी की टोपी पहन कर ही बगावत का रूप दिखा दिया था। एक नहीं कितने ही तरीकों से लोग अपने विद्रोह की अभिव्यक्ति कर रहे थे। 

इतिहास  के अध्येता सत्याग्रह-आन्दोलन और क्रान्तिकारी-आन्दोलन को  लेकर इस प्रकार वाद-विवाद करते रहते हैं जैसे स्वतन्त्रता का संग्राम अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध न होकर उनके परस्पर विरोध में हो रहा था। बल्ब और ट्यूब जल रहे हैं, ए.सी. चल रहे है, कम्प्यूटर भी चल रहे हैं, माइक भी चल रहा है किन्तु विद्युत-धारा तो एक ही है न।  इसी प्रकार समग्रता में सोचने की जरूरत है कि जो सशस्त्र-क्रान्तिकारी हैं, वे भी लोक-चेतना से उद्वेलित हैं और जो सत्याग्रही हैं, वे भी लोक-चेतना से ही प्रेरित हैं। ध्येय एक है, लक्ष्य एक है: स्वतन्त्रता। लोकसाहित्य में क्रान्तिकारी-आन्दोलन को लेकर डा. विश्वामित्र उपाध्याय का शोध-प्रबन्ध प्रकाशित हो चुका है।  

प्रश्न: हमारी आज़ादी के आंदोलन और लोक-चेतना के आपसी सम्बन्ध को आप किस प्रकार से देखते हैं? 

आचार्य जी:  लोक-चेतना का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है  –  सर्वजन-हित  अथवा व्यापक सरोकार। व्यापक सरोकार के बिना समष्टि की कल्पना ही नहीं की जा सकती। स्वतन्त्रता-संघर्ष की प्रेरणा में मानुष-भाव प्रतिष्ठित है: सर्वजन-हित। यदि कोई व्यक्ति स्वतंत्रता-आन्दोलन को सत्ता-परिवर्तन का आन्दोलन समझता है तो  हमें संदेह है कि वह स्वतन्त्रता को जानता भी है या नहीं। हमें संदेह है कि  वह  आन्दोलन को, लोक को और लोक-चेतना को समझता भी है या नहीं। स्वतंत्रता-आन्दोलन की चेतना समग्र चेतना है, वह सामाजिक-चेतना भी है, आर्थिक-चेतना भी है और सांस्कृतिक-चेतना भी। स्वतंत्रता-आन्दोलन की चेतना में मनुष्य और मनुष्य के संबंध की भी चिन्ता है और मनुष्य तथा प्रकृति के संबंध की भी चिन्ता है।   

स्वतंत्रता-आन्दोलन मध्यकालीन-वैचारिक परिवेश से आधुनिक वैचारिक-परिवेश में संक्रमण का आन्दोलन है। स्वतंत्रता-आन्दोलन सामन्तशाही से लोकतन्त्र के युग में संक्रमण का आन्दोलन है। स्वतंत्रता-आन्दोलन में वैश्विक-दृष्टिकोण का विकास है, भारत की समष्टि-मेधा का विश्व के विभिन्न देशों के साथ संवाद हो रहा है। स्वतंत्रता-आन्दोलन राष्ट्र में अभिनव जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा का आन्दोलन है। स्वतंत्रता-आन्दोलन की समस्त गतिविधियाँ स्वतन्त्रता रूपी ‘युगसत्य’ की परिक्रमा कर रही हैं।

जब किसी एक अवधारणा को समूचा जमाना जीवन के प्रयोजन के रूप में स्वीकार कर लेता है, वह उस समय का युगसत्य होता है। जो शब्द  लोकजीवन में उतर कर व्यापक बन जाता है, तब उस शब्द का अर्थ भी उतना ही व्यापक बन जाता है। जितने लोग अपने अपने भाव से, अपने अपने परिवेश में उस शब्द को  जितने अर्थों में ग्रहण करते हैं, वे सभी अर्थ उस शब्द में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।

प्रश्न: उपरोक्त व्याख्या के आधार पर कुछ सटीक उदाहरण?

आचार्य जी: स्वतन्त्रता का संघर्ष दो-चार-दस-बीस-पचास, लाख -दो लाख आदमियों का संघर्ष नहीं है,  सर्वसाधारण अगणित लोग हैं, कोटि-कोटि जन हैं।  बिना  भेदभाव के विविध जाति, विविध वर्ग, विविध संप्रदाय, विविध स्तर। कितने लोगों ने सभाओं में भाग लिया, कितने लोगों ने कहाँ-कहाँ जुलूस निकाला, कितने लोगों ने पुलिस की लाठी और बेंतों से पिटाई झेली?  कोई गिनती नहीं है। बंकिम चन्द्र चटर्जी कहते हैं – कोटि-कोटि कंठ कल-कल निनाद कराले। जनता की इतनी व्यापक और प्रचंड शक्ति को देख कर ही उस जमाने  की समष्टि-मेधा ने जनता को “जनार्दन” कहा। देश के कोने-कोने में व्याप्त स्वतन्त्रता का आन्दोलन किसी एक-दो-चार या सौ जगहों पर नहीं हो रहा, भारत के कोने-कोने में, विभिन्न-प्रदेशों, जनपदों, जंगलों, पहाड़ों, नगरों, गाँवों में, यत्र-तत्र-सर्वत्र स्वतन्त्रता का स्वर गूँज रहा था। स्वतन्त्रता के  आन्दोलन को लेकर हजारों-हजारों लेख छप चुके हैं, भले ही उस समस्त सामग्री की बिबलियोग्राफ़ी  अभी तक देखने में नहीं आयी।

प्रश्न: क्या समाज सुधार आंदोलन को भी आप स्वतंत्रता आंदोलन की लोक-चेतना का हिस्सा मानते हैं?

आचार्य जी: निरन्तरता के संदर्भ में हमें यह ध्यान में रखना होगा कि बंगाल का वह  नवजागरण स्वतन्त्रता-आन्दोलन से अलग नहीं है। ब्रह्म-समाज स्वतन्त्रता की उस लोक-चेतना से भिन्न नहीं है। कोई इतिहासकार स्वामी दयानन्द के आर्य-समाज आन्दोलन स्वतन्त्रता-आन्दोलन से भिन्न समझे तो उसकी बुद्धि की आरती ही उतारी जानी चाहिए। क्या स्वामी विवेकानन्द की टेर ने आज़ादी के आन्दोलन की पृष्ठभूमि  की रचना नहीं कर दी थी? जागरण क्या होता है? वही तो लोक-चेतना है। भारतीय नवजागरण  भारत के स्वाधीनता-संघर्ष की पृष्ठभूमि है, नवजागरण को अलग करके देश के स्वतन्त्रता-संघर्ष को नहीं समझा जा सकेगा। क्या अरविन्द घोष को हम भूल सकेंगे, जिन्होंने गरम दल को बौद्धिक-आधार प्रदान किया था?  क्या बंकिम का योगदान कुछ कम था, जिन्होंने आन्दोलन के लिए वन्दे मातरम के रूप में समग्र भारत माँ का समष्टि रूप प्रस्तुत किया था। राजा राम-मोहनराय ने प्रेस एक्ट के विरुद्ध इतना लिखा,  लन्दन तक गये, यह स्वतन्त्रता-आन्दोलन से भिन्न नहीं है?

प्रश्न: लोकगीतों में आज़ादी की लड़ाई की गूंज के कुछ उदाहरण?

आचार्य जी: स्वतन्त्रता-आन्दोलन में लोकगीतों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी। आप प्रत्येक जनपद के उन लोकगीतों पर एक नजर डालिये, जो राष्ट्रीय-आन्दोलन के दिनों में भारत के आकाश में गूंज रहे थे।  भारत-माता के पुत्रों को लोकगीत ने उत्तेजित किया था। विभिन्न जनपदों में स्वराज की आल्हा लिखी गयी:

सिंहिन बेटा एकई जनमें जाकौ भय मानें संसार,

पेंतीस कोटि जनि कें दुख पाबै, त्यारे जीवन कों धिक्कार।

दुष्ट मुएँ, मोरे पल-पल होते अवार ,क्यों डरो डार गले फाँसी,

सूधा सूरा स्वर्ग को जाऊँ ,धरम राय को बिथा सुनाऊँ,

और हर से माँग भगतसिंह को लाऊँ, भारत को हजार, 

क्यों डरो डार गले फाँसी।

महात्मागांधी ने पंजाब की एक सभा में देवेन्द्र सत्यार्थी को लोकगीत गाने के लिए आमन्त्रित किया था और कहा था कि जो असर लोकगीत का हुआ वह शायद मेरे भाषण से न हुआ होता ।

चरखा और  खादी स्वदेशी का प्रतीक बन चुके थे।  चरखे को लेकर जनपदीय साहित्य में हजारों गीत हैं। विभिन्न प्रदेशों और जनपदों में स्वतन्त्रता-संग्राम की इतनी लोकगाथा और कहानियाँ हैं कि उनको लेकर एक स्वतन्त्र अनुसंधान किया जा सकता है। उदाहरण के लिए भोजपुरी में बाबू कुंवर सिंह  की गाथा है –

एह रजपूती हाड़ माँस में दुर्गा जी के वास भइल, 

रणचंडी काली करालिनी के भी द्सि आसिरबाद भइल।

काँपि गइल अंग्रेजी शासन लार्ड गवर्नर माने हार, 

ई रजपूती सान कबों ना मानें केहू के ललकार।

मंगलपांडे के गीत हैं –

जब सत्त्तावन की रार भइल, 

बलिया के मंगलपांडे के बलिवेदी से ललकार भइल, 

खउलल तब खून किसानन के, 

जागल तब जोश जवानन के। 

बंदूक दगिल दन दनन दनन गोरे गोरे कप्तानन के।

[आउवा ] राजस्थान में  अंग्रेजों के द्वारा लूट, हत्या, विध्वंस और दमन के विरुद्ध जो विद्रोह हुआ उसकी चर्चा अभिजन-साहित्य में कौन करता है?  लेकिन, लोकसाहित्य में उसकी याद सुरक्षित है: 

आयौ इंगरेज मुलक के ऊपर, आहंस लीधा खैंच उरा।

 धणियाँ मरै न दीधी धरती, धणियाँ ऊभा गई धरा।

फ़ौजा देख न कीधी फ़ौजाँ, दोयण किया न खळाँ डळा।

खवा खाँच चूड़ै खवन्द रै, उणहिज चूड़ै गई यला।फ़िरंगियों से लड़ने वाले  विभिन्न वीर नायकों की कहानियाँ विभिन्न जनपदों  में प्रचलित हैं। राजस्थान की एक गाथा है – डूँगजी।

जयपुर- जोधपुर- बीकानेर के राजाओं ने कंपनी-सरकार से दोस्ती कर ली लेकिन बठोठ के ठाकुर  डूँगजी ने बगावत कर दी। ददरेवे का ठाकुर अंग्रेजों से टकराया था। बीकानेर के पेमा बावरी ने भी अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। बावरी जाति का था लेकिन इलाके के चार हजार आदमी उसके साथ हो गये थे। डूँगजी जवार जी बागी बन गये। शेखावाटी की सरहद पर फ़िरंगियों की पलटन थी, डूँगजी जवार जी  ने हमला बोल दिया और अंग्रेज-पलटन के घोड़े लूट लिये। उसके बाद फ़िरंगियों के खजाने लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। राजस्थान के गाँवों में डूँगजी जवार के किस्से प्रचलित हैं:

जै कोई जणती राणियाँ डूँग जस्यो दीवाण।

तो इण हिन्दुस्तान में फ़लतो नहिं फ़रंगाण।

जनपदीय-भाषाओं का लोकसाहित्य है, जिसमें  फ़िरंगियों [अंग्रेजों ] के विरुद्ध बगावत का स्वर कितना बुलन्द है। कितनी गाथाएं हैं, कितनी कहानियाँ हैं और कितने गीत हैं। वृन्दावन लाल वर्मा ने रानी लक्ष्मीबाई उपन्यास लिखा, उन्होंने जगह जगह स्वीकार किया है कि उनके कथानक का आधार लोकजीवन में प्रचलित कथाएं  और अनुश्रुतियाँ हैं । झलकारी बाई  जैसे पात्र  उनको  लोकजीवन  में मिले हैं। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने एक अमर गीत  लिखा –

खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी। 

बुन्देले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी।।

इस बात में रत्ती भर भी सन्देह नहीं, कि सुभद्रा-कुमारी चौहान का  यह गीत हिन्दी के अमर गीतों में से एक है । किन्तु आप ध्यान दीजिये झाँसीवाली रानी की कहानी किन से सुनी? सुभद्राजी स्वयं कह रही हैं – बुन्देले हरबोलों के मुंह। हरबोले लोकगायक ही तो हैं। निश्चित ही सुभद्राकुमारी चौहान के इस गीत की महिमा बखानने योग्य है परन्तु लोकवार्ता मनीषी श्री रामनारायण उपाध्याय कहते हैं कि स्वतन्त्रता-आन्दोलन में सन्‌ सत्तावन की तलवार को नई धार देने वाले साहित्यकार का जितना महत्त्व है उतना ही महत्त्व लोकगायक हरबोलों का भी है, जिन्होंने उस तलवार की चमक को मशाल की तरह अपनी जुबान देकर उसे सुरक्षित रूप से युग के हवाले कर दिया। बुंदेले हरबोलों  का गीत है:

“खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी।

पुरजन पुरजन तोपें लगा दईं, अरे गोला चलें असमानी।

खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी।

सबरे सिपाइन कों पेरा जलेबी, अपन चलाई गुरधानी।

खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी।

छोड़ मोरचा जसकर कों दौरी, ढूँड़े मिलै न पानी।

खूब लड़ी मरदानी, अरे झाँसी वारी रानी।”

स्वामी सहजानन्द सरस्वती के किसान -आन्दोलन का सूत्रपात बहव और बडहिया गांव से होता है।

वहां से वे पटना पंहुचते हैं, अलख जगाते हैं।

गांव का किसान उनसे अपील करता है – ओ जोगी, अब तुम दिल्ली जाओ और सारे हिन्दुस्तान में अलख जगाओ।

बहव गइले बड़हिया गइले,

गइले पटना नगरिया हो राम,

जाहु-जाहु दिल्ली तुम जोगिया अलख जगाओ हो राम,

पेड़ सोबै अधरतिया ,पतई दुपहरिया हो राम,

कहक से आवै ए जोगिया अलख जगावे हो राम।

प्रश्न: लोकगीतों के अलावा तत्कालीन साहित्य और संस्कृति में भी स्वतंत्रता आंदोलन की लोक-चेतना के स्वरों का भी आपने अध्ययन किया ही होगा?

आचार्य जी: स्वतन्त्रता-संघर्ष की चेतना में मानवीय संवेदना है। सचाई तो यह है कि लोक-चेतना मूलत: मानवीय-चेतना होती है, वह जातिचेतना, वर्गचेतना, मजहबी चेतना, भाषायी और क्षेत्रीय-संकीर्णता से ऊपर की बात है। यह मानवीय-संवेदना ही थी जिसने मनुष्य के प्रति करुणा का रूप ग्रहण करके देश की सीमा का अतिक्रमण किया था। नहीं तो रोमा रोलाँ जैसे अनेक विदेशी नर और नारी भारत की स्वतन्त्रता के समर्थक कैसे बन जाते? खुदीराम बोस की फाँसी की सजा की गूँज रूस के लेनिन तक पँहुची थी। इस प्रसंग को लेकर २३ जुलाई १९०८ के अपने पत्र प्रोलेटारी में लेनिन ने लिखा था कि भारत में अब सडकें भी अपने लेखकों और राजनैतिक-नेताओं के नाम पर उठ खडी हुई हैं। इस समय अंग्रेजी शासकों ने भारतीय लोकतन्त्रवादी तिलक को जो भयंकर सजा दी थी, थैलीशाहों के नौकरों ने लोकतन्त्रवाद के विरुद्ध जो बदला लेने वाला कदम उठाया है, उससे बंबई की सडकों पर हडताल और प्रदर्शन हुए हैं।

स्वतन्त्रता-आन्दोलन का रूप लोकोन्मुखी है। लोकोन्मुखी कार्यक्रम हैं। लोकोन्मुखी अवधारणाएं आन्दोलन को शक्ति दे रही हैं। लोकपर्व, लोकोत्सव, लोक आस्था, लोक विश्वास स्वतन्त्रता के आन्दोलन को शक्ति दे रहे हैं। बालगंगाधर तिलक ने १८९३ से महाराष्ट्र में गणेश-उत्सव का सूत्रपात किया। जाति -वर्ग का भेद मिट गया। इस रंगमंडप में जो भी सम्मिलित हुआ, वह देशभक्त हो कर निकला। ब्रिटिश सरकार इस लोकोत्सव से परेशान हो गयी, यहां प्रदर्शित होने वाले नाटकों को लेकर खुफिया रिपोर्टें इंग्लेंड भेजी जाती और उन नाटकों को प्रतिबंधित किया जाता, उन पर आरोप लगाया जाता कि ये ब्रिटिश-अधिकारियों की हत्या करने को प्रेरित करने वाले हैं। लार्ड मिंटो की हत्या के प्रयास और कलेक्टर जैक्सन की हत्या के पीछे गणेश-उत्सव को जिम्मेदार माना गया और कहा गया कि यह लोकोत्सव राजद्रोही है। जब बालगंगाधर तिलक बंगाल गये तो शिवाजी-उत्सव मनाया गया और दुर्गा पूजा के पंडाल बनाये गये। एक परंपरा का प्रवर्तन हुआ। महामना मालवीय ने कुंभ के अवसर पर स्वतन्त्रता की टेर लगायी, हरिद्वार में कथा-सत्याग्रह किया। लावणी के माध्यम से देशभक्ति का भाव जगाया जा रहा है। बेलगाम में  गीगी पदों से लोगों को आन्दोलन में सम्मिलित किया गया। बैंगलूर में कीर्तनकारों की भूमिका उल्लेखनीय थी। मेले के आयोजन के संदर्भ में हम बंगाल के उस मेले को नहीं भूल सकते जिसे हिन्दू मेला कहा गया था। १८६२ में राजनारायण बोस, नवगोपाल मित्र, ज्योतिरिन्द्रनाथ ठाकुर, भूदेव मुखर्जी ने इस मेले का आयोजन प्रारंभ किया जो दस बरस तक चलता रहा और जिसमें गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने देशभक्ति  की कविताओं का पाठ किया। 

भारत माता की अवधारणा लोक-अवधारणा है?  निर्गुणब्रह्म शास्त्र की बात है, मेधावी वर्ग  की बात है।लोकमानस तो सगुण-साकार का उपासक है, भाव का उपासक है। भारत का भौगोलिक-विस्तार, कोटि-कोटि जन का विस्तार तथा विविध-संस्कृतियों या उपसंस्कृतियों  का विस्तार कितना व्यापक है। 

जहाँ पँहुच अनजान क्षितिज को,

मिलता एक सहारा, 

अरुण यह मधुमय देश हमारा। 

बरसाती आँखों के बादल बनते,

जहाँ भरे करुणा जल,

लहरें टकरातीं अनन्त की, 

पाकर जहाँ किनारा। 

उस जमाने के साहित्यकार स्वाधीनता के आन्दोलन के साथ-साथ चलने लगे। उनके साहित्य के माध्यम से हम उस लोक-चेतना का साक्षात्‌ कर सकते हैं। उदाहरण के लिए प्रेमचन्द का साहित्य स्वतन्त्रता-आन्दोलन की चेतना से आप्लावित है,  महात्मा-गांधी का भाषण  सुन कर उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी। उनका उपन्यास गोदान उस जमाने के द्वन्द्व का साकार स्वरूप है। निश्चित ही रंगभूमि उपन्यास ही है किन्तु वह राष्ट्रीय-आन्दोलन की जीवित गाथा है, समसामयिक इतिहास है। यहाँ उनकी एक कहानी का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहूँगा। कहानी है ‘जुलूस’। इस कहानी से हम उस जमाने के जनजीवन और लोक-चेतना के उद्वेलन को समझ सकते हैं। 

“स्वराजियों का जुलूस निकल रहा है, पटरी पर खड़े होकर  दो  दूकानदार बात कर रहे हैं। एक सेठ कह रहा है : सब के सब काल के मुंह में जा रहे हैं, आगे सवारों का दल है, मार-मार कर भगा देगा।

दूसरा सेठ बोला: महात्माजी सठिया गये हैं, जुलूस निकालने से स्वराज्य मिल जाता तो अब तक कब का मिल गया होता। और देखो, जुलूस में हैं कौन? लोंडे, लफ़ंगे, सिरफ़िरे। शहर का कोई बड़ा आदमी नहीं है। 

मैकू उन सेठों की बात सुन कर हँसने लगा। सेठ बोला: क्यों हँसा मैकू?  मैकू बोला: बड़ा आदमी जुलूस में क्यों होगा? वह तो महलों में रहता है, उसे क्या तकलीफ़ है? बड़े आदमियों ने ही तो मिट्टी खराब कर रखी है।

जुलूस आगे बढ़ रहा था कि नये दरोगा ने डीएसपी को आते देख कर कारगुजारी दिखायी और घोड़ों को जुलूस पर चढा दिया। घोड़े ने दोनों पैर उठाये तथा जुलूस के आगे चलने वाला आदमी घोड़े की टापों के नीचे आ गया। दरोगा का लट्ठ पड़ा और उसकी खोपड़ी खुल गयी।पुलिस के डंडे बरसने लगे और जुलूस के लोगों के सिर फ़ूट गये। बाजार में सन्नाटा छा गया। दूकानदार अपनी दूकान बढ़ा कर उसी दिशा में आने लगे, एक दिन तो मरना ही है, जो कुछ होना है हो जाय, आखिर ये लोग  सभी के लिए जान दे रहे थे। जो लोग जुलूस का तमाशा देख रहे थे वे भी घटना-स्थल पर आ गये। भीड़ होने लगी और उन्माद भी जगने लगा। उनका हुजूम देखा तो पुलिस वाला दल खिसक लिया।

जनता में सहानुभूति की लहर दौड़ गयी। जिस दरोगा ने जुलूस के नायक पर प्रहार किया था उसकी पत्नी को जब अपने पति की कारिस्तानी पता चली तो वह बिगड़ गयी। तुम अपने ही लोगों को घोड़ों से कुचल कर जवाँमर्दी दिखा रहे थे? तीन-चार दिन बाद  जुलूस का नेतृत्व करने वाला वह नायक मर जाता है जिसके सिर पर घोड़े की टाप और दरोगा की लाठी लगी थी। उसके शव को लेकर स्वराजियों का जुलूस निकला तो शहर उमड़ पड़ा। दरोगा की बीबी जुलूस में महिलाओं की टोली में सबसे आगे थी।”

प्रश्न: मिथक और लोक को अलग अलग से नहीं देखा जा सकता है। दोनों एक दूसरे में गुत्थे हुए हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में मिथकों की भूमिका पर कुछ प्रकाश डालिएगा।

आचार्य जी: लोकमानस मिथकीय बिंब और मिथकीय भाषा में सोचता है। जो लोग मिथक को मिथ्या समझते हैं, वे मिथक को नहीं जानते। वे मिथक की प्रत्यक्ष शक्ति और प्रभाव  को देख कर भी नहीं देख पाते। वे नहीं समझ सकते कि मिथक लोकचेतना का यथार्थ है, सत्य है। मिथक समष्टि को आन्दोलित करता है, प्रेरित करता है, उत्तेजित करता है, लोकभावों का संचार करता है। 

माना कि भारत माता किसी  नारी-विशेष का नाम  नहीं है। मातृ-उपासना की प्राचीन लोक-परंपरा  ने मानो नया अवतार  धारण कर लिया। “वंदे मातरम्‌”  बंगाल के लोकमानस का स्वर है। 

समष्टि का स्वर गूँजा – भारतमाता की जय, जैसे लोकमानस में  बिजली दौड़ गयी। प्राणों का संचार हो गया। भारतमाता की जय – यह कोटि-कोटि जन की एकता का मन्त्रघोष है, समष्टि का मन्त्रघोष है। यह समष्टि के भावों का विस्फोट है, बगावत है, क्रान्ति है। भारतमाता की जय- यह सामूहिकता का भावसूत्र है। सामूहिक-स्वीकृति का कोई विकल्प नहीं होता। यह लोकतन्त्र की शक्ति है। अन्याय-अत्याचार-विषमता के विरुद्ध बगावत का इतना प्राणवान स्वर दूसरा और कौन सा है?  इस  मन्त्रघोष  ने जनता को जगाया, उसमें प्राणों का संचार  किया। आजादी के आन्दोलन में जब भारतमाता की जय का नारा गूंजता तो अंग्रेज सरकार कांप जाती थी। भारतमाता की जय कहने से वे इतने घबराते थे कि इस आवाज को बन्द करने के लिये कोड़े लगाते थे। बगावत की चिंगारी सुलग चुकी थी। लोग कोड़े खाते किन्तु भारतमाता की जय बोलते जाते थे।

भारतमाता  की तरह रामराज्य की  अवधारणा भी लोकअवधारणा है। न जाने कब से लोकमानस में यह अवधारणा समायी हुई है: दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज काहू नहिं व्यापा। स्वराज्य की  अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए महात्मा गाँधी ने रामराज्य का मिथक प्रस्तुत किया। लोकमानस जटिलताओं में नहीं जाता। रामराज्य के मिथक से  लोगों के मन में स्वराज्य की भावना स्पष्ट हो गयी । 

राष्ट्रीय-आन्दोलन की टेर गांव-गांव में गूंज रही थी।

प्रश्न: जब हम लोकचेतना की निरंतरता की बात करते हैं तो स्वतंत्रता आंदोलन की लोकचेतना को सन १८५७ की बग़ावत से पहले कैसे देखा जाए?

आचार्य जी: ध्यान में रखने की बात है कि स्वतन्त्रता का संघर्ष १८५७ से भी पहले से चल रहा था लेकिन उसका लक्ष्य पूर्ण स्वराज्य नहीं है, जैसे-जैसे  लोकचेतना का  विकास होता रहा, वैसे वैसे संघर्ष  के उद्देश्य का भी विकास होता रहा और १९२९ के  लाहौर अधिवेशन में रावी नदी के तट पर पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

जनजातियों के संघर्ष पर तो बहुत कम ध्यान दिया गया है। छोटा नागपुर के विद्रोह को देखिये न!  चुनमुन कहार थे और सोना माँझी संथाल थे। हिमाचल में बुशहर रियासत के किसानों के विद्रोह और चंबा के किसान- आन्दोलन की चर्चा कौन करता है?  झारखंड में धालभूम का विद्रोह हुआ, पहाड़िया विद्रोह हुआ, संथाल परगना की भूमि पर तिलका माँझी का विद्रोह हुआ। सरगुजा, भोगनाडीह, पलामू का विद्रोह; क्या ये लोकचेतना नहीं है ?  झारखंड की धरती से कितने विद्रोह हुए:  मुंडा-विद्रोह, चुआड़-विद्रोह, उराँव विद्रोह, खेरवार-विद्रोह। पूर्वोत्तर भारत में रियांग, मेइते, मिशिंग, चकमा, गुरंग तमांग आदि आदिवासी समुदायों को विस्मृत नहीं किया जा सकता, जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध जम कर संघर्ष किया। सिंगपो और खासी समुदायों ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबाने को बाध्य कर दिया था। छ्तारी के ऊदैया चमार ने  सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। अलीगढ के गाँवों में उसकी कहानियाँ सुनी जा सकती हैं। १८०७ में उसे अंग्रेजों ने पकड़ लिया और फ़ाँसी दे दी। 

 ‘धरती बाबा’  के नाम से प्रसिद्ध विरसा मुंडा की महिमा को कितना पहचाना गया है ?  पैट्रियट अखबार की वह कटिंग मेरे पास सुरक्षित है, जिसमें  डाक्टर बी एम शंखधर  [जवाहरलालनेहरू विश्वविद्यालय]  ने ब्रिटिश-म्यूजियम,लन्दन में मई १८२४ के अंग्रेजी-समाचार-पत्र में छपी एक खबर को नये सन्दर्भ में पुन: प्रकाशित किया था, जिसमें बताया गया था कि १८२४ में जो पिंडारियों का नेता अंग्रेजों से लडता हुआ मारा गया था, उसकी जेब से एक ब्रजभाषा-कविता मिली थी। उस कविता में हिन्दू, मुसलमान और राजपूतों का आह्वान किया गया था कि वे सब मिल कर अंग्रेजों के विरुद्ध खड़े हो जाएँ। यह घटना बंकिमचन्द्रचटर्जी के वन्देमातरम से ५० साल पुरानी है। अंग्रेजी-जमाने में पिंडारियों को असभ्य और खूंखार माना जाता था। पिंडारी ही नहीं, ऐसी अन्य जनजातियों ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज उठायी थी, जिन समुदायों को अंग्रेजों ने क्रिमिनल घोषित कर दिया था। मुझे याद है, जब मैं भूभरिया और बंजारी जाति की संस्कृति का सर्वेक्षण कर रहा था, तब जानकारी मिली कि शहर में चोरी होती है तो सबसे पहले थाने-कोतवाली में उनको याद किया जाता है। 

आप गुंडा शब्द को ही ले लीजिये। गुंडा शब्द  कन्नड़ का है, मोक्षगुण्डम शब्द है। यहां निश्चित ही मोक्ष से जुडा गुंडं शब्द उदात्त अर्थ का वाचक है। गुंडा व्यक्तिनाम था, जो कर्नाटक के जंगल में बने मलय दुर्ग का स्वामी था। ईस्ट इंडिया कंपनी के जमाने में मैसूर राज्य में गुंडा आतंक और विद्रोह का प्रतीक बन गया था। देवगिरि की रानी से समझौता करके अंग्रेजों ने मैसूर-राज्य का आधिपत्य राजवंश के एक अबोध बालक को सौंप दिया था। पीछे से उसकी देखरेख पूर्णिया नामक अंग्रेजों का चापलूस करता था। ऐसे समय में गुंडा ने बगावत का झंडा उठा लिया कि अंग्रेजों की नाक में दम हो गयी। विलियम बेंटिंक के द्वारा भेजी फौज ने गुंडा को मार तो दिया था किन्तु गुंडा का भय अंग्रेजों के दिलो-दिमाग पर बना रहा।  गुंडा शब्द यहां आकर व्यक्तिनाम से चलकर विशेषण बन गया। अंग्रेज प्रत्येक ऐसे आदमी को गुंडा ही कहते थे जो बगावती हो, उत्पाती हो, कानून व्यवस्था को न मानता हो। यह शब्द अंग्रेजों के माध्यम से हिन्दी में आया है। ब्रजभाषा के एक कवि ने गुंडपच्चीसी लिखी थी।

लोक-चेतना का एक महत्वपूर्ण लक्षण और है – निरन्तरता। स्वतन्त्रता का संघर्ष दो-चार-छह महीने, साल-दो-साल चलने वाला संघर्ष नहीं है, यह शताब्दी से भी अधिक समय तक चलने वाला संघर्ष  है। १८५७ से पहले के संघर्ष पर जिसे इतिहास के अध्येता “पीजेण्ट एंड ट्राइबल रिवोल्ट ” कह देते हैं तो हमारी नजर ही नहीं जाती। एल नटराजन ने लिखा है कि पहला किसान-विद्रोह सन्‌ १७६७ में त्रिपुरा में हुआ था। 

प्रश्न: हमने तो स्वतंत्रता आंदोलन के कटु अनुभव भी झेले हैं। देश का धर्म के नाम पर विभाजन हुआ, दंगे हुए। क्या लोकचेतना का स्वरूप प्रतिक्रियावादी भी हो सकता है?

आचार्य जी: लोकचेतना का लक्षण है निर्भय हो जाना, संशय मिट जाना, विश्वास जग जाना, अन्याय के विरुद्ध कमर कस लेना, समर्पण-भाव का जग जाना। उसमें निजी लाभ का भाव नहीं होता।समष्टिजनचेतना या लोकचेतना का कोई विकल्प नहीं होता। लोकचेतना विभक्त चेतना नहीं होती। लोकचेतना सर्वचेतना होती है, अविभक्त चेतना होती है। यदि विभक्त चेतना है तो वह जाति चेतना है, मजहबी चेतना है,  पन्थचेतना है, वर्गचेतना है, क्षेत्र चेतना है,  संकीर्ण भाषा चेतना है, किंतु लोकचेतना नहीं है। विभक्त चेतना में जाति, वर्ग, वर्ण, मजहब-पन्थ, क्षेत्रियता आदि  और पार्टियों  के  हित या स्वार्थ का आग्रह होता है।

व्यक्तिचेतना अंग्रेजी साम्राज्य के विरुद्ध देश का  सामान्य जन स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था,  आंदोलित था, यह सच  है। लेकिन, यह  भी सच है कि पुलिस और  सेना में,  प्रशासन में देश के ही लोग थे। वे अंग्रेजों की  नौकरी कर रहे थे। जमींदार और रावराजे अंग्रेजों के खैर ख़्वाह थे। वे खानबहादुर और रायबहादुर की पदवी लेकर इठला रहे थे। अंग्रेजी राज में उनके सात खून माफ होते थे। इस कारण रैयत में उनका आतंक या दहशत बनी रहती थी। उनके सेवक, नौकर-चाकर होते थे, जो अंग्रेजी राज का गुणगान करते थे, किसानों से लगान वसूल करते थे, स्वतंत्रता-सेनानियों की मुखबिरी करते थे। वैयक्तिक-चेतना निजी लाभ की चेतना थी जो जमींदारों, सरकारी- अधिकारियों, उनके वफ़ादारों के मन में थी। उनके मन में डर था।  

अन्त में एक और विचार-बिन्दु। कारण-परंपरा का विश्लेषण परिणाम के आधार पर किया जाता है।  वृक्ष पर आम का फल लगा है, इसका कारण आम का ही बीज है। आम का बीज बोया गया था इसलिए फल भी आम का आया। प्रत्येक युद्ध या संघर्ष का परिणाम  होता है और उस परिणाम के आधार पर उस संघर्ष या युद्ध के स्वरूप का, उसकी शक्ति या निर्बलता का आकलन किया जाता है। स्वतन्त्रता के संघर्ष का परिणाम नकारात्मक रूप में भी सामने आया: ‘देश का विभाजन’। लोकचेतना का विभाजन हुआ तो देश का भी विभाजन हुआ। विभाजन का कारण विभक्त-चेतना थी।

व्यष्टिस्वार्थ और समष्टिहित में संघर्ष कल भी था, आज भी है और आगे भी चलता रहेगा।  व्यष्टिस्वार्थ कभी कभी समष्टिहित के कपड़े पहन लेता है, यह बात मनुष्य जीवन का सच है क्योंकि मनुष्य जीवन मूल-प्रवृत्तियों से संचालित होता है। 

प्रश्न: इस साक्षात्कार के अंतिम सवाल के रूप में क्या स्वतंत्रता आंदोलन की लोकचेतना के विकास को हम भिन्न भिन्न पड़ावों के रूप में चिन्हित कर सकते हैं?

आचार्य जी: लोकचेतना को समझने के लिए हमारे सामने पाँच चित्र हैं। एक चित्र है सन्‌ १७५७ का, दूसरा है अप्रेल  १९१९ का तथा तीसरा चित्र है सन्‌ १९४२ का,  चौथा चित्र है सन्‌ १९४७ का  और  पाँचवाँ चित्र  है १९५० का।

 १७५७ के  प्लासी के युद्ध में  तथाकथित जीत  के बाद भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की स्थापना  हो जाती है। क्या सचमुच में इसे युद्ध कहा जा  सकता है? क्लाइव के पास ३०० सिपाही हैं और नवाब सिराजुद्दौला के पास १८ हजार की फ़ौज है। क्लाइव  नवाब के सेनापति मीरजाफ़र को खरीद लेता है। तथाकथित युद्ध होता है जिसमें अंग्रेजों के ६५ और नवाब के ५०० अर्थात कुल मिलाकर ५६५ सैनिक मारे गए थे, संख्या हजार भी नहीं पहुँची थी और देश गुलाम हो गया। प्लासी के नायक लार्ड क्लाइव ने प्लासी का युद्ध जीतकर जब मुर्शिदाबाद में ७०० सिपाहियों के साथ प्रवेश किया था तब की स्थिति का वर्णन पार्लियामेंट की एक कमेटी के समक्ष किया है: ” नगर के लोग, जो उस समय तमाशा देख रहे थे, कई लाख जरूर रहे होंगे; और यदि वे चाहते तो लकड़ियों और पत्थरों से हम  को वहीं खत्म कर सकते थे।”

अंग्रेज सरकार ने देश में उभर रहे राष्ट्रीय आंदोलन को कुचलने के  लिए मार्च १९१९ में रोलेट एक्ट [Anarchical and Revolutionary Crimes Act, १९१९] कानून बनाया जिसके अनुसार  न वकील, न अपील और न दलील, बिना मुकदमा चलाए  जेल में बंद  या कालापानी,  प्रेस की स्वतंत्रता  समाप्त। मतलब  साफ़ था कि राष्ट्रीय- आंदोलन में भाग मत लो, नहीं तो दमन होगा। महात्मा गाँधीजी ने  सत्य और अहिंसा  के  आधार पर  व्यापक सत्याग्रह -आन्दोलन   का आह्वान किया।   यद्यपि  दूसरे  नेता गांधी की सत्य-अहिंसा की नीति से सहमत नहीं थे, जनचेतना उभार पर थी, देशव्यापी हड़तालें, जूलूस और प्रदर्शन होने लगे, अन्दर ही अन्दर तैयारी अमृतसर में भी  चल रही थी। 

 उस तैयारी से लगा कर और जनरल डायर के दानवी रूप  और भय से अधमरी जनता की दशा तक  का आँखों देखा हाल स्व. ज्ञानी  पिंडीदास ने लिखा था जो जनज्ञान  इत्यादि पत्रों में छपा था।  स्व. ज्ञानी   पिंडीदास  का मकान अमृतसर में कटड़ा दूलों पर था। उन्होंने लिखा है कि उस साल रामनवमी नौ अप्रेल की थी, शोभायात्रा तो प्रतिवर्ष ही निकला करती थी, किन्तु इस साल इस शोभायात्रा में मुस्लिम जनता भी शामिल हो गयी थी। जनचेतना का पहला काम ऐक्य की प्रतिष्ठा का  ही होता है। यह ऐक्य अंग्रेजों को क्राइम जैसा लगा:  रामनवमी की शोभायात्रा नहीं, यह तो बगावत है, उन्होंने हिन्दू नेता डा. सत्यपाल और मुस्लिम नेता किचलू को गिरफ़्तार कर लिया। 

 सवेरे सवेरे यह खबर सनसनाती हुई शहर में फ़ैल गयी।  तेली, नाई, पनवाड़ी, हलवाई, धोबी किसी ने दूकान नहीं खोली।  हजारों लोग इकट्ठा हुए, सिविल लाइन की तरफ़ चल दिये।  फ़ौजी टुकड़ियाँ  तैनात थी, गोली चला दी। आठ दस हिन्दू और मुस्लिम मारे गये। इससे भीड़ बेकाबू हो गयी। लूट, आगजनी, तोड़फ़ोड़, मालगोदाम, डाकघर, बैंक, टाउनहाल आदि का सिलसिला शुरू हो गया।  चार-पाँच अंग्रेज भी  जनता की प्रतिहिंसा की भेट चढ़ गये। अगले तीन दिन शहर में पुलिस नहीं दिखी,  जनता के स्वयंसेवक ही अन्न-जल और दूसरी व्यवस्था करते रहे।  

१३ अप्रिल को वैशाखी थी। पूरे पंजाब की जनता हरिमन्दिरसाहब में आती है। उस दिन दोपहर हंसराज सुनार ने मुनादी कर दी कि जलियाँवाला बाग में कन्हैयालाल ऐड्वोकेट की अध्यक्षता में सभा होगी।  दोपहर-बाद पुलिस-इन्स्पेक्टर जीप पर निकला और शहर में मार्शल ला लागू करने की घोषणा कर दी कि पाँच से अधिक भीड़ इकट्ठी हुई तो गोली चला दी जायेगी । 

ज्ञानी पिंडीदास कुछ मित्रों को लेकर सभास्थल पर पँहुच चुके थे। अध्यक्ष  की कुर्सी पर  कन्हैयालाल ऐड्वोकेट की  तसवीर थी  और गुरुबख्शसिंह का भाषण चल रहा था। ज्ञानी  पिंडीदास  भारी भीड़ देख कर लौट रहे थे कि जनरल डायर पचास गोरे जवानों के साथ पश्चिमी गेट से घुसा और जवानों को पंक्तिबद्ध करके  हुक्म दे दिया – फ़ायर। एक क्षण में हाय-पुकार मच गयी। चीखों से कान फ़टने लगे।  बारह-चौदह सौ लोग मरे और तीन हजार लोग घायल हो गये। कुछ तो मरने से भी बुरे।  

८ अगस्त  सन्‌ १९४२ की रात को १२ बजे भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित हो गया। और,  ९ अगस्त को सूर्योदय से पहले ही महात्मा गांधी, नेहरू, पटेल, मौलाना आजाद, राजेन्द्र बाबू, गोविन्दबल्लभ पन्त, आचार्य कृपलानी, पट्टाभि सीतारमैया, आसफ अली, अशोक मेहता, सरोजिनी नायडू आदि नेता गिरफ्तार कर लिये गये। सबेरे जैसे ही लोगों को पता चला कि नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया है वैसे ही मुंबई में जनसमुद्र उमड़ पड़ा। अरुणा आसफ अली ने उसी पंडाल में मंच पर चढ़ कर झंडा फहरा दिया। करो या मरो की क्रान्ति चिंगारी देखते देखते ज्वाला बन गयी और उसकी लपटें महाराष्ट्र, बिहार, उत्तरप्रदेश, गुजरात आदि अन्यान्य प्रदेशों में भभकने लगी। ब्रिटिश सेना के जनरल मोल्सवर्थ ने लिखा था कि हमें विद्रोह का मुकाबला करने के लिए साढ़े सत्तावन बटालियन फौज का इस्तेमाल करना पड़ा। वायसराय लिनलिथगो ने प्रधानमन्त्री चर्चिल को लिखा कि सैन्य सुरक्षा की दृष्टि से हम यह बात दुनियाँ से छिपा रहे हैं। सच यह है कि हमें बहुत प्रखर विद्रोह का सामना करना पड़ रहा है।

चौथा चित्र १९४७ में भारत के विभाजन की विभीषिका का है, साम्प्रदायिक-उन्माद की विभीषिका। पंजाब में ५५ हजार सशस्त्र सैनिक थे लेकिन वे हिंसा को नहीं रोक पाये। देश का विभाजन हुआ और इधर बंगाल और उधर अमृतसर से लाहौर तक धरती पर  लाशें बिछ गयीं। ध्यान देने की बात है कि लार्ड कर्जन ने १९०५ में बंगाल का विभाजन किया था।  यह कूटनीति किसके विरुद्ध थी ? यह उस लोक चेतना के विरुद्ध थी जो समष्टि-भाव से एकजुट हो कर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दे रही थी।  सत्ता का सरोकार  लोकमानस और लोकचेतना को विभक्त करता है। जब स्वराज आता दिखने लगा तब जाति, पन्थ, भाषागत संकीर्णता, संकीर्ण प्रान्तीयता, दलगत स्वार्थ के भेद उभरे और उभारे जाते जाते रहे। २२ मार्च १९४० को लाहौर-अधिवेशन में जिन्ना ने साफ-साफ कह दिया कि हिन्दू-मुसलमानों का खानपान-रीतिरिवाज भिन्न-भिन्न है, वे एक राष्ट्र कैसे बन सकते हैं?  यही काम हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथ ने किया। इस विभक्त चेतना को तत्कालीन सत्ता से ऊर्जा मिली और उस विभक्त-चेतना का परिणाम देश के विभाजन के रूप में सामने आया। तत्कालीन सत्ता का यह षड्यन्त्र ही था कि उसने रियासतों को सत्ता  सौंपी। जाति ,पन्थ की  विभक्त -चेतनाओं  को  सर्वजन चेतना  पर प्रहार का  मौका मिल गया और  जाति, पन्थ की  विभक्त चेतनाओं  ने  सर्वजन चेतना पर प्रहार किया। विभक्त चेतनाओं  को बल मिला और सर्वजन चेतना निर्बल हुई।

 १९५० का वह दिन था जब रामधारीसिंह दिनकर ने लिखा था – सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। १९५० में  हम भारत के लोग संपूर्ण प्रभुत्वसंपन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य की स्थापना  करते हैं। भारत के प्रत्येक नागरिक को शासन में भागीदारी का अधिकार प्राप्त होता है। यह लोकतन्त्र आसमान से नहीं बरसा था, यह लोकतन्त्र किसी बादशाह या सम्राट ने बख्शीश में भी नहीं दिया था। लोकतन्त्र राज सिंहासन ने बख्शीश में दिया होता तो जनता को मताधिकार देने की कृपा नहीं होती। लोकतन्त्र किसी की मेहरबानी नहीं, लोकजीवन के संघर्ष और समायोजन की युगयुगीन प्रक्रिया का फल है। संविधानसभा  में मताधिकार के सवाल पर शंका उठी थी कि अनपढ,,दरिद्र, असभ्य भीड को वोट का अधिकार देना लोकतंत्र को मौत के कुए में ढकेलने के समान होगा। जो जनता लाठी गोली झेल रही थी, बलिदान कर रही थी, बलिदानियों का जयजयकार कर रही थी, उसके प्रति राजसत्ता की परिधि से आने वाली यह प्रतिक्रिया स्पष्ट थी कि उनकी नजरों में लोक क्या है?  उस दिन विश्व ने देखा और पहचाना कि संप्रभुता राजसिंहासन या राजमुकुट में से नहीं निकलती, संप्रभुता का स्रोत तो लोकचेतना ही है, लोकमानस की स्वीकार्यता। क्रूर राजाओं, आक्रान्ताओं, दस्युओं, बादशाहों, सामन्तों, जमीन्दारों ने क्या- कुछ कम जुल्म नहीं ढाये थे। लोकजीवन-लोकसंस्कृति-लोकआस्था-लोकविश्वास को कुचलने में कोई कसर नहीं छोड़ी  थी। बार-बार निर्मम प्रहार किया परन्तु वे प्रहार करने वाले इतिहास के मलबे में दब कर खाद बन गये और विजयिनी लोक-संस्कृति का विटप महक रहा है।

सुरेन्द्रपाल सिंह

जन्म – 12 नवंबर 1960
शिक्षा – स्नातक – कृषि विज्ञान स्नातकोत्तर ।

सेवा – स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत।
लेखन – समसामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित
सलाहकार – देस हरियाणा पत्रिका
कार्यक्षेत्र – विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि।
पताः डी.एल.एफ. वैली, पंचकूला

मो. 98728-90401

1 thought on “स्वतन्त्रता संग्राम की लोक-चेतना – आचार्य राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी से सुरेन्द्रपाल सिंह की बातचीत।

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    Vikas Sharma says:

    बहुत बहुत बधाई सुरेंद्र सर आपको.. ऐसा सुन्दर कार्य

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