आओ नया समाज बनाएं – राजेंद्र चौधरी

क्या हम आज के भारत/हरियाणा/अपने गाँव/शहर से संतुष्ट हैं?

यदि हाँ, तो बहुत अच्छा परन्तु शायद ही कोई ऐसा हो. ज़्यादातर लोग देश-दुनिया, अपने समाज की स्थिति से खुश नहीं हैं. इस के साथ ही ज़्यादातर लोगों को निकट भविष्य में बेहतर समाज की आस भी नहीं है.  लेकिन कोई, वो रामदेव हो, वो अन्ना हो, केजरीवाल हो या मोदी हो, अगर परिवर्तन की आस दिखाता है तो बड़ी आबादी उस का साथ देती है. सामाजिक परिवर्तन के इन दावेदारों को मिला समर्थन दिखाता है कि लोगों को परिवर्तन की ज़रूरत महसूस हो रही है. भले ही एक हिस्सा परिवर्तन के इन दावेदारों के पीछे अपने निजी स्वार्थ के कारण लगा हो, किसी को टिकट की और किसी को एजेंसी मिलने की आस हो, परन्तु आम जनता का बड़ा हिस्सा केवल एक बेहतर समाज की आस में इन के साथ लगा था. परन्तु बड़े पैमाने पर लोगों को बार बार निराशा ही मिलती है. इस का एक बड़ा कारण यह है कि ये सब प्रयास ‘मसीहा’ केन्द्रित रहे हैं. कोई आता है, वो व्यक्ति हो सकता है या संगठन, और कहता है कि मुझे समर्थन दो, मैं सब ठीक कर दूंगा. रैली, जुलूस, और वोट के लिए तो लोगों की ज़रूरत रहती है पर इस के अलावा नहीं. निर्णय प्रक्रिया में तो लोगों की कोई भूमिका होती ही नहीं. आम लोगों की छोड़ो, आज विधायक और सांसदों तक की कोई ख़ास भूमिका नहीं होती; मुख्यमंत्री तक का चुनाव विधायक नहीं करते.  इन व्यक्ति केन्द्रित उपायों की सीमा हम बरसों से देख रहे हैं; गांधी गया तो साथ ही चरखा और अहिंसा भी देश से लगभग चली गई.

उपाय क्या है?

स्पष्टतयः राजनैतिक शक्ति प्राप्त करना उपयोगी होगा. परन्तु राजनैतिक ताकत का कैसा प्रयोग होगा यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि राजनैतिक ताकत प्राप्त कैसे हुई है. अगर वह चंद व्यापारियों के पैसे या अपराधियों के सहयोग से या जातपात के नारे से प्राप्त हुई है तो इसके आम जनता के पक्ष में प्रयोग होने की सम्भावना कम ही है. हालाँकि यदा-कदा कुछ राहत, महत्वपूर्ण राहत भी मिल सकती है परन्तु बुनियादी तौर पर सरकार को जनपक्षीय और जवाबदेह बनाने की संभावना कम ही है. इसलिए जैसे-तैसे सत्ता प्राप्त करने की नीति नहीं अपनाई जा सकती. सत्ता का चरित्र एवं तौर तरीके बदलने के लिए सत्ता प्राप्ति के तौर-तरीके भी बदलने होंगे. केवल सत्ता में बैठे लोग बदलने से काम नहीं चलेगा. दूसरा, एक केंद्र बिंदु से इस विशाल देश को नहीं चलाया जा सकता. इसके लिये सत्ता का विकेंद्रीकरण भी ज़रूरी है. निर्णय करने वाली इकाई और उस निर्णय से प्रभावित लोगों के बीच कम से कम दूरी हो. जहाँ तक संभव हो केवल एक गांव या खंड को प्रभावित करने वाले फैसलें वहीँ लिए जाएँ.

बुनियादी एवं व्यापक बदलाव के लिए अंतत आम जन का, सत्ता से वंचित तबकों का संगठित होना ज़रूरी है. केवल एक पार्टी या नेता के पक्ष में वोट डालने के लिए नहीं अपितु बहुसंख्यक आबादी के हक़ में देश को चलाने के लिए. ज़रूरत इस बात कि है कि पूरा समय शासन व्यवस्था की नकेल प्रभावी रूप से जनता के हाथ में रहे. पॉँच साल में एक बार नहीं अपितु पूरे पॉँच साल लगातार शासन करने वालों में जनता के प्रति जवाबदेही का भाव रहे और जनता की सत्ता में बैठे लोगों पर कड़ी निगाह रहे.

इस की शुरुआत छोटी से छोटी इकाई, वार्ड/पंचायत से करनी होगी.

ऐसा नहीं है कि ‘ऊपर’ से कदम नहीं उठाये जा सकते या उपयोगी नहीं हो सकते. लैंगिक असमानता एवं छुआछात संवैधानिक तौर पर ख़त्म की गई एवं इन संवैधानिक उपायों का असर भी हुआ. परन्तु इस के साथ ही यह भी स्पष्ट है कि संवैधानिक रूप से ख़त्म हो जाने के बाद भी ये बुराइयां ख़त्म नहीं हुई हैं. प्रत्युतर में प्रश्न उठ सकता है कि क्या राज्य/राष्ट्र के स्तर पर परिवर्तन के बिना, स्थानीय/ पंचायत स्तर पर ऐसा करना संभव है? यह सही है कि केवल स्थानीय स्तर पर 1-2 समस्या उठाने से काम नहीं चलेगा; समस्या बहुआयामी हैं और परस्पर गुंथी हुई हैं. परन्तु उतना ही महत्वपूर्ण यह प्रश्न है कि अगर स्थानीय  स्तर के परिवर्तन की ताकत हमारे पास नहीं है तो राज्य या राष्ट्र के स्तर पर परिवर्तन लाने की ताकत हम कहाँ से जुटा पाएंगे? अगर आमजन अपने हितों से जुड़ी हुई नीतियों में बदलाव या उन के सही क्रियान्वयन के लिए लड़ने (अपना राशन कार्ड बनवाने के लिए भागदौड़ करना और राशन की व्यवस्था में सुधार के लिए काम करना, इन दोनों में अंतर समझना ज़रूरी है) के लिए संगठित नहीं हैं, तो उन को दूर किसी अन्य के साथ होते अन्याय के खिलाफ़ (या उन के स्वयं के किसी दूरगामी हित के लिए) लड़ने के लिए तैयार करना बहुत मुश्किल होगा.

यह भी ध्यान रहे कि लड़ाई केवल सरकार से ही नहीं है. केवल राजनैतिक/सामाजिक ढांचों में ही नहीं, हमारे अपने अन्दर भी परिवर्तन ज़रूरी है. हमें अपने आप से भी लड़ना होगा. महिलाओं के खिलाफ भेदभाव और हिंसा में उनके अपने परिजन भी शामिल होतें हैं. आम जनता के, हमारे अपने मूल्यबोध (सही क्या है और गलत क्या है, प्राथमिकता किस को दें) भी बदलने होंगे. जीवन में सफलता के नए पैमाने गढ़ने होंगे. केवल सरकारी नीतियों या उन के क्रियान्वयन की आलोचना से काम नहीं चलने वाला.

लेकिन हमारे प्रयास इन आंतरिक बदलावों तक सीमित नहीं हो सकते.कई लोग कहते हैं कि ‘अपना आप सुधार लो, जग सुधर जाएगा’ और इस लिए व्यक्ति के सुधार पर ध्यान केन्द्रित करते हैं. निश्चित तौर पर हमारी कथनी और करनी में अंतर नहीं होना चाहिए. जो हम औरों को कहें, वह हम अपने पर भी लागू करें पर केवल व्यक्तिगत सुधार से काम नहीं चलने वाला.  कुछ मामलों में तो जब तक सामाजिक स्तर पर बदलाव न हो, व्यक्तिगत स्तर पर पूरा सुधार हो भी नहीं सकता. मलेरिया को ही देख लें. हमें अपने स्तर पर सब सुरक्षा उपाय ज़रूर करने चाहिए परन्तु अगर आप के आस पड़ोस में पानी इकट्ठा होता है तो आप के उपाय भी नाकाफी रहेंगे. इस से भी आगे, ज़्यादातर लोगों द्वारा पूरी सावधानी बरतने के बावजूद भी कहीं कोई चूक रह सकती है. इस लिए हस्पतालों की व्यवस्था भी ज़रूरी है. और ये सब उपाय तो सामूहिक/सामाजिक हैं. सुरक्षा, विशेष तौर पर महिला सुरक्षा और उन के प्रति भेदभाव या जातिगत एवं धार्मिक भेदभाव सामजिक मुद्दा है न कि केवल व्यक्तिगत. अगर चारों तरफ़ परीक्षा में नकल या नशे का बोलबाला है, तो अपने बच्चों को बचा पाना भी मुश्किल हो जाता है. इस लिए व्यक्तिगत बदलाव के साथ साथ सामाजिक परिवर्तन के सचेत प्रयास भी आवश्यक हैं.

असल में हमें एक व्यक्ति विशेष के रूप में अपनी भूमिका और एक नागरिक के रूप में अपनी भूमिका – दोनों के अंतर को समझना और दोनों को निभाना होगा. एक कर्मचारी, एक अध्यापक के रूप में दिए हुए पाठ्यक्रम/योजना को लागू करना ही होगा और उस का विरोध नहीं कर सकते, परन्तु एक नागरिक के रूप में हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि उस की उपयोगिता की पड़ताल करें और ज़रूरत हो तो उस का विरोध भी करें. केवल ईमानदार होना ही काफी नहीं है, बेईमानी के खिलाफ लड़ना भी ज़रूरी है. परन्तु अकेले अकेले यह काम करना मुश्किल या अपर्याप्त होता है.

परन्तु सामाजिक सुधार की दिशा क्या हो?

मोटे तौर पर दो विचार ज्यादा प्रचलित हैं. एक कि वेदों में सब दिया है, प्राचीन भारत में तो सब अच्छा ही था, पुराने दिन लौट आयें तो सब ठीक हो जाएगा. इस के ठीक उल्टा यह विचार है कि भारत को आधुनिक बनाना है, भारत को अमरीका (या यूरोप जैसा बनाना है). इस विचार के अनुसार मोटे तौर पर हर नई वस्तु बेहतर है और हर पुरानी वस्तु ख़राब है. ये दोनों विचार ही ठीक नहीं हैं. सब पुरानी चीज़ों को भी ठीक नहीं मान सकते.  अगर आज का समाज गलतियाँ कर रहा है, आज के समाज में कमियां हैं, तो हमारे पूर्वजों में भी कमियाँ रही होंगी, उन से भी गलत निर्णय हुए होंगे. दूसरी और, अगर अमरीका की जीवन शैली आदर्श मान ली जाए तो जाहिर तौर पर हर व्यक्ति, हर देश वही जीवन शैली अपनाना चाहेगा. और अगर पूरी दुनिया वो जीवन शैली अपनाए, तो फिर एक धरती से काम नहीं चलने वाला. अमरीका की प्रति व्यक्ति ऊर्जा, भोजन, पानी की खपत इत्यादि के आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक अध्ययन दिखाते हैं कि फिर एक धरती नहीं कई धरती चाहिए होंगी. तालाबंदी के दौरान साफ़ हुई हवा-पानी ने स्पष्ट कर दिया है कि इन्सान ने कुदरत के साथ भयंकर छेड़-छाड़ की है.

आज जीवन की बुनियादी ज़रूरत – साफ़ हवा-पानी और सुरक्षित एवं पौष्टिक भोजन खतरे में है. बदलते मौसम और ख़त्म होने जा रहे कोयले, लोहे, पेट्रोल इत्यादि जैसे संसाधनों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते. एक ओर नित नयी कार और दूसरी ओर प्रदूषण से निपटने के लिए एक दिन सम नंबर और एक दिन विषम नंबर की गाड़ी को खड़ी रखने की सोच सही नहीं हो सकती. परन्तु आज सब तरह के किन्तु-परन्तु के बावजूद लगातार बढ़ते उत्पादन और उपभोग को ही विकास मान लिया है. ‘पूंजीवादी’ व्यवस्था का विरोध करने वालों में भी सादगी, संयम जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं होता.

हमें भौतिक आवश्यकताओं को नकारने की ज़रूरत नहीं है. हम इस जीवन को माया मान कर परलोक सुधारने की बात नहीं कह रहे परन्तु हमें भौतिक आवश्यकताओं की सीमा भी समझनी चाहिए. हमारी भौतिक ज़रूरतें भी हैं परन्तु हमारी गैर-भौतिक ज़रूरते भी हैं. इंसान को रोटी कपड़ा चाहिए पर इंसान केवल रोटी कपड़े के लिए नहीं जीता. हमारी गैर-भौतिक ज़रूरते काफी हद तक परस्पर सम्बन्धों से पूरी होती हैं और एक सीमा के बाद भौतिक ज़रूरतों की पूर्ति गैर-भौतिक ज़रूरतों की पूर्ति के आड़े आ सकती है.  मानव जीवन में उपभोग की सीमा के साथ-साथ हमें प्रकृति की उत्पादन की सीमा को भी समझना होगा. इसलिए प्रकृति पर उत्पादन और उपभोग के पड़ने वाले प्रभावों के प्रति हमें ज्यादा संवेदनशील होना होगा. इसके चलते कई तरह के उपभोग को रोकना/कम करना होगा. बात केवल प्लास्टिक की नहीं है. हर जगह ‘बरतो और फैंको’ की संस्कृति के विपरीत संयम, मुरम्मत और पुनः प्रयोग की संस्कृति को बढ़ावा देना होगा. बिजली-पानी की बाहरी फिटींग के स्थान पर इनको दीवार में छुपाने से लागत ही बढ़ती है. फ़ायदा तो दिखावटी ही है. अन्य ऐसी कई वस्तुएँ हैं जिनके प्रयोग को हम आज सभ्यता का तकाज़ा समझते हैं (और ये केवल शीतल पेय या खेती में यूरिया तक सीमित नहीं हैं; कहने को खेल ‘शौकिया’ होते हैं इस लिए ओलम्पिक इत्यादि में कोई पैसा पुरस्कार के तौर पर नहीं दिया जाता परन्तु वास्तव में उद्योग/व्यवसाय बन चुके हैं) परन्तु धीरे-धीरे उनमें से कइयों के व्यक्तिगत या सामाजिक नुकसान हमें समझ आ रहे हैं. यह सूची बहुत बड़ी है.

हमें वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकल्पों, जीवन शैली और विकास/प्रगतिशीलता/आधुनिकता का पुनर्मूल्यांकन करना होगा. क्या हमें उन सब वस्तुओं की आवश्यकता है जिनका हम प्रयोग कर रहें हैं? क्या जैसा भोजन हम कर रहे हैं, जैसे हमारे बच्चे पढ़ रहे हैं, जैसे हम जी रहे हैं, क्या वह हमारे लिए अच्छा है? इन मुद्दों पर साधु संतों को ही नहीं हम आमजन को भी विचार करना होगा. विशेष तौर पर मध्य वर्ग को जो इन का सब से बड़ा उपभोक्ता/समर्थक है.

इस लिए लगातार बढ़ते उत्पादन/राष्ट्रीय आय के स्थान पर सब के लिए रोज़गार, सब की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने लायक रोज़गार नए समाज का आधार होना चाहिए. जैसे एक अच्छे परिवार में होता है – जो है जितना है, मिल बाँट कर खाते हैं – वही समाज और देश में होना चाहिए. एक प्रश्न उठ सकता है कि अगर सब की बुनियादी ज़रूरतें पूरी होंगी, मिल बाँट कर खायेंगे, तो काम कौन करेगा? कई खाते पीते परिवारों में बच्चों की बुनियादी ज़रूरतें तो पैत्तृक सम्पति से बखूबी पूरी हो सकती हैं, फिर भी घर के लोग काम करते हैं. न कोई माँ-बाप पसंद करता है और न कोई बच्चा की वो बैठ कर खाए.  आर्थिक सुरक्षा का इतना फायदा ज़रूर होता है कि पूरी शिक्षा दीक्षा के बाद ही कमाने की बारी आती है और मनपसन्द काम की तलाश की जाती है. इसी तरह जब समाज में भी सब की बुनियादी ज़रूरतें पूरी होंगी, तब भी अधिकांश लोग काम करेंगे एवं कमाएंगे, पर ये काम लाचारी और बेगारी का नहीं होगा. किसी को दबा कर काम कराना मुश्किल हो जाएगा परन्तु काम तो लोग करेंगे ही. सबको (क्योंकि जाति, धर्म, लिंग, नस्ल, राष्ट्रीयता, भाषा या संस्कृति की ऊँच.नीच गलत है) न्यूनतम आर्थिक सुरक्षा के अलावा, सब के लिए न्याय और इस सब का टिकाऊ आधार (यानी पीढ़ियों तक चलने वाला), ये तीन नए समाज के बुनियादी बिंदु हो सकते हैं. प्रतियोगिता और सहयोग, स्वार्थ और परमार्थ, दोनों, न कि इन में से कोई एक, मानव की स्वाभाविक प्रकृति है.  इंसान न केवल स्याह है और न केवल सफ़ेद.

परन्तु केवल इतने भर से आगे की दिशा नहीं तय हो जाती.

सरकार या बाज़ार, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है. कुछ लोग यह मानते हैं कि सब समस्याओं कि जड़ निजी सम्पति में है. निजी सम्पति का खात्मा सबसे अहम काम मानते हैं.  परन्तु ऐतिहासिक अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि निजी सम्पति का खात्मा होने भर से भी समस्या हल नहीं हो जाती और दूसरी ओर निजी सम्पति पर सामाजिक नियंत्रण रख कर भी काफी सुधार हो सकता है. इसलिए अर्थव्यवस्था में निजी और सार्वजानिक सम्पति दोनों रहे परन्तु निजी सम्पति पर सामाजिक अंकुश रहे (जैसे आज भी अपने प्लाट पर मकान बनाने के लिए नक्शा पास कराना पड़ता है). निजी और सार्वजानिक क्षेत्र दोनों में सुधार की बहुत सम्भावना है. एक स्तर तक के कामों में स्वयं के श्रम की भागेदारी को आवश्यक बनाया जा सकता है. उदाहरण स्वरूप, जैसा कि अब होता है 3-4 रेलवे स्टेशनों पर दुकानों का इकट्ठा ठेका छोड़ने के स्थान पर एक-एक स्टेशन या 1-1 दुकान का ठेका छोड़ा जा सकता है और ठेकेदार का स्वयं दुकान पर होना आवश्यक बनाया जा सकता है. जैसे आज भी कानूनी रूप से एक आदमी दो जगह नौकरी नहीं कर सकता, या नौकरी के साथ व्यापार नहीं कर सकता, इसी प्रकार से बहुत सी परिस्थितियों में एक आदमी को दो दुकान या उद्योग चलाने की अनुमति भी नहीं होनी चाहिये. जहाँ-जहाँ तकनीकी कारणों से बड़े उद्योग ज्यादा उपयोगी हैं, उन परिस्थितियों को छोड़ कर छोटे उद्योगों को बढ़ावा दिया जाये. इस के साथी ही निजी एवं सार्वजनिक सम्पति के अलावा सहकारी एवं स्थानीय जनसमुदाय आधारित सम्पति का भी आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाना चाहिए. निश्चित तौर पर ऐसा करने पर भी न तो सामाजिक असमानता और न ही धरती से समस्याएं ख़त्म हो जायेंगी परन्तु असामनता काफ़ी कम एवं जीवन काफ़ी बेहतर हो जाएगा.

सवाल उठ सकता है कि क्या ऐसा करने से लाल फीताशाही को बढ़ावा नहीं मिलेगा?

सामाजिक नियमन और लाल फीताशाही में फर्क करना होगा. नियमन कौन करता है, कैसे करता है, उस प्रक्रिया में कितनी पारदर्शिता और जवाबदेही है, इस सब पर निर्भर करेगा कि यह लालफीताशाही होगी या सामाजिक हित में नियमन. और यह सब तय होता है इस बात से कि समाज कितना जनतांत्रिक है. कहाँ क्या होगा, यह सब की भागेदारी के साथ लोकतांत्रिक तरीके से तय हो. परन्तु यह तय है कि जो समाज/सरकार स्वयं स्कूल/हस्पताल/बस चलाने में असमर्थ साबित होती है उस पर निजी स्कूलों/हस्पतालों एवं परिवहन के नियमन के लिए भी विश्वास नहीं किया जा सकता. और जो समाज सरकारी तंत्र को नहीं सुधार सकता, वह निजी क्षेत्र को कैसे सुधारेगा?

 ‘क्या ऐसा समाज संभव है’?

अगर हम यह मानते कि यह समाज भगवान का बनाया है और सब कुछ पूर्वनियोजित है तो बात और है, वरना हमारी आँखों के सामने समाज बदल रहा है. पारिवारिक ढांचा बदला है. सरकारी स्कूलों की स्थिति बदली है.  जिस तरह के समाज की बात हम यहां कर रहे हैं उसके अधिकांश अंश तो कई जगह फलीभूत हो भी चुके हैं. कई देशों में निशुल्क एवं समान शिक्षा/स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था है. सब नागरिकों की बुनियादी ज़रूरतें पूरी करने की ज़िम्मेवारी भी सामाजिक है. हरियाणा में ही अब से 20-25 साल पहले तक गांव के सभी बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ते थे. सरकारी स्कूलों से पढ़े बहुत से लोग आज उच्च पदों पर हैं. परन्तु आज सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के भविष्य के बारे में ऐसी आशा आम तौर पर नहीं हैं. देश के कई इलाकों में महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ बहुत कम होती है. कहीं पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली मजबूत है, तो कहीं सरकारी नौकरियों में सिफारिश बहुत कम है. कई जगह पंचायत व्यवस्था काफी मजबूत है. इसलिये हम जो चाह रहे हैं उस से मिलता जुलता परिवर्तन सशरीर हमारे सामने है. यह दिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन संभव है. हम ऐसा कुछ करने की नहीं सोच रहे जो कभी कहीं पर हुआ ही न हो.

शुरुआत कैसे करें?

घर परिवार को छोड़ कर संन्यास लेने की ज़रूरत नहीं है. केवल यह निश्चय करने कि ज़रूरत है कि घर परिवार की ज़िम्मेदारी के साथ-साथ कुछ समय, कुछ संसाधन, सामाजिक बदलाव (सामाजिक सेवा यानी गरीब लड़की के लिए दहेज़ जुटाने में सहयोग और सामाजिक बदलाव यानी दहेज़ प्रथा ख़त्म करने की कोशिश, के अंतर को ध्यान में रखना होगा) के काम में भी लगायेंगे क्योंकि बिना बाहरी परिवेश को बदले, हमारा, हमारे बच्चों का जीवन भी सुखमय नहीं हो सकता, क्योंकि जिस रास्ते पर आज हम चल रहे हैं उस पर आर्थिक सम्पनता आने के बावज़ूद खुशहाली नहीं है, क्योंकि यह राह टिकाऊ नहीं है.  विशेष तौर पर मध्यम वर्गीय लोगों को अपने जीवन में परिवर्तन की शुरुआत करनी होगी क्योंकि बहुत से मामलों में हम प्रचलित विचारधारा के सब से बड़े वाहक/समर्थक होते हैं.  इस से आगे, कुछ मूल बातों को ध्यान में रख कर हम अपनी रूचि/क्षमता और परिस्थिति अनुसार इस बदलाव के काम में शामिल हो सकते हैं. मसलन जहां हम हैं, वहां पर मौजूद जनतांत्रिक ताकतों के साथ सहयोग करें, उनके काम में हाथ बटायें. ऐसी ताकतों के सहयोग से, या अपनी पहलकदमी पर अपनी रूचि एवं क्षमता अनुसार किसी भी एक सरकारी विभाग/योजना या सामजिक मुद्दे पर पर नियमित निगरानी करने का काम हाथ में ले सकते हैं. लगातार निगरानी के इस काम से एक ओर सरकार पर दबाव बना रहेगा और दूसरी ओर समाज को भी नियमित रूप से समय रहते जागरूक किया जा सकेगा.

कोई भी सरकार हो, चाहे कितनी भी जनपक्षीय हो, उस पर इस तरह से नागरिक समाज की निगरानी की ज़रुरत हमेशा बनी रहेगी. ग्राम स्तर पर जहाँ मध्यम वर्ग एवं गरीब तबके में भौगोलिक एवं भावनात्मक/मानसिक दूरी अभी इतनी नहीं है, वहां तो यह काम ठोस सांगठनिक पहल का रूप भी ले सकता है. समय के साथ शहर में भी ऐसे प्रयास किये जा सकते हैं एक बार कुछ जगह ऐसे प्रयास होने शुरू हो गए, तो फिर ये अभियान तेजी पकड़ लेगा. शुरुआत हमेशा मुश्किल होती है. हरियाणा के साक्षरता अभियान एवं कुदरती खेती अभियान का हमारा अनुभव दिखाता है कि बिना परम्परागत माध्यम (जाति/खाप इत्यादि) का प्रयोग कर के भी लोगों को जोड़ जा सकता है.

इस दिशा में एक बड़ा काम (पर ज़रूरी नहीं इस से ही शुरूआत करें) है ग्रामसभा, जिस में गाँव के सारे वोटर और सभी सरकारी विभागों के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, की नियमित एवं प्रभावी बैठक सुनिश्चित करना. कागज़ पर आज भी पंचायत का हर निर्णय, किस की पेंशन बनेगी और किस का पीला/गुलाबी कार्ड बनेगा या कौन से गली पक्की होगी, यह सब ग्राम सभा की बैठक में तय होता है (अब तो हरियाणा में पंचायत वार्ड सभा की बैठक भी अनिवार्य हो चुकी है). परन्तुवास्तव में तो ग्राम सभा होती ही नहीं; न कोई बुलाता और न कोई आता है.

लेकिन कोई एक काम (या उस को करने का कोई एक तरीका) ऐसा नहीं है जिसे हम आज का क्रांतिधर्म माने (यहाँ तक कि स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भी देश-समाज प्रेमी लोगों ने न केवल अलग अलग काम हाथ में उठाये थे बल्कि अलग अलग तरीके से उठाये थे). बुनियादी काम है जनतंत्र को मज़बूत और व्यापक बनाना; केवल राजनैतिक व्यवस्था के तौर पर ही नहीं पर घर परिवार और संगठन के अन्दर भी (परन्तु जनतंत्र का अर्थ केवल बहुमतवाद नहीं होता; जनतंत्र में समता के आधार पर विभिन्न विचारों और मतभेद, व आपसी लेनदेन के लिए स्थान होता है; बहुमत का निर्णय तो अंतिम विकल्प होता है.) अगर जगह-जगह ऐसे संगठन बने जो स्वतंत्र रूप से, बिना किसी ऊपरी आदेश के, लगातार सक्रिय रहें. यह प्रयास करें कि चुनावों में शराब, जाति पाति, अपना पराया या लट्ठ का जोर न चले.

अपनी स्थानीय दिक्कतों को दूर करने के प्रयास करें. जो काम स्वावलंबी रूप से स्थानीय स्तर पर हो सकते हैं, वो अपने स्तर पर किये जाएँ और जहाँ ज़रुरत हो वहां सरकार पर मिलकर दबाव डाला जाए (न कि नेता या अधिकारी को मुख्य अतिथि के तौर पर बुला कर जी हजूरी से काम कराया जाय).  क्षमता भर जनविरोधी कार्यों का विरोध भी करें एवं व्यापक सामाजिक परिवर्तन और दूसरे तबकों की दिक्कतों के प्रति भी संवेदनशील हों.  ये संगठन व्यक्ति केन्द्रित न हो कर जनतांत्रिक-सामूहिक नेतृत्व आधारित हों एवं ऐसे स्थानीय संगठनों का आपस में तालमेल हो, तो व्यापक राज्य/राष्ट्रीय स्तर का सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन भी दूर नहीं रहेगा.

आइये, अपने जीवन की दिशा में बदलाव के साथ साथ, जनतांत्रिक तरीके से अपने आसपास ऐसे संगठन बनाएं (जो केवल युवाओं या पुरुषों या एक जाति या एक उम्र के न हों) जो इस दिशा में सामूहिक/संगठित प्रयास करें. चाहे शुरुआत एक दो कामों से की जाए, परन्तु सोच बहुमुखी परिवर्तन की हो.  काम में औपचारिकता न हो, प्रभावी प्रयास हों और बुनियादी/राज्य/राष्ट्रव्यापी परिवर्तन की ओर अग्रसर प्रयास हों. अब नहीं तो कब? हम नहीं तो कौन?

लेखक – महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक में अर्थशास्त्र विभाग में प्रोफेसर रहे हैं।

राजेंद्र चौधरी

1 thought on “आओ नया समाज बनाएं – राजेंद्र चौधरी

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    B S Lalit says:

    Prof Rajinder Chaudhary let us enumerate major questions before us; Govts are going back instead of forward in performing their basic functions like; 1 Instead of improving they have practically rolled back the ‘Rule of Law’ with freedom of expression almost thrown away 2 Rolling back another very important role pertains to enabling kids upward mobility through publicly funded equal school education. 3 Govt instead of moving forward has jumped back in providing publicly funded healthcare and have left them at the mercy of unaffordable corporate hospitals. 4 Every publicly elected and even unelected govt in the world is always on tenterhook against menace of unemployment, regularization of job through various labor laws, human rights and all but in India govt has actively created Jobs and casualization of jobs for even most regular activities. 5. Govt year on year promoting impoverishment of peasantry, 6 It is finishing off labor laws with respect to payments of minimum wages, hours of work and hosts of other benefits. 7 Govt is promoting anything but harmony between communities with full media control. 8 Govt is actively promoting concentration of resources in few hands. Now kindly inform the readers how your essay help anything of these massive roll backs. or u can tell the readers for be in total amnesia and enjoy the diminishing returns with zero control on anything worthwhile. !

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