प्रतिभा और आरक्षण – रजनी दिसोदिया

आजकल आरक्षण विरोध का जो मुद्दा गरमाया है उसमें भी बड़ा कंफ्यूजन है। क्या यह पूरी आरक्षण व्यवस्था का विरोध है या अन्य पिछड़ा वर्ग के 27% आरक्षण का विरोध है या यह पिछले सत्तर वर्षों से भीतर ही भीतर सुलगती उस खुन्नस का विस्फोट है जिसे इस ओ.बी.सी. आरक्षण ने और हवा दे दी है।

बच्चे मिट्टी के खिलौने बना बनाकर खेल रहे थे। एक ने बड़ी सी हवेली बनाई और उसके सामने मिट्टी के दो घोड़े बनाकर रखे । गर्व से दूसरे बच्चों की ओर देखते हुए उसने कहा- ये मेरी हवेली होगी और इन घोड़ों के रथ पर बैठकर मैं रोज सुबह सैर को जाऊंगा। उत्साहित हो दूसरे ने दो बैल बनाए और दो गाय बनाईं और बोला कि ये मेरे बैल मेरा खेत जोतेंगे और ये मेरी गाय ढेर सारा दूध देंगी। तीसरा जो अभी तक उन दोनों को देख भर रहा था, वह भी सक्रिय हुआ। उसने मिट्टी की छोटी सी हंडिया बनाई और बोला- ये मेरी हंडिया होगी जिसमें मैं तुम्हारे घर में छाछ (मट्ठा) मांगने आऊंगा। उसका यह कहना था कि पास ही खेत पर मजदूरी करते उसके पिता ने उसके कान पर थप्पड़ लगाते हुए कहा – नालायक, तू मिट्टी से भी हाथी, घोड़ा, बैल नहीं बना सका? बच्चा रुंआसा हो अपने पिता का मुंह ताकने लगा।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान द्वारा सरकारी शिक्षण संस्थानों और नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण का जो प्रावधान रखा गया उसके पीछे दलितों की अत्यंत निम्न आर्थिक स्थिति तो एक बड़ा कारण थी ही, किंतु पुश्त दर पुश्त हजारों वर्षों से चली आ रही इस आर्थिक दुरावस्था के अतिरिक्त लंबे समय से हो रहा सामाजिक व सांस्कृतिक शोषण भी, आरक्षण के लिए एक बहुत बड़े कारण के रूप में स्वीकार किया गया था। जिसने इनकी कल्पना तक के पर भी कतर दिए थे इस शोषण ने उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उनकी चेतना में इस कदर बैठा दिया था कि वे स्वयं भी सहज रूप से इसके परे नहीं देख सकते थे। गरीबी और जहालत से उनका चोली-दामन सा रिश्ता बन गया था। वैज्ञानिक सत्य है कि कल्पना का भी कोई न कोई ठोस आधार होता है। आकाश में उड़ते पंछियों को देखकर ही मनुष्य ने वायुयान की कल्पना की थी।

हम एक अन्य उदाहरण लेते है ! भारत विभाजन (1947) के समय भारी संख्या में पंजाबी रिफ्यूजी पाकिस्तान से भारत आए और देश के अलग-अलग हिस्सों में बस गए । किसी तरह जान बचा कर भागे ये लोग अपनी बड़ी-बड़ी हवेलियाँ, दुकानें, बसा – बसाया व्यापार, चल-अचल संपत्ति सभी कुछ गंवाकर अचानक सड़क पर आ गए। आज मात्र सत्तर वर्ष पश्चात ये लोग उसी मुकाम पर दोबारा पहुंच चुके हैं जिसे गंवाकर ये भारत आए थे। कैसे ? क्या सिर्फ इसलिए कि वे बहुत मेहनती और प्रतिभावान लोग थे? नहीं। निश्चित उनकी मेहनत और लगन एक बड़ा कारण तो है पर साथ ही यह भी समझने वाली बात है कि ये जानते थे कि इन्हें कहां जाना है, क्या पाना है। अपनी मंजिल को इतने करीब से देखने और महसूस करने के कारण और उस तक पहुंचने के समस्त रास्तों से पूर्व परिचित होने के कारण इन्हें जरूरत सिर्फ पैर टिकाने भर की थी। ऐसे में साधन की कमी कोई बहुत बड़ी कमी नहीं रह जाती।

दलितों ने अपने आस-पास, अपने साथ युगों से जिस माहौल को देखा और भोगा वह कहीं भी किसी तरह उनके लिए प्रेरणादायक नहीं था । उनकी स्मृति में कोई ऐसे चित्र ही न थे, जब उनके यहां धन-धान्य की वर्षा होती थी। उन्होंने अपने बाप-दादाओं, दादाओं-परदादाओं को हमेशा बेगार करते, मजदूरी करते किसी के यहां हल चलाते ही देखा था। वे भी समाज की बहुत जरूरी और महत्वपूर्ण इकाई होते थे, यह एहसास तो कभी सपने में भी उन्हें नहीं हुआ। और तो और, जब आदर्श राज-व्यवस्था माने जाने वाले ‘राम-राज्य’ में भी उनके हित सुरक्षित नहीं थे तो बात ही किसकी की जाए। उस बालक ने जब अपने मुहल्ले के किसी घर में गाय, बैल, घोड़ा कभी देखा ही नहीं तो वह कैसे कल्पना करे कि उसके पास भी गाय, घोड़ा, बैल भी हो सकता है। वह भी कभी हवेली का मालिक हो सकता है। जिसे आज भी शादी वाले दिन भी घोड़ी पर बैठने नहीं दिया जाता वह घोड़ा बनाकर सैर करने जाने का दंभ कैसे भरे । यह बदलाव तो धीरे-धीरे ही होना है। उसके भीतर का जो यह घाव है उसे भरने में समय लगेगा । जब समाज उसे यह एहसास कराएगा कि कोई छोटा-बड़ा नहीं है। वह आज जो पिछड़ा है वह इसलिए नहीं कि उसमें कुछ कम योग्यता या कम मेहनत करने का माद्दा है। वह इसलिए कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थितियां कुछ इस तरह बनीं और बदलीं कि समाज की कुछ जातियां विकास की राह में पीछे रह गईं। पर हो बिलकुल इससे उलटा रहा है । दलितों के प्रति सदियों से कायम हीनताबोध का रवैय्या आज तक कायम है। जो उनकी उन्नति में बाधक बना हुआ है। जो जाति का पता लगते ही उस पर अयोग्यता का ठप्पा लगा देता है। हम सब जानते हैं कि भारत देश जिसे हम आज जिस रूप में जानते और पहचानते हैं वह उसी रूप में 1947 से पूर्व नहीं था। एक लोकतांत्रिक सरकार जिस पर अपने लोगों को नागरिक सुविधाएं देने, उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का खयाल करने का उत्तरदायित्व होता है, वह उत्तरदायित्व पहले की शासन व्यवस्थाओं के शासकों पर नहीं था। इसलिए इन सब कामों को किसी भी तरह समाज स्वयं ही हल करता था। पूरा समाज सामाजिक और आर्थिक संगठन के रूप में जातियों में बंटा था और ये संगठन अपने-अपने समूह के लिए इन उत्तरदायित्वों का स्वयं वहन करते थे। समय-समय पर विभिन्न बाह्य और आंतरिक उठापटक के चलते इन समूहों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति गड़बड़ा जाती या बदल जाती थी। भारत में मुगलों के पतन और अंग्रेजों के आने के बाद इस सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में आमूल-चूल बदलाव आया। उद्योगों और कृषि दोनों का ह्रास हुआ। उद्योगिकीरण और अंग्रेजो की आर्थिक नीतियों के कारण कुछ जातीय समूहों की स्थिति तेजी से बिगड़ी और बदली। कुछ जातियों का पेशेगत एकाधिकार उनसे छिन गया। नए पेशों और रोजगारों के लिए जिस आर्थिक सहायता और वांछित कुशलता की आवश्यकता होती है उसके अभाव में वे जातियां निरंतर गरीबी और अभाव के दलदल में फंसती चली गईं। मजबूरी में जो काम (मजदूरी और मैला उठाने वाला) हाथ आया वही करने लगी। दूसरी ओर उन जातियों ने जिन्हें मुगलों के पतन और अंग्रेजों के आने से फायदा हुआ था, (ब्राह्मण, राजपूत, जमींदार, कायस्थ इत्यादि) की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति निरंतर सुदृढ़ होती गई। भारतीय समाज में विभिन्न जातियों की यह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्थिति लंबे समय तक लगातार बनी रही। यह वही समय था जब विभिन्न चीजों का दस्तावेजीकरण प्रारंभ हुआ। जनगणना, विभिन्न प्रकार के सर्वे, अखिल भारतीय स्तर पर इसी समय प्रारंभ हुए। इस समय के भारत की विभिन्न आधारों पर जो तस्वीर लिपिबद्ध की गई उसे ही स्वतंत्र होते भारत में शाश्वत सत्य मान लिया गया। दलितों के दिमाग में भी वही तस्वीर घर कर गई जो उन्होंने पिछले दो सौ – ढाई सौ सालों से देखी थी। एक ओर उनका तो आत्मविश्वास बैठ गया दूसरी ओर उन जातियों ने जिनके हित मुगलों के पतन के बाद पुष्ट हुए थे, जिन्होंने अंग्रेजों के आने से फायदे उठाए थे वे आत्माभिमान में इतनी भर गई थीं कि वे मानने लगीं कि वे तो हमेशा से ही इतनी सत्ताशाली स्थिति में थीं। इस स्थिति को हमेशा बनाए रखने के लिए यह जरूरी था कि यह बात सिद्धांत के रूप में फैलाई जाए कि एक जाति से दूसरी जाति में स्थानांतरण नहीं हो सकता। निम्न जातियों के लोग जन्मना ही बुद्धिहीन, कामचोर और बेईमान होते हैं इसलिए वे उन कामों व पदों के लायक ही नहीं हैं जिन पर सवर्ण इस समय विराजमान हैं। इसी समय इन जातियों को शूद्र व अतिशूद्र की श्रेणी मे डाल कर उन पर वे सब बंधन थोप दिए गए जो मनु समृति जैसी पुस्तकों में कभी लिखे गए थे। जबकि इन तमाम स्मृतियों- संहिताओं की ऐतिहासिकता स्वयं सवालों के दायरे में है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तथाकथित निम्न जातियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए जो नीतियां बनीं (मूलतः आरक्षण) उन्हें अपने इन्हीं पूर्वग्रहों के चलते उच्च जातियों ने कभी कामयाब नहीं होने दिया। दलितों के उत्थान के लिए उन्हें विभिन्न प्रकार की आर्थिक मदद के लिए आने वाला पैसा इधर-उधर दूसरे कामों में लगाने की मुहिम लगातार चलती रही है। ‘मेरिट’ का मुद्दा बनाकर आरक्षण के बल पर आए विद्यार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को अयोग्य ठहराने की हर मुमकिन कोशिश की गई। आज प्रतिभा और आरक्षण एक-दूसरे के धुर विलोम के रूप में स्थापित किए जा रहे हैं। आरक्षण विरोध में उठे बवालों में राष्ट्रीय सहारा के एक संपादक को अपनी पहचान छिपाए जाने की शर्त पर एम्स के आरक्षित कोटे के प्रशिक्षुओं ने बताया कि किस प्रकार उनके सवर्ण सहपाठी और उनके गुरु उनकी छोटी-छोटी गलतियों को इतनी तत्परता से ढूंढ़ते हैं ताकि जल्द से जल्द उन्हें आधार बनाकर तुरंत उनपर अयोग्यता का ठप्पा लगाया जा सके। आरक्षण विरोधियों का प्रतिभा (मेरिट) का तर्क भी इसी आरक्षण के आधार पर गढ़ा गया है, जो भी आरक्षण के माध्यम से विभिन्न संस्थाओं में आते हैं वे सब अयोग्य उम्मीदवार हैं उनमें प्रतिभा (मेरिट) का नितांत अभाव होता है इसी कारण वे सब जिनके पास आरक्षण का आधार नहीं है वे सब योग्य और प्रतिभावान हो जाते हैं चाहे वे विभिन्न संस्थाओं में चुने जाएं या न चुने जा सकें। यह मानसिकता मानकर चलती है कि प्रतिभा सवर्णों के घर की बांदी है जो नित्य प्रति इन्हीं के घरों में चहलकदमी करती है। पहले शास्त्र सम्मत रूप में खुले आम द्रोणाचार्य एकलव्य का अंगूठा मांग लेता था। आज क्योंकि शास्त्र संविधान इसके पक्ष में नहीं है और लोकतांत्रिक देश में अपने सार्वजनिक चेहरे पर किसी को कोई धब्बा भी मंजूर नहीं है इसलिए अब यह काम गुप-चुप भीतर ही भीतर निपटाया जाता है। द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा केवल इसलिए नहीं मांगा कि वह भील होने के कारण धनुर्विद्या सीखने के लिए अवैध व्यक्ति था। वास्तव में द्रोणाचार्य और उनके गुरुकुल की स्थापना ही केवल राज परिवार के बच्चों को युद्ध-विद्या सिखाने के लिए की गयी थी। उनकी लॉयलटी राजपरिवार के प्रति थी उन्हें युद्ध विद्या में इतना माहिर करना कि उनके राज्य को कोई उनसे छीन न पाए। कोई उन्हें चुनौती न दे पाए। एकलव्य को धनुर्विद्या सीखने के लिए किसी गुरु की जरूरत नहीं थी यह विद्या तो वन की जरूरतें उन्हें स्वयं सिखा रही थीं। उन्होंने जब वन-भ्रमण के दौरान एकलव्य की योग्यता को देखा तो उनके पांवों के तले से जमीन खिसक गई कि वह तो कभी भी राजपरिवार के लिए खतरा हो सकता है। इसलिए उन्होंने मिलकर उसके दायं हाथ का अंगूठा काट लिया। बाद में इस घटना को शास्त्रों के नाम पर वैध ठहराने की कोशिश की गई।

भारतीय काव्यशास्त्र के सभी आचार्यों ने एक मत से प्रतिभा को सर्वोपरि माना है वे मानते हैं कि काव्य का हेतु प्रतिभा है किंतु प्रभिता का हेतु (कारण) व्युत्पत्ति (विभिन्न शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन और लोक व्यवहार) तथा अभ्यास है। आ. हेमचंद्र लिखते हैं कि जिस प्रकार लता की उत्पत्ति का हेतु मिट्टी और जल से युक्त बीज है उसी प्रकार काव्य रचना का हेतु व्युत्पत्ति और अभ्यास से युक्त प्रतिभा है। आनंदवर्धन ने भी इस मत का समर्थन किया है। निस्संदेह प्रतिभा अनिवार्य है। पर व्युत्पत्ति अनिवार्य न होते हुए भी अभिवांच्छित है। भारतीय काव्यशास्त्र के अनुसार आज दलितों के संदर्भ में उठाए गए मेरिट (प्रतिभा) के सवाल को समझा जा सकता है। दलितों में प्रतिभा की कहीं कमी नहीं है परंतु ‘व्युत्पत्ति’ अर्थात अच्छी स्कूली शिक्षा सकारात्मक सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण और सही अवसर के अभाव में वह निखरकर सामने नहीं आ पाती। अर्थात् दलितों के यहां प्रतिभा नामक बीज तो है पर उचित मिट्टी और जल के अभाव में यह बीज अकुंरित नहीं हो पाता। आरक्षण सहित विभिन्न प्रावधान वह खाद-पानी उपलब्ध कराने का ही जरिया हैं।

वास्तव में उच्च शिक्षण संस्थानों व नौकरियों के साथ-साथ प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर भी विशेष प्रावधान किए जाने की जरूरत है। पूरे भारत में प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का स्तर सुधार कर सरकारी व गैर-सरकारी शिक्षण संस्थाओं के बीच की खाई को पाटना भी जरूरी है। प्राथमिक व माध्यमिक स्तर के गैर-सरकारी स्कूलों में भी दलितों का दाखिला सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अच्छी व सस्ती शिक्षा से ही सामाजिक न्याय की क्रांति साकार हो सकती है। इसके अतिरिक्त रोजगार के अवसर जनसंख्या के अनुपात में बढ़ाए जाने चाहिए। साथ ही मात्र दस मिनट के साक्षात्कार पर पूर्णतः आधारित चयन प्रक्रियाओं (विश्वविद्यालय में शिक्षकों की ) पर भी विराम लगना चाहिए। जहां प्रतिभागी की प्रतिभा से ज्यादा उनकी प्रबंधन क्षमता का आंकलन किया जाता है। सरकारी वस्तुओं की ठेकेदारी में दलितों का हित सुनिश्चित किया जाना भी एक कारगर उपाय है जिससे सरकारी नौकरियों पर इनकी एक मात्र निर्भरता को भी कम किया जा सके।

आजकल आरक्षण विरोध का जो मुद्दा गरमाया है उसमें भी बड़ा कंफ्यूजन है। क्या यह पूरी आरक्षण व्यवस्था का विरोध है या अन्य पिछड़ा वर्ग के 27% आरक्षण का विरोध है या यह पिछले सत्तर वर्षों से भीतर ही भीतर सुलगती उस खुन्नस का विस्फोट है जिसे इस ओ.बी.सी. आरक्षण ने और हवा दे दी है। इस आरक्षण विरोध के दो रूप सामने हैं एक आरक्षण को प्रतिभा विरोधी ठहराकर इसे पूर्णतय समाप्त कर देने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन, दूसरा हर उस जाति द्वारा जो अभी किसी भी आधार पर आरक्षण के दायरे में नहीं है उसके द्वारा स्वयं को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन।

आरक्षण को प्रतिभा विरोधी सिद्ध करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन की प्रकृति बहुत गहरी और मारक है – वह सीधे-सीधे सामने से वार नहीं करती पर वह अंदर ही अंदर हरेक उस व्यक्ति व बच्चे के मन में विष घोल रही है जो स्वयं आरक्षण के दायरे में नहीं है। उन्हें यह समझाया जा रहा है कि उन्हें जहां-जहां जो कुछ नहीं मिल पाया वह इस आरक्षण के कारण ही। यदि उन्हें किसी अच्छे शिक्षण संस्थान में प्रवेश नहीं मिला तो इसकी वजह यही है कि आरक्षण के कारण कम मेरिट वाले आकर बैठ गए। अगर उन्हें नौकरी नहीं मिल पाई तो इस कारण क्योंकि आरक्षण के कारण कम मेरिट वाले लोग वहां भर्ती हो गए। और तो और, इस मुहिम ने स्वयं आरक्षण का लाभ लेने वाले बच्चों और युवाओं के मन में भी ऐसा अपराधबोध भर दिया है कि वे अपनी इस पहचान को छिपाए रखने के लिए लाखों जतन करते देखे जाते हैं। शायद कहीं उनके भी मन में यह बात घर कर गई है कि आरक्षण कोई खैरात है जिसे लेकर वे दूसरों के बोझ तले दब जाते हैं।

पिछले कुछ सालों से आरक्षण के लिए चलाए जा रहे आंदोलन भी वास्तव में अपनी प्रकृति में आरक्षण विरोधी हैं। इसमें हरियाणा के जाट समुदाय द्वारा चलाया जा रहा हिंसक आंदोलन हो या गुजरात में पटेलों और मराठाओं द्वारा चलाया जा रहा आंदोलन हो। ये तीनों ही जातियां अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से सुदृढ़ जातियां रही हैं । वैयक्तिक और सार्वजनिक किसी भी आधार पर उनसे भेदभाव बरतने, उन्हें हीन व कमतर बताने के प्रयास नहीं होते। जाति किसी भी तरह उनके विकास में बाधक नहीं है। सत्ता में इन जातियों का दबदबा रहा है फिर वे किस आधार पर अपने लिए आरक्षण की मांग करती हैं। वास्तव में इनके ये आंदोलन ‘आरक्षण’ के असर को कम करने के प्रयास हैं। उनके द्वारा आरक्षण के लिए जो हिंसा फैलाई जाती है, जो उग्रतापूर्ण वातावरण बनाया जाता है वह इसीलिए जिससे आरक्षण को लेकर समाज में ज्यादा से ज्यादा नकारात्मक वातावरण बनाया जा सके।

रजनी दिसोदिया

– रजनी दिसोदिया

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के मिराण्डा हाउस कॉलेज में एसोसियेट प्रोफेसर (हिन्दी) के पद पर कार्यरत हैं।

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