मोरनी हिल्ज़ः नरबलि और उसके बाद – सुरेंद्र पाल सिंह

हरियाणा के एकमात्र हिल स्टेशन मोरनी हिल्ज़ की खूबसूरत वादियों में हरी भरी पहाड़ियाँ, एक पुराना क़िला, घग्गर नदी का उतरता चढ़ता हुआ बहाव, पानी का एक सुंदर और गहरा ताल जैसी तमाम चीजें किसी भी यात्री का मन मोह लेती हैं। यात्री तो यात्री ही होता है जो मन बहलाने के लिए कुछ समय के लिए आता है और फिर अपनी दुनिया में लौट जाता है। परंतु, पहाड़ का अपना जनजीवन अपनी तमाम खूबियों और कमियों के साथ शहरों और महानगरों की तेज रफ़्तार की बनिस्बत मन्द गति के साथ निरंतरता और बदलाव की राह चलते हुए यात्रियों की आँखों से प्रायः ओझल ही रहता है। 

मोरनी हिल्ज़ के जनजीवन के अनेक पहलुओं पर लिखने का मुख्य आधार एक 74 वर्षीय बुजुर्ग श्री मातु राम (नाम परिवर्तित) के साथ हुई लम्बी बातचीत है जो पहाड़ के उस इलाक़े से हैं जहां अभी तक भी सड़क नहीं पहुँची है। बस पकड़ने के लिए जंगल के रास्ते काफ़ी दूर पैदल चलना पड़ता है। बिजली भी अभी पिछले 5-6 साल पहले पहुँची है। मातु राम जी से बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के संस्मरण सुनना एक रोमांचक अनुभव रहा और इसी तर्ज़ पर मोरनी के पहाड़ में झाड़ फूंक करने वाले, भूत -प्रेत का इलाज करने वाले और देवी -देवताओं की शक्ति जगा कर काला जादू करने का दावा करने वाले सयानों से और मानसिक विकारों से ग्रसित कुछ रोगियों से बातचीत को इस आलेख में प्रस्तुत किया रहा है।

जीवन निर्वाह:

मोरनी क़स्बे से क़रीब 18 किलोमीटर दूर मातु राम जी के गाँव में मुश्किल से 10-12 घर हैं। उनके पास अपनी ज़मीन नहीं है लेकिन लम्बे अरसे से इनकी कई पुश्तें दूसरों की ज़मीन पर काश्तकार के तौर पर खेती करती रहीं है और इस प्रकार से इनके क़ब्ज़े में फ़िलहाल 10-15 बीघे खेती लायक़ ज़मीन है। फ़सल बारिश पर निर्भर है और जंगली जानवरों यथा बंदर, मोर, जंगली सूअर, जंगली मुर्ग़े, कक्कड़ (हिरण प्रजाति का बकरी जैसा जानवर) से इसे बचाना मुश्किल काम है। खेती के नाम पर मक्कई, टमाटर, मिर्च, हल्दी, अरबी और अदरक उगाया जाता है। एक दौर में खेती की उपज को अपने गाँव से कंधे और पीठ पर लाद कर क़रीब 8-9 किलोमीटर की दूरी पर लवासा चौकी तक ढोकर लाया जाता था और वहाँ से क़रीब 30 किलोमीटर आगे बस से नाहन की मंडी में ले जाकर बेचकर आते थे। लेकिन, हरड़ बेचने के लिए रायपुर रानी जाना पड़ता था। 

मातुराम जी के पिता की बीमारी से मृत्यु उस वक्त हो गई थी जब उनकी उम्र मात्र 7 वर्ष की थी। उन दिनों उनके गाँव में केवल चार घर होते थे जो पीने के पानी के लिए एक स्थानीय बावड़ी पर निर्भर थे। पढ़ाई, लिखाई, स्कूल, अस्पताल, बिजली आदि व्यवस्थाएं कल्पना के बाहर की बातें थी। उनके एक लड़के ने पहली बार स्कूल का मुँह देखा जिसके लिए उन्हें जंगल के रास्ते क़रीब 3-4 किलोमीटर पैदल चलकर हिमाचल प्रदेश के अपरों गाँव से दसवीं और उसके बाद हिप्र के ही ग़ुलाना घाट में स्थित स्कूल से प्लस टू किया। दूसरा लड़का दसवीं तक नहीं पढ़ पाया और बाक़ी तीन लड़कियों को स्कूल का कोई अनुभव नहीं हो पाया।

बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए मातुराम जी ने बताया कि केवल खेतीबाड़ी से उनका परिवार नहीं चल पा रहा था। इसलिए 17-18 वर्ष की उम्र में उन्होंने चिनाई के काम की मज़दूरी शुरू कर दी थी। इसके लिए उन्हें हिप्र के इलाक़ों में जाना पड़ता था। उन दिनों एक दिन की दिहाड़ी मात्र एक रुपया थी और उसकी अदायगी भी छः महीने बाद होती थी। धीरे धीरे उन्होंने पत्थर के काम में महारत हासिल कर ली और इस प्रकार से वे मिस्त्री बन गए। उन दिनों घर पत्थर की दीवारों, लकड़ी की छत से बनाए जाते थे और उनपर मिट्टी की लिपाई की जाती थी।

वस्त्र और भोजन:

वस्त्रों के नाम पर एक लम्बी क़मीज़ और नीचे लंगोट ही होता था। पावों में जूता नहीं पहना जाता था क्योंकि जूता एक लक्ज़री का आइटम था। ख़रीद फ़रोख़्त के लिए क़रीब 25-30 किलोमीटर दूर रायपुर रानी के बाज़ार तक पहाड़ी पगडंडियों के रास्ते पैदल जाना होता था। थोड़ी गुंजाइश होने पर हरड़ की बोरियों को ढोने के लिए खच्चरों को भाड़े पर ले जाते थे और वहाँ  के बाज़ार से रबड़ का जूता भी ख़रीद लिया जाता था। पुरुषों की क़मीज़ के लिए बिन्नी कम्पनी का मलेशिया खादर और औरतों के लिए मख़मली छींट का क़मीज़- पायज़ामा/ सूतन और मोटे कपड़े का दुपट्टा होता था। वस्त्रों की सिलाई सुई धागे से घर की औरतें अपने हाथों से ही करती थी। एक नई क़मीज़ को किसी विशेष मौक़े पर पहनने के लिए उधार माँगना सामान्य बात थी। मातुराम जी ने बताया कि 15-16 वर्ष की उम्र में उन्हें जीवन में पहली बार मशीन से सिला हुआ क़मीज़ और इसके एक- दो साल बाद रबड़/प्लास्टिक का जूता पहनने का सौभाग्य मिला। उस वक्त उन्होंने जूते की क़ीमत 13 रुपए अदा की थी और वह जोड़ा डेढ़ -दो साल तक चला था। 

सर्दियों में ठंड से बचने के लिए चूल्हे में आग जलती रहती थी और बिछावन के लिए धान की पुराली और खजूर के पत्तों से बनी चट्टाई का प्रयोग किया जाता था। 

हाथ की चक्की से मक्कई का आटा पीसा जाता था। और, जंगली सूअर, जंगली मुर्ग़ा, कक्कड का शिकार करना सामान्य बात थी। पूरे इलाक़े में मांसाहार प्रत्येक जाति के लोग करते रहे हैं। विशेष अवसर पर बकरे का मीट खाया जाता है।

आस्थाएँ, मान्यताएँ, देवी-देवता, पूजा-पाठ, भूत-प्रेत:

खेड़ा

    प्रत्येक परिवार अपनी खेती की ज़मीन के देवता के रूप में खेड़े की पूजा विशेष अवसरों पर करता है। खेड़े के देवता के रूप में पत्थर के एक टुकड़े को स्थापित किया गया होता है।

नगरखेड़ा

पूरे गाँव का सामूहिक देवता नगर खेड़ा कहलाता है। गाँव के भीतर या बग़ल में पत्थर की एक अनगढ़ मूर्ति की पूजा दिवाली के मौक़े पर कनक का रोट, गुड़ और घी के चढ़ावे के रूप में की जाती है। कुछ नगरखेड़ो में बकरे की बलि की परम्परा भी है। 

कुलेष्ट/ कुलदेवी

मातुराम जी ने बताया कि उनकी कुलदेवी का नाम नगरकोटि है जिसका मूल स्थान काँगड़ा में है। काँगड़ा स्थित देवी से उनके सम्बन्ध के बारे में उनका कहना है कि उनके दादा-परदादा के समय से ही यह मान्यता चली आ रही है और इसके वास्तविक इतिहास का उन्हें कोई ज्ञान नहीं है। कुलदेवी की पूजा दिवाली, दूज, ग्यास के समय जागरण के वक्त कढ़ाई और बकरे की बलि के रूप में की जाती थी। अग़ल बग़ल के गाँवों के परिवारों की कुलदेवियों के उदाहरण के रूप में ज्वाला माई, देवी भरागी आदि नाम बताए गए। उल्लेखनीय है कि कुलदेवी किसी एक जाति विशेष के परिवारों से ना जुड़कर अनेक जातियों के लिए सांझी है। लेकिन यह ग़ौरतलब है कि सांझी कुलदेवी होने के बावजूद ब्राह्मण और राजपूत जाति के लोग ये मानते है कि तथाकथित निम्न जाति के लोग यदि उनके घरों के बर्तनों में भोजन कर लेंगे तो सांझी होते हुए भी कुलदेवी रुष्ट हो जाती है।

कुलदेवता

कुलदेवी के साथ साथ प्रत्येक परिवार का एक कुलदेवता भी होता है। मातुराम जी के अनुसार पौराणिक देवता वीरभद्र उनका कुलदेवता है। वीरभद्र ने शिव के गण के रूप में सती द्वारा यज्ञकुंड में जल जाने का बदला सती के पिता राजा दक्ष की गर्दन काट कर लिया था। वीरभद्र किस प्रकार से उनका कुलदेवता बना इसके जवाब के तौर पर मातुराम जी परिवार की परम्परा का हवाला ही दे पाए।

क्षेत्रदेवी 

माँ शमलाशन की पूरे क्षेत्र की देवी के रूप में मान्यता है। साल में दो बार नवरात्रों के दिनों में यहाँ मेला लगता है। एक ऊँची पहाड़ी पर शमलोठा देवी के नाम से यहाँ एक प्राचीन मंदिर है जहाँ मेले के वक़्त क़रीब क़रीब प्रत्येक मोरनीवासी पूजा के लिए आता है। किसी भी परिवार में पहला पुत्र होने पर उस परिवार की तरफ़ से नवरात्रों के दौरान यहाँ एक रातभर का विशेष पूजन होता है। ऐसा ना करने पर देवी का उस बच्चे पर प्रकोप हो सकता है। कभी यहाँ पर बकरे की बलि सामान्य बात थी लेकिन सरकार द्वारा बलिप्रथा पर रोक लगाने के बाद प्रतीकात्मक बलि आज भी जारी है जिसमें बकरे को देवी की मूर्ति के सामने लाया जाता है और उसके कान के एक छोटे से टुकड़े को काट कर उसके खून के कुछ छींटे देवी को अर्पित करके बकरे को वापस ले जाकर घर में उसका मांस प्रसाद के तौर पर बाँट कर खाया जाता है। मातुराम जी ने यह भी बताया कि सरकार द्वारा बलिप्रथा पर रोक लगाने से पहले तक यहाँ भैंसे की बलि भी दी जाती थी। 

दूधिया नाहर सिंघ 

        अनेक अनिष्टकारी देवी-देवताओं के बीच दूधिया नाहरसिंघ ऐसा देवता है जिसकी शक्ति को अच्छे कार्यों के लिए जागृत किया जाता है।

ख़्वाजा पीर

          पानी के देवता को यहाँ ख़्वाजा पीर के नाम से जाना जाता है। गाँव की बावड़ी में मध्यरात्रि को एक तांत्रिक अनुष्ठान के ज़रिए इस शक्ति की सिद्धि की जाती है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ महीने में घग्गर नदी में दलिया और बकरे की बलि की परम्परा आज भी क़ायम है। 

मदानन

एक ऐसी शक्ति है जिसकी सिद्धि गंदगी में की जाती है और इसका प्रयोग किसी के अनिष्ट के लिए किया जाता है।

शामकाली 

           मसान की शक्ति को शामकोर के नाम से भी जाना जाता है जिसकी सिद्धि गुप्त रूप से आधी रात को मसान में की जाती है और इसका प्रयोग भी किसी का नुक़सान करने के लिए किया जाता है।

अघोरी नाहर सिंघ 

       दूधिया नाहरसिंघ के विपरीत इस शक्ति की सिद्धि गंदगी में की जाती है और इसका प्रयोग अनिष्टकारी उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

गोगापीर 

        लोकदेवता गोगा पीर की मान्यता इस इलाक़े में एक नया प्रकरण है। मातु राम जी के अनुसार इसका प्रचार प्रसार काफ़ी तेज गति से स्थान स्थान पर माड़ियो (मैड़ियों) की स्थापना के रूप में हो रहा है। लेकिन, ये सिलसिला मुश्किल से 15-20 साल पहले से ही शुरू हुआ है। गोगा पीर की शक्ति का प्रयोग भी झाड़ फूंक व अन्य कष्टों के हरण के लिए किया जाता है।  

झाड़नेवाला 

पहाड़ी इलाक़ों में साँप, बिच्छू, कीड़े आदि द्वारा डसे जाना सामान्य बात है और इनके तुरंत इलाज के लिए सयाने के पास जाकर झाड़ा लगवाना भी उतना ही सामान्य है। ज़हर उतारने के अलावा सयाने अन्य कई बीमारियों का इलाज भी करते हैं। झाड़ने वाला सयाना उपरोक्त अनिष्टकारी सिद्धियों वाला भी हो सकता है या केवल अच्छाई करने की सिद्धि वाला।   

दिवाली  

मोरनी के पहाड़ी इलाक़ों में दिवाली का त्योहार अलग ही तरीक़े से मनाया जाता है। सबसे पहले सिरमौर की बर्फीली शृंखला चूहड़धार में अग्नि प्रज्वलित की जाती है जिसका अनुसरण उससे नीचे हरिपुरधार शृंखला वाले करते हैं और इसको देखादेखी नाहन कुमारहट्टी रोड पर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित लोकदेवता भूरसिंघ देव के मंदिर में लकड़ियाँ जलाई जाती है जिसकी इंतज़ार मोरनी की पहाड़ियों वाले टकटकी लगाकर करते हैं और तमाम गाँवों में ढोल नगाड़ों के साथ इकट्ठी की हुई लकड़ियों में आग जलाते हैं। घरों में पकवान बनाए जाते हैं और सयाने इस रात को सिद्धि प्राप्त करने हेतु तांत्रिक कर्मकांड के लिए प्रयोग करते हैं।

होली

होली का त्योहार मनाने की परम्परा इस इलाक़े में न के बराबर है। पिछले कुछ वर्षों से यहाँ के लोग देखा देखी में फ़ाग वाले दिन को रंग -गुलाल, खाने- पीने आदि में गुज़ारने लगे हैं।

दशहरा

दशहरे के कुछ रोज़ पहले इस इलाक़े में जौ की बुवाई हो जाती है। दशहरे वाले दिन अंकुरित हो गए जौ के कुछ पौधे घर में लाकर खेती करने वाले औज़ारों पर टिकाए जाते हैं और धूप दीप जलाकर उनकी पूजा की जाती है। त्योहार है तो घर में कुछ मीठा पकवान बनेगा ही। 

सिद्धि प्राप्त करने की गुप्त विधि  

        किसी भी प्रकार के शारीरिक या मानसिक कष्ट के निवारण के लिए इस इलाक़े में कोई बिरला ही व्यक्ति होगा जो अलौकिक शक्तियों के प्रभाव में विश्वास ना करता हो। यहाँ साँप और बिच्छू द्वारा डसा जाना बहुत सामान्य घटना है और सयानों द्वारा इसका प्रभावी इलाज भी इतना सामान्य है कि रोगियों की आस्था मज़बूती से क़ायम रहती है। इस प्रकार से सयानों की उपलब्धि और उनकी साख अच्छे ख़ासे रूप में बनी रहती है। मगर, उनकी विशेषज्ञताएँ भिन्न भिन्न होती हैं। किसी भी प्रकार के  संकट का कारण या तो पित्तरदोष होता है, या किसी अहित चाहने वाले द्वारा टोना -टोटका, या देवी-देवता का कुपित होना। इनका समाधान तो कोई पहुँचा हुआ सिद्धि प्राप्त सयाना ही कर सकता है। तो कष्ट निवारण के लिए तलाश होती है किसी अच्छे सयाने की। 

सयाने की सिद्धि

सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति किसी अनुभवी सयाने के दिशानिर्देश के अनुसार अधिकतर मामलों में आधी रात को मसान में जाकर मंत्र साधना और कुछ तांत्रिक कर्मकांड करता है। मदानन और अघोरी नाहरसिंघ की साधना के लिए स्थान मसान की बजाए गंदगी से भरा होता है। आमतौर पर 7 से लेकर 41 रातों की साधना के  बाद एक विशेष कर्मकांड के माध्यम से मुर्ग़े की बलि दी जाती है जिसका मांस प्रसाद के तौर पर खाया जाता है लेकिन उसकी मुंडी और पंजे वहीं पर छोड़ दिए जाते हैं। इसके बाद साधक एक विशेष शक्ति का संचार महसूस करता है जिसे हवा आना कहा जाता है। और, बाद में जब भी किसी के कष्ट निवारण का उपाय करने के लिए जब वह अपने आसन पर बैठकर कुछ मंत्रों का जाप करता है तो उसके हाव भाव बदल जाते है और ये माना जाता है कि अब उसमें विशेष देवी या देवता की हवा प्रवेश कर चुकी है।

कष्टों का इलाज – 

       साँप और बिच्छू काटे मरीज़ को सबसे पहले तिलचट्टे पौधे की जड़ का रस पिलाया जाता है और कूटी गई जड़ को डसे गए स्थान पर कपड़े से बांध दिया जाता है। रस पीने से रोगी को उल्टी आती है। अब सयाना अपने आसन पर बैठकर मंत्र पढ़ता है, उसमें हवा आती है और वह मोरपंख से या भाभड़ के पौधे की तीलियों की एक झाड़ू को रोगी के शरीर पर ऊपर से नीचे की ओर फिराता है। धीरे धीरे रोगी दर्द को नीचे की ओर सरकता हुआ महसूस करता है और अंत में दर्द का शरीर से बाहर निकल जाने का एहसास करता है। इस प्रकार रोगी स्वस्थ होकर वापस लौटता है।

        मानसिक या पारिवारिक संकटों से परेशान व्यक्तियों की समस्याओं के समाधान से पहले सयाना गिनती करता है जिसके अनुसार मंत्र पढ़ते हुए सयाना या तो पाशे फेंकता है जिसमें रबड़ या प्लास्टिक के  एक चोकोर टुकड़े को पंचांग दिवाकर पर गिरने की चाल से या दानों की दो ढेरियों से चार- चार दाने बाहर निकालते हुए आख़िर में बचे हुए दानों की गिनती के हिसाब से ये क़यास लगाया जाता है कि समस्याग्रस्त व्यक्ति पर किसका प्रकोप है। प्रकोप पितरों का हो सकता है, किसी अनिष्टकारी शक्ति का हो सकता है, कुलदेवी या कुलदेवता का रुष्ट होना भी हो सकता है, किसी जादू टोना के कारण या कोई अन्य देवी या देवता का कुपित होना हो सकता है। उसी क़यास के अनुसार संकट के समाधान के लिए समस्याग्रस्त व्यक्ति को मंत्र फूंक कर चावल या सरसों के दाने दिए जाते हैं या पानी दिया जाता है। मरीज़ को एक अंतराल तक इनका सेवन करना होता है और उसके बाद आधी रात को मसान में जाकर मदानन देवी को शांत करने के लिए सिंदूर, चूड़ियाँ, लाल कपड़ा, नारियल आदि के साथ मुर्ग़े की बलि दी जाती है। यदि दूधिया नाहरसिंघ को शांत किया जाना है तो दिन के उजाले में उसकी मूर्ति पर दूध चढ़ाया जाता है। अनिष्टकारी देवता अघोरी नाहरसिंघ की शांति के लिए मसान में या गंदगी में आधी रात को शराब और मुर्ग़े की बलि दी जाती है। बलि से पहले मुर्ग़े को गुड़ाया जाता है जिसमें मुर्ग़े के शरीर में एक कमकंपी सी होती है जो इस बात का प्रमाण है दुष्ट शक्ति संकटग्रस्त व्यक्ति के शरीर से निकल कर उस मुर्ग़े में प्रवेश कर गई है और मुर्ग़े की बलि के साथ उस शक्ति का प्रकोप भी समाप्त हो गया है। 

यदि, एक या अनेक सयानों द्वारा किए गए उपायों के बावजूद पितर दोष ख़त्म नहीं होता है तो अंतिम उपाय के लिए हिप्र के सिरमौर ज़िले में एक ऊँचे पहाड़ की रेंज में स्थित हरिपुरधार में बड़ी देवी (देवी का असली नाम पुकारना असम्मानजनक माना जाता है इसलिए यहाँ भी नहीं लिखा जा रहा है) को छेली और भेली का चढ़ावा चढ़ाया जाता है। छेली के नाम पर बकरे के मेमने की क़ीमत के तौर पर आजकल रु 275/- और भेली के नाम पर पाँच सेर गुड़ होता है। स्पष्ट है कि बलिप्रथा पर रोक लगने के बाद अनेक प्रथाएँ अब केवल प्रतीकात्मक रूप में ही रह गई हैं।    

इस गोपनीय विद्या को बहुत विस्तार में लिखना इस आलेख के स्कोप से बाहर है। अतः यहाँ कुछ संकेत ही पर्याप्त हैं।

नरबलि की वह घटना 

       इस आलेख के शीर्षक में ‘नरबलि’ शब्द का ज़िक्र है। पाठकों की उत्सुकता को शांत करने के लिए आइए अब हम आस्ट्रेलिया से छपने वाले ‘द होर्शम टाइम्ज़, विक्टोरिया’, (13 मई 1938) ’द सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड, न्यू साउथ वेल्ज़’ (15 सितम्बर 1937) और ‘द डेली न्यूज़, पर्थ’ (14 सितम्बर 1937) अख़बारों पर नज़र डालें तो एक रोंगटे खड़े करने वाली कहानी पढ़ने को मिलती है जो उपरोक्त वृतांत से जुड़ी हुई है।        

     नाहन के इलाक़े में गुणपुर गाँव के मुखिया ने पड़ोस के गाँव के एक नौजवान को तीन दिनों तक एक कमरे में ज़ंजीरो से बांध कर रखा। इसके बाद ढोल नगाड़ों के बीच ज़ंजीरो से जकड़े हुए, उसके माथे पर सिंदूर और राख लगाकर, गले में फूलों की माला डाल कर जलूस के रूप में उसे गाँव के मंदिर की वेदी पर ले जाकर उसकी गर्दन काट दी गई। उस वक्त दर्शकों की भीड़ भजन गा रही थी। यह मानव बलि मंदिर के पुजारी की सलाह पर दी गई थी जिसने दावा किया था कि इस प्रकार से इंद्र देव प्रसन्न होकर वर्षा कर देंगे और सूखे व अकाल का ख़ात्मा हो जाएगा। पुलिस को उस नौजवान का कटा हुआ सिर मंदिर में मूर्ति के सामने मिला। बलि के शिकार नौजवान की पत्नी को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उसने पुलिस थाने में ही आत्महत्या कर ली थी। 

       इस प्रकरण में गाँव के मुखिया को उम्रक़ैद, पुजारी को दस साल और तीन अन्य अभियुक्तों को 14 वर्षों की कठोर कारावास की सजा मिली थी।

निरंतरता और बदलाव: 

        यदि क़रीब 85 वर्ष पहले नरबलि की घटना को आधार मानकर आज के परिवेश से तुलना की जाए तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जिसमें बहुत कुछ बदल चुका है लेकिन काला जादू, पशुबलि, टोने- टोटके, पितर दोष, अनिष्टकारी शक्तियों का प्रभाव, देवी देवताओं का प्रकोप, झाड़ फूंक आदि मान्यताएं संशोधित रूप में बरकरार हैं। 

     किसी भी बीमारी के लिए झाड़ा लगवाएँगे तो डॉक्टर से दवाई भी लेंगे। मानसिक रोगों के लिए मनोचिकित्सकों से इलाज करवाने वाले कितने ही मरीज़ों को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूँ जिन्होंने पहले सयानों की सेवाएँ ली थी और एक सयाने से लेकर अनेक सयानों के चक्कर काट चुके थे। पिछले पाँच -छः वर्षों से अनेक विद्यार्थियों ने पंचकुला या चंडीगढ़ जाकर पढ़ना शुरू किया है तो बाहरी दुनिया का असर होने लगा है।इसी प्रकार से कर्मचारियों और अध्यापकों का आवागमन भी सामाजिक चेतना में बदलाव लाने का एक मुख्य कारक है। काले जादू की सिद्धि प्राप्त करने का अभ्यास करने वालों में से कुछ लोग अब मानने लगे हैं यह पूरा खेल मानसिक सम्मोहन का है। 

निष्कर्ष: 

      इस आलेख को समेटते हुए इस दावे से असहमति जताना चाहूँगा कि भूतप्रेत, काला जादू, झाड़- फूंक आदि चालाक और स्वार्थी व्यक्तियों द्वारा खेले जाने वाला प्रपंच मात्र है। इस बात की सम्भावना को पूर्णतया ना नकारते हुए यह उल्लेख करना आवश्यक है कि प्रत्येक साधारण आदिवासी समाज में इस प्रकार की तमाम मान्यताएं, आस्था, विश्वास प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं जबकि चालाकी, स्वार्थपन जैसे अवगुण उनके व्यवहार में नहीं होते हैं। ऐसे समाज में जहाँ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ कुछ वर्षों से ही पहुँची हो, वैज्ञानिक विचारों का प्रचार-प्रसार नाममात्र का हो, बड़े शहरों से जुड़ाव अभी शुरू ही हुआ हो वहाँ अलौकिक शक्तियों की कारगुजारियों के कारण सुख दुःख, हारी बीमारी, कष्ट, संकट आदि का होना और निवारण हेतु इन शक्तियों को किसी न किसी उपाय से प्रभावित करने की स्वभाविक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। 

        इलाज जड़ी बूटी से भी होता है तो दवाइयों से भी होता है और आस्था व विश्वास के सम्मोहन से भी होता है। कष्ट का शिकार व्यक्ति तमाम उपाय अपनाता है लेकिन ठीक होने पर अलौकिक शक्तियों के चमत्कार को पूरा श्रेय दे देना इनकी मानसिकता का स्वभाव बना हुआ है। मनोविश्लेषण में फेथ हिलिंग एक महत्वपूर्ण अध्याय है और इस आलेख की विषय वस्तु को बेहतर समझने के लिए फेथ हिलिंग का अध्ययन आवश्यक हो जाता है। सामूहिक मानसिकता के व्यूहचक्र से बाहर निकलना अप्रत्यक्ष रूप से असामाजिक गतिविधि की श्रेणी में शामिल माना जाता है और इस प्रकार से सामाजिक संरचना और सामाजिक सम्मोहन की प्रक्रिया में निरंतरता और परिवर्तन के एक अध्ययन के रूप में यह आलेख पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।          

सुरेंद्र पाल सिंह

जन्म - 12 नवंबर 1960 शिक्षा - स्नातक - कृषि विज्ञान स्नातकोतर - समाजशास्त्र सेवा - स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत लेखन - सम सामयिक मुद्दों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित सलाहकर - देस हरियाणा कार्यक्षेत्र - विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के माध्यम से सामाजिक मुद्दों विशेष तौर पर लैंगिक संवेदनशीलता, सामाजिक न्याय, सांझी संस्कृति व साम्प्रदायिक सद्भाव के निर्माण में निरंतर सक्रिय, देश-विदेश में घुमक्कड़ी में विशेष रुचि-ऐतिहासिक स्थलों, घटनाओं के प्रति संवेदनशील व खोजपूर्ण दृष्टि। पताः डी एल एफ वैली, पंचकूला मो. 98728-90401

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