जाति-व्यवस्था का क्षय हो – ई. वी. रामासामी पेरियार

उच्च जाति के धूर्त व्यक्तियों ने अत्यन्त धूर्ततापूर्वक जाति और धर्म को आपस में जोड़ दिया; ताकि उनको अलग करना मुश्किल हो जाए। इसलिए, जब आप जाति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, तो आपको यह डर नहीं लगना चाहिए कि धर्म भी नष्ट हो जाएगा।

पेरियार

बहनों और भाइयों !

किसी जाति से जुड़कर आपको कोई लाभ होने वाला नहीं है। माननीय मंत्री जो करीब ही बैठे हैं, भले ही वह प्रेसीडेंसी के प्रमुख हैं; भले ही उनमें केन्द्र सरकार में मंत्री होने की क्षमता है; भले ही वह विशाल वेललार समुदाय से आते हैं; लेकिन, उनको एक निम्न जाति के व्यक्ति के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। उनके ऊपर तीन जातियाँ हैं। उनकी जाति शूद्र की श्रेणी में आती है। इसलिए जब तक जाति का तमगा लगा है, तब तक ऊँचे और नीचे की भावना समाप्त नहीं होगी। इस अन्तर को नष्ट करने के लिए जाति नाम और उससे जुड़े अहसास को नष्ट करना होगा । भाइयों! पहले ही काफी समय नष्ट हो चुका है। कई अहम प्रस्ताव पारित होने हैं। सम्मेलन शीघ्र समाप्त होने को है। इसलिए, जैसा कि आज सुबह कहा गया, कुछ प्रारम्भिक टिप्पणियाँ आवश्यक हैं।

हमें देशभर में ऐसे सम्मेलन होते नजर आते हैं। देश में तमाम जातियाँ और समुदाय हैं। जिस दिन हमारे यहाँ जाति-व्यवस्था का प्रादुर्भाव हुआ और जन्म के आधार पर लोगों का ऊँचा या नीचा होना तय होने लगा, उसी दिन से प्रत्येक जाति के लोगों के लिए अलग-अलग सम्मेलन आयोजित करने की आवश्यकता पैदा हो गई। मुझे तमाम लोगों से ऐसी शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि अगर अलग-अलग जातियों के अलग-अलग सम्मेलन आयोजित होते रहे, तो हम सब एकजुट कब हो सकेंगे?

मैंने यह भी सुना है कि कुछ लोग इन सम्मेलनों को साम्प्रदायिक करार दे रहे हैं और इनमें शिरकत से इनकार कर रहे हैं। इसके लिए जाति या समुदाय आधारित बैठकें आयोजित करने वालों को दोष नहीं दिया जा सकता है। यह जरूरी है कि ऐसे सम्मेलन आयोजित किए जाएँ। जब तक किसी खास समुदाय से ताल्लुक रखने वालों को यह नहीं लगता है कि उनका दर्जा औरों से कमतर है, तब तक वे अपनी स्थिति सुधारने के लिए कोई प्रयास नहीं करेंगे। अगर उनको यह अहसास हो जाता है कि वे भी मनुष्य हैं और वे भी औरों के समान हैं तथा उनको कमतर बताने या उन पर असहनीय अत्याचार करने का काम कुछ स्वार्थी लोगों का काम है, तो वे समानता हासिल करने का प्रयास करेंगे। भले ही उनको देवेन्द्र कुला वेललार जैसे भारी-भरकम शब्दों से पुकारा जाए; हकीकत में वे वंचित और अस्पृश्य हैं। जब उनमें आत्मसम्मान की भावना आ जाएगी, तो वे समानता हासिल करने का प्रयास करेंगे। तमाम मौजूदा समस्याओं की वजह नीची जाति का तमगा और दूसरों द्वारा निम्न कहकर पुकारा जाना है। ऐसे में इस व्यवस्था से निकलने का प्रयास किया जाना अनिवार्य है।

ऐसे सम्मेलनों से हम क्या सीखते हैं? ऐसे सम्मेलनों की चमक-दमक की सराहना करने और इनके बारे में गर्व महसूस करने के बजाय हमें इसके बात पर ध्यान देना चाहिए कि यहाँ क्या निर्णय हुए? कौन-से प्रस्ताव पास हुए? हमें खुद को उन नतीजों के मुताबिक तैयार करना चाहिए ।

हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा में शामिल होने के अनुकूल नहीं। अगर हर किसी को समान स्तर पर रख दिया जाए, तो हम अवश्य अपनी क्षमता दिखा सकते हैं। लेकिन, फिलहाल दौड़ की शुरुआत से ही अलग-अलग वर्ग काफी आगे-पीछे खड़े हैं और देवेन्द्र कुला वेललार तो इस पंक्ति में सबसे पीछे खड़े हैं। जब उन पर प्रतिस्पर्धा के लिए दबाव बनाया जाता है; तो जाहिर है, जो सबसे पीछे है – वह चाहे जितनी मेहनत कर ले; उसे सबसे पीछे ही रहना है। हमारी शैक्षणिक और आर्थिक स्थिति भी बहुत सीमित है। कुछ लोग कह सकते हैं कि हमने शिक्षा हासिल करने के बहुत अधिक प्रयास नहीं किए। ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा, जिसने शिक्षा हासिल करने की कोशिश नहीं की हो। परन्तु हम बँधे रहे हैं। हमें जकड़े रखा गया, ताकि हम शिक्षा और बेहतर आर्थिक स्थिति न हासिल कर लें। अगर हम एकजुट हो गए, तो वे जकड़बन्दियाँ टूट सकती हैं। हम इस प्रतिस्पर्धा में भी बहुत अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं ।

जाज हालाँकि, कुछ लोग मानते हैं कि देवेन्द्र कुला वेललार अस्पृश्य होते हैं; कुछ लोग उनको शूद्र और वेश्या पुत्र मानकर भी खुद से दूर रखने की हिमायत करते हैं। एक ब्राह्मण, जो अपने अलावा सबको शूद्र मानता है; उसे दक्षिण अफ्रीका में गोरे सामाजिक रूप से कमतर मानते हैं। वह कुछ खास जगहों पर रह नहीं सकता, न ही वह कुछ सड़कों पर चल सकता है। यानी दुनियाभर में लोगों के साथ ऐसा दोयम व्यवहार होता है।

अगर कोई आपको पल्लार, परयर कहकर पुकारता है और आपसे खराब व्यवहार करता है, तो मैं कहूँगा कि वह आपसे भी बुरी स्थिति में है। आपका जाति नाम किसी भी तरह उन लोगों के जाति नाम से भिन्न नहीं है, जो आपको अपने से कमतर समझते हैं। अगर कोई मुझसे पूछे कि पल्लार, परयर या शूद्र कहे जाने में सबसे ठीक क्या है? तो इसके उत्तर में मैं कहूँगा कि कभी किसी को शूद्र मत कहिए । पल्लार और परयर कहा जाना, तो फिर भी बेहतर है। इसलिए, क्योंकि शूद्र नाम में जो भाव छिपा है, वह अन्य जातियों से खासा कमतर है। पल्लार और परयर तो अपने माता-पिता की सन्तान होते हैं, जबकि शूद्रों को ब्राह्मणों की रखैल की सन्तान माना जाता है। आप कह सकते हैं कि मौजूदा सरकार ऐसा नहीं मानती है। परन्तु अगर पुराना रामराज्य वापस आया, तो स्थिति ठीक यही होगी; जो मैंने कहा ।

आज भी त्रावणकोर में जहाँ रामराज्य है, वहाँ स्थिति ऐसी ही है। वहाँ अगर आप किसी पक्के नायर से पूछेंगे कि तुम किसके बेटे हो? पिता का नाम क्या है? तो वह उत्तर में कहेगा कि मैं फलाने नंबूदरी का बेटा हूँ। मैं अमुक नंबूदरी से पैदा हुआ हूँ। वह अपने आपको एक नायर का बेटा बताने एक में शरमाएगा। उसके ऐसा कहने की वजह यह है कि वहाँ रामराज्य है । सच्चे हिन्दू राज्य में कोई व्यक्ति इच्छा के मुताबिक पिता बदल सकता है और सम्बन्धित व्यक्ति की इच्छा से एक महिला कई पुरुषों की पत्नी हो सकती है । यहाँ शूद्र शब्द का लगभग यही अर्थ है।

आप खुद को वेललार कहलवाना चाहते हैं । वन्नियार खुद को क्षत्रिय कहलवाना चाहते हैं। चेट्टियार खुद को वैश्य कहलवाना चाहते हैं। अगर पूछा जाए कि यह सब क्यों? क्योंकि, यह तो खुद को गिराने के समान है; तो आपकी तरफ से उत्तर मिलता है कि क्या हुआ, हम तो केवल अपने माता-पिता सुधार रहे हैं और आप हैं कि हमें नीचे धकेल रहे हैं?

कुछ नडार सज्जनों ने केवल आर्यों का अनुकरण करने की कोशिश में पूनुल ( यज्ञोपवीत) धारण किया । जब उनसे उसे हटाने को कहा गया, तो उन्होंने उत्तर में कहा कि उन्हें इसे धारण करने में लम्बा अरसा लगा है और काफी लम्बा संघर्ष करना पड़ा है और इससे पहले कि यह पुराना भी पड़े आप हमें इसे उतारने को कह रहे हैं? यानी यह स्पष्ट है कि क्षत्रिय, वैश्य, वेललार कहलाने की कोशिश या पवित्र धागा धारण करना यह बताता है कि यह भावना अभी मौजूद है कि हमसे ऊँची जातियाँ अस्तित्व में हैं। ऐसी कोशिश करने वाले यह मानते हैं कि वे औरों से कमतर हैं। जो व्यक्ति खुद को उच्च जाति का क्षत्रिय और वैश्यों से ऊपर मानता है और वैश्यों को शूद्रों से बेहतर मानता है, वह भी शेष दोनों से एक समान निम्न व्यवहार करता है ।

उसके लिए शेष तीनों जातियों में कोई फर्क नहीं। क्या आपने ऐसा होते देखा नहीं और क्या आपको कभी रेलवे टिफिन सेंटर या होटल जाते वक्त इस बात का अहसास नहीं हुआ ? यहाँ दो स्थान होते हैं – एक स्थान पर ब्राह्मण बैठकर भोजन करते हैं और दूसरी जगह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बैठकर भोजन करते हैं। आपको वहाँ क्या अन्तर नजर आता है? क्या इससे यह संकेत नहीं जाता है कि ब्राह्मण औरों से श्रेष्ठ हैं; जबकि शेष तीनों जातियाँ एक समान हैं? तब फिर आप क्यों कहते हो कि आप क्षत्रिय, वैश्य या वेललार हो और आप ऐसी स्थिति में ऊँची या नीची जाति की बात ही क्यों करते हो? क्या आपको यह समझ में नहीं आता है कि ये सारे आपकी एकता भंग करने के धूर्ततापूर्ण उपाय हैं? जातियों के बँटवारे से केवल एक जाति को लाभ होता है; बाकी सभी की एकता भंग होती है।

इसलिए, हमें इस नतीजे पर पहुँचना होगा कि जाति की वजह से होने वाले अत्याचारों का खात्मा होना चाहिए या नहीं? दूसरी बात हमें इस नतीजे पर भी पहुँचना होगा कि किसी व्यक्ति के लिए उच्च जाति या निम्न जाति जैसी कोई चीज नहीं होती। जाति प्रथा का चाहे जो भी आधार हो, इसे तत्काल नष्ट किया जाना चाहिए। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं और सोचते हैं कि फिर भी जाति-प्रथा को खत्म किया जा सकता है; तो यह वैसा ही है, जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति पेड़ की ऊँची शाखा पर बैठकर उसके निचले हिस्से को काट रहा हो । जाति और आचार संहिता जैसी बातों ने ही धर्म रूपी वृक्ष को संरक्षण दे रखा है। जाति को धर्म से अलग करना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया और अगर जाति और धर्म आपस में जुड़े रहे, तो दोनों का नष्ट होना अपरिहार्य है।

उच्च जाति के धूर्त व्यक्तियों ने अत्यन्त धूर्ततापूर्वक जाति और धर्म को आपस में जोड़ दिया; ताकि उनको अलग करना मुश्किल हो जाए। इसलिए, जब आप जाति को नष्ट करने का प्रयास करते हैं, तो आपको यह डर नहीं लगना चाहिए कि धर्म भी नष्ट हो जाएगा। क्योंकि, ऐसा होना अनिवार्य है। जाति और धर्म के वृक्षों को एक साथ जलाकर राख करना होगा। लेकिन, इसमें एक समस्या भी है। धर्म वेदों, पुराणों आदि से आबद्ध है। इसलिए, उसे पहले वेदों और पुराणों से मुक्त करना होगा। यह बन्धन बहुत मजबूत से है 1 और इसमें अलगाव सम्भव नहीं है। यहाँ भी इन दोनों को एक साथ ही नष्ट करना होगा । वेदों का सम्बन्ध ईश्वर से है । इसलिए ईश्वर से भी निपटना होगा।

अगर आप वेदों से मजबूती से पेश आते हैं, तो ईश्वर को भी झटका लगेगा । यहाँ पर किसी भी व्यक्ति के लिए दुविधा की स्थिति बन सकती है। लेकिन, ईश्वरीय सत्ता को हिलाने से भी भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। जाति धर्म, वेद, ईश्वर सभी को नष्ट किया जाना चाहिए। वे एक-दूसरे से इस कदर जुड़े हुए हैं कि उनमें से किसी को भी अलग कर पाना या उनको अलग-अलग नष्ट कर पाना मुश्किल है। ऐसे में जब हम उन सभी को एक साथ नष्ट करेंगे, तो यदि उनमें से किसी में जरा-सा भी दम होगा, तो वह नष्ट होने से बच जाएगा। इसलिए जब हम जाति व्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं और धर्म भी नष्ट होता है; तो होने दें। हम ऐसा धर्म नहीं चाहते, जिसमें जाति-व्यवस्था जैसी गड़बड़ी हो । उसे नष्ट हो जाने दीजिए; आज और अभी। जब आप धर्म को जलाते हैं, तब अगर वेद भी जल जाता है, तो जलने दीजिए। जब आप वेद को जलाएँ, तब अगर ईश्वर भी जलता है, तो उसे जल जाने दीजिए। हमें ऐसे ईश्वर की आवश्यकता नहीं ।

जाति के अत्याचारों के कारण मनुष्य की स्थिति अपशिष्ट पदार्थ से भी बुरी रही है । यह सच है, केवल जुमलेबाजी नहीं । एक व्यक्ति जो नित्यक्रिया से निपटने जाता है, वह पानी भरे बर्तन से उस क्षेत्र को साफ करता है। अगर गलती से भी किसी का हाथ या पाँव मल से टकरा जाए, तो वह अपने हाथ या पैर को धोकर साफ करता है। लेकिन, अगर कोई इनसान किसी अन्य इनसान से टकरा जाए, तो ऐसा माना जाता है मानो वह सर से पैर तक पूरी तरह दूषित हो गया। तब कहा जाता है कि जब तक वह व्यक्ति सर से पैर तक पानी से नहा नहीं लेता, तब तक यह प्रदूषण जाने वाला नहीं है। जाहिर है मनुष्य की स्थिति मल से भी गई- गुजरी है। अगर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को छू दे, तो भला इससे क्या नुकसान होने वाला है ? यह किस तरह का प्रदूषण है? यह क्या कोई अपराध है? नहीं; तो फिर इसे दोष क्यों कहा जाता है ? ऐसा करना केवल दूसरों को मूर्ख बनाकर जीवन व्यतीत करने के समान है।

कुछ लोग कहते हैं कि अमुक जाति के लोगों को नहाकर अपने शरीर को साफ करना चाहिए; ताड़ी नहीं पीनी चाहिए; मांस नहीं खाना चाहिए। जो लोग ऐसा कहते हैं, वे खुद को सुधारवादी बताते हैं। मैं यह नहीं कहता कि इन लोगों को साफ नहीं रहना चाहिए। न ही मैं कहता हूँ कि उनको ताड़ी या अरक पीना ही चाहिए या मांस खाना ही चाहिए। लेकिन, उनको केवल इस आधार पर नीचा दिखाने का काम नहीं किया जाना चाहिए।

मैं ऐसे लोगों को सलाह देने वालों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वे ऐसे लोगों को नहीं छूते, जो नहाते नहीं या ताड़ी पीते अथवा मांस खाते हैं? क्या वे रोज जितने लोगों को छूते हैं या जितने लोगों से संवाद करते हैं, वे सभी रोज स्नान करते हैं? क्या वे मांस नहीं खाते? क्या वे ताड़ी या अरक नहीं पीते? मैं सप्ताह में केवल दो दिन नहाता हूँ? चूँकि मैं निरन्तर यात्रा पर रहता हूँ; इसलिए मैं इससे ज्यादा नहीं नहा पाता। मेरे जैसे तमाम लोग हैं। क्या वे ऐसे लोगों को नहीं छूते? दुनिया में 99 प्रतिशत लोग मांस खाते हैं। पीने की परम्परा भी सभी जातियों में है। क्या ये लोग इन तमाम लोगों को नहीं छूते?

क्या हमारे यहाँ होने वाली तमाम ताड़ी और सारा मांस केवल वही लोग खाते-पीते हैं, जिनको अस्पृश्य कहा जाता है? कुछ लोग कहते हैं कि ये लोग गोमांस खाते हैं। जो लोग हम पर शासन करते हैं, वे पूरी तरह गोमांस खाने वाले हैं। जिन लोगों ने गोमांस-भक्षियों को अपना शासक स्वीकार कर लिया है और उनके अधीन हैं; उनको हमारे किसी भाई-बन्धु के गोमांस खा लेने से भला ऐसी क्या आपत्ति है? क्या ये बातें बेतुकी, बेशर्मी भरी और एक तरह के श्रेष्ठताबोध से संचालित नहीं हैं? मुस्लिम भी गोमांस खाते हैं। ये लोग इस मुद्दे पर उनसे क्यों नहीं लड़ते ?

कुछ अन्य लोगों का कहना है कि वे मृत गायों और बैलों का मांस खाते हैं। यदि ऐसा है भी, तो उन तक भला किस तरह का प्रदूषण पहुँचता है? क्या भयभीत और चीखती-चिल्लाती गाय को मारकर खाना बेहतर या मृत और दफनाए जाने को तैयार गाय को मारकर खाना? वह भी तब, जबकि गरीबी ने कोई अन्य विकल्प नहीं छोड़ा हो । क्या यह कोई पाप है? कीड़ों को खाने वाली मुर्गियाँ, गंदगी खाने वाले सूअर की तुलना में घास और खली खाने वाले मृत गाय और बैल को खाना खराब काम कैसे हो गया?

अगर किसी व्यक्ति के पास नहाने का कोई जरिया ही न हो, तो वह भला कैसे नहाएगा? आप मठाधीशों और तथाकथित संतों को बन्द कर दीजिए। उनको एक महीने तक नहाने और मुँह दाँत आदि धोने के लिए पानी मत दीजिए। क्या उनके मुँह से बदबू नहीं आएगी? क्या उनका शरीर बदबू नहीं देगा? क्या उनके कपड़े गंदे नहीं होंगे? ऐसा क्यों होगा? क्या ऐसा उनको पानी नहीं देने के कारण होगा ? या इसमें उनकी पैदाइश की कोई भूमिका होगी? जब तथाकथित अस्पृश्यों को पीने का पानी नहीं दिया जाता, तो फिर यह कहना निहायत मूर्खतापूर्ण है कि वे नहाते नहीं हैं। जब उसे इतना कम पैसा मिलता है और उसकी कड़ी मेहनत से मामूली आय होती है और जब वह ऐसी सामाजिक स्थिति में है कि मांस नहीं खरीद सकता, तो वह मृत गाय या बकरी का मांस खाने के अलावा क्या कर सकता है? उसे अपनी आजीविका के लिए तमाम कठिन स्थानों पर जाना होता है। फिर चाहे कड़ी धूप हो, कड़ाके की ठंड हो, विकट बारिश हो रही हो या वह पसीने में लथपथ हो। अगर वह शारीरिक थकान मिटाने के लिए ताड़ी पीता है, तो क्या वह इसलिए दूसरों से कमतर हो जाएगा?

मैं इन जगहों पर इनकी सामाजिक स्थिति के बारे में नहीं जानता। हमारे यहाँ तो इस जाति को तालाबों और जलाशयों तक पर नहाने की इजाजत नहीं है; जबकि वहाँ जानवरों तक को नहलाया जा सकता है । इनको उन नहरों तक में नहाने की इजाजत नहीं है, जिनके जरिये पानी कुओं से खेतों तक पहुँचाया जाता है। इन बातों के लिए कौन उत्तरदायी है? क्या यह सब जन्म से जुड़ा है? या फिर यह जातीय गौरव से लैस लोगों की करतूत है ?

हमने सब कुछ निष्पक्ष ढंग से किया; धर्म के अनुशासन का पालन, शास्त्रों का पालन, ईश्वर के प्रति आस्था का प्रदर्शन आदि करने में असीम धैर्य का परिचय दिया। यह सब इसलिए, ताकि हमारी जीवन परिस्थितियों में कुछ सुधार आए। हमने सब कुछ शान्तिपूर्ण अन्दाज में किया; धर्म और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का प्रदर्शन किया। परन्तु, धैर्य और शान्ति प्रदर्शन की एक सीमा है। अब वह सीमा टूट चुकी है। अब धर्म, वेद या ईश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया जाएगा।

वे कहते हैं कि पुराणों में कोई कमी मत निकालो। इन पुराणों ने नन्दन को नयनार और पन्नन को अलवार बना दिया। ठीक है; हम खामोश रहते हैं। लेकिन, अगर यह सच है कि नन्दन को स्वर्ग जाने का अवसर मिला या उसे मुक्ति मिली, तो उसके बेटे को मन्दिर जाने की इजाजत क्यों नहीं दे रहे हो? अगर यह सच है कि पन्नन को अलवार बना दिया गया था, तो उसके पोते को मन्दिर जाने से क्यों रोका जाता है? आप नन्दन और पन्नन के लिए एक-एक पत्थर रखते हैं और चाहते हैं कि लोग उनके नाम पर पोंगल अर्पित करें। आप ऐसा करके धन कमाना चाहते हैं। आप उनके नाम पर और क्याक्या कर रहे हैं? अगर नन्दन ऐसा कर सकता है, तो हम क्यों नहीं? अगर हम ऐसे प्रश्न पूछते हैं, तो वे कहते हैं कि नन्दन ने मन्दिर प्रवेश के पहले आग में प्रवेश किया; इसलिए तुम भी ऐसा ही करो। यानी अगर हम मन्दिर जाना चाहें, तो हमें पहले आग पर चलना होगा। ऐसे तो हम जलकर राख हो जाएँगे। प्रवेश की तो बात ही छोड़ दीजिए।

यानी जाति के बन्धन को हर हाल में खत्म किया जाना चाहिए। जातिगत भेदभाव दूर करने की कोशिश में तमाम बलिदान दिए जाने चाहिए। हमें इस सम्मेलन में पारित प्रस्तावों को क्रियान्वित करना चाहिए। हर किसी को आगे आकर इनसे प्रतिबद्धता जतानी चाहिए। पल्लार कहकर पुकारा जाए या वेललार, इसमें समय गँवाने में कोई तुक नहीं है। पश्चिमी देशों में कई चीजों पर शोध किया जा रहा है और हम यहाँ नामों को लेकर लड़ रहे हैं। अगर आप अपने आपको देवेन्द्र कुला ब्राह्मण कहेंगे, तो भी क्या होगा? मैं उन लोगों की पीड़ा से भी अवगत हूँ, जिन्होंने अपने जाति नाम में ब्राह्मणों का नाम जोड़ लिया है। विश्व ब्राह्मण, देवांग ब्राह्मण, सौराष्ट्र ब्राह्मण आदि ऐसे ही नए नाम हैं।

मुझे पता है उनकी हालत क्या है? एक आदि द्रविड़ को किसी घर से चाहे जितनी गालियाँ मिलती हों; वह वही खाएगा, जो उसे उस घर से दिया जाएगा। जहाँ उसे खड़ा किया जाएगा, वह खड़ा होगा और जो उसे दिया जाएगा, वह ले लेगा । लेकिन, वह विश्व ब्राह्मण के घर से दिया गया पानी तक नहीं छुएगा। अगर आप उससे इसकी वजह पूछेंगे, तो आपसे कहा जाएगा कि विश्व ब्राह्मण इदक्कैयार यानी बाएँ हाथ वाले हैं; जबकि हम सभी वलंगई यानी दाएँ हाथ वाले हैं। तो जिन लोगों ने अपने जाति नाम में ब्राह्मण शब्द जोड़ लिया है, उनकी यह स्थिति है।

मुझे तो देवेन्द्र कुला नाम भी अपमानजनक लगता है। मुझे नहीं पता आप लोगों का नाम ऐसा क्यों है? लेकिन, देवेन्द्रन शब्द अपने आप में अश्लील है। क्योंकि, देवेन्द्र से जुड़ी तमाम कहानियों में उसका चित्रण ऐसा ही है। उसे तो एक वेश्या पुत्र से भी बुरा माना जाता है। किसी एक जाति को कई नामों के साथ विभिन्न उपजातियों में नहीं बाँटा जाना चाहिए। नायकरों में भी कई तरह के भेद हैं। चेट्टीज और पिल्लई में भी ऐसे ही अन्तर हैं।

मद्रास में एक परियाह भी अपने आप को पिल्लई बुलाता है। पल्लन भी खुद को पिल्लई कहता है। चूँकि, मद्रास में रहने वाले पल्लन और परियाह अपना नाम बदलकर पिल्लई कर चुके हैं, इसलिए यहाँ रहने वाले युवाओं ने भी अपना नाम हवाई जहाज की तरह तीव्र गति से बदला और वे मुदलियार हो गए। ऐसी प्रवृत्ति से बचा जाना चाहिए। हमें अपने विचारों से जाति-भेद को नष्ट करना होगा। हम अपनी जन्म-जाति को नीचा समझें और खुद को दूसरों से कमतर समझकर उनके समक्ष आत्मसमर्पण कर दें; इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। हमें ऐसे विचारों का पालन नहीं करना चाहिए।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी आरम्भिक टिप्पणी समाप्त करता हूँ। मैं यहाँ हुए स्वागत के लिए स्वागत समिति के प्रति आभार प्रकट करता हूँ।

साभार- जाति व्यवस्था और पितृसत्ता – पेरियार
(त्रिची में 29 सितम्बर, 1929 को दिया गया भाषण। द्रविड़न डेली – 5 अक्टूबर, 1929)
(अंग्रेजी से अनुवाद : पूजा सिंह)

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