निराला

निराला : रचना सौष्ठव

इस दृश्य के अनुरूप रचना कल्याणकारिणी होनी चाहिए। फूलों की अनेक सुगन्धों की तरह कल्याण के भी रूप हैं। साहित्यिक को यहाँ देश और काल का उत्तम निरूपण कर लेना चाहिए। समष्टि की एक माँग होती है। वह एक समूह की माँग से बड़ी है। साहित्यिक यदि किसी समूह के अनुसार चलता है, तो वह उच्चता नहीं प्राप्त कर सकता, जो समष्टि को लेकर चलता है।

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

पहले यह समझ लेना चाहिए कि संसार में जितने विषय, जितनी वस्तुएँ, मन और बुद्धि द्वारा ग्राह्य जो कुछ भी है – वह भला हो, या बुरा – रचयिता की दृष्टि में बराबर महत्त्व रखता है। इसलिए किसी बुरे दृश्य की वर्णना उतनी ही महत्त्वपूर्ण होगी, जितनी अच्छे दृश्य की। रचयिता को दोनों की रचना में एक ही-सी शक्ति लगानी पड़ती है।

वर्णना के मुख्य दो रूप हैं, बाहरी और भीतरी। आज तक संसार के साहित्यिक भीतरी रूप को ही विशद, सुन्दर और कल्याणकारी मानते आये हैं। क्योंकि वह आत्मा के और निकट है। भीतरी बुरे रूप की जब शक्तिपूर्ण वर्णना होती है, तब बुराइयों के भीतर वह साहित्यिक दृष्टि से सत्य, शिव और सुन्दर है । आत्मा से जब कि भले और बुरे का निराकरण नहीं हो सकता, एक ही आत्म-समुद्र में दोनों अमृत और विष की तरह मिले हुए हैं- तब उस विष की परिव्यक्त सघन नीलिमा भी नभ की ही श्याम शोभा बनती है। भले चित्र के भीतरी वर्णन का निकटतर सम्बन्ध आत्मा से ही होगा, यह लिखना द्विरुक्ति है । साथ-साथ हम यहाँ यह भी लिखेंगे कि वर्णन में कुशलता प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक अध्ययन और चिन्तन आवश्यक हैं । अध्ययन द्वारा विषय प्रवेश होता है, और चिन्तन द्वारा मौलिक उत्पत्ति और रचना शक्ति का विकास|

जहाँ कई पात्रों के चरित्र एक साथ रहते हैं, वहाँ लेखक को बड़ी सावधानी से निर्वाह करना पड़ता है। यही कला के मिश्रण का स्थल है। यह मिश्रण प्रति चरित्र में भी रहता है। जिन महाराणा प्रतापसिंह में प्रतिज्ञा की अटलता देख पड़ी है, वहीं प्रकृति के विरोध-संघर्ष से पराजित होकर, बाहर से, पश्चात् मन से भी हारकर, अकबर को पत्र लिखते हैं। यह प्राकृतिक संघर्ष हर चित्रण में जीवन और मृत्यु की तरह रहता है। इसका परिपाक कला का उत्कर्ष- साधन है। यहीं बड़े-बड़े लेखक नाकामयाब होते हैं। सच्चा कलाविद् ही इस मौके की पहचान रखता है कि यह प्रवाह इतनी देर तक इस तरह, इस तरफ गया, अब इस कारण से इसे रुख बदलना चाहिए। कारण पैदा करनेवाला कलाकार ही है, वह एक प्रवाह की गति फेरने के लिए कारण पैदा करता हैं, और गति-विपर्यय ही बढ़ने का कारण है। हर चरित्र इस प्रकार बढ़ता हुआ पूर्णता प्राप्त करता है, अपने गम्य स्थान को जाता है। एक बीज जैसे पेड़ होता है; एक तना – यही प्रधान पात्र है, या मुख्य विषय दो-तीन शाखाएँ पात्र या विषय को अवलम्ब देती हैं। अनेक प्रशाखाएँ, उपालम्ब स्वरूप; उनका टेढ़ापन कलापूर्ण प्रगतिः पत्र आदि वर्णनाच्छद; पुष्प-सौन्दर्य, विकास; सुगन्ध परिसमाप्ति; अथवा फलप्राप्ति। एक परिपूर्ण रचना के लिए भी बिलकुल ऐसा ही है: गंगा – जैसी बड़ी नदी को भी हम उदाहरण के लिए ले सकते हैं। गृह-गृह का जल नालों में, नालों का उपनदियों में, उपनदियों का नद-नदियों में और नद नदियों का सर्वत्र वक्र गति से बढ़ता हुआ, गंगा से मिलकर समुद्र में समाप्त होता है।

इस दृश्य के अनुरूप रचना कल्याणकारिणी होनी चाहिए। फूलों की अनेक सुगन्धों की तरह कल्याण के भी रूप हैं। साहित्यिक को यहाँ देश और काल का उत्तम निरूपण कर लेना चाहिए। समष्टि की एक माँग होती है। वह एक समूह की माँग से बड़ी है। साहित्यिक यदि किसी समूह के अनुसार चलता है, तो वह उच्चता नहीं प्राप्त कर सकता, जो समष्टि को लेकर चलता है।

पिता के श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन तब ठीक था, जब ब्राह्मण शिक्षा-गुरु और भिक्षान्नजीवी थे। अब यह पुण्य कार्य व्यापक विचार से नहीं रहा। जिनका पेट भरा हो, उन्हें उत्तम पदार्थ खिलाने से क्या पुण्य? साहित्यिक ऐसे स्थल पर यदि गरीबों को वर्णीविचार वार छोड़कर खिलाता है, तो एक नयी सूझ होती है, साहित्य को नयी शक्ति मिलती है, समाज में एक नवीनता आती है। कोई ऐसा भी कर सकता है कि पिता का श्राद्ध ही न किया। कारण बतलाये, देश बहुत ग़रीब हो गया है, ऐसे सुकृत्यों की अब आवश्यकता नहीं रही। यह भी एक नयी बात होगी। ऐसे ही सामाजिक, धार्मिक तथा अपर-अपर अंगों के लिए।

अभी हमारा समाज इतना पीछे है कि उसी में रहकर, उसी के अनुकूल चित्र खींचते रहने से हम आगे नहीं बढ़ सकते। कुछ-कुछ समाज के ही अनुरूप चित्र खींचने के पक्ष में हैं। पर यह उनकी अदूरदर्शिता है। हम पक्ष में भी हैं और वैपक्ष्य में भी। जहाँ तक हमें औचित्य देख पड़ेगा, हम पक्ष में हैं, जहाँ तक हमें उस औचित्य को ले जाना होगा, वहाँ यदि विपक्षता है तो हम वैपक्ष्य में हैं। अनेकानेक भावों से यही साहित्य की नवीन प्रगति है, और इसी की वृद्धि साहित्य की पुष्टि।

हमारे समाज से भिन्न, किन्तु मिला हुआ एक और समाज है। वह केवल देश में नहीं बँधा, तमाम पृथ्वी के मनुष्य उसके अन्तर्गत हैं। वहाँ मानवीय उन्हीं भावों के लिए गुंजाइश है, जो मनुष्य-मात्र के कहे जा सकते हैं, जिन्हें पढ़कर एक ही सा अनुभव समस्त संसार के मनुष्य करेंगे। ऐसे सर्व-साधारण भावों पर लिखनेवाले साहित्यिक को बाहरी छोटे-छोटे साम्प्रदायिक अथवा जातीय उपकरण छोड़ देने पड़ते हैं। मनस्तत्त्व में ही उसे विशेष रूप से रहना पड़ता है।  एक प्रकार निरवलम्ब हो जाने के कारण साधारण लेखक यहाँ कामयाब नहीं होते, पर इस तरह की कृतियाँ साहित्य में सर्वोच्च व्याख्या प्राप्त करती हैं ।

पात्र के मनोभावों का वर्णन, उसके समर्थ बाहरी प्रकृति का सत्य संयोग, तदनुकूल भाषा, आदि-आदि मुख्य साधनों की शिक्षा पहले प्राप्त कर लेनी चाहिए। सुबह को अगर वियोग की कथा कहनी हो, तो ऋतु – विपर्यय दिखलाये; यदि इसके लिए जगह न हो, तो प्रदीप के नीचे के अँधेरे की तरह सुख प्रकृति में दुःख की वर्णना करे। कलाविद् ऐसे स्थलों में, हर पत्तों पर पीले फूल की तरह, खूबसूरती से विषय को और खिला देता है।

हमारे साहित्य में जो रचनाएँ प्रायः देखने को मिलती हैं, उनमें बच्चों के हृदय का उच्छ्वास अथवा वृद्धों का मस्तिष्क-विकार ही अधिकांश में प्राप्त होता है। किसी स्थितप्रज्ञ की रचना मुश्किल से कहीं देखने को मिलती है। हमारे विचार में इसका मुख्य कारण लेखकों का धर्म, सम्प्रदाय, जाति और रूढ़ियों के बन्धनों में बँधा रहा जाना है।

– सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

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