भारतमाता सावित्रीबाई फुले

भारत की पहली शिक्षिका सावित्री बाई फुले जयंती व्याख्यान

सावित्री बाई शिक्षा और समानता को समर्पित अनूठा व्यक्तित्व। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग ने प्रथम शिक्षिका की जयंती पर आयोजित किया ऑनलाइन व्याख्यान।

भारतमाता सावित्रीबाई फुले

कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा साहित्य परिषद हिन्दी विभाग व देस हरियाणा के सहयोग से प्रथम शिक्षिका एवं क्रांतिज्योति सावित्री बाई फुले की जयंती पर ऑनलाइन सेमिनार का आयोजन किया गया। सेमिनार की अध्यक्षता विभाग के अध्यक्ष एवं देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चन्द्र ने की।

मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. एस. के. चहल ने कहा कि सावित्रीबाई फुले देश की  पहली महिला शिक्षिका ही नहीं, बल्कि देश की पहली महिलावादी थी। 3 जनवरी, 1831 को सावित्री बाई फुले का सतारा जिला में नायगांव में जन्म हुआ। मां का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम खांडोजी था। 1840 में विवाह हुआ। पहले बचपन में ही शादी कर दी जाती थी। ज्योतिबा फुले मि. जॉन सहित मिशनरियों के साथ रहे। ज्योतिबा ने सावित्री को प्राथमिक शिक्षा प्रदान की। उन्होंने कहा कि मैडम फरार ने लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला था। वहीं शिक्षक प्रशिक्षण की व्यवस्था भी होती थी। यहां पर शुरूआती प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद में सावित्रीबाई ने पुणे में शिक्षक प्रशिक्षण लिया। पुणे में सावित्रीबाई व ज्योतिबा फुले ने अछूत कन्याओं के लिए स्कूल खोला। लोग लड़कियों को पढ़ाने के खिलाफ थे और वे दोनों लड़कियों की शिक्षा की बात कर रहे थे। ऐसे में सावित्रीबाई को स्कूल जाते हुए अनेक प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। उनके ऊपर कीचड़ व गंदगी फैंकी जाती थी। सावित्रीबाई सहनशीलता की मूर्ति तो थी, लेकिन इतनी भी सहनशील ना थी कि कोई अन्याय पर तुल जाए और वे जवाब ना दें। गंदगी डालती हुए सावित्रीबाई ने एक व्यक्ति को झापड़ जड़ दिया था। उसके बाद अन्यायकारी बर्ताव करने वालों के हौंसले पस्त हो गए थे।

डॉ. चहल ने बताया कि सावित्री बाई फुले और महात्मा जोतिबा के क्रांतिकारी कदमों के कारण उनके ऊपर दबाव बनाया गया। ब्राह्मणवादी ताकतों के प्रभाव में बिरादरी ने ज्योतिबा के पिता पर दबाव बनाया। पिता ने ज्योतिबा और सावित्री को चेतावनी दी कि या तो ये काम छोड़ दो या फिर घर से निकल जाओ। इरादों के पक्के और स्वाभिमानी ज्योतिबा अपने शिक्षा व समाज सुधार के मार्ग से पीछे हटने वाले नहीं थे। उन्होंने घर से निकलना उचित समझा। ऐसे में शेख उस्मान ने ज्योतिबा को अपने घर में शरण दी। शेख उस्मान की पत्नी फातिमा शेख थी। फातिमा शेख भी बाद में स्कूल में पढ़ाने लगी थी। वह पहली मुस्लिम शिक्षिका थी। 1850 में उन्होंने ट्रस्ट बनाया- सोसायटी फॉर प्रोमोटिंग एजूकेशन अमंग डाउ ट्रोडन सोसायटी। 

डॉ. चहल ने कहा कि सावित्रीबाई के क्रांतिकारी व्यक्तित्व के कईं आयाम थो। सावित्रीबाई ने अपने पति ज्योतिबा को पत्र लिखे। पत्रों से पता चलता है कि वह किस तरह से लोगों को समझाती है। वह जब अपने मायके सतारा गई हुई थी तो सावित्री का भाई और मां ज्योतिबा की आलोचना करते हैं। वह भाई और मां को समझाती है। चहल ने कहा कि पूना में बाल विवाह की बड़ी समस्या थी। चितपावन ब्राह्मणों में छोटी-छोटी उम्र की लड़कियों से बड़ी उम्र के लोग शादी कर लेते थे। उनमें कईं मारे जाते। छोटी उम्र में लड़कियां विधवा हो जाती थी। उनमें से कईंयों को यौन शोषण का सामना करना पड़ता था। सावित्रीबाई फुले ने बालिका हत्या प्रतिबंधक गृह खोला। वहां पर गर्भवती विधवा महिलाओं की प्रसूति होती थी। सावित्री बाई फुले व फामिमा शेख डिलीवरी करवाती थी। वहां पर करीब 40 विधवाओं की प्रसूति हुई। सावित्रीबाई फुले ने महिला सेवा मंडल शुरू किया। जिस मंच से महिलाओं की स्थिति में सुधार व समाज सुधार के अनेक प्रकार के काम किया।

चहल ने बताया कि सावित्री बाई फुले ने देश का पहला अन्तर्जातीय विवाह आयोजित करवाया। यह सावित्री बाई फुले का मौलिक कार्य था। वह सतारा जिला में गई हुई थी। एक ब्राह्मण लडक़े का मातंग दलित जाति की लडक़ी से प्रेम हो गया। कुछ लोग दोनों की लिंचिंग करने वाले थे। ऐसे में सावित्रीबाई फुले में लोगों को समझाया। उन्होंने दोनों को बचाया और अपने अधीन लेकर सुरक्षा प्रदान की। सावित्री ने जोड़े को सतारा से पुणे भेजा। 

सावित्रीबाई फुले ने बाल आश्रम की स्थापना की। 1880-82 के करीब की बात है। 1879 को महाराष्ट्र में अकाल पड़ा। कईं लोग मारे गए। ऐसे में अनाथ हुए बच्चों के लिए यह आश्रम स्थापित किया गया। उन्होंने आश्रम में सभी बच्चों के लिए खाने के लिए सामूहिक रसोई की व्यवस्था की और बच्चों के पढऩे की व्यवस्था की। फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। इस संगठन के लिए सावित्रीबाई फुले ने सक्रिय रूप से कार्य किया। 1890 में ज्योतिबा की मृत्यु हो जाती थी। ऐसे में सावित्री ने सत्यशोधक समाज का नेतृत्व किया। यह भी अपने आप में अनोखा था कि कोई महिला किसी बड़े संगठन का नेतृत्व करे। 

सावित्रीबाई फुले का अंतिम बलिदान भी प्रेरणादायी है। उन्होंने शाहदत दी। 1897 में पुणे व महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों पर प्लेग फैल गया। ऐसे में उन्होंने प्लेग पीडि़तों के इलाज के लिए कार्य किया। उन्होंने अपने बेटे डॉ. यशवंत को क्लिीनिक खोलने के लिए कहा। सावित्रीबाई फुले के सामने एक किशोर प्लेग से पीडि़त हो गया। सावित्री ने उस किशोर को कंधे पर उठाकर क्लिीनिक पहुंचाया। वह भी चपेट में आ गई और लोगों को बचाते हुए उसने शहादत दी।

सावित्रीबाई फुले एक क्रांतिकारी कवयित्री थी। उसके दो काव्य-संग्रह- काव्य फुले और बावन काशी सुबोध प्रकाशित हुए हैं। सावित्री बाई ने अपनी कविता में कहा-जाओ शिक्षा हासिल करो और प्रबुद्ध हो जाओ। सावित्री बाई ने उस समय शिक्षा को केवल लिखने-पढऩे तक सीमित नहीं किया बल्कि पढऩे का उद्देश्य प्रबुद्धता बताया। सावित्री बाई एक अन्य स्थान पर लिखती हैं- उठो, जागो, प्रबुद्ध बनो और परंपराओं की बेडिय़ों को तोड़ दो। सावित्री बाई देश की पहली स्त्रीवादी महिला हैं।

सावित्रीबाई फुले ने न्याय विरोधी व सत्य विरोधी शक्तियों को चुनौति दी: डॉ. सुभाष

व्याख्यान की अध्यक्षता करते हुए हिन्दी विभाग के अध्यक्ष और देस हरियाणा के संपादक डॉ. सुभाष चन्द्र ने कहा कि सावित्रीबाई फुले के जन्म को 191 साल हो गए। वे कौन से काम थे, जिनकी वजह से हम उन्हें याद करते हैं। वे काम हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं। सावित्रीबाई फुले ने रूढि़वादी, सत्यविरोधी व न्याय विरोधी शक्तियों को चुनौति दी।  सावित्री बाई फुले विवेकवादी व सुधारवादी परंपरा का एक हिस्सा हैं। समाज में जितनी तरक्की हुई है, उसका इस ज्ञान से रिश्ता है। ज्योतिबा फुले ऐसे महात्मा नहीं थे, जोकि हिमालय पर बैठ कर तपस्या करें। वे समस्याओं से जूझते व काम करते हुए आगे बढ़ते हैं। सावित्री बाई फुले का निरंतर विकास होता है। कोई भी महापुरूष जन्म व पूर्व जन्म से ही महान नहीं होता। सावित्री बाई फुले के परिवार में ज्ञान की कोई परंपरा नहीं है। लेकिन वह अपने ही अनुभवों से सीखती हुई आगेे बढ़ती है। सावित्री बाई ने महसूस किया कि जीवन व समाज में कुछ गड़बड़ है। उसमें आमूलचूल सुधार की जरूरत है। चीजें शीर्षासन किए हुए हैं, उन्हें सीधा करना है। 

डॉ. सुभाष ने कहा कि भारत की वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊंचा वो है, जिसके पास ज्ञान के स्रोत हैं। ज्ञान के स्रोत को भी प्रदूषित किया गया है। सावित्रीबाई ने ऐसे ज्ञान की बात की जो विवेक जगाए। सावित्री बाई फुले का ज्ञान समता, न्याय व सत्य पर आधारित है। सत्य तोहफे में नहीं मिलता है। सत्य की खोज करनी पड़ती है और उसे प्राप्त करना पड़ता है। आज के युग को पोस्ट ट्रूथ एज कहा जा रहा है। ऐसे में सावित्रीबाई फुले के जीवन, विचारों व सच खोजने का संघर्ष देखेंगे तो हमें प्रेरणा मिलेगी। सावित्रीबाई फुले ने बहुत सुंदर कविता लिखी है। जूही का फूल व कनेर का फूल और प्रकृति उनकी कविताओं में है।

सावित्री बाई फुले नवाचारी शिक्षिका थी: अरुण कैहरबा

हरियाणा विद्यालय शिक्षा विभाग में हिन्दी प्राध्यापक व देस हरियाणा से जुड़े अरुण कैहरबा ने कहा कि सावित्रीबाई फुले प्रथम शिक्षिका ही नहीं बल्कि नवाचारी शिक्षिका के रूप में हमारे सामने आती हैं। वे सबसे कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा के प्रति संकल्पबद्ध हैं। उन्होंने 150 से अधिक स्कूल खोले और स्कूल में लड़कियों व बच्चों के लिए विज्ञान, गणित, समाज विज्ञान सहित आधुनिक विषयों को नवाचारी ढंंग़ से पढ़ाया जाता था। कुछ स्कूलों में आधुनिक मिड-डे-मील से भी आगे बच्चों के खाने की भी व्यवस्था थी। उन्होंने कहा कि सावित्रीबाई फुले परंरावादी व घिसीपिटी शिक्षा की आलोचक हैं और आधुनिक शिक्षा की पक्षधर हैं।

व्याख्यान के दौरान अंग्रेजी विषय की शोधार्थी कीर्ति सैनी व राजकीय महाविद्यालय पलवल में हिन्दी के सहायक प्रोफेसर सुनील थुआ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। व्याख्यान के दौरान हिन्दी विभाग में अध्यापक विकास साल्याण, ब्रजपाल, डॉ. जसबीर सिंह और हिन्दी विभाग और इतिहास विभाग के शोधार्थी और विद्यार्थी शामिल रहे।

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