सृजनात्मक प्रतिरोध है जरूरी – डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय

साहित्य जनता की चितवृत्तियों का संचित प्रतिबिम्ब होता है।कैसे भारतीय कवि अपनी कविता के माध्यम से आजादी के आन्दोलन में जनता में चेतना पैदा करने का कार्य करते है।

साहित्य परिषद् हिन्दी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र व देस हरियाणा पत्रिका के सहयोग से एक ऑनलाईन व्याख्यान का आयोजन किया गया। जिसका विषय था – भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम और हिन्दी कविता। जिसमें मुख्य वक्ता के तौर पर आलोचक व समीक्षक और केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा के सहायक प्राध्यापक डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय जी ने शिरकत की। डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय ने बताया की भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम केवल राजनैतिक आजाद़ी की लड़ाई नहीं थी बल्कि सदियों से चलती आ रही सामंतवादी सोच से भी लड़ाई थी। कोई भी साहित्य और विचारधारा हर वर्ग की मुक्ति के बिना अगर आधुनिकता की कामना कर रहा है तो उसे संदेह की दृष्टि से देखने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि साहित्य की व्याख्या बहुत सीमित दायरे में की जाती है लेकिन साहित्य को विस्तार देने की आवश्यकता होती है। कविता सामुहिकता में उत्साह पैदा करने का कार्य करती है और बिना सामुहिक उत्साह के कोई भी आन्दोलन और परिवर्तन नहीं हो सकता। डॉ. सिद्धार्थ ने कहा कि साहित्य का पहला उत्तरादायित्व होता है कि प्रतिरोध की चेतना पैदा करे और इसके साथ वह सृजनात्मक भी होना चाहिए। उन्होंने विभिन्न उद्धरणो के माध्यम से बताया की साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास होता है। साहित्य जनता की चितवृत्तियों का संचित प्रतिबिम्ब होता है और इसी संचित प्रतिबिम्ब की झलक हमें आजादी के आन्दोलन में दिखाई देती है। उन्होंने विभिन्न कवियों की कविता के उदाहरण देकर बताया कि कैसे भारतीय कवि अपनी कविता के माध्यम से आजादी के आन्दोलन में जनता में चेतना पैदा करने का कार्य करते है।


इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए देस हरियाणा पत्रिका के संपादक डॉ. सुभाषचन्द्र ने कहा कि कविता आज के दौर में मनुष्य को भटकाव और भ्रमित होने से बचाती है और जीवन में स्पष्ट राह दिखाती है। उन्होंने कहा कि देश प्रेम का अपने देश के लोगों से अधिक संबंधित है। दूसरों से घृणा करना और इतिहास के पक्षों को काले से सफेद करना और सफेद से काला करना सच्चे देश प्रेम का काम नहीं है बल्कि अपने देश की विरासत से शक्ति अर्जित करते हुए पाखड़ों और दोषों की खुल कर आलोचना करते हैं।

कार्यक्रम में वरिष्ठ कवि जयपाल, लेखक अशोक भाटिया, सुनील कुमार थुआ के साथ-साथ हिन्दी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र के अध्यापक, विद्यार्थी और शोधार्थी शामिल हुए।

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