शंकरगुहा नियोगी : नव उदारीकरण के पहले शहीद

शंकर गुहा नियोगी

28 सितंबर 1991 को शंकर गुहा नियोगी (19.2.1943- 28.9.1991) को दुर्ग स्थित उनके अस्थायी निवास पर सुबह लगभग चार बजे खिड़की से निशाना बनाकर गोली मार दी गई थी. वे देर रात रायपुर से लौटे थे. उस समय उनकी उम्र महज 48 वर्ष की थी. रात में भी वे निहत्थे रहते थे यद्यपि वे जानते थे कि उनकी लड़ाई बहुत ताकतवर लोगों से है. संस्कृतिकर्मी और ‘नवाँ अँजोर’ के संपादक अमित सेनगुप्त के शब्दों में, “नियोगी की मृत्यु के बाद जब मैं 29 सितंबर 1991 को दल्ली राजहरा पहुँचा तो मैंने उनकी शवयात्रा में या अपने मकानों के छज्जों से शवयात्रा को देखते हुए, कम से कम दो लाख लोगों को रोते हुए पाया.“ (‘जिसने जनता के पैरों के लिए जूते बनाना सीखा’ शीर्षक लेख, पृष्ठ- 17)

शंकर गुहा नियोगी के बचपन का नाम धीरेश था. उनका जन्म एक मध्यवर्गीय परिवार में अविभाजित बंगाल के जिला दिनाजपुर के ग्राम बालूवाड़ी में हुआ था. उनके पिता का नाम हेरम्ब कुमार और माता का नाम कल्याणी था. बाद में परिवार असम के नौगांव जिले के जमुनामुख गाँव में  आ गया. उनकी प्राथमिक शिक्षा यहीं हुई. आगे की पढ़ाई के लिए उन्हे अपने ताऊ के पास पश्चिम बंगाल के जिला वर्दमान में साकेतोरिया भेज दिया गया. आसनसोल के नजदीक का यह पूरा क्षेत्र कोयला खदान का है. यहीं रहकर उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई की. यहाँ रहते हुए उन्होंने कविताएं भी लिखीं और प्रकृति से प्रेम करना सीखा. यहीं उन्होंने जाना कि गरीबी और अमीरी के बीच कितना फर्क है और यह पर्क क्यों है. क्यों अमीर दिन प्रतिदिन और अधिक अमीर होता जाता है तथा गरीब, गरीब ही बना रहता है.

अपनी माँ के देहान्त के बाद सन् 1961 में वे अपने मामा के पास भिलाई, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ आ गए और प्रशिक्षित मजदूर के रूप में नियुक्त हो गए. 1962 से 1968 तक उन्होंने बीएसपी में काम किया. इस दौरान उन्होंने दुर्ग साईंस कॉलेज से प्राइवेट परीक्षार्थी के रूप में बी.एस-सी. पास किया. इसी के साथ वे दुर्ग म्युनिसिपैलिटी के कर्मचारियों के संगठन से भी जुड़े और इसी क्रम में बीएसपी के मजदूर संगठनों का भी नेतृत्व करने लगे. उनका संगठन इंटक से जुड़ गया.

जब कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में विभाजित हुई तो धीरेश सीपीआई(एम) के साथ हो गए. इन्हीं दिनों वे अनुभवी कम्युनिस्ट फिजीशियन डॉ. बी.एस.यदु के संपर्क में आए और उनके सहयोग से मार्क्सवाद-लेनिनवाद का गहरा अध्ययन किया. जब 1967 में बंगाल में नक्सलबाड़ी आन्दोलन आरंभ हुआ तो उसके असर से मध्यप्रदेश भी अछूता नहीं रहा. धीरेश भी उसके संपर्क में आए. वे सीपीआई (एमएल) के गठन के समय अर्थात 1969 ई. में कुछ दिन तक उसके साथ भी जुड़े रहे और बाद में  उससे मोहभंग होने पर अलग हो गए. इन्हीं दिनों उनके नेतृत्व में ही भिलाई स्टील प्लांट के प्रथम सफल हड़ताल के समय उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा. धीरेश की आन्दोलनकारी भूमिका के कारण इन दिनों पुलिस में उनकी पहचान एक नक्सली के रूप में होने लगी. विवश होकर धीरेश भूमिगत हो गए. भूमिगत रहते हुए ही उन्होंने ‘स्फुलिंग’ नाम से एक साप्ताहिक पत्र निकाला. इसी माध्यम से वे गाँवों में अपना संपर्क बनाते रहे. उन्होंने अनुभव किया कि आन्दोलन की सफलता के लिए छत्तीसगढ़ की शोषित जनता को उनकी छत्तीसगढ़ी जातीयता से जोड़ना जरूरी है. यह वह दौर था जब धीरेश को दुर्ग और भिलाई के गाँवो में संपर्क बनाने के लिए किसान, मछुवारे और बकरियों के ब्यापारी के रूप में काम करना पड़ा.

1971 में धीरेश को पुन: एक ठेका श्रमिक के रूप में नौकरी मिल गई. इसी दौर में उन्होंने अपना नाम धीरेश की जगह शंकर रख लिया और अपने ही एक सहयोगी मजदूर सियाराम की बेटी आशा के साथ विवाह कर लिया. 1975 ई. में इमरजेंसी के दौरान मीसा में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. वे रायपुर जेल मे बंद रहे. इमरजेन्सी की समाप्ति के समय जब वे रिहा हुए तो उनकी पहचान एक ईमानदार और निष्ठावान मजदूर नेता की बन चुकी थी.

यह वह समय था जब बीएसपी की दल्ली राजहरा की लौह अयस्क खदानों में ठेके पर काम कर रहे मजदूरों की दशा बहुत खराब थी. उनसे 14 से 15 घंटे तक काम लिया जाता था और दो रुपए मजदूरी मिलती थी. आवाज उठाने के लिए उनका कोई ट्रेड यूनियन भी नही था. शंकर ने इन मजदूरों के साथ 1977 में छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ (सीएमएसएस) का गठन किया.

छत्तीसगढ़ माइन्स श्रमिक संघ उस समय देश भर में चर्चा का विषय बना जब मार्च-अपैल 1977 ई. में दल्ली-राजहरा के हजारों खदान मजदूरों ने शंकर गुहा नियोगी के नेतृत्व में अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दी. यह हड़ताल ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों की देश में सबसे बड़ी हड़ताल थी. इसमें प्रशासन द्वारा हड़ताल को असफल करने के लिए तरह- तरह से दबाव बनाया गया. दो बार गोली चलाई गई जिसमें एक महिला मजदूर व एक बच्चे सहित ग्यारह मजदूर मारे गए. इसका इतना असर हुआ कि सयंत्र प्रबंधन को मजदूरों की सारी माँगे माननी पड़ी. इतना ही नहीं, इस दौरान मजदूरों के संगठन का चरित्र रचनात्मक और बहुआयामी बना. खदान में हुई हड़ताल के बाद नियोगी प्रदेश के सबसे बड़े मजदूर नेता के रूप में देखे जाने लगे. भिलाई-दुर्ग की कई निजी कंपनियों के मजदूर भी इस संगठन से जुड़ने लगे.

प्रो. अनिल सद्गोपाल ने शंकर गुहा नियोगी पर केन्द्रित अपनी पुस्तक ‘बदलाव की राजनीति और संघर्ष-निर्माण का दर्शन’ की भूमिका में लिखा हैं,

 “नियोगी के नेतृत्व में लगभग 20,000 मजदूर छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा (छमुमो) के लाल हरे झंडे के तहत संगठित हुए. मजदूरों ने दिहाड़ी की लड़ाई को इज्जत की लड़ाई में बदलना सीखा और अर्थवाद से परे हटकर सामाजिक व राजनीतिक बदलाव की लड़ाई लड़ी. एक के बाद एक निराले कदम उटाए गए. शराबबंदी आन्दोलन, शहीद अस्पताल व शहीद स्कूलों का निर्माण, सांस्कृतिक समूह व महिला मोर्चे का गठन, मशीनीकरण रोकने के लिए अर्ध-मशीनीकरण की लड़ाई, पर्यावरण की लड़ाई, देशभर के जनान्दोलनों को सक्रिय समर्थन देना और अंतत: छत्तीसगढ़ के विकास के लिए विश्व बैंक के माडल के खिलाफ जनवादी व देशप्रेमी वैकल्पिक मॉडल खड़ा करना. 1990 में इस आन्दोलन से भिलाई क्षेत्र के करीब एक लाख मजदूर जुड़ गए. इसीलिए जरूरी हो गया था कि नियोगी की हत्या करवायी जाए.“ ( भूमिका, पृष्ठ 3) इसे 28 सितंबर 1991 को अंजाम दे दिया गया.

शंकर गुहा नियोगी पर केन्द्रित पुस्तक लिखने के क्रम में अपने अनुभवों का जिक्र करते हुए प्रो. सद्गोपाल लिखते हैं, “हमने इस पुस्तक के लिए जब सामग्री एकत्रित करनी शुरू की तो धीरे- धीरे बढ़ते क्रम में यह स्पष्ट होता गया कि हमारे सामने कोई ट्रेड यूनियन नेता नहीं, वरन् पूरे भारत के नवनिर्माण का एक क्रान्तिकारी स्वप्नद्रष्टा खड़ा है.

भिलाई की अपनी अन्तिम आम सभा में भाषण देते हुए 25 अगस्त 1991 को शंकर गुहा नियोगी ने कहा था,“ मेरे दो बेटे हैं. मेरा एक बेटा कारखाने में काम करने जाता है तो वे उसके समस्त अधिकारों को छीनकर अमानवीय शोषण करते हैं. जब वह उस शोषक के खिलाफ सीना तानकर खड़ा होता है, यूनियन बनाकर इंकलाब का नारा लगाता है, अपने हक की माँग करता है, तब वे मेरे दूसरे बेरोजगार बेटे के हाथ में चाकू थमा देते हैं और कहते हैं, ‘ जा, अपने भाई पर चाकू चलाकर आ जा.‘ इस प्रकार इंसानियत के दुश्मन ये लालची उद्योगपति मेरे दोनो बेटों का शोषण करते हैं.“

शंकर गुहा नियोगी के संघर्ष की दिशा और उनके दर्शन का विश्लेषण करते हुए कोयला मजदूरों के जुझारू नेता, राजनीतिक विचारक और सांसद ए.के.रॉय लिखते हैं, “ देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन की तीन धाराओं में से गुजरकर नियोगी एक चौथी धारा बने और यह धारा थी समन्वय की. हर प्रयोग के सकारात्मक पहलुओं को चुनकर एक नए मॉडल की रचना करना चाहा था शंकर ने. और वह भी लोहा खदानों की लाल मिटटी पर और भारत के सबसे कमजोर और विकास से दूर समाज को लेकर. यह मॉडल दो पैरों पर खड़ा था -एक संघर्ष, दूसरा निर्माण. श्रमिकों की मजदूरी की लड़ाई, बेरोजगारों की रोजगार की लड़ाई, पूँजीपतियों के शोषण के विरुद्ध लड़ाई, सरकार तथा शोषक वर्ग के दमन के विरुद्ध लड़ाई आदि के साथ जुड़ गए अस्पताल, स्कूल, सहकारी समिति एवं पर्यावरण संरक्षण के रचनात्मक कार्यक्रम. व्यस्त रहते हुए भी शंकर कभी अध्ययन से दूर नहीं रहे और कोई विकल्प तैयार करे बगैर आन्दोलन में कभी उतरे नहीं. विदेश से मशीन लाकर आधुनिकीकरण के नाम पर जब 8000 मजदूरों की छँटनी की योजना बनी तब लोहा खदानों में शंकर बगावत का बिगुल फूँक चुके थे. लेकिन साथ ही साथ भारत की स्थिति में उपयोगी मशीन और श्रम-शक्ति को मिलाकर उन्होंने अर्ध-मशीनीकरण की एक वैकल्पिक स्कीम भी पेश की थी जिसने इस्पात मंत्रालय को भी आश्चर्यचकित कर दिया और अंत में यही वहाँ लागू हुई.“ ( ए.के.राय का लेख, उपर्युक्त, पृष्ठ- 9)

दुनिया भर की ट्रेड यूनियनों के इतिहास में इस प्रेरणादायक मिसाल का परिणाम यह था कि अर्ध-मशीनीकरण के इस सफल प्रयोग के कारण एक ओर हजारों मजदूरों का रोजगार बरकरार रह पाया और दूसरी ओर भिलाई स्टील प्लांट की बढ़ती हुई उत्पादन क्षमता व बेहतर किस्म के अयस्क की जरूरत भी पूरी हो सकी. इसीलिए नियोगी पूर्ण-मशीनीकरण को ‘देशद्रोही तकनालॉजी’ और अर्ध-मशीनीकरण को ‘देशप्रेमी तकनालॉजी’ कहते थे.

शंकर गुहा नियोगी का उद्देश्य मार्क्सवाद के भारतीयकरण का था. जिस तरह चीन में माओ-त्से-तुंग ने क्रान्ति के बाद सांस्कृतिक क्रान्ति का नारा दिया था, बहुत कुछ उसी तरह भारत में भी शंकर गुहा नियोगी सामाजिक सुधार की जरूरत महसूस कर रहे थे. उनकी दृष्टि में विदेशी पूँजी आज विदेशोन्मुखी मानसिकता की जड़ है जो सिर्फ भ्रष्टाचार को फैलाकर ही समाज को प्रदूषित नहीं कर रही है, बल्कि देशभक्ति को भी नष्ट कर राष्ट्र को ही खतरे में डाल रही है.

अमित सेनगुप्त के अनुसार नियोगी कभी अपने आप को विपक्ष का नहीं मानते थे.  उनका कहना था कि “ हम सत्ता में नहीं हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि हम विरोधी या विपक्ष के हैं. विपक्ष वाला सुनकर लगता है कि हमारा कार्यक्रम ही विरोध करना है. जिसका कार्यक्रम मात्र विरोध करना ही है, वह देश और समाज के लिए क्या कर सकता है?  हमें ‘विपक्ष वाला’ या विरोधी करार देकर शासक वर्ग जानबूझकर गलतफहमी में रखना चाहता है. हम अपने आप को विपक्ष ( अपोजीशन) नहीं, वरन् विकल्प ( प्रोपोजीशन) वाला समझते हैं. इसलिए हम हर समस्या का हल विकल्प के माध्यम से देने की कोशिश करते हैं.“

शंकर गुहा नियोगी के विचार और उनकी कार्य पद्धति को विद्वानों ने ‘संघर्ष-निर्माण का दर्शन’ कहा है. अपनी इस अवधारणा को समझाते हुए वे कहा करते थे,  “ संघर्ष के साथ- साथ निर्माण के काम को हम उस दर्जे तक ले आना चाहते हैं जहाँ शासक वर्ग के द्वारा किया गया या करवाया गया हर निर्माण जनता के लिए निरर्थक और गैर-जरूरी हो जाएगा. अत: हमारे निर्माण के सामने शासक वर्ग द्वारा किया गया निर्माण टिक नहीं पाएगा और ध्वस्त हो जाएगा। समाज को बदलने के लिए आज की परिस्थिति में संघर्ष का एक मुख्य हथियार है –निर्माण. संघर्ष व निर्माण एक ही चीज है. जैसे इंसान को चलने के लिए दो पैरों की जरूरत है, ऐसे ही हमारे संगठन के दो पैरों में से एक है संघर्ष और दूसरा है निर्माण. जिस प्रकार इंसान एक पैर से ठीक से नहीं चल सकता, ऐसे ही एक ही पैर से यानी, केवल संघर्ष या केवल निर्माण से कोई भी संगठन ठीक से नहीं चल सकता.“ ( उद्धृत, उपर्युक्त, पृष्ठ 17 )

छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा ने नारा गढ़ा था, “संघर्ष के लिए निर्माण, निर्माण के लिए संघर्ष.“ इस तरह ‘संघर्ष और निर्माण’ के दर्शन को छत्तीसगढ़ की माटी में साकार रूप देकर ही नियोगी ने भारत के क्रान्तिकारी नवनिर्माण का सपना देखा था. उनकी दृष्टि में संघर्ष – निर्माण की राजनीति ही वह राजनीति होगी जिसके जरिए मेहनतकश जनता भारत का नवनिर्माण करेगी.

इसी तरह उनका एक क्रान्तिकारी कदम “स्वास्थ्य के लिए संघर्ष करो” आन्दोलन था. “मेहनतकशों के स्वास्थ्य के लिए मेहनतकशों का अपना कार्यक्रम” दल्ली राजहरा के जन स्वास्थ्य आन्दोलन की केन्द्रीय भावना है. इस स्वास्थ्य आन्दोलन के तहत ही शहीद अस्पताल, स्वास्थ्य प्रचार तथा स्वास्थ्य के लिए संघर्ष का काम सन् 1977 में छत्तीसगढ़ माईन्स श्रमिक संघ की शुरुआत के साथ ही हुआ. इसी वर्ष संघ की जुझारू उपाध्याक्षा कुसुम बाई ने प्रसव पीड़ा के दौरान भिलाई स्टील प्लांट के राजहरा स्थित अस्पताल में डाक्टरों की लापरवाही के कारण जान गंवाई.  इस घटना से उत्पन्न माहौल में स्वास्थ्य की सही देखभाल करने के लिए अपना अस्पताल बनाने की सोच मजदूरों के मन में उपजी और इसी सोच के तहत यूनियन के सत्रह विभिन्न विभागों में से एक विभाग स्वास्थ्य का खोला गया. ‘किशोर भारती’ (होशंगाबाद) संस्था की तरफ से उनके प्रतिनिधि डॉ. विनायक सेन ( एम.बी.बी.एस., एम.डी.) इस कार्यक्रम के संचालक बने. इस स्वास्थ्य कार्यक्रम के लिए आर्थिक मदद पूरी तरह से मजदूरों द्वारा ही जुटाई जाती थी. मजदूरों के चंदे से गैरेज में चलाई जाने वाली डिस्पेंसरी नौ सालों में 15 बिस्तरों वाले अस्पताल से होते हुए अत्याधुनिक प्रयोगशाला, ऑपरेशन थियेटर, एंबुलेंस सहित 45 बिस्तरों वाला दो मंजिला अस्पताल बन गया. इसकी प्रगति की रफ्तार को देखते हुए सरकारी –गैर सरकारी संगठनों से आर्थिक मदद की अनेक बार पेशकश हुई किन्तु यूनियन ने इन प्रस्तावों को ठुकरा दिया क्योंकि उनके अनुसार बाहरी आर्थिक मदद लेने पर अपने कार्यक्रम पर बाहरी नियंत्रण हो जाएगा जिसे यूनियन स्वीकार नहीं कर सकती.

शंकर गुहा नियोगी के यूनियन ने मजदूरों में ब्याप्त शराब की लत छुड़ाने का असाधारण काम किया. संगठन के संघर्षों के फलस्वरूप दल्ली राजहरा के खदान मजदूरों की दैनिक औसत मजदूरी तीन-साढ़े तीन रूपए से बढ़कर 1981-82 में बीस से तेईस रूपए हो गई. लेकिन इसके साथ- साथ इस क्षेत्र में शराब की खपत भी तेजी से बढ़ने लगी. यूनियन नेतृत्व का स्पष्ट मत था कि यदि मजदूरी बढ़ने का लाभ उनके पारिवारिक जीवन को सुधारने में मिलना है तो खून पसीने की इस कमाई को शराब में बहने से रोकना होगा. फलस्वरूप यूनियन ने अपने कार्यक्रमों में शराबबंदी को भी शामिल किया. यूनियन दफ्तर की दीवारें शराब –विरोधी पोस्टरों से एवं नारों से ढँक गईं. इस अभियान के दौरान चलाई गई शैक्षिक प्रक्रिया के बारे में मई 1982 में एक नागरिक अधिकार जाँच दल द्वारा प्रसारित रपट में लिखा है, 

“हजारों मजदूरों को सामूहिक रूप से शराब पीने के खिलाफ राष्ट्रीय शहीदों के नाम पर कसमें दिलवाई गईं. शराब पीने वालों पर अर्थदंड लगाने और उनका सामाजिक बहिष्कार करने की व्यवस्था की गई. मजदूरों का ध्यान इस बात की ओर भी आकर्षिक किया गया कि उनके गाढ़े पसीने की कमाई किस प्रकार शराब के जरिए पूँजीपतियों के पास पहुंच कर मजदूर विरोधी गठबंधन को और अधिक मजबूत करती है.“ इस विषय पर यूनियन के काम को नजदीक से जानने वाले दिल्ली के एक पत्रकार भारत डोगरा लिखते हैं, “प्राय: यह माना जाता है कि आदिवासियों व विशेषकर आदिवासी खनिकों में शराब पीने की प्रवृत्ति इतनी प्रबल होती है कि उसे बदला नहीं जा सकता. पर यूनियन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब शराब छोड़ना मजदूरों के संगठन की इज्जत का सवाल बन जाता है, कि संगठन की जिन उपलब्धियों को उन्होंने अपने खून पसीने से हासिल किया है उसे बनाए रखने के लिए शराब छोड़ना जरूरी है, तो उसे जनान्दोलन का रूप देते हुए बड़ी संख्या में आदिवासी खनिक भी शराब छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं.“ ( शहीद शंकर गुहा नियोगी और छत्तीसगढ़ का जन आन्दोलन, पुस्तिका, मार्च 1992 से उद्धृत )

प्रसिद्ध पत्रकार व गाँधीवादी लेखिका मणिमाला ने इस संबंध में लिखा है, “शराब –विरोधी आन्दोलन ने समाँ बाँधा तो शराब के ठेकेदर नाराज हो गए. …. ठेकेदारों को सबसे बड़ा घाटा यह हुआ कि मजदूरों को अपने स्वास्थ्य व अपने बच्चों की पढ़ाई के बारे में सोचने व उसके लिए प्रयास करने का समय मिलने लगा. शराब बंदी के बाद ही वहाँ दो स्कूलों की नींव पड़ी. मजदूरों ने अपने पैसों से ये स्कूल खड़े किए. इन स्कूलों में अब उनके बच्चे पढ़ते हैं. अबतक वे दूसरों के बच्चों के लिए विद्यालय भवन बनाते थे. उन्होंने अपने लिए कुछ रचने के सुख का अनुभव किया.

स्कूल क्या खड़ा हुआ, मानो व्यवस्था को चुनौती देने के लिए अगली पीढ़ी के गढ़ने का काम शुरू हो गया. …. अब दिखने लगा कि यह आन्दोलन एक पीढ़ी में सिमटकर रहनेवाला नहीं है. पीढ़ी दर पीढ़ी चलेगा. … नियोगी ने मजदूर संगठन, मजदूर आन्दोलन और मजदूर नेता की परिभाषा ही बदल दी. अन्य मजदूर संगठनों के मजदूर भी अपने बहुआयामी विकास की माँग कर बैठे तो जमे- जमाए नेताओं का क्या होगा, यह चिन्ता उन्हें सताने लगी.“ ( सप्ताहिक हिन्दुस्तान, 3 नवंबर, 1991 )

प्रसिद्ध पत्रकार नरेन्दर कुमार सिंह लिखते हैं, “नियोगी सबसे अलग थे. मेरी नजर में नियोगी उन कुछ गिने-चुने मार्क्सवादियों में से थे जिन्होंने सचमुच में अपने आप को डिक्लासीफाई किया था. हमारे ज्यादातर कम्युनिस्ट नेता मध्य वर्ग या उच्च मध्य वर्ग से आते थे. मसलन जमींदार के बेटे ईएमएस या पाइप पीने वाले ज्योति बाबू. कम्युनिस्ट आंदोलन में ऑक्सफोर्ड और केम्ब्रिज में पढ़े लोगों का दबदबा हुआ करता था. वास्तव में उस वर्ग का दबदबा अभी भी कायम है. ज्यादातर मार्क्सवादी नेता कभी भी अपने आप को मजदूरों और किसानों के साथ एकरूप नहीं कर पाए.

यही नियोगी की सफलता थी. वे खुद मध्यवर्ग से आते थे. पर जब उन्होंने किसानों का संगठन बनाने की सोची तो एक गाँव में जाकर बटाईदार का काम करने लगे. खेत जोतते थे. जब उन्होंने मजदूर संगठन बनाने की सोची तो लोहे की खदानों में जाकर दिहाड़ी मजदूर बन गए. वहीं झुग्गी में रहते थे और वहीं एक मजदूर महिला से विवाह कर उन्होंने गृहस्थी बसाई. इस तरह से नियोगी ने अपने आप को डिक्लासीफाई किया. मजदूर उन्हें अपने में से एक मानते थे.“

शंकर गुहा नियोगी खुद कभी चुनाव नहीं लड़े, लेकिन छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा को राजनीतिक तौर पर खड़ा करने की कोशिश जरूर की और उसकी ओर से दो बार अपना एक विधायक विधानसभा तक पहुँचाने में सफल भी हुए.

वे सिर्फ एक मजदूरे नेता नहीं थे अपितु देश के विकास की सही दिशा दिखाने वाले दार्शनिक और महान कर्मयोगी थे.

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

डॉ. अमरनाथ

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