टी एन शेषन

 टी.एन.शेषन  : राजनेताओं के लिए अल्सेशियन 

हालांकि शेषन एक धार्मिक व्यक्ति थे लेकिन जब वे मुख्य चुनाव आयुक्त होकर आए तो सबसे पहले उन्होंने अपने कार्यालय से सभी देवी- देवताओं की मूर्तियाँ और कैलेंडर हटवा दिए। अपना फैसला लेने की क्षमता के लिए भी शेषन जाने जाते हैं। जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो उन्होंने चुनाव स्थगित कर दिया था।

टी एन शेषन

1985 के बिहार विधान सभा चुनाव में जहाँ 63 लोगों की हत्या हुई थी और 1990 के चुनाव में 87 लोगों की, वहाँ 2020 के चुनाव में कहीं से किसी तरह के हिंसा की कोई खबर नहीं मिली। इस हिंसा मुक्त चुनाव के पीछे जिस एक व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान है, उसका नाम है टी.एन.शेषन।

टी.एन.शेषन (15.12.1932-10.11.2019) देश के पहले ऐसे चुनाव आयुक्त थे जिन्होंने यह कहने का साहस दिखाया कि चुनाव आयोग सरकार का हिस्सा नहीं है। चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। शेषन से पहले सरकारी पत्र में ‘चुनाव आयोग, भारत सरकार’ लिखा होता था। शेषन ने इस परंपरा को समाप्त कर सरकारी अधिकारियों की चुनाव आयोग के प्रति जवाबदेही तय की। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकारों के सचिवों को आयोग के प्रति जिम्मेदार बनाया और इसके लिए उन पर सख्ती भी की। अधिकारियों को चुनाव आयोग के काम को गंभीरता से लेने का आदेश दिया। वे इतने साहसिक प्रवृत्ति के अधिकारी थे कि मुख्य चुनाव आयुक्त होने के बाद उन्होंने सरकार को लिखा था कि जब तक सरकार चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को सुनिश्चित नहीं करती है, तब तक आयोग चुनाव कराने में असमर्थ है। उन्होंने अगले आदेश तक देश के सभी चुनावों को स्थगित कर दिया था। जिसके कारण बंगाल में राज्यसभा के चुनाव नहीं हो पाए और केंद्रीय मंत्री प्रणव मुखर्जी को इस्तीफा देना पड़ा था। भारत में स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव कराने की दिशा में गुणात्मक सुधार लाने के लिए उन्होंने ही चुनाव में मतदाता पहचान पत्र को अनिवार्य किया था।

भारत के दसवें मुख्य चुनाव आयुक्त टी. एन. शेषन (तिरुनेल्लै नारायण अय्यर शेषन) का जन्म केरल के पालघाट ज़िले में तिरुनेल्लई गाँव के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी आरंभिक पढ़ाई बेसल इवैंजेलिकल मिशन हायर सेकंड्री स्कूल से की और इंटरमीडिएट गवर्नमेंट विक्टोरिया कॉलेज, पलक्कड़ से। मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से उन्होंने फिजिक्स में ग्रैजुएशन किया और वहीं से उन्होंने मास्टर की उपाधि भी हासिल की। उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में ही 1952 से पढ़ाना शुरू कर दिया। वहाँ उन्होंने तीन साल तक अध्यापन किया। मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाने के दौरान वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी करते रहे। 1953 में उन्होंने पुलिस सेवा परीक्षा में टॉप किया और 1954 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए होने वाली परीक्षा भी उत्तीर्ण की। 1955 बैच के प्रशासनिक अधिकारी टी. एन. शेषन की छवि प्रारंभ से ही एक निर्भीक, सख्त तथा ईमानदार प्रशासक की रही। इसी कार्यशैली के कारण उन्हें आगे बहुत सी कठिनाईयों का भी सामना करना पड़ा, लेकिन न तो उन्होंने अपनी राह बदली और न ही कभी निराशा को अपने मन में आने दिया।

शेषन की पहली नियुक्ति तमिलनाडु के मदुरई जिले के डिंडीगुल में उप जिलाधिकारी के रूप में हुई। वहां उन्होंने उप जिलाधिकारी के अधिकार-क्षेत्र से बाहर के प्रभारों को भी संभाला। अपनी पोस्टिंग के शुरुआती दिनों में ही उन्होंने मजबूत प्रशासक की अपनी छवि बनाई और न्यायोचित कार्यों में नेताओं के दबाव को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उदाहरणार्थ 1962 में उनका अपने एक वरिष्ठ अधिकारी से विवाद हो गया। इसकी वजह से उनका सचिवालय से ट्रांसफर कर दिया गया और उनको छोटी बचत कार्यक्रम, पिछड़ा वर्ग कल्याण और महिला कल्याण के विभाग में भेज दिया गया। अंत में उनको शहर का परिवहन निदेशक बना दिया गया। उनकी ईमानदारी और कर्तव्य निष्ठा की बातें प्रदेश के तत्कालीन उद्योग और परिवहन मंत्री रामास्वामी वेंकटरमन तक पहुंची। वेंकटरमन ने उनसे भीड़भाड़ वाले शहर की सार्वजनिक बस व्यवस्था संभालने को कहा। शेषन को वहां तरह-तरह के लोगों को संभालने का मौका मिला जो उनके भविष्य के कैरियर में काफी काम आया।

वे मद्रास में यातायात आयुक्त के रूप में बिताए गए दो सालों को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय मानते हैं। उस पोस्टिंग के दौरान 3000 बसें और 40,000 हज़ार कर्मचारी उनके नियंत्रण में थे। एक बार एक ड्राइवर ने शेषन से पूछा कि, “अगर आप बस के इंजन को नहीं समझते और ये नहीं जानते कि बस को ड्राइव कैसे किया जाता है, तो आप ड्राइवरों की समस्याओं को कैसे समझ पाएंगे?” शेषन ने इसको एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने न सिर्फ़ बस की ड्राइविंग सीखी बल्कि बस वर्कशॉप में भी काफ़ी समय बिताया। उनका कहना है, “मैं इंजनों को बस से निकाल कर उनमें दोबारा फ़िट कर सकता था।” एक बार उन्होंने बीच सड़क पर ड्राइवर को रोक कर स्टेयरिंग संभाल लिया और यात्रियों से भरी बस को 80 किलोमीटर तक चलाया।

शेषन का तमिलनाडु के मुख्यमंत्री से काफी विवाद हो गया। इसके बाद वे तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के एक सदस्य रूप में दिल्ली आ गए। कुछ दिन बाद उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आग्रह पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय का सचिव बनाया गया। इस पद पर वे 1988 तक रहे।

शेषन जब वन और पर्यावरण मंत्रालय में थे तो पर्यावरण मंत्रालय को उन्होंने सरकार का सबसे ताकतवर मंत्रालय बना दिया। सचिव के तौर पर उन्होंने टिहरी बांध और सरदार सरोवर बांध जैसी परियोजनाओं का विरोध किया था। भले ही सरकार ने उनके विरोध को महत्व नहीं दिया और परियोजना को आगे बढ़ाया लेकिन बांध से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया। कुछ हद तक यह पर्यावरणविदों के लिए जीत थी।

 इसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से उनकी नजदीकी बढ़ी। उनको आंतरिक सुरक्षा का सचिव बनाया गया जिस पद पर वे 1989 तक रहे। राजीव गांधी से उनकी नजदीकी का पता इस बात चलता है कि रक्षा मंत्रालय में सचिव के तौर पर नियुक्ति के 10 महीने बाद उनको कैबिनेट सचिव बनाया गया। जब राजीव गांधी दिसंबर 1989 में चुनाव हार गए और प्रधानमंत्री नहीं रहे तो टी.एन.शेषन का ट्रांसफर योजना आयोग में कर दिया गया।

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार में सुब्रह्मण्यम स्वामी कानून मंत्री थे जिनसे टी.एन.शेषन के मधुर संबंध थे। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद ऑफर किया। उन्होंने शुरू में तो इस ऑफर को ठुकराना चाहा लेकिन फिर उन्होंने पहले राजीव गांधी से मशविरा किया, फिर तत्कालीन राष्ट्रपति आर.वेंकटरमन और अपने परिवार के दूसरे वरिष्ठ सदस्यों से सलाह ली। उसके बाद उन्होंने ऑफर स्वीकार कर लिया और दिसंबर 1990 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का प्रभार संभाल लिया। इसके बाद उन्होंने देश की चुनाव व्यवस्था में जो सुधार किया, उससे उनका नाम इतिहास में अमर हो गया।

मुख्य चुनाव आयुक्त का उनका कार्यकाल 12 दिसंबर 1990 से 11 दिसंबर 1996 तक रहा। अपने कार्यकाल में उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त पद को नई परिभाषा दी। उन्होंने स्वच्छ एवं निष्पक्ष चुनाव सम्पन्न कराने के लिये नियमों का कड़ाई से पालन किया, जिसके कारण तत्कालीन केन्द्रीय सरकार एवं कई नेताओं के साथ उनका विवाद हुआ। उन्होंने मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्य व्यवस्था, चुनाव-प्रक्रिया में सुधार तथा धर्मनिरपेक्ष छवि आदि के क्षेत्र में काम किया। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक के लिए ‘मतदाता पहचान-पत्र’ तथा राजनीतिक दलों के खर्च पर अंकुश लगाना उनकी पहल का ही नतीजा था। अनेक नेताओं ने मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता के प्रस्ताव का यह कह कर विरोध किया कि यह भारत जैसे विकासशील देश के लिए बहुत ख़र्चीला है। लालूप्रसाद यादव ने दानापुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए मतदाता पहचान पत्र को लेकर मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि, “जहां के लोग अपना कागज-पत्तर (दस्‍तावेज) खपरैल के बांस के फोंफी में रखता है, बताओ तो वह मतदाता पहचान पत्र कहाँ से संभाल कर रखेगा?”

 शेषन का जवाब था कि अगर मतदाता पहचान पत्र नहीं बनाए गए तो 1 जनवरी 1995 के बाद भारत में कोई चुनाव नहीं कराए जाएंगे। कई चुनावों को सिर्फ़ इसी वजह से स्थगित किया गया क्योंकि उस राज्य में मतदाता पहचान पत्र तैयार नहीं थे।

उनकी एक और उपलब्धि थी उम्मीदवारों के चुनाव ख़र्च को कम करना। उनसे एक बार एक पत्रकार ने पूछा था, “आप हर समय कोड़े का इस्तेमाल क्यों करना चाहते हैं?” शेषन का जवाब था, “मैं वही कर रहा हूँ जो कानून मुझसे करवाना चाहता है। उससे न कम न ज़्यादा। अगर आपको कानून नहीं पसंद है तो उसे बदल दीजिए। लेकिन जब तक कानून है, मैं उसको टूटने नहीं दूँगा।”

शेषन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि जब वे कैबिनेट सचिव थे, तो प्रधानमंत्री ने उनसे कहा था कि वह चुनाव आयोग को बता दें कि प्रधानमंत्री इस-इस दिन चुनाव करवाना चाहते हैं। लेकिन शेषन ने प्रधानमंत्री को बताया कि ऐसा करने का उन्हें अधिकार नहीं है, वह सिर्फ यह कह सकते हैं कि सरकार चुनाव के लिए तैयार है।

1992 के उत्तर प्रदेश चुनाव में शेषन ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों, पुलिस अफसरों और 280 पर्यवेक्षकों से कह दिया था कि एक भी गलती बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अखबारों में छपी कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, तब एक रिटर्निंग ऑफिसर ने कहा था- ‘हम एक दयाविहीन इंसान की दया पर निर्भर हैं।’ सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही शेषन ने करीब 50,000 अपराधियों को ये विकल्प दिया था कि या तो वे अग्रिम जमानत ले लें या खुद को पुलिस के हवाले कर दें।

उस दौर में बिहार की दशा सबसे खराब थी। बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, हेरा-फेरी, हिंसा- सब बिहार में चुनाव के अनिवार्य अंग थे। अगर यह सब नहीं होता था, तो बड़ी खबर बन जाती थी। वर्ष 1984 के लोकसभा चुनाव में 24 लोग मारे गए थे और 1989 में 40। विधानसभा चुनावों में मतदान के  दौरान होने वाली हिंसा का जिक्र ऊपर किया गया  है।

वर्ष 1995 के बिहार विधान-सभा चुनाव में शेषन ने तय कर लिया था कि इस बार वे हिंसा नहीं होने देंगे। वहाँ निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा दाँव पर लगा दी। उन्होंने राज्य में अर्धसैनिक बलों की 650 टुकड़ियाँ भेज दीं। चुनाव को चार चरणों में विभक्त कर दिया। चार बार मतदान स्थगित किया और राज्य प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी। कानून के उल्लंघन का जरा सा भी संकेत मिलने पर उन्होंने पूरी चुनाव प्रक्रिया को रद्द कर दिए जाने की चेतावनी दी। अंजाम ये हुआ कि बिहार को देश के उस समय तक के सबसे लंबे विधानसभा चुनावों की यंत्रणा से गुजरना पड़ा। चुनाव आयोग द्वारा यह चुनाव 8 दिसंबर, 1994 को अधिसूचित किया गया और अंतिम मतदान 28 मार्च, 1995 को संपन्न हुआ। उम्मीदवार लगभग तीन महीने तक सड़क पर थे। इस दौरान शेषन का कार्यालय निरंतर सवाल पूछता रहता था और निर्देशों का पालन न होने की स्थिति में कड़े परिणाम की धमकी देता रहता था। फिलहाल, लालूप्रसाद यादव ने इस विलंब और लंबे समय के अभियानों का अच्छा फायदा हुआ।

ईमानदारी और कानून के प्रति अपनी निष्ठा की वजह से शेषन बहुतों को खटकते थे। उनके विरोधी उन्हें सनकी और तानाशाह तक कहते थे।1993 में हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल गुलशेर अहमद अपने बेटे का प्रचार करने सतना पहुँच गए। अखबारों में तस्वीर छपी। परिणाम यह हुआ कि गुलशेर को पद छोड़ना पड़ा। इसी तरह लालूप्रसाद यादव को सबसे ज्यादा जीवन में यदि किसी ने परेशान किया, तो वे शेषन ही थे। 90 के दशक में तो भारत में एक मज़ाक प्रचलित था कि भारतीय राजनेता सिर्फ़ दो चीज़ों से डरते हैं, एक ख़ुदा से और दूसरे शेषन से। सच तो यह है कि शेषन के आने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त एक आज्ञाकारी नौकरशाह होता था जो वही करता था जो उस समय की सरकारें चाहती थीं। शेषन ने पहली बार चुनाव आयुक्त की ताकत का एहसास कराया। चुनाव आयुक्त बनने के पहले शेषन भी एक अच्छे प्रबंधक की छवि के साथ भारतीय अफ़सरशाही के सर्वोच्च पद कैबिनेट सचिव तक पहुँचे थे। उनकी प्रसिद्धि का कारण ही यही था कि उन्होंने जिस मंत्रालय में काम किया उस मंत्री की छवि अपने आप ही सुधर गई। लेकिन 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद उन्होंने अपने मंत्रियों से मुँह फेर लिया। सरकारों के आने- जाने का कोई असर इनके ऊपर नहीं पड़ा। उन्होंने बाक़ायदा ऐलान कर दिया, “आई ईट पॉलिटीशियंस फॉर ब्रेक फ़ास्ट।” उनका दूसरा नाम ही रख दिया गया था, “अल्सेशियन।”

टी.एन.शेषन व्यवस्था में क्रांति लाने वाले इंसान थे, परिश्रमी और सक्षम प्रशासक थे और इसीलिए बुद्धीजीवियों और मध्य वर्ग के लिए नायक की तरह थे। आज अगर देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र माहौल में चुनाव हो पाता है तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय टी.एन.शेषन को जाता है। शेषन अपनी कर्तव्यनिष्ठा, निर्भीकता, स्पष्टवादिता और आजाद प्रवृत्ति के लिए जाने जाते थे। पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल मैन के नाम से विख्यात ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने अपनी जीवनी ‘अग्नि की उड़ान’ में शेषन की ईमानदारी और पेशेवर रवैये की तारीफ की है।

हालांकि शेषन एक धार्मिक व्यक्ति थे लेकिन जब वे मुख्य चुनाव आयुक्त होकर आए तो सबसे पहले उन्होंने अपने कार्यालय से सभी देवी- देवताओं की मूर्तियाँ और कैलेंडर हटवा दिए। अपना फैसला लेने की क्षमता के लिए भी शेषन जाने जाते हैं। जब राजीव गांधी की हत्या हुई तो उन्होंने चुनाव स्थगित कर दिया था।

अवकाश ग्रहण करने के बाद शेषन ने अपनी आत्मकथा लिखी। लेकिन वे इसे छपवाने के लिए तैयार नहीं हुए क्योंकि उससे दूसरे कई लोगों को तकलीफ़ होती। उनका कहना था कि, “मैंने ये आत्मकथा सिर्फ़ अपने संतोष के लिए लिखी है।”

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने देशभक्त ट्रस्ट बनाया।1997 में वे राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़े और के.आर.नारायणन से पराजित हुए। इसी तरह उन्होंने काँग्रेस की टिकट पर लालकृष्ण अडवाणी के खिलाफ लोक सभा का भी चुनाव लड़ा और उसमें भी पराजित हुए। जनता को उनकी ईमानदार और साफ सुथरे अधिकारी की छवि ही पसंद थी। उसने एक नेता के रूप में शेषन को अस्वीकार कर दिया।

1996 में उनकी कर्तव्यनिष्ठा और सेवा के लिए रैमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

शेषन की रचित दो पुस्तकें भी प्रकाशित हैं जिनके नाम हैं, ‘द डीजेनरेशन ऑफ इंडिया’ तथा ‘ए हर्ट फुल ऑफ बर्डन’।

87 वर्ष की उम्र में टी.एन. शेषन का हृदय गति रुक जाने से चेन्नई में 10 नवंबर 2019 को निधन हो गया। अन्तिम दिनों में उन्हें भूलने की बीमारी हो गई थी। पता चला कि कुछ दिन उन्हें एम.एस.एम. रेजीडेंसी नामक वृद्धाश्रम में भी रहना पड़ा था।

फिलहाल, टी.एन.शेषन जैसे नौकरशाह यदा कदा पैदा होते हैं।

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

डॉ. अमरनाथ

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