राहुल सांकृत्यायनः सत्य की खोज का नायाब पथिक – अमरनाथ

राहुल सांकृत्यायन

“वैसे तो धर्मों में आपस में मतभेद है। एक पूरब मुँह करके पूजा करने का विधान करता है, तो दूसरा पश्चिम की ओर। एक सिर पर कुछ बाल बढ़ाना चाहता है, तो दूसरा दाढ़ी। एक मूँछ कतरने के लिए कहता है, तो दूसरा मूँछ रखने के लिए। एक जानवर का गला रेतने के लिए कहता है, तो दूसरा एक हाथ से गर्दन साफ करने को। एक कुर्ते का गला दाहिनी तरफ रखता है, तो दूसरा बाईं तरफ। एक जूठ-मीठ का कोई विचार नहीं रखता तो दूसरे के यहाँ जाति के भीतर भी बहुत-से चूल्हे हैं। एक ख़ुदा के सिवाय दूसरे का नाम भी दुनिया में रहने देना नहीं चाहता, तो दूसरे के देवताओं की संख्या नहीं। एक गाय की रक्षा के लिए जान देने को कहता है, तो दूसरा उसकी कुर्बानी से बड़ा सबाब समझता है।

” ‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- इस सफ़ेद झूठ का क्या ठिकाना है? अगर मज़हब बैर नहीं सिखलाता, तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हज़ार बरस से आज तक हमारा मुल्क़ पामाल (बर्बाद) क्यों है? पुराने इतिहास को छोड़ दीजिए, आज भी हिंदुस्तान के शहरों और गाँवों में एक मज़हब वालों को दूसरे मज़हब वालों के ख़ून का प्यासा कौन बना रहा है? कौन गाय खाने वालों से गोबर खाने वालों को लड़ा रहा है? असल बात यह है- ‘मज़हब तो है सिखाता आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का ख़ून पीना।’ हिंदुस्तानियों की एकता मज़हबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मज़हबों की चिता पर होगी।”

उक्त अंश महापंडित राहुल सांकृत्यायन (9.4.1893-14.4.1963) की पुस्तक ‘तुम्हारी क्षय’ में संकलित लेख ‘तुम्हारे धर्म की क्षय’ का है। यह पुस्तक 1947 में प्रकाशित हुई थी। तबतक वे सोवियत संघ से लौट चुके थे। यानी, अपनी विचार- यात्रा की अन्तिम मंजिल पर थे।  इस लेख में वे धर्म को इंसानियत से ऊपर रखने पर समाज को धिक्काते हैं और लिखते हैं कि, “अज्ञान का दूसरा नाम ही ईश्वर है।’’ वे इस बात को भी बार-बार रेखाँकित करते हैं कि, ‘’अज्ञान और असमर्थता के अतिरिक्त यदि कोई और भी आधार ईश्वर-विश्वास के लिए है, तो वह धनिकों और धूर्तों की अपनी स्वार्थ-रक्षा का प्रयास है। समाज में होते अत्याचारों और अन्यायों को वैध साबित करने के लिए उन्होंने ईश्वर का बहाना ढूँढ लिया है। धर्म की धोखा-धड़ी को चलाने और उसे न्यायपूर्ण साबित करने के लिए ईश्वर का ख्याल बहुत सहायक है।’’

महापंडित राहुल संकृत्यायन की जीवन- यात्रा अद्भुत है। यदि यह यथार्थ न होता तो विश्वास कर पाना कठिन होता कि उत्तर प्रदेश के एक गाँव के ब्राह्मण परिवार में जन्मा एक बालक किस तरह ग्यारह वर्ष की उम्र में घर से भाग जाता है और ज्ञान की खोज में दुनिया भर का चक्कर लगाते हुए महापंडित बनकर लौटता है। वह पहले सनातनी सन्यासी बनता है फिर आर्यसमाजी बनता है इसके बाद बौद्ध भिक्खु बनता है और अंत में कम्युनिस्ट। इस दौरान लगातार दुनिया भर के साहित्य का, धर्मों-संप्रदायों का, तीन दर्जन से अधिक भाषाओं का अध्ययन करता है, अध्यापन करता है, जनान्दोलनों में हिस्सा लेता है, लाठियाँ खाता है, जेल जाता है और इतना सब होते हुए भी बहुमूल्य डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकों का प्रणयन करता है। ऐसी मेधा, ऐसी जिजीविषा और लोकहित के प्रति ऐसा समर्पण अन्यत्र कहाँ मिलेगा ?

राहुल सांकृत्यायन का जन्म आजमगढ़ जिले के पंदहा नामक गाँव के एक निम्नवर्गीय किसान-परिवार में हुआ था। उनके बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डेय था। उनके पिता का नाम गोवर्धन पाण्डेय तथा माँ का नाम कुलवंती देवी था। बचपन में ही माँ का देहांत हो जाने के कारण केदारनाथ का पालन-पोषण ननिहाल में हुआ। 1898 में प्राथमिक शिक्षा के लिए इन्हें गाँव पंदहा के ही एक मदरसे में भेजा गया।

राहुल जी के नाना पण्डित राम शरण पाठक फ़ौज में नौकरी कर चुके थे। उनके  मुख से सुनी हुई फ़ौज़ी जीवन की कहानियाँ, शिकार के अद्भुत वृत्तान्त, देश के विभिन्न प्रदेशों का रोचक वर्णन, नदियों, झरनों के वर्णन आदि ने केदार पाण्डेय के मन में दुनिया को देखने की ललक पैदा कर दी। इसके अलावा दर्जा तीन की उर्दू किताब में उन्होंने एक शेर पढ़ा था,

सैर कर दुनिया की गाफिल ज़िन्दगानी फिर कहाँ,
ज़िन्दगी गर कुछ रही तो नौजवानी फिर कहाँ।

इस शेर ने केदारनाथ पाण्डेय के मन पर गहरा प्रभाव डाला। इस बीच ग्यारह वर्ष की छोटी उम्र में उनकी शादी कर दी गई। इस शादी ने भी उन्हें घर छोड़ने में मदद की और केदारनाथ पाण्डेय एक दिन चुपके से घर छोड़कर दुनिया को देखने-जानने के लिए निकल पड़े। वे हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में विचरते रहे और वहाँ यायावरी का जीवन जिया।  हिमालय पर्यटन के बाद 1910 में संस्कृत के अध्ययन की आकाँक्षा ने स्वाभाविक रूप से केदारनाथ पाण्डेय को ज्ञान की नगरी काशी ले गई। वहाँ ‘मोतीराम का बाग’ नामक आश्रम में उन्होंने चक्रपाणि ब्रह्मचारी के अंतेवासी के रूप में संस्कृत का अध्ययन शुरू किया।

काशी में रहते हुए इनकी भेंट छपरा जिले के परसा- मठ के महंत लक्ष्मणदास से हुई और वे अपने उत्तराधिकारी के रूप में केदारनाथ पाण्डेय को परसा ले गए जहाँ पहुँचकर केदारनाथ पाण्डेय वैष्णव साधु रामउदार दास बन गए।

रामउदार दास अब भक्ति के दार्शनिक स्रोत और पारंपरिक ज्ञान हासिल करने के लिए 1913 में दक्षिण चले गए। वहाँ तिरुमिशी शहर में रहकर उन्होंने विशिष्टाद्वैतवादी रामानुजीय वेदान्त के साथ न्य़ाय, मीमांसा आदि का गहन अध्ययन किया। परसा लौटने के बाद पूजा- पाठ के अलावा सामाजिक कामों में भी वे बराबर अपना योगदान करते रहते थे। इसी बीच अयोध्या के निकट प्रसिद्ध देवकाली मंदिर में बलि- प्रथा को बंद करने के लिए किए गए आन्दोलन में रामउदार दास ने सक्रिय रूप से भाग लिया। विवाद बहुत बढ़ गया था और मामला मारपीट तक जा पहुँचा। पुलिस आई और आर्यसमाजी पुलिस इंस्पेक्टर ने रामउदार दास का पक्ष लिया। इसके बाद रामउदार दास पर आर्य समाज के प्रति गहरा आकर्षण पैदा हुआ और वे आर्य समाज का गंभीर अध्ययन करने लगे। 1915 में रामउदार दास ने अपना सनातनी का चोला उतार फेंका और आगरा के आर्य मुसाफिर विद्यालय में दाखिला ले लिया। आर्य समाज ने न सिर्फ रामउदार को वैचारिक मुक्तता की जमीन प्रदान की, बल्कि उनकी तार्किक प्रतिभा को निखरने का भी मौका दिया। इस दौरान केदारनाथ विद्यार्थी के नाम से उनके लेख अखबारों में छपने लगे थे। 1917 से लेकर 1920 तक का उनका काल-खंड आर्यसमाजी प्रचारक और अध्ययन की आकांक्षा में निरंतर भटकते रहने का काल खंड है। इस दौरान वे लाहौर से लेकर कलकत्ता और फिर 1920 में अध्ययन के लिए दुबारा दक्षिण गए।

इन्ही दिनों गाँधी जी का असहयोग आंदोलन तेजी से फैल रहा था। रामउदार दास ने उसमें बढ़ चढ़ करल हिस्सा लिया और जेल गए। इसी वर्ष उन्हें जिला कांग्रेस का मंत्री चुना गया। पटना में तथाकथित सरकार विरोधी भाषण देने पर उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया और इस बार उन्हें दो वर्ष की जेल की सजा हुई। उन्हें इस बार हजारीबाग जेल में रखा गया और वे 18 अप्रैल 1925 को रिहा हुए।

जेल से मुक्त होने के बाद रामउदार दास हिमालय की ओर निकल पड़े। वे लेह, लद्दाख, तिब्बत और हिमालय के बर्फ से ढंके पहाड़ों में घूमते रहे। उन दिनों भारतीयों को तिब्बत की यात्रा की अनुमति नहीं थी, इसलिए उन्होंने तिब्बत की पहली यात्रा एक भिखारी के छद्मवेश में की। वहाँ से लौटकर वे सारनाथ गए और उसके बाद बौद्ध- दर्शन के अध्ययन के लिए श्रीलंका चले गए।।

राहुल श्रीलंका में उन्नीस महीने ( 16.5.1927-1.12.1928) रहे। यहाँ रहकर उन्होंने अध्ययन-अध्यापन दोनों किया। उन्होंने पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी एवं सिंहली भाषाओं का अध्ययन करते हुए सम्पूर्ण बौद्ध ग्रन्थों का मनन किया और त्रिपिटकाचार्य की सर्वश्रेष्ठ उपाधि प्राप्त की।

एक बार और तिब्बत की यात्रा के उद्देश्य वे श्रीलंका से भारत लौट आए। वे तिब्बत गए और अनेक दुरूह स्थानो से होते हुए ल्हासा तक पहुँचे। वहाँ से अनेक दुर्गम स्थानों से होते हुए उन्होंने तमाम हस्तलिखित पोथियों का अनुसंधान और अध्ययन किया और प्रचुर सामग्री लेकर भारत आए।

रामउदार दास एक बार फिर लंका की ओर कूच किए। इस बार श्रीलंका में जाकर वे बौद्ध धर्म में दीक्षित हो गये। वे ‘रामउदार दास’ से ‘राहुल’ हो गये और सांकृत्य गोत्र के कारण ‘सांकृत्यायन’ कहलाए। उनकी अद्भुत तर्क-शक्ति और अनुपम ज्ञान- भण्डार को देखकर काशी के पंडितों ने उन्हें ‘महापंडित’ की उपाधि दी।  इस प्रकार केदारनाथ पाण्डेय अब महापंडित राहुल सांकृत्यायन हो गये। उन्होंने ‘मज्झिम निकाय’ के सूत्र का हवाला देते हुए अपनी ‘जीवन यात्रा’ में बुद्ध का कथन उद्धृत किया है और लिखा है, “बड़े की भाँति मैंने तुम्हें उपदेश दिया है, वह पार उतरने के लिए है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिए नहीं-तो मालूम हुआ कि जिस चीज़ को मैं इतने दिनों से ढूँढता रहा हूँ, वह मिल गयी।”

5 जुलाई 1932 को आनंद कौसल्यायन के साथ राहुल समुद्री जहाज से यूरोप की ओर रवाना हो गए। वे पोर्ट सईद, क्रीट, सारदीनिया, कॉरसिका, मार्सेई, नोत्रदम होते हुए पेरिस पहुँचे। पेरिस से वे लंदन गए। कैम्ब्रिज और आक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों को देखा। आक्सफोर्ड के हाईगेट कब्रिस्तान में राहुल ने कार्ल मार्क्स की समाधि का दर्शन किया।

राहुल की यूरोप यात्रा का अगला पड़ाव जर्मनी था। फ्रैंकफुर्त से वे मारबुर्ग गए और फिर बर्लिन। उन्होंने बर्लिन में डॉ।पॉल डाल्के के बौद्ध बिहार में व्याख्यान दिया। जर्मनी में अपना क्रिसमस बिताने के बाद राहुल पानी के जहाज से ही कोलंबो लौट आए और वहाँ से 1933 में भारत।  

1934 में भयंकर भूकंप आया। बिहार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू आदि नेताओं के साथ राहुल भूकंप पीड़ितों की सेवा में तन मन धन से कूद पड़े। इसी वर्ष राहुल दूसरी बार तिब्बत गए। यह यात्रा पूरी तैयारी के साथ थी। ल्हासा में राहुल जिनके संपर्क में आए उनमें प्रमुख थे भोट विद्यामार्तंड गेशे शेरब। राहुल ने इस बार दुर्गम प्रदेशों एवं बौद्ध- बिहारों की यात्रा की और दुर्लभ पाँडुलिपियाँ देखीं। उनमें से बहुतों की उन्होंने तस्वीरे लीं और बहुतों की प्रतिलिपि तैयार। इन्हीं में धर्मकीर्ति और दिड़्नाग के भी ग्रंथ थे। इस तरह दुर्लभ पाँडुलिपियों और चित्रों के साथ राहुल भारत लौटे।

1935 की गर्मियों में राहुल रंगून, सिंगापूर, हांगकांग, मलयेशिया होते हुए जापान पहुँचे। जापान से वे कोरिया गए और वहाँ से मंचूरिया।  राहुल की हार्दिक इच्छा सोवियत संघ जाने की थी। आगे से ट्रेन में सफर करते हुए राहुल छह दिन का सफर तय करके मास्को पहुँचे। वहाँ की समाजवादी व्यवस्था देखकर राहुल बहुत प्रभावित हुए। वहाँ से वे ईरान और अफगानिस्तान के रास्ते भारत लौटे।

यह यात्रा बहुत कठिन थी। इस बीच अध्ययन-लेखन के कारण उनका स्वास्थ्य बुरी तरह खराब हो चुका था। उन्हें टायफायड हो गया। अपनी इस पहली बड़ी बीमारी का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है, “ 30 दिसंबर से 3 जनवरी, पाँच दिन तक मैं बेहोश रहा….. यह सुनकर बड़ी खुशी हुई कि मैंने राम या भगवान का नाम बेहोशी में भी नहीं लिया।— मेरे नास्तिक होने का यह एक पक्का सबूत था।  मौत के लिए मुझे जरा भी हर्ष-विषाद नहीं था, लेकिन यह ख्याल जरूर आता था कि  धर्मकीर्ति के प्रमाणवार्तिक को पूरा संपादित करके मैं प्रकाशित नहीं कर सका।” ( मौत के मुँह में, पृष्ठ-236)

टायफायड से उबरने में राहुल को समय लगा। वे बहुत कमजोर हो चुके थे। किन्तु वे फिर से तिब्बत जाने का मन बना चुके थे। थोड़ा ठीक होने पर 1936 में वे फिर से तिब्बत की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ सा-क्या के प्रसिद्ध बौद्ध मठ में उन्हें दसवीं- ग्यारहवीं सदी की अनेक बहुमूल्य पोथियाँ मिलीं। यहाँ तीन महीने रहकर उन्होंने इन पोथियों का गंभीर अध्ययन किया।

तिब्बत से लौटने के बाद सोवियत संघ को देखने-जानने की अभिलाषा राहुल के भीतर फिर से बलवती हो उठी। 1937-38 में ईरान होते हुए वे फिर से सोवियत संघ पहुँचे। लेलिनग्राद में रहते हुए राहुल की भेंट ‘रामचरितमानस’ का रूसी में अनुवाद करने वाले महान विद्वान वारान्निकोव से हुई। लेनिनग्राद के विश्वप्रसिद्ध संग्रहालय से वे जुड़ गए।  वहाँ उनकी सेक्रटरी बनीं रूसी विदुषी महिला एलेना नारवेरतोवना कोजेरोव्स्काया उर्फ लोला। राहुल उन्हें संस्कृत पढ़ाने लगे। धीरे-धीरे वे एक -दूसरे के नजदीक आए और फिर वैवाहिक बंधन में बँध गए।

लोला को राहुल बहुत प्यार करते थे किन्तु उन्हें तिब्बत की एक और यात्रा करनी थी जिसके लिए बिहार सरकार ने छह हजार रूपए मंजूर किए थे। राहुल अपनी पत्नी से विदा होकर उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान होते हुए 26 जनवरी 1938 को भारत पहुँचे। सोवियत संघ से लौटने पर राहुल पूरी तरह बदल चुके थे और कम्युनिस्ट बन चुके थे किन्तु अपना बौद्ध भिक्षु का चीवर उन्होंने नहीं छोड़ा था क्योंकि तिब्बत की यात्रा की सफलता के लिए अब भी बौद्ध भिक्षु का आडंबर जरूरी था।

राहुल ने 1938 में चौथी बार तिब्बत की यात्रा की। इस बार की यात्रा में भी तिब्बत से प्रचुर पाण्डुलिपियां लेकर वे भारत आए। इस बार वे तिब्बत वे कलकत्ता आए और आने के पहले ही दिन संवाददाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अब वे साम्यवाद प्रभावित सक्रिय राजनीति में भाग लेने जा रहे हैं।

अब राहुल एक कर्मयोगी योद्धा के रूप में किसान आन्दोलन में कूद पड़े। अमवारी किसान सत्याग्रह में उन्होंने हिस्सा लिया और लाठियाँ खाई। उनका सिर फट गया था। 24 फरवरी से 10 मई 1939 तक वे जेल में बंद थे।  इस बीच राहुल ने जेल में ही कई बार भूख हड़ताल की।  कारावास की सजा के दौरान ही 14 मार्च 1939 को सोवियत संघ से आचार्य श्चेरवात्स्की का पत्र मिला जिसमें लिखा था कि लोला ने एक स्वस्थ, सुंदर पुत्र को जन्म दिया है। पत्र के साथ फोटो भी था।

20 अक्टूबर 1939 को बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी की पहली बैठक हुई जिसमें उन्होंने हिस्सा लिया। उस वक्त पार्टी गैरकानूनी थी। राहुल को भारत रक्षा कानून के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। इस बार राहुल को 29 महीने की जेल हुई। वे हजारीबाग जेल तथा देवली कैंप में रहे। इन्हीं दिनों जेल में उन्होंने ‘मेरी जीवन यात्रा’, ‘दर्शन दिग्दर्शन’, ‘मानव समाज’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘विश्व की रूपरेखा’, ‘बोल्गा से गंगा’ जैसी महान कृतियाँ लिखीं।

राहुल अपने विचारों से कभी भी समझौता करने वाले व्यक्ति नहीं थे। सन् 1940 में ‘बिहार प्रान्तीय किसान सभा’ के अध्यक्ष के रूप में जमींदारों के आतंक की परवाह किए बिना वे किसान सत्याग्रहियों के साथ खेतों में उतरकर और हाथ में हँसिया लेकर गन्ना काटने लगे थे, जहाँ ज़मींदार के लठैतों ने उनके सिर पर वार करके उन्हें लहूलुहान कर दिया था। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य रहते हुए भी राहुल अपनी वैचारिक दृढ़ता पर कायम रहे। सन् 1947 में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रूप में उन्होंने पहले से छपे भाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया था एवं जो भाषण दिया था, वह अल्पसंख्यक संस्कृति एवं भाषाई सवाल पर कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों के विपरीत था। परिणामस्वरूप पार्टी की सदस्यता से उन्हें वंचित होना पड़ा।

अपने जीवन के पचास साल पूरे होने पर 12 अप्रैल 1943 को बाबा नागार्जुन के साथ राहुल अपने गाँव गए। वे घूम- घूम कर अपने बचपन से जुड़ी स्म़ृतियों का साक्षात्कार करना चाहते थे। राहुल का कठिन हृदय गाँव के परिचितों के बीच पहुँचते ही द्रवित हो उठा। उन्होंने लिखा है, “ नेत्रों को सूखा रखने और स्वर को ठीक करने के लिए भारी प्रयत्न करना पड़ा। ।।।।पंदहा में घुसने पर परिचित मिले वृद्ध लौहर नाना। अश्रुगद्गद कंठ से ‘कुलवंती के पूत-केदार’ कहना और फिर गले से लिपट जाना मेरे धैर्य पर जबरदस्त प्रहार करने के लिए काफी था। कुलवंती के पुत्र, रामशरण पाठक के नाती केदारनाथ को देखने के लिए गाँव के लोग आने लगे। “(राहुल वांड़्मय, खंड-1, जिल्द-2, पृष्ठ-381) दूसरे दिन राहुल अपने पितृग्राम कनैला भी गए।

 इस बीच राहुल को लेलिनग्राद विश्वविद्यालय से प्रोफेसर का पदभार ग्रहण करने का आमंत्रण मिला। 3 जून 1945 को राहुल मास्को पहुँचे और वहाँ लेनिनग्राद विश्वविद्यालय में अध्यापन करने लगे। इसी दौरान भारत की आजादी की खबर राहुल को मिली। वे आजाद भारत को देखने के लिए 17 अगस्त 1947 को देश लौट आए।

इस तरह राहुल का पूरा जीवन घुमक्कड़ी में बीत गया। घुमक्कड़ी के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा है कि घुमक्कड़ से बढ़कर व्यक्ति और समाज का कोई हितकारी नहीं हो सकता। घुमक्कड़ों के काफिले न आते- जाते, तो सुस्त मानव जातियाँ सो जातीं और पशु से ऊपर नहीं उठ पाती।

1949 में कलिंगपोड़् में रहते हुए राहुल के जीवन में टाइपिस्ट के रूप में कमला जी आईं और बाद में वे सहधर्मिणी हो गईं। 1950 में कमला जी से उन्होंने विवाह कर लिया। 1953 में उनकी बेटी जया और 1955 में बेटे जेता का जन्म हुआ। 1961 से राहुल के भीतर स्मृति-भ्रंशता के लक्षण दिखाई देने लगे थे और 23 मार्च 1963 को यह अनोखा महापंडित दार्जीलिंग में सदा- सदा के लिए सो गया।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन की लगभग डेढ़ सौ पुस्तकें प्रकाशित हैं जिनमें प्रमुख हैं, ‘सतमी के बच्चे’, ‘वोल्गा से गंगा’, ‘बहुरंगी मधुपुरी’, ‘कनैला की कथा’, ‘बाईसवीं सदी’, ‘जीने के लिए’,’ सिंह सेनापति’, ‘जय यौधेय’, ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’, ‘मधुर स्वप्न’, ‘राजस्थान निवास’, ‘विस्मृत यात्री’, ‘दिवोदास’ ‘मेरी जीवन यात्रा’ ‘सरदार पृथ्वीसिंह’, ‘नए भारत के नए नेता’, ‘बचपन की स्मृतियाँ’, ‘अतीत से वर्तमान’, ‘स्तालिन’, ‘लेनिन’, ‘कार्ल मार्क्स’, ‘माओ-त्से-तुंग’, ‘घुमक्कड़ स्वामी’, ‘मेरे असहयोग के साथी’, ‘जिनका मैं कृतज्ञ’, ‘वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली’, ‘सिंहल घुमक्कड़ जयवर्धन’, ‘कप्तान लाल’, ‘सिंहल के वीर पुरुष’, ‘महामानव बुद्ध’ ‘लंका यात्रावली’, ‘मेरी यूरोप यात्रा’, ‘जापान’, ‘ईरान’, ‘किन्नर देश की ओर’, ‘घुमक्कड़ शास्त्र’, ‘एशिया के दुर्गम खंडों में’, ‘चीन में क्या देखा’, ‘मेरी लद्दाख यात्रा’, ‘मेरी तिब्बत यात्रा’, ‘तिब्बत में सवा वर्ष’, ‘रूस में पच्चीस मास’, ‘विश्व की रूपरेखा’, ‘दार्जीलिंग परिचय’, ‘कुमायूँ’, ‘गढ़वाल’, ‘नेपाल’, ‘हिमालय प्रदेश’, ‘जौनसागर देहरादून’, ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’, ‘बौद्ध दर्शन’, ‘शासन शब्दकोश’, ‘राष्ट्रभाषा कोश’, ‘साम्यवाद ही क्यों’, ‘दिमागी गुलामी’, ‘क्या करें’, ‘तुम्हारी क्षय’, ‘सोवियत न्याय’, ‘राहुल जी का अपराध’, ‘सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास’, ‘मानव समाज’, ‘आज की समस्याएं’, ‘आज की राजनीति’, ‘कम्युनिस्ट क्या चाहते हैं’, ‘वादन्याय’, ‘प्रमाणवार्तिक’, ‘विग्रहव्यावर्तनी’, ‘प्रमाणवार्तिकभाष्य’, ‘विश्व की रूप रेखा’, ‘तिब्बत में बौद्ध धर्म’, ‘पुरातत्व निबंधावली’, ‘आदि हिन्दी की कहानियाँ’, ‘दक्खिनी हिन्दी काव्यधारा’, ‘सरल दोहा कोश’, ‘मध्य एशिया का इतिहास’, ‘ऋग्वैदिक आर्य’, ‘भारत में अंग्रेजी राज के संस्थापक’ आदि। इसके अलावा उन्होंने लगभग एक दर्जन पुस्तकों का अनुवाद किया है।

हमारा समाज पूज्य का पूजन नहीं करता, दानवों, दैत्यों, गुंडों और हत्यारों का पूजन करता है। राहुल को यथोचित सम्मान नहीं मिला। फिर भी उनकी परंपरा खत्म नहीं हुई है।

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

डॉ. अमरनाथ

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