इंदिरा गाँधी : अटल की ‘दुर्गा’

सिफ़ारिश की गई थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए। लेकिन जब वह फ़ाइल इंदिरा गाँधी के सामने रखी गई तो उन्होंने उसे अस्वीकार करते हुए बहुत ग़ुस्से में उस पर लिखा था, “आर नॉट वी सेकुलर?

इंदिरा गांधी

“मैं आज यहाँ हूँ। कल शायद यहाँ न रहूँ। मुझे चिंता नहीं मैं रहूँ या न रहूँ। मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आख़िरी साँस तक ऐसा करती रहूँगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मज़बूत करने में लगेगा।”

हत्या के ठीक एक दिन पहले इंदिरा गाँधी ने भुवनेश्वर में भाषण देते हुए यही कहा था। और दूसरे दिन अर्थात् 31 अक्टूबर 1984 को सुबह 9 बजकर 10 मिनट पर जब वे अपने घर से निकल कर बाहर आ रही थीं तो उनके अपने ही सुरक्षा कर्मी बेअंत सिंह ने अपनी रिवाल्वर से उनपर तीन गोलियाँ दाग दीं। गोलियाँ उनके पेट, सीने और कमर में लगी। उसके बाद उससे पाँच फुट की दूरी पर खड़े सतवंत सिंह ने अपनी ऑटोमेटिक कारबाइन की सभी पचीस गोलियाँ इंदिरा गाँधी के शरीर में उतार दी।

उल्लेखनीय है कि ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इस तरह के हमले की आशंका व्यक्त की थी और सिफ़ारिश की थी कि सभी सिख सुरक्षाकर्मियों को उनके निवास स्थान से हटा लिया जाए। लेकिन जब वह फ़ाइल इंदिरा गाँधी के सामने रखी गई तो उन्होंने उसे अस्वीकार करते हुए बहुत ग़ुस्से में उस पर लिखा था, “आर नॉट वी सेकुलर?

देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी बहुत साहसी और निर्भीक थीं। नेहरू की विरासत को आगे ले जाने वाली इंदिरा गाँधी ने भारत को वैश्विक प्रतिष्ठा तो दिलाया ही, आंतरिक स्तर पर भी बहुत समृद्ध और मजबूत किया।

सत्ता में आते ही उन्होंने पहला काम किया देश को खाद्यान्न के मामले आत्मनिर्भर बनाने का। भारत खाद्यान्न के मामले में विदेशों से आयात पर निर्भर था, खासतौर पर अमेरिका से। 24 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री का पद सँभालने के दो महीने बाद मार्च में उन्हें अमेरिका जाना पड़ा था और देश के लिय़े खाद्यान्न की माँग करनी पड़ी थी। इसलिए उन्होंने सबसे पहले अपना ध्यान कृषि पर केन्द्रित किया। इसकी शुरुआत लाल बहादुर शास्त्री के साथ काम करते हुए ही हो गई थी। शास्त्री जी ने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। दुर्भाग्य से वे ज्यादा दिन देश की बागडोर न सँभाल सके। इंदिरा गाँधी ने हरित क्रान्ति पर जोर दिया जिसमें उनका उद्देश्य भारत के लिए खाद्यान्न की आत्ममिर्भरता थी। कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन के शोध और परिश्रम से, हाईब्रिड बीजों, राज्य के द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी, बिजली की उपलब्धता, जल संसाधन आदि सहित किसानों के सहयोग से भारत तेजी से खाद्यान्न के मामले मे आत्मनिर्भर होने लगा। इंदिरा गाँधी ने संकल्प ले लिया था कि मैं अमरीका के आगे अनाज के लिए भीख नहीं माँगूंगी। और उनका संकल्प पूरा हुआ। इंदिरा गाँधी के शासन काल में ही भारत खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हो गया बल्कि अनाज का निर्यात भी करने लगा।

जनता द्वारा दी गई शक्ति का दुरुपयोग करके सरकारी (जनता की) संपत्ति को निजी हाथों में बेंच देने से कमीशन मिलता है, दलाली मिलती है और उसकी देख- रेख से भी मुक्ति मिल जाती है, किन्तु उसी संपत्ति को निजी हाथों से लेकर उसे सरकारी (जनता की) संपत्ति बना देना बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। इसमें कोई कमीशन भी नहीं मिलता और मालिकों से दुश्मनी अलग।

19 जुलाई, 1969 को इंदिरा गाँधी ने 14 निजी बैंको का एक ही झटके में राष्ट्रीयकरण कर दिया। बैंकों के राष्ट्रीयकरण की यह घटना असाधारण थी। उस वक्त ये बैंक देश के बड़े औद्योगिक घराने चला रहे थे। इन बैंकों में सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नैशनल बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, देना बैंक, यूको बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक, सिंडिकेट बैंक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक तथा बैंक ऑफ महाराष्ट्र शामिल थे। इंदिरा गाँधी के इस कदम से आमजन कितने उत्साहित थे, इसका अंदाज़ा ‘शू शाइन बॉयज यूनियन’ द्वारा दिए गए एक ऑफर से लगाया जा सकता है। यूनियन की ओर से घोषणा की गई थी कि कांग्रेस अधिवेशन में शामिल होने वाले ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के तमाम प्रतिभागियों के जूतों पर मुफ्त़ में पॉलिश की जाएगी। राष्ट्रीयकृत किए जाने वाले बैंकों में सबसे बड़ा सेंट्रल बैंक था। टाटा द्वारा नियंत्रित इस बैंक में 4 अरब से अधिक रुपए जमा थे। सबसे छोटा बैंक ऑफ महाराष्ट्र में भी 70 करोड़ रूपए जमा थे।

इंदिरा गाँधी के इस फैसले में जहाँ आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर लक्ष्मीकांत झा, प्रधानमंत्री के तत्कालीन सचिव पी. एन. हक्सर, राष्ट्रपति वी वी गिरि आदि ने भरपूर सहयोग किया, जबकि मोरारजी देसाई बेहद नाराज थे और उन्होंने वित्त मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था।

इंदिरा गाँधी ने देश के राजाओं को दिया जाने वाला ‘प्रिवी पर्स’ समाप्त किया। आजाद भारत की यह एक बड़ी घटना थी। आजादी के समय पाँच सौ से अधिक देशी रियासतों को भारत में तो विलीन कर लिया गया था किन्तु उनका खजाना, महल और किले उनके ही अधिकार में रह गए थे। यही नहीं, उन्हें केन्द्रीय कर और आयात शुल्क भी नहीं देना पड़ता था। यानी, इनकी शान- शौकत बरकरार थी। इंदिरा गाँधी को लगता था कि जिस देश में इतनी गरीबी हो वहाँ राजाओं को मिलने वाली ये सुविधाएं उचित नहीं हैं। उन्होंने संविधान में 26वाँ संशोधन करके प्रिवी पर्स को हमेशा के लिए बंद कर दिया।

अंतरराष्ट्रीय दबावों की तनिक भी परवाह न करते हुए इंदिरा गाँधी ने 1971 में बंगला देश के मुक्ति संग्राम में जो भूमिका निभाई वह उनकी अद्भुत कूटनीति, सूझबूझ और साहस का उदाहरण है। 1971 का युद्ध भारत के लिए सिर्फ सैन्य जीत नहीं थी, यह राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से बहुत बड़ी सफलता थी। अमेरिका और चीन जैसे देश यह देखकर हैरान थे।

1971 का युद्ध शुरू होने से पहले ही इंदिरा गाँधी कई पहलुओं पर रणनीति बना चुकी थीं। उन्होंने अपने मिलिट्री जनरलों को पूरी छूट दी कि वो मुक्ति वाहिनी को अपने तरीके से तैयार करें। वे युद्ध को छोटा और निर्णायक बनाना चाहती थीं। युद्ध लंबा खिंचने से इसमें अमेरिका और चीन जैसे देशों की दखलंदाजी का डर था। इंदिरा गाँधी ने पूर्वी पाकिस्तान का संकट शुरू होने से लेकर युद्ध तक अपना धैर्य बनाए रखा। वे नहीं चाहती थीं कि किसी भी सूरत में भारत युद्ध शुरू करे। पाकिस्तानी एयरफोर्स के हमले के समय इंदिरा गाँधी कलकत्ता में थीं। वे जल्दी दिल्ली पहुँची और देश को संबोधित करते हुए कहा कि, “हम पर एक युद्ध थोपा गया है।”

इंदिरा गाँधी की रणनीति थी कि युद्ध छोटा हो लेकिन लेकिन लंबा खिंचता है तो दुनिया को पहले से ही पाकिस्तान की करतूत पता होनी चाहिए। इसके लिए मार्च से अक्टूबर 1971 तक इंदिरा गाँधी ने दुनिया के कई नेताओं को खत लिखकर भारत की सीमा पर चल रहे हालात की जानकारी दी। कई देशों की यात्रा करके भी उन्होंने वहाँ पूर्वी पाकिस्तान में चल रहे नरसंहार का जिक्र किया। इंदिरा गाँधी ने सोवियत संघ के तत्कालीन राष्ट्रपति लियोनिद ब्रेझनेव से भी युद्ध के समय सहयोग का आश्वासन ले लिया था। जबकि अमेरिका में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन का इंदिरा के साथ व्यवहार काफी रूखा और असहयोगात्मक था। निक्सन और उनके विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर पहले से ही भारत के खिलाफ थे। पर इंदिरा गाँधी ने इसे भी कूटनीति से जीता और संबोधन का मौका मिलने पर सीधे अमेरिकी लोगों को पूर्वी पाकिस्तान की व्यथा सुना दी। 

जब भारत और पाकिस्तान का युद्ध शुरू हुआ तो निक्सन ने अमेरिका के सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था। इस बेड़े में दुनिया का सबसे बड़ा वॉरशिप भी शामिल था। निक्सन का अंदाजा था कि भारत इस कदम से घबरा जाएगा जबकि, भारत बिलकुल नहीं घबड़ाया और सोवियत संघ से सहयोग के लिए कहा। सोवियत संघ ने भारत के निवेदन को स्वीकारा और व्लादिवोस्तोक से अपना एक बेड़ा बंगाल की खाड़ी के लिए रवाना कर दिया। सोवियत संघ के बेड़े में भी अमेरिका की तरह परमाणु हथियार शामिल थे। ब्रिटिश नेवी का भी एक समूह भारतीय क्षेत्र की तरफ बढ़ रहा था। इसे अमेरिका ने अपनी मदद और भारतीय नेवी को घेरने के लिए बुलाया था। लेकिन सोवियत संघ के बेड़े को देखकर ब्रिटिश नेवी वापस चली गई थी और अमेरिका भी कुछ नहीं कर पाया। सोवियत संघ ने अपना बेड़ा 13 दिसंबर 1971 को भेजा था और तीन दिन बाद युद्ध का फैसला होने वाला था।  

युद्ध शुरू होने के 13 दिन बाद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना की पूर्वी कमांड के इंचार्ज जनरल एए खान नियाजी ने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ भारतीय सेना के पूर्वी कमांड इंचार्ज लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा के सामने ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया था। इस घटना की तस्वीर भारत के पराक्रम की गवाह बनी थी।

16 दिसंबर की शाम 5 बजे जनरल सैम मानेकशॉ ने इंदिरा गाँधी को फोन करके बताया कि ढाका अब मुक्त है और पाकिस्तानी सेना ने बिना शर्त सरेंडर कर दिया है। इंदिरा इसके बाद संसद गईं और कहा, “ढाका अब एक आजाद देश की राजधानी है। हम जीत के इस क्षण में बांग्लादेश के लोगों का अभिवादन करते हैं।” तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गाँधी को पाकिस्तान को हराने और उसके दो टुकड़े करने के लिए ‘दुर्गा’ कहकर संबोधित किया था।

1975 में इंदिरा गाँधी ने सिक्किम को भारत का अंग बना लिया। इसके पहले वह स्वतंत्र राष्ट्र था और वहाँ राजतंत्र था। सिक्किम को भारत का 22वाँ राज्य बनाने के लिए 23 अप्रैल, 1975 को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया था। बिल पास हुआ और 16 मई 1975 को सिक्किम औपचारिक रूप से भारतीय गणराज्य का 22 वाँ प्रदेश बन गया। सिक्किम भारत का अंग बनने के साथ वहाँ नाम्ग्याल राजवंश का शासन हमेशा के लिए खत्म हो गया।

पं। जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू की इकलौती बेटी इंदिरा गाँधी का जन्म 19 नवम्बर 1917 को इलाहाबाद में हुआ था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद इंदिरा ने शांति निकेतन में प्रवेश लिया। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ही इन्हें ‘प्रियदर्शिनी’ नाम भी दिया था। इसके बाद उन्हें इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू कहा जाता था। 18 साल की उम्र में इंदिरा के सिर से माँ का साया उठ गया।

इंदिरा गाँधी का पूरा परिवार स्वाधीनता आन्दोलन से जुड़ा रहा। स्वाभाविक रूप से इंदिरा पर उसका प्रभाव था और वे भी बचपन से ही स्वाधीनता आन्दोलन में सक्रिय रहीं। बचपन में उन्होंने ‘बाल चरखा संघ’ की स्थापना की और असहयोग आंदोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी की सहायता के लिए 1930 में बच्चों के सहयोग से ‘वानर सेना’ का निर्माण किया था।  आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने ऑक्सफोर्ड में दाखिला लिया। यहीं फिरोज गाँधी से उनकी नजदीकियाँ बढ़ीं। वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ रहे थे। वे भी इलाहाबाद के थे और नेहरू परिवार के काफी करीब थे। फिरोज पारसी परिवार से थे। 1941 में पढ़ाई पूरी करके इंदिरा भारत लौटीं। 16 मार्च 1942 को इलाहाबाद में जवाहरलाल नेहरू की इच्छा के विरुद्ध, गाँधी जी के हस्तक्षेप से इंदिरा और फिरोज की शादी हुई। इसके बाद इंदिरा के नाम के आगे ‘गाँधी’ जुड़ा और इस तरह इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरू का नाम इंदिरा गाँधी हो गया। सितम्बर 1942 में उन्हें जेल में डाल दिया गया। 1944 में उन्होंने राजीव गाँधी को जन्म दिया।

इसके दो साल बाद 1946 में संजय गाँधी पैदा हुए। बच्चों के पालन-पोषण की बड़ी जिम्मेदारी इंदिरा जी के सामने थी। इसके बावजूद देश में चल रहे आजादी के आन्दोलन में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही थीं। 1947 में देश जब विभाजन की त्रासदी के कारण साम्प्रदायिकता की आग में जल रहा था तो अपने छोटे बच्चों के बावजूद गाँधी जी के मार्गदर्शन में  इंदिरा गाँधी ने दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर राहत कार्य किया।

1955 में श्रीमती इंदिरा गाँधी कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनी। जवाहर लाल नेहरू के प्रधान मंत्री बनने के बाद इंदिरा गाँधी उनके साथ काम करती रहीं।  1958 में उन्हें कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया। वे एआईसीसी के राष्ट्रीय एकता परिषद की उपाध्यक्ष और 1956 में अखिल भारतीय युवा कांग्रेस और एआईसीसी महिला विभाग की अध्यक्ष बनीं।

1959 में इंदिरा गाँधी चुनाव लड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनीं। वे जवाहर लाल नेहरु की प्रमुख सलाहकार टीम में शामिल थी। 1964 में वे राज्यसभा की सदस्य चुनी गईं। लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया।

भले ही पं। नेहरू ने इंदिरा गाँधी को अपने रहते सक्रिय राजनीति से दूर रखा लेकिन पार्टी से लेकर मंत्रालय तक का ज्यादातर काम इंदिरा गाँधी की निगरानी में होता था। अपने उत्तराधिकारी के तौर पर खुलकर नेहरू ने कभी अपनी बेटी का नाम नहीं लिया लेकिन लाल बहादुर शास्त्री सहित उनके करीबी यही मानते थे कि वे अपनी बेटी को ही अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते हैं।

11 जनवरी 1966 की रात ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री का निधन हो गया। शास्त्री जी के निधन के 8 दिन बाद 19 जनवरी को प्रधानमंत्री पद के चुनाव के लिए वोटिंग हुई। इसमें इंदिरा गाँधी को 355 और मोरारजी देसाई को 169 वोट मिले। इस तरह इंदिरा गाँधी भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। मोरारजी देसाई भारत के उप-प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री बने। इंदिरा गाँधी ने 24 जनवरी 1966 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लीं। वे 24 मार्च 1977 तक प्रधानमंत्री पद पर रहीं। दोबारा वे 14 जनवरी 1980 को प्रधानमंत्री बनीं और अपनी हत्या के समय तक इस पद पर रहीं।

परिवार को लेकर चलने वाले बड़े से बड़े लोगों को भी अपनी संतानों के कारण शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है। लौह महिला इंदिरा गाँधी भी इससे बच न सकीं। प्रख्यात कार निर्माता कंपनी रोल्स रॉयस से प्रशिक्षित होकर इंदिरा गाँधी का छोटा बेटा संजय गाँधी 1969 में इंग्लैंड से भारत लौटा। यहाँ आकर उसने छोटी व सस्ती कार बनाने का लाइसेंस लेने के लिए आवेदन दिया। हरियाणा में बंसीलाल के अधीन चल रही कांग्रेस सरकार ने संजय के इस कारख़ाने के लिए 300 एकड़ से ज्यादा ज़मीन आवंटित कर दी। 1973 तक इंदिरा गाँधी के मुख्य़ सचिव रहे पी।एन।हक्सर ने इस भूमि अधिग्रहण का विरोध किया तो उन्हें हटा दिया गया। इन सारी घटनाओं का असर इंदिरा गाँधी की कार्यशैली पर पड़ना स्वाभाविक था। उनके ऊपर अपनी संतान को लाभ पहुँचाने के आरोप लगने लगे।

वर्षों तक सार्वजनिक जीवन से दूर रहने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण इन्ही दिनों लोकतंत्र बचाने के लिए सक्रिय हो गए। 1973 में उन्होंने जनतंत्र समाज (सिटिजन फॉर डेमोक्रेसी) नाम से एक संगठन बनाया और ‘संपूर्ण क्रान्ति’ का नारा दिया।  सरकार के कामकाज से असंतुष्ट लोग जेपी के साथ जुड़ने लगे।

इस बीच 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में रायबरेली से इंदिरा गाँधी के निर्वाचन को चुनावी धाँधली के कारण अवैध घोषित कर दिया। यही नहीं, न्यायालय ने इंदिरा गाँधी को आगामी छह साल तक किसी भी संवैधानिक पद के लिए भी अयोग्य घोषित कर दिया। 25 जून 1975 को जेपी, मोरारजी देसाई व अन्य दिग्गज नेताओं ने इंदिरा गाँधी को पद से हटाने के लिए दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बड़ी जनसभा का आयोजन किया। इसमें जेपी ने एक ज़िद्दी व मनमानी पर उतारू सरकार को पदच्युत करने के लिए लोगों से असहयोग करने का आह्वान किया। इसी दिन रात में इंदिरा गाँधी ने ‘राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा’ बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। जेपी सहित सभी बड़े विपक्षी नेता गिरफ्तार कर लिए गए। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दिया गया।

जनवरी 1977 में इंदिरा गाँधी को महसूस हुआ कि इमर्जेंसी हटा देनी चाहिए। उन्होंने पहले से पंगु हो चुकी लोकसभा को भंग किया और नए चुनाव की घोषणा कर दी। तमाम राजनीतिक कैदियों को भी रिहा कर दिया गया और देश चुनाव की तैयारियाँ करने लगा। इस चुनाव में कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। इंदिरा गाँधी व संजय दोनों चुनाव हार गए। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस महज 153 सीटों पर सिमट गई, जबकि जनता पार्टी को 298 सीटें मिलीं। इस जनता पार्टी में कांग्रेस (आर), भारतीय जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी व भारतीय लोकदल शामिल थे। चुनाव से लगभग एक माह पहले जल्दबाज़ी में जनता पार्टी बनाई गई थी। जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी व लालकृष्ण आडवाणी को महत्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार सौंपा गया।

आज़ादी के बाद कांग्रेस की इस पहली हार से पार्टी के कई नेता टूटने लगे, लेकिन इंदिरा के भीतर मौजूद योद्धा विचलित नहीं हुआ। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष ब्रह्मानंद रेड्डी ने 1978 के पहले ही दिन इंदिरा गाँधी को पार्टी से निष्कासित करने की घोषणा कर दी। तब इंदिरा गाँधी ने अपने समर्थकों के साथ नई कांग्रेस की घोषणा की। इसे उस समय इंदिरा कांग्रेस या कांग्रेस (आई) कहा जाने लगा। लोकसभा में कांग्रेस के 153 सांसदों में से 76 इंदिरा गाँधी के साथ आ गए, जिसका अभी कोई कार्यालय तक नहीं था। यही नहीं इस आपसी विवाद में पार्टी का चिन्ह गाय-बछड़ा भी दोनों के हाथ से जाता रहा। इंदिरा गाँधी के हाथ में पंजा आया।

जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी। जनवरी 1980 में आम चुनाव हुआ। इंदिरा गाँधी पूर्ण बहुमत से दुबारा सत्ता में आईं। इस बार वे रायबरेली ( उ।प्र।) और मेडक ( आं।प्र।) दोनो जगह से चुनी गईं।

इंदिरा गाँधी के लिए 1980 का दशक खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। 1984 में जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में सिख चरमपंथ की धीरे- धीरे सुलगती आग फैलती गई और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चरमपंथियों का जमावड़ा होने लगा। जून 1984 में इंदिरा गाँधी ने सेना को मंदिर परिसर में घुसने और ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाने का आदेश दिया। उस समय स्वर्ण मंदिर परिसर में हजारों दर्शनार्थी भी मौजूद थे। इस ऑपरेशन में कई निर्दोष नागरिक भी मारे गए। ऑपरेशन ब्लू स्टॉर का निर्णय एक कठिन निर्णय था। इससे खालिस्तान की माँग करने वाले सिख चरमपंथ का तो सफाया हो गया किन्तु इंदिरा गाँधी को इसके लिए अपने प्राण गँवाने पड़े।

इंदिरा गाँधी के निधन के बाद भारत में शोक की जो लहर उठी थी उसका असर आज भी भारत के निष्ठावान नागरिकों के हृदय में महसूस की जा सकती है।

( लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं।)

डॉ. अमरनाथ

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